बादल राग : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ( Badal Raag : Suryakant Tripathi Nirala )

(1) तिरती है समीर-सागर परअस्थिर सुख पर दुःख की छाया-जग के दग्ध हृदय परनिर्दय विप्लव की प्लावित माया-यह तेरी रण-तरीभरी आकांक्षाओं से,घन, भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुरउर में पृथ्वी के, आशाओं सेनवजीवन की, ऊँचा कर सिर,ताक रहे है, ऐ विप्लव के बादल!फिर-फिर! प्रसंग – प्रस्तुत काव्यांश हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक में संकलित ‘बादल राग’ नामक … Read more

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