आओ मिलकर बचाएँ : निर्मला पुतुल ( Aao, Milkar Bachayen : Nirmala Putul )
अपनी बस्तियों को नंगी होने से शहर की आबो-हवा से बचाएँ उसे बचाएँ डूबने से पूरी की पूरी बस्ती को हड़िया में (1) व्याख्या – प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री झारखंड की अपनी संथाली आदिवासी संस्कृति को शहरी सभ्यता-संस्कृति के कुप्रभाव से दूर रखना चाहती हैं क्योंकि अब आदिवासी लोग भी अपनी संस्कृति को छोड़कर धीरे-धीरे … Read more