व्यक्तित्व का अर्थ — व्यक्तित्व से आशय व्यक्ति के बाहरी और आंतरिक गुणों के समग्र रूप से है। इसमें व्यक्ति का स्वभाव, व्यवहार, विचार, भावनाएँ और बोलचाल शामिल होते हैं। व्यक्ति दूसरों के सामने जैसा दिखाई देता और व्यवहार करता है, वही उसका व्यक्तित्व कहलाता है।
व्यक्तित्व विकास के तत्त्व
व्यक्तित्व विकास के तत्त्व या व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले तत्त्व निम्नलिखित हैं :
(1) वंशानुक्रम (अनुवांशिकता) — व्यक्ति को कुछ गुण जन्म से ही माता-पिता से प्राप्त होते हैं। जैसे शारीरिक बनावट, बुद्धि और स्वभाव। ये गुण व्यक्तित्व की नींव बनाते हैं।
(2) पारिवारिक वातावरण — परिवार बच्चे का पहला विद्यालय होता है। माता-पिता का व्यवहार, संस्कार और प्रेम बच्चे के व्यक्तित्व को आकार देता है। अच्छा पारिवारिक वातावरण सकारात्मक व्यक्तित्व बनाता है।
(3) शिक्षा — शिक्षा व्यक्ति की सोच और समझ को विकसित करती है। विद्यालय और शिक्षक व्यक्ति में अनुशासन, आत्मविश्वास और नैतिक मूल्य पैदा करते हैं। शिक्षा से व्यक्तित्व निखरता है।
(4) सामाजिक वातावरण — समाज, मित्र और पड़ोसी व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। अच्छे मित्र अच्छे गुण सिखाते हैं। समाज से व्यक्ति सामाजिक नियम और मर्यादा सीखता है।
(5) अनुभव — जीवन के अनुभव व्यक्ति को परिपक्व बनाते हैं। सुख-दुःख और सफलता-असफलता से व्यक्ति बहुत कुछ सीखता है। अनुभव से व्यक्तित्व मजबूत होता है।
(6) आर्थिक स्थिति — परिवार की आर्थिक स्थिति भी व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करती है। सुविधाएँ मिलने से शिक्षा और अवसर बढ़ते हैं। इससे आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास बढ़ता है।
(7) संस्कृति और परंपराएँ — संस्कृति व्यक्ति को संस्कार और मूल्य सिखाती है। रीति-रिवाज और परंपराएँ व्यक्ति के व्यवहार को दिशा देती हैं। इससे व्यक्ति की पहचान बनती है।
अतः स्पष्ट है कि वंशानुक्रम, परिवार, शिक्षा, समाज, अनुभव, आर्थिक स्थिति और संस्कृति मिलकर व्यक्ति के व्यक्तित्व को आकार देते हैं। ये तत्त्व व्यक्ति के विचार, व्यवहार और स्वभाव को दिशा प्रदान करते हैं। इसलिए संतुलित वातावरण और सकारात्मक प्रयासों से व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को बेहतर बना सकता है।