रामवृक्ष बेनीपुरी के रेखाचित्र “पुरुष और परमेश्वर” का सार

रामवृक्ष बेनीपुरी जी द्वारा रचित ‘पुरुष और परमेश्वर’ एक अत्यंत मार्मिक, दार्शनिक और वैचारिक रेखाचित्र है, जो उनके प्रसिद्ध निबंध संग्रह ‘गेहूँ और गुलाब’ का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इस रचना में बेनीपुरी जी ने मनुष्य (पुरुष) और ईश्वर (परमेश्वर) के बीच के सदियों पुराने संबंधों, धार्मिक मान्यताओं और मानवीय मनोविज्ञान का बहुत ही तार्किक और वैज्ञानिक विश्लेषण किया है। लेखक ने पारंपरिक अंधविश्वासों और काल्पनिक ईश्वरीय सत्ता पर गहरी चोट करते हुए यह स्थापित करने का प्रयास किया है कि ईश्वर की अवधारणा वास्तव में मानव की ही कल्पनाओं, आकांक्षाओं और भयों की उपज है। इस निबंध का मुख्य उद्देश्य समाज में ‘मानवतावाद’ की स्थापना करना है। बेनीपुरी जी स्पष्ट करते हैं कि आज के युग की सबसे बड़ी आवश्यकता काल्पनिक ईश्वर की स्तुति करना या उसके भरोसे बैठे रहना नहीं है, बल्कि मनुष्य को अपने ‘पुरुषार्थ’ (कर्म) पर विश्वास करते हुए एक सच्चे और साहसी मानव का निर्माण करना है।

‘पुरुष और परमेश्वर’ का सार

(1) पुरुष और परमेश्वर के बीच का आदिम विवाद — निबंध के आरंभ में ही लेखक स्पष्ट करते हैं कि पुरुष (मनुष्य) और परमेश्वर (ईश्वर) के बीच महानता का यह विवाद कोई आज का नहीं है, बल्कि यह आदि युग से चला आ रहा है। इस विवाद में मुख्य रूप से तीन पक्ष रहे हैं। एक पक्ष का अहम् यह कहता है कि ‘मैं ही सब कुछ हूँ, और संसार मेरा है’। दूसरे पक्ष का तर्क है कि ‘यदि ईश्वर कहीं है भी, तो वह मैं ही हूँ’। जबकि तीसरे पक्ष ने ईश्वर के सामने पूरी तरह से आत्मसमर्पण करते हुए कहा कि ‘जो कुछ हो, तुम्हीं हो और मैं तुम्हारी शरण में हूँ’।
आगे लेखक दो विपरीत विचारधाराओं को सामने रखते हैं। जहाँ एक ओर धार्मिक भक्त का यह मानना है कि भगवान ने अपने रूप में मनुष्य का निर्माण किया है, वहीं दूसरी ओर दर्शनशास्त्र यह कहता है कि मनुष्य ने अपने रूप में भगवान की रचना की है।

(2) ईश्वर की उत्पत्ति: मानव के सपनों और भयों की उपज — बेनीपुरी जी के अनुसार, ईश्वर का अस्तित्व तब शुरू हुआ जब मनुष्य ने सपने देखना (सपनाना) सीखा। ज्यों-ज्यों मनुष्य के सपनों में वृद्धि हुई, भगवान की महत्ता भी उसी अनुपात में बढ़ती गई। जैसे-जैसे मनुष्य के सपने धुंधले पड़े या उनमें परिवर्तन आया, भगवान का स्वरूप भी बदलता गया और धुंधला पड़ता गया।
अतीत के मानव को केवल एक भगवान से संतोष नहीं मिला, इसलिए वह हमेशा अनेक भगवान खोजता रहा। मनुष्य ने प्रकृति के कण-कण में, पृथ्वी की नन्ही दूब से लेकर आकाश के इन्द्रधनुष तक में भगवान के ही दर्शन किए। लेखक स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य के वे विश्वास, जिनके बिना उसका जीना संभव नहीं था, वे ही उसके भगवान बन गए। इसी तरह उसके मन के वे भय, जिनसे बड़ा कोई और सत्य उसे मालूम नहीं होता था, उन्होंने भी भगवान का रूप ले लिया। वास्तव में, भगवान एक सपना है और एक आकांक्षा है, जिससे मानव जीवन पूरी तरह से ओतप्रोत है। मनुष्य की आत्मा हमेशा भगवान का ही सपना देखती रहती है।

(3) प्रार्थनाओं का यथार्थ और प्रकृति की निष्ठुरता — मनुष्य ने एकांत में खड़े होकर, भय और विस्मय में भगवान से प्रार्थना की, उनसे सहायता माँगी और ज्ञान व प्रकाश की याचना की। लेकिन मानव चिल्लाता रहा और भगवान हमेशा चुप ही रहे। जब मानव ने खेतों में बीज बोए और बड़ी मेहनत से खेत जोते, तो उसने वर्षा के लिए भगवान से अपने बादलों को बरसने की आज्ञा देने की प्रार्थना की। परंतु उत्तर में भगवान ने पानी नहीं बरसाया, बल्कि केवल सूखी झंझा (तेज़ हवा) बहती रही।
इसी प्रकार, जब मानव युद्ध-भूमि के चक्रव्यूह में दुश्मनों से घिर गया, तब उसने भयभीत होकर भगवान से अपनी रक्षा और विजय की प्रार्थना की। लेकिन वहाँ भी युद्ध-भूमि में वीरों की लाशें (लोथ) बिखरी पड़ी थीं जिन पर चील-कौवे अपना भोज मना रहे थे। लेखक व्यंग्य करते हैं कि यदि कभी संयोग से वर्षा हो गई या युद्ध में विजय मिल गई, तो मनुष्य उसी स्वप्न को सत्य मानकर भगवान को अपना रक्षक मान लेता है।

(4) समाज, सत्ता और ईश्वर का अंतर्संबंध — लेखक तर्क देते हैं कि भगवान और आदमी आख़िरकार एक ही सिक्के के दो रूप हैं। विशुद्ध भगवान का वास्तविक अर्थ ‘विशुद्ध मानव’ ही है।
समाज में भगवान की जो परिकल्पना की गई है, वह मानवीय शोषण का ही एक रूप है। सर्वसत्ताधारी भगवान वास्तव में उस निरंकुश राजा का प्रतीक है, जो प्रजा का उत्पीड़न या शोषण करता है। सर्वज्ञ भगवान उस पुरोहित के समान है, जो जनता के अज्ञान पर अपना व्यापार चलाता है। राजनीति में भगवान का काम षड्यंत्र करना है और संपत्ति के मामले में भगवान का काम अधिकाधिक लोगों को दरिद्र बनाना है। वस्तुतः मानव ने भगवान को कभी अपने से महान नहीं बनाया। जब तक मानव संहार में लीन है, वह संहारकर्ता भगवान की ही सृष्टि करेगा। समाज के विचार ही भगवान के विचार हैं और जनता का दृष्टिकोण ही भगवान का दृष्टिकोण होता है।
जब मानव आँधी, अंधकार या प्रकाश की सीधे उपासना करता था, तब वह अधिक सरल और ईमानदार था। लेकिन जब उसने इनमें देवत्व या ईश्वरत्व की कल्पना कर ली, तो वह भूल-भुलैया में फँस गया। मानव-विचार में असीम बल है; आदमी जैसा सोचता है, संसार को उसी के अनुरूप ढलना होता है।

(5) मानवता की वंदना और नये युग का आह्वान — लेखक आह्वान करते हैं कि ‘भगवान-निर्माता’ के रूप में मानव ने अपनी प्राकृतिक शक्ति का बहुत परिचय दे दिया है। अब समय आ गया है कि वह ‘मानव-निर्माता’ के रूप में अपने कौशल का परिचय दे। अब मानव को भगवान की नहीं, बल्कि मानव की उपासना और वंदना करनी चाहिए। हमारी कविताएँ और गीत अब भगवान की स्तुति करने के बजाय मानव की अलिखित यशोगाथा को छन्दोबद्ध करें।
मानव ने राह चलते कितने ही देव और ईश्वर बनाये। लेकिन अब उसे एक ऐसे महान ‘मानव’ का निर्माण करना चाहिए, जिसकी शक्तियों के सामने छप्पन कोटि देव और देवाधिदेव भगवान भी नतमस्तक हो जाएं।

(6) जीवन का सच्चा स्वप्न: पुरुषार्थ और कर्म — मनुष्य को नए और सुनहले सपने देखने चाहिए और इसमें लज्जित होने की कोई बात नहीं है। हमें नए दिन, नए कर्त्तव्यों और नए साहसों के सौंदर्य का सपना देखना है। लज्जित न होना ही नए मानव के लिए एक नई कला है।
लेखक मानव की शक्ति के तीन सपने बताते हैं:

    • काम करने का सपना।
    • रात का सपना।
    • छलना का सपना।
      इन सभी में सबसे अमर और सच्चा सपना ‘काम करने का सपना’ है। रचनात्मक शक्ति के इसी सच्चे सपने का नाम वास्तव में ‘जीवन’ है। अंत में लेखक एक ऐसे जीवित और सरल मानव की कामना करते हैं जो सीधा देखे, सीधा सोचे और सीधा काम करे। यह जीवित मानव ही हमें मृत्यु से बचा सकता है।
      निबंध का अंतिम और सबसे सशक्त निष्कर्ष यह है कि हमने परमात्मा की ओर बहुत देख लिया, अब हमें परमात्मा की ओर देखना छोड़कर अपने ‘पुरुषार्थ’ (कर्म और मेहनत) की ओर देखना चाहिए।

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