“जीप पर सवार इल्लियाँ” व्यंग्य लेख का उद्देश्य / संदेश / मूल भाव

हिंदी साहित्य के मूर्धन्य व्यंग्यकार शरद जोशी द्वारा रचित “जीप पर सवार इल्लियाँ” केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि यह आज़ाद भारत की भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था, सरकारी अफसरों के खोखलेपन और किसानों की दयनीय स्थिति पर किया गया एक बेहद तीखा और मारक व्यंग्य है। साहित्य में ‘व्यंग्य’ वह विधा है जिसमें समाज की बुराइयों पर हँसी-मज़ाक के आवरण में गहरी चोट की जाती है।

इस पाठ का शीर्षक ही अपने आप में बहुत प्रतीकात्मक है। ‘इल्ली’ उस छोटे से कीड़े को कहते हैं जो फसलों (विशेषकर चने की फसल) पर लगकर उसे धीरे-धीरे खोखला कर देता है और किसानों की महीनों की मेहनत को बर्बाद कर देता है।
लेकिन शरद जोशी जी ने इस पाठ के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि हमारे समाज में किसानों की फसल को असली नुकसान खेतों में रेंगने वाले छोटे कीड़े नहीं पहुँचा रहे हैं, बल्कि सरकारी जीप पर सवार होकर आने वाले वे ‘अधिकारी रूपी कीड़े’ (इल्लियाँ) पहुँचा रहे हैं, जिन्हें सरकार ने किसानों की रक्षा के लिए भेजा है। यह रचना दिखाती है कि कैसे रक्षक ही भक्षक बन जाते हैं।

पाठ की पृष्ठभूमि और संदर्भ

कहानी की शुरुआत बहुत ही सहज और मज़ाकिया ढंग से होती है। लेखक बताते हैं कि शहर के अखबारों में अचानक यह खबर ज़ोर पकड़ने लगती है कि खराब मौसम के कारण चने के खेतों में इल्ली लग गई है। अखबार इस खबर को खूब उछालते हैं, यहाँ तक कि एक अखबार तो चने के पौधे पर बैठी इल्ली की एक सुंदर सी तस्वीर भी छाप देता है।
लेखक इस बात पर भी व्यंग्य करते हैं कि जब अखबारों में शोर मचता है और नेता लोग भाषण बाज़ी शुरू करते हैं, केवल तब जाकर हमारी सोई हुई सरकारी व्यवस्था की नींद टूटती है। सरकार जागती है, मंत्री जागते हैं, अफसर जागते हैं और धूल खाई हुई फाइलें अचानक मेजों पर उदित हो जाती हैं। यह पूरा दृश्य हमारे देश की उस लालफीताशाही (Red Tapism) को दर्शाता है जहाँ कोई भी काम तब तक नहीं होता जब तक कि मीडिया या राजनेताओं का दबाव न पड़े।

पाठ का मुख्य उद्देश्य

इस व्यंग्य को लिखने के पीछे लेखक शरद जोशी के कई गहरे सामाजिक और राजनीतिक उद्देश्य छिपे हुए हैं, जिन्हें हम निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझ सकते हैं:

(1) अफसरशाही और भ्रष्टाचार की पोल खोलना — पाठ का सबसे प्रमुख उद्देश्य सरकारी अधिकारियों के भ्रष्ट आचरण और उनकी कामचोरी को उजागर करना है। जब ‘इल्ली उन्मूलन’ (कीड़ों को नष्ट करने) का आदेश निकलता है, तो एक कृषि अधिकारी (बड़ा अफसर) अपनी जीप में बैठकर खेतों का दौरा करने निकलता है। साथ में लेखक भी यह देखने चले जाते हैं कि चने के पौधे होते हैं या झाड़।
खेत में पहुँचकर बड़ा अफसर छोटे अफसर से इल्लियों को लेकर जो बातचीत करता है, वह पूरी तरह से रटी-रटाई और औपचारिक होती है। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि असल में फसल का कितना नुकसान हुआ है या किसान की परेशानी क्या है। उनका यह दौरा केवल सरकारी कागज़ों का पेट भरने और अपनी ड्यूटी का दिखावा करने के लिए होता है।

(2) व्यवस्था द्वारा गरीब किसान का शोषण — यह व्यंग्य दिखाता है कि कैसे सत्ता और पद का दुरुपयोग करके गरीबों को डराया जाता है। बड़ा अफसर छोटे अफसर से अपने घर ले जाने के लिए हरे चने (बूट) की माँग करता है। इस पर छोटा अफसर तुरंत एक गरीब किसान को बुलाता है और उस पर चिल्लाता है। वह किसान से पूछता है कि उसके खेत की इल्लियाँ कहाँ गईं।
बेचारा भोला-भाला किसान हाथ जोड़कर काँपने लगता है; उसे लगता है कि खेत में इल्ली लगने के अपराध में सरकार उसका खेत ही ज़ब्त कर लेगी। किसान के इसी डर का फायदा उठाकर छोटा अफसर उसे डरा-धमका कर मुफ्त में साहब की जीप के लिए हरे चने उखाड़कर रखने का आदेश देता है। लेखक का उद्देश्य यह बताना है कि जो तंत्र किसान को राहत देने के लिए बना है, वही तंत्र उसे डराकर लूट रहा है।

(3) शहरी संभ्रांत वर्ग की झूठी सहानुभूति और पाखंड — लेखक ने पाठ में बड़े अफसर के दोहरे चरित्र (Double Standard) पर गहरी चोट की है। एक तरफ उसका मातहत (छोटा अफसर) किसान को डराकर उसकी फसल मुफ्त में लुटवा रहा होता है और किसान अपने ही हाथों अपनी फसल उखाड़ रहा होता है, वहीं दूसरी तरफ बड़ा अफसर खेतों में टहलते हुए शांति और सुख का नाटक कर रहा होता है।
वह खेतों को देखकर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की ग्राम-जीवन पर लिखी कविताएँ सुनाने लगता है जो उसने कभी रटी थीं। उसे ग्रामीण जीवन बहुत सुहावना लगता है, लेकिन उस ग्रामीण जीवन को जीने वाले किसान के दर्द से उसे कोई हमदर्दी नहीं है। लेखक का उद्देश्य यह दिखाना है कि शहरी बाबू और अफसर केवल किताबों और कविताओं में गाँव से प्यार करते हैं, असलियत में वे किसानों के प्रति पूरी तरह संवेदनहीन हैं।

(4) मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग की उदासीनता पर कटाक्ष — शरद जोशी जी ने केवल सिस्टम पर ही नहीं, बल्कि अपने आप पर (बुद्धिजीवी वर्ग पर) और मीडिया पर भी व्यंग्य किया है। लेखक स्वीकार करते हैं कि उन्हें चने के बारे में बस इतना पता है कि वह खाया जाता है। जब इल्ली की समस्या आती है, तो वे कुछ ठोस करने के बजाय ‘इल्ली’ से ‘बिल्ली’ और ‘दिल्ली’ की तुकबंदी मिलाकर कविता लिखने के बारे में सोचते हैं।
वहीं उनके एक ज्ञानी मित्र इल्ली का संबंध अन्न की देवी ‘इला’ से जोड़कर अपनी विद्वता बघारते हैं। मीडिया भी केवल तस्वीरें छापने और शोर मचाने तक सीमित है। इस प्रकार लेखक यह स्पष्ट करते हैं कि समाज का पढ़ा-लिखा वर्ग और मीडिया भी ज़मीनी हकीकत से कटा हुआ है और केवल बातों के महल बनाता है।

(5) ‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ की प्रतीकात्मकता को सिद्ध करना — पाठ का अंतिम उद्देश्य शीर्षक की सार्थकता को सिद्ध करना है। जब अफसरों की जीप हरे चनों के ढेर से भर जाती है और वे वापसी के सफर पर निकल पड़ते हैं। जीप में बैठे हुए बड़ा अफसर, छोटा अफसर और स्वयं लेखक मज़े से उन मुफ्त के चनों को खा रहे होते हैं।
उस समय लेखक के मन में यह गहरा विचार कौंधता है कि खेतों को उन नन्हीं इल्लियों ने उतना बर्बाद नहीं किया, जितना जीप में सवार इन तीन इल्लियों ने किया है। असली कीड़े तो ये अफसर हैं जो जनता के पैसे और किसान की मेहनत को बिना किसी अपराधबोध के खाए जा रहे हैं।

निष्कर्ष –– निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि “जीप पर सवार इल्लियाँ” केवल एक कृषि विभाग के दौरे की हास्य कथा नहीं है, बल्कि यह आज़ाद भारत के उस कड़वे सच का पर्दाफाश है जहाँ ‘मुहाफ़िज़’ (रक्षक) ही ‘चोर’ बन बैठे हैं।
शरद जोशी जी ने बहुत ही सरल और व्यंग्यात्मक भाषा का प्रयोग करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि जब तक देश की नौकरशाही (Bureaucracy) संवेदनशील और ईमानदार नहीं होगी, तब तक कितनी भी योजनाएँ बन जाएँ, निचले स्तर पर गरीब और किसान का शोषण होता ही रहेगा। जीप पर सवार वे इल्लियाँ आज भी हमारे समाज के हर सरकारी विभाग में मौजूद हैं, जो फाइलें तो दौड़ाती हैं, लेकिन आम आदमी का हक़ मारकर अपनी जीपें भरती हैं।
लेखक का मूल उद्देश्य पाठकों को हँसाने के साथ-साथ उन्हें इस भ्रष्ट व्यवस्था के प्रति जागरूक करना और सोचने पर मजबूर करना है कि आख़िर इस सिस्टम रूपी ‘इल्ली’ का उन्मूलन (सफाया) कैसे किया जाए।

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