रेखाचित्र का अर्थ — ‘रेखाचित्र’ शब्द अंग्रेजी भाषा के ‘स्केच’ (Sketch) शब्द का हिंदी अनुवाद है। यह दो शब्दों के मेल से बना है— ‘रेखा’ और ‘चित्र’। जिस प्रकार कोई चित्रकार कैनवस पर कुछ आड़ी-तिरछी रेखाएँ खींचकर किसी व्यक्ति या दृश्य का सजीव चित्र बना देता है, ठीक उसी प्रकार जब कोई साहित्यकार शब्दों के माध्यम से किसी व्यक्ति, वस्तु, घटना या भाव का ऐसा मार्मिक और सजीव वर्णन करता है कि पाठक की आँखों के सामने उसका एक चित्र सा खिंच जाए, तो उसे साहित्य में ‘रेखाचित्र’ (या शब्द-चित्र) कहते हैं। रेखाचित्र में विस्तार कम होता है, लेकिन प्रभाव अत्यंत गहरा होता है।
रेखाचित्र की परिभाषा
विद्वानों ने रेखाचित्र को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है:
- डॉ. भगीरथ मिश्र के अनुसार: “शब्दों के द्वारा किसी व्यक्ति, वस्तु या दृश्य का ऐसा सजीव और मार्मिक वर्णन कि उसका चित्र आँखों के सामने खिंच जाए, रेखाचित्र कहलाता है।”
- पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’ के अनुसार: “रेखाचित्र वह गद्य विधा है जिसमें किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना का शब्दों द्वारा ऐसा सजीव और कलात्मक चित्रांकन किया जाता है कि उसका वास्तविक रूप पाठक के सामने साकार हो उठता है।”
रेखाचित्र के तत्त्वों के आधार पर ‘पुरुष और परमेश्वर’ की समीक्षा
रामवृक्ष बेनीपुरी जी हिंदी साहित्य में रेखाचित्र विधा के शलाका पुरुष माने जाते हैं। यद्यपि रेखाचित्र आमतौर पर किसी व्यक्ति विशेष पर लिखे जाते हैं, लेकिन बेनीपुरी जी का ‘पुरुष और परमेश्वर’ (‘गेहूँ और गुलाब’ पुस्तक से) एक वैचारिक रेखाचित्र है। इसमें किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि मानव जाति की सदियों पुरानी मान्यताओं, ईश्वर की कल्पना और मानव के क्रमिक वैचारिक विकास का शब्द-चित्र खींचा गया है।
रेखाचित्र के प्रमुख तत्त्वों के आधार पर इसकी समीक्षा इस प्रकार है:
(1) विषय-वस्तु — किसी भी रेखाचित्र का पहला तत्त्व उसका विषय होता है। इस रेखाचित्र का विषय बहुत ही दार्शनिक और चिंतनशील है। इसमें पुरुष (मनुष्य) और परमेश्वर (ईश्वर) के बीच महानता के उस आदिम विवाद को विषय बनाया गया है, जो आदि युग से चला आ रहा है। लेखक ने इस बात का विश्लेषण किया है कि कैसे मनुष्य ने अपने भयों और सपनों के कारण ईश्वर की रचना की। बेनीपुरी जी का मानना है कि मनुष्य ने ही अपने रूप में भगवान को गढ़ा है। विषय-वस्तु की दृष्टि से यह रेखाचित्र अत्यंत गंभीर, मौलिक और विचारोत्तेजक है।
(2) चित्रात्मकता और सजीवता — रेखाचित्र की आत्मा उसकी ‘चित्रात्मकता’ होती है। बेनीपुरी जी को ‘कलम का जादूगर’ कहा जाता है, जो शब्दों से चित्र उकेरने में माहिर हैं। इस वैचारिक निबंध में भी उन्होंने मानव की पीड़ा और प्रकृति की निष्ठुरता के सजीव चित्र उकेरे हैं।
- सूखे का चित्र: लेखक एक ऐसा दृश्य उकेरते हैं जहाँ मानव बड़े यत्न से खेत जोतता है और वर्षा के लिए भगवान से गिड़गिड़ाता है, किंतु उत्तर में केवल एक सूखी झंझा (तेज़ आँधी) बहती रहती है।
- युद्ध-भूमि का वीभत्स चित्र: इसी प्रकार, जब युद्ध के मैदान में मनुष्य भगवान से अपनी रक्षा की प्रार्थना करता है, तब वहाँ का चित्र उकेरते हुए लेखक बताते हैं कि वहाँ केवल वीरों की लोथ (लाशें) बिखरी पड़ी हैं, जिन पर चील-कौवे भोज मना रहे हैं। ये शब्द-चित्र पाठक के मन पर गहरा आघात करते हैं।
(3) तटस्थता और यथार्थवाद — एक अच्छे रेखाचित्रकार को अपने विषय के प्रति तटस्थ (Objective) होना चाहिए, ताकि वह सच्चाई को ज्यों का त्यों रख सके। बेनीपुरी जी ने ईश्वर जैसी संवेदनशील और धार्मिक विषय-वस्तु पर बहुत ही तटस्थता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार किया है। वे बिना किसी धार्मिक लाग-लपेट के यथार्थ बताते हैं कि समाज के सर्वसत्ताधारी भगवान असल में उस निरंकुश राजा के प्रतीक हैं जो प्रजा का शोषण करता है। वे स्पष्ट लिखते हैं कि राजनीति में भगवान का काम षड्यंत्र करना है और संपत्ति में लोगों को दरिद्र बनाना है। लेखक का यह यथार्थवादी दृष्टिकोण इस रेखाचित्र को बौद्धिक रूप से बहुत मज़बूत बनाता है।
(4) संवेदनशीलता और मार्मिकता — रेखाचित्र में संवेदना का होना अनिवार्य है। भले ही यह एक वैचारिक रेखाचित्र है, लेकिन इसमें मनुष्य के प्रति लेखक की गहरी संवेदना और करुणा झलकती है। लेखक इस बात से पीड़ित है कि मानव ने भगवान के पीछे पागल होकर स्वयं अपने वजूद को भुला दिया है। मनुष्य का वह दर्द, जहाँ वह ईश्वर पर विश्वास करता है लेकिन फिर भी उसे युद्ध और गरीबी झेलनी पड़ती है, लेखक को व्यथित करता है। अंत में उनकी यही संवेदनशीलता उन्हें इस निष्कर्ष पर ले जाती है कि अब मानव को मानव की ही वंदना और उपासना करनी चाहिए।
(5) भाषा और शैली — बेनीपुरी जी की भाषा ओजपूर्ण, प्रवाहमयी और सूत्रात्मक है। वे छोटे-छोटे वाक्यों में बहुत गहरी बात कह देने की कला जानते हैं।
- “भगवान एक सपना है।”
- “विशुद्ध भगवान का अर्थ है, विशुद्ध मानव।”
- चाहिए जीवित मानव- जो हमें मृत्यु से बचावे।
- परमात्मा की ओर हमने बहुत देखा, अब अपने पुरुषार्थ की ओर देखें।”
इस रेखाचित्र की शैली मुख्य रूप से विश्लेषणात्मक और उद्बोधन वाली है। शब्दों का चयन ऐसा है जो पाठक को सोचने पर विवश कर देता है। अलंकारों और प्रतीकों का बहुत ही सटीक प्रयोग हुआ है।
(6) उद्देश्य — किसी भी सफल रेखाचित्र का एक निश्चित उद्देश्य होता है। ‘पुरुष और परमेश्वर’ का मुख्य उद्देश्य समाज में फैले अंधविश्वासों, काल्पनिक ईश्वरीय सत्ताओं और भाग्यवादी सोच पर प्रहार करना है। लेखक का स्पष्ट उद्देश्य मानवतावाद की स्थापना करना है। वे चाहते हैं कि मनुष्य आसमान की ओर देखना छोड़े और अपने भीतर छिपी अनंत शक्तियों को पहचाने। पाठ के अंत में लेखक ने अपने उद्देश्य को पूरी तरह से स्पष्ट करते हुए कहा है कि हमें परमात्मा की ओर देखना छोड़कर अब अपने ‘पुरुषार्थ’ (कर्म) की ओर देखना चाहिए। मनुष्य को अब एक ऐसे ‘सरल और जीवित मानव’ का निर्माण करना है जो सीधा सोचे और सीधा काम करे।
निष्कर्ष — समग्र रूप से देखा जाए तो ‘पुरुष और परमेश्वर’ रेखाचित्र विधा की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है। यद्यपि इसमें किसी एक हाड़-माँस के व्यक्ति का चित्र नहीं है, लेकिन इसमें ‘संपूर्ण मानव जाति के भयों, विश्वासों और उसके वैचारिक पतन व उत्थान’ का जो भव्य शब्द-चित्र खींचा गया है, वह अद्वितीय है। बेनीपुरी जी ने शब्दों के माध्यम से ईश्वर की काल्पनिकता और मानव के यथार्थ को इतनी सजीवता से प्रस्तुत किया है कि यह हिंदी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ वैचारिक रेखाचित्रों में गिना जाता है।
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