साहित्य में ‘आत्मकथा’ उस विधा को कहते हैं जिसमें कोई लेखक अपने ही जीवन की कहानी को खुद लिखता है। हिंदी साहित्य में महान कवि हरिवंशराय बच्चन जी की आत्मकथा का बहुत ऊँचा स्थान है। उन्होंने अपने जीवन की कहानी को चार भागों में लिखा था। इनमें से दूसरा भाग है— ‘नीड़ का निर्माण फिर’।
इस किताब का नाम बहुत ही खास है। ‘नीड़’ का मतलब होता है— ‘घोंसला’। जब कोई भयानक आँधी आती है और किसी पक्षी का घोंसला टूट कर बिखर जाता है, तो वह पक्षी रोता नहीं रहता, बल्कि आँधी रुकने के बाद वह फिर से तिनके बटोरता है और अपना नया घोंसला (नीड़) बनाता है। यह आत्मकथा भी बच्चन जी के जीवन के पूरी तरह से बर्बाद हो जाने के बाद, राख से उठकर फिर से अपनी ज़िंदगी को सजाने और नया घर बसाने की एक बहुत ही सुंदर और प्रेरणा देने वाली कहानी है।
नीचे आत्मकथा के प्रमुख तत्त्वों के आधार पर इस किताब की समीक्षा की गई है:
(1) कथानक — किसी भी आत्मकथा का सबसे पहला तत्त्व यह होता है कि उसमें किस विषय या कहानी के बारे में बताया गया है।
इस किताब की कहानी बच्चन जी की ज़िंदगी के सबसे दुख भरे दौर से शुरू होती है। उनकी पहली पत्नी श्यामा का टी.बी. की बीमारी से निधन हो गया था। पत्नी के जाने के बाद वे पूरी तरह टूट गए थे। उनका घर सूना हो गया था और ज़िंदगी में बस उदासी, अकेलापन और अँधेरा बचा था। इसी बीच उनके पिता जी का भी साया सिर से उठ गया और घर पर कर्ज का भारी बोझ आ गया।
किताब का मुख्य विषय यही है कि इस भयानक निराशा और अकेलेपन से जूझते हुए बच्चन जी कैसे तेजी सूरी (तेजी बच्चन) से मिले। तेजी जी ने कैसे अपनी समझदारी और सच्चे प्यार से बच्चन जी की टूटी हुई ज़िंदगी को फिर से संवारा। उन्होंने कैसे समाज की परवाह न करते हुए एक-दूसरे का हाथ थामा और एक नया खुशहाल घर (नीड़) बसाया। यही इस पूरी आत्मकथा का मुख्य विषय है, जो बहुत ही बांधे रखने वाला है।
(2) सच्चाई और ईमानदारी –– आत्मकथा लिखते समय लेखक के लिए सबसे ज़रूरी और सबसे मुश्किल काम होता है— ‘सच बोलना’। एक अच्छी आत्मकथा वही होती है जिसमें लेखक अपने आप को एक महान ‘हीरो’ बनाकर न पेश करे, बल्कि अपनी कमियों को भी दुनिया के सामने रखे।
इस कसौटी पर ‘नीड़ का निर्माण फिर’ पूरी तरह से सौ प्रतिशत खरी उतरती है। बच्चन जी ने इसमें अपनी गलतियों, अपनी कमजोरियों और अपनी बुराइयों को बिना किसी शर्म या परदे के बताया है। उन्होंने बड़ी ईमानदारी से लिखा है कि पत्नी की मौत के बाद वे किस तरह रास्ता भटक गए थे, कैसे उन्होंने खुद को शराब के नशे में डुबो लिया था और कैसे उनके मन में आत्महत्या (खुद को खत्म करने) के विचार आते थे। यहाँ तक कि उन्होंने उस दौर में अपने जीवन में आई अन्य महिलाओं के बारे में भी पूरी सच्चाई से लिखा है। उनकी यह बेबाकी और ईमानदारी ही इस किताब को सबसे सच्ची और प्रामाणिक आत्मकथा बनाती है।
(3) चरित्र-चित्रण — आत्मकथा में लेखक के अपने व्यक्तित्व के साथ-साथ उनसे जुड़े अन्य लोगों के चरित्र भी उभर कर सामने आते हैं।
इस किताब में मुख्य रूप से दो ही चरित्र सबसे ज्यादा चमकते हैं— बच्चन जी और तेजी जी। बच्चन जी एक ऐसे इंसान के रूप में दिखाई देते हैं जो बहुत भावुक हैं, जो दुखों के बोझ तले दब गए हैं, लेकिन फिर भी अपनी विधवा माँ और परिवार को पालने के लिए ट्यूशन पढ़ाकर संघर्ष कर रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर, तेजी बच्चन जी का चरित्र बहुत ही शक्तिशाली और प्रेरणादायक रूप में सामने आता है। वे एक बहुत ही खुशमिज़ाज, कला से प्यार करने वाली और मजबूत इरादों वाली महिला थीं। उन्होंने बच्चन जी के दर्द को गहराई से समझा और एक सच्चे साथी की तरह उनका हाथ थाम लिया। तेजी जी का यह रूप साबित करता है कि एक औरत का सच्चा प्यार किसी भी टूटे हुए इंसान को फिर से खड़ा कर सकता है।
(4) देशकाल और वातावरण — एक अच्छी आत्मकथा अपने समय के समाज का एक आइना (शीशा) भी होती है। उसमें उस समय के समाज की सोच और रहन-सहन का पता चलता है।
इस पुस्तक में 1930 और 1940 के दशक (समय) का माहौल बहुत ही अच्छे ढंग से दिखाया गया है। इसमें हमें इलाहाबाद और बरेली शहरों की जीवन-शैली देखने को मिलती है। उस समय का समाज आज की तरह आज़ाद खयालों वाला नहीं था। जब बच्चन जी (जो एक साधारण कायस्थ परिवार से थे और जिनकी पहली पत्नी गुज़र चुकी थी) ने तेजी जी (जो एक अमीर पंजाबी खत्री परिवार से थीं) से शादी करने का फैसला किया, तो समाज में इसे बहुत गलत माना गया। अलग-अलग जाति और राज्य में शादी करना उस समय एक बहुत बड़ी बगावत थी। बच्चन जी ने अपनी किताब में उस समय के रूढ़िवादी समाज, लोगों के तानों और अपनी आर्थिक तंगी का बहुत ही जीता-जागता चित्र खींचा है, जो उस समय के वातावरण को एकदम सच साबित करता है।
(5) भाषा और शैली — आत्मकथा तभी अच्छी लगती है जब उसकी भाषा में एक खिंचाव हो और वह पढ़ने वाले को बोर न करे।
बच्चन जी मूल रूप से एक बहुत बड़े कवि थे। इसलिए, जब उन्होंने गद्य अपनी आत्मकथा लिखी, तब भी उसमें कविता जैसी मिठास और रवानी आ गई। इस किताब की भाषा बहुत ही आसान, लगातार बहने वाली और सीधे दिल को छू लेने वाली है। उन्होंने बहुत ही आम बोलचाल के शब्दों का इस्तेमाल किया है, जिससे एक आम पाठक भी उनकी भावनाओं से तुरंत जुड़ जाता है।
उनकी शैली में एक जादुई प्रवाह है। किताब पढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे बच्चन जी हमारे सामने बैठे हों और अपनी ज़िंदगी का दुख-सुख हमसे बाँट रहे हों। बीच-बीच में उन्होंने अपनी कविताओं की पंक्तियों का भी इस्तेमाल किया है, जो कहानी के असर को और भी ज्यादा बढ़ा देती हैं।
(6) उद्देश्य या संदेश — कोई भी बड़ी रचना बिना किसी उद्देश्य के नहीं लिखी जाती।
बच्चन जी की इस आत्मकथा का उद्देश्य केवल दुनिया को अपने प्यार या शादी की कहानी सुनाना नहीं था। इसका सबसे बड़ा उद्देश्य हार चुके और निराश हो चुके इंसानों के अंदर एक नई उम्मीद जगाना था। बच्चन जी दुनिया को यह संदेश देना चाहते थे कि ज़िंदगी में चाहे कितने भी बड़े तूफान क्यों न आ जाएं, चाहे आपका सब कुछ उजड़ जाए, लेकिन आपको कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। बर्बादी के बाद, कुछ नया बनाने का समय ज़रूर आता है। इंसान के अंदर की जीने की इच्छा हमेशा दुखों से बड़ी होती है।
निष्कर्ष — अंत में, हम पूरी पक्के तौर पर कह सकते हैं कि हरिवंशराय बच्चन जी की किताब ‘नीड़ का निर्माण फिर’ आत्मकथा की सभी कसौटियों और तत्त्वों पर पूरी तरह से खरी उतरती है। यह सिर्फ एक इंसान की ज़िंदगी का पन्ना नहीं है, बल्कि यह मानव आत्मा की उस ताकत की कहानी है जो राख में से भी नया जीवन पैदा कर सकती है।
इस किताब में बच्चन जी की निर्मम सच्चाई, तेजी जी का निस्वार्थ प्रेम, उस समय के समाज की तस्वीर और जीवन से कभी हार न मानने का संदेश—ये सब मिलकर इसे हिंदी साहित्य की एक बहुत ही अनमोल और महान आत्मकथा बनाते हैं। यह किताब हर उस इंसान के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा है, जिसे लगता है कि उसकी ज़िंदगी में अब सिर्फ अँधेरा बचा है, क्योंकि यह हमें सिखाती है कि अँधेरे के बाद उजाला ज़रूर आता है और उजड़े हुए घोंसले फिर से बनाए जा सकते हैं।
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