यह प्रसिद्ध रचनाकार शरद जोशी जी द्वारा लिखा गया एक तीखा व्यंग्य है। इस पाठ का मुख्य विषय हमारे देश की सरकारी व्यवस्था, अफसरशाही का खोखलापन और किसानों के प्रति उनकी संवेदनहीनता है।
अक्सर सरकार किसानों की भलाई के लिए योजनाएँ बनाती है और अधिकारी खेतों के दौरे करते हैं। लेकिन असलियत में, यह सब केवल दिखावा होता है। इस रचना में लेखक ने बहुत ही रोचक और मज़ाकिया ढंग से बताया है कि जो अधिकारी किसानों की फसल को ‘इल्लियों’ (फसल बर्बाद करने वाले कीड़ों) से बचाने जाते हैं, वे खुद ही सबसे बड़ी इल्लियाँ बनकर किसान का शोषण करते हैं।
“जीप पर सवार इल्लियाँ” व्यंग्य का सार
चने और इल्ली की चर्चा: लेखक मज़ाकिया अंदाज़ में बताते हैं कि उन्हें खेती की कोई जानकारी नहीं है, बस उन्हें चना खाना बहुत पसंद है। अचानक अख़बारों में खबर आती है कि खराब मौसम के कारण चने के खेतों में इल्ली लग गई है।
इला और इल्ली का संबंध: लेखक के एक ज्ञानी मित्र उन्हें बताते हैं कि ‘इला’ का अर्थ अन्न की अधिष्ठात्री देवी (पृथ्वी) है। इस पर लेखक व्यंग्य करते हुए सोचते हैं कि इल्ली उसी ‘इला’ की पुत्री है जो अपनी ही माँ की कमाई खाकर अख़बारों में पब्लिसिटी लूट रही है।
सरकारी दिखावा: अख़बारों में शोर मचने और नेताओं के भाषण देने के बाद सरकार और अफसर जागते हैं। एकदम से दिखावे के लिए बैठकें होती हैं, फाइलें उदित होती हैं और रेंगती हुई रिपोर्टों से राजधानी घिर जाती है। एक दिन एक कृषि अधिकारी (बड़ा अफसर) लेखक को भी ‘इल्ली उन्मूलन’ की प्रगति देखने के लिए अपनी जीप में खेतों की ओर ले जाता है।
खेतों का दौरा: खेत पहुँचकर बड़ा अफसर छोटे अफसर से इल्लियों के बारे में रटे-रटाए सवाल करता है और छोटा अफसर बस नम्रता से ‘जी हाँ’ में जवाब देता है। उन्हें असल समस्या सुलझाने में कोई दिलचस्पी नहीं होती।
किसान का शोषण: बड़ा अफसर घर ले जाने के लिए हरे चने (बूट) की माँग करता है। छोटा अफसर एक गरीब किसान को घुड़ककर डराता है कि इल्ली लगने के अपराध में उसका खेत ज़ब्त हो जाएगा। डर के मारे काँपता हुआ किसान मुफ्त में चने के पौधे उखाड़कर साहब की जीप में रखने लगता है।
अफसरों का पाखंड: एक तरफ बेचारे किसान की खड़ी फसल लुट रही होती है, और दूसरी तरफ बड़ा अफसर खेतों में टहलते हुए शांति और सुख का अनुभव करता है। वह मैथिलीशरण गुप्त की ग्राम-जीवन वाली कविताएँ सुनाकर झूठी भावुकता का प्रदर्शन करता है।
असली इल्लियाँ: वापसी में जीप हरे चनों से भरी होती है। लेखक और अफसर मजे से चने खा रहे होते हैं। तभी लेखक को गहराई से यह एहसास होता है कि खेतों को असली कीड़ों ने उतना नुकसान नहीं पहुँचाया, जितना जीप में बैठे इन तीन लोगों ने पहुँचाया है। वास्तव में, जीप में सवार ये तीनों लोग ही असली ‘इल्लियाँ’ हैं जो किसान की मेहनत को मुफ्त में चट कर रही हैं।
यह भी पढ़ें :
नव्यतर गद्य विधाएँ ( BA 6th Semester Kuk ) ( महत्वपूर्ण प्रश्न )