‘बयालीस के ज्वार की लहरों में’ संस्मरण का सार

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ जी का यह संस्मरण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे निर्णायक और उग्र चरण 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (Quit India Movement) का अत्यंत सजीव और रोंगटे खड़े कर देने वाला चित्रण है। संस्मरण की शुरुआत में ही लेखक उस समय के माहौल का खाका खींचते हुए बताते हैं कि उन दिनों भारतवासी पूरी तरह से जोश और उफान में थे, जबकि ब्रिटिश सत्ता अपने पूरे जोर और ताकत के साथ उन्हें दबाने में लगी थी। यह एक ऐसा समय था जब अंग्रेजों की सदियों पुरानी सत्ता के उखड़ने का खतरा मंडरा रहा था, और दूसरी ओर भारतीयों की महानता फिर से जन्म लेने वाली थी। अंग्रेजों के पास लगभग सौ सालों की खूंखार सैनिक ताकत थी, तो भारतीयों के पास भी लगभग एक सदी से सुलग रही विद्रोही भावनाओं की आग थी।
यह एक ‘करो या मरो’ का संघर्ष था; अगर अंग्रेज इस दाँव में चूकते तो उनकी सत्ता की मौत निश्चित थी, और अगर भारतीय चूकते तो उनकी घोर पराजय होती। अंग्रेज अपनी उखड़ती हुई जड़ों को वापस जमाने की कोशिश कर रहे थे, जबकि भारतीय अपनी सदियों से उखड़ी पड़ी स्वतंत्रता की जड़ें फिर से जमाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। दोनों ही पक्ष अपनी जान की बाज़ी लगाकर यह ऐतिहासिक खेल खेल रहे थे। भारतवासियों की देशभक्ति का केवल एक ही स्पष्ट नारा था कि “अंग्रेजों, यहाँ से निकल जाओ,” जबकि इसके जवाब में अंग्रेजी सेना का अहंकार भरा उद्घोष था कि “हम क्यों निकल जाएँ?”। इस भयानक संघर्ष में कोई एक कसर नहीं छोड़ रहा था। भले ही उस समय के हालात को देखकर अतीत यह गवाही देता हो कि अंग्रेज जीत गए और हम हार गए, लेकिन इतिहास और वर्तमान इस बात के साक्षी हैं कि अंग्रेज वह लड़ाई जीतकर भी हार गए, और हम हार कर भी ऐसा चमत्कारिक रूप से जगे कि हमारी असली जीत हुई।

9 अगस्त, 1942 नेतृत्वविहीन जनता का विद्रोह — 9 अगस्त, 1942 को बम्बई (मुंबई) में राष्ट्रीय महासभा ने ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पास किया था। लेकिन इससे पहले कि यह आंदोलन कोई निश्चित रूप ले पाता, अंग्रेजी सरकार ने ९ अगस्त १९४२ की सुबह ही देशभर से चुन-चुनकर सभी बड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेलों में बंद कर दिया। भारत के इन शत्रुओं को यह घमंड था कि उन्होंने इस बगावत को हमेशा के लिए कुचल दिया है और अब इस देश में जनता को बगावत की राह दिखाने वाला कोई भी नेता नहीं बचा है। अंग्रेजी शासन का मस्तिष्क यह सोचकर निश्चित था कि उन्होंने क्रांति के शिशु को पैदा होने से पहले ही कुचल दिया है। उनकी यह निश्चिंतता बिल्कुल वैसी ही थी जैसे किसी ज़माने में कंस भगवान कृष्ण के संबंध में निश्चित होकर सो गया था।

ब्रिटिश मंत्री एमरी की मूर्खता और क्रांति को दिशा — अंग्रेज उस समय द्वितीय विश्व युद्ध जीत रहे थे, इसलिए उन्हें दुनिया के सामने अपनी साख भी बचानी थी। इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारतमंत्री ‘एमरी’ ने लंदन रेडियो से दुनिया के सामने कांग्रेस के नेताओं की गिरफ्तारी को सही ठहराने की कोशिश की। उसने अपने भाषण में कहा कि कांग्रेस ने एक भयंकर हिंसात्मक क्रांति की योजना बनाई थी, जिसमें रेलवे स्टेशन फूँकना, लाइनें तोड़ना और पुलिस थानों पर कब्ज़ा करना शामिल था; इसीलिए उन्हें मजबूर होकर कांग्रेसियों को पकड़ना पड़ा।
लेकिन एमरी का यह भाषण अंग्रेजों के लिए ही आत्मघाती साबित हुआ। इस भाषण ने नेतृत्वविहीन और गुस्से में भरी भारतीय जनता को एक नई दिशा और नया बल दे दिया। नेताओं की सामूहिक गिरफ्तारी से जनता के दिलों में जो आग सुलग रही थी, वह एमरी के शब्दों को सुनकर एकदम से भड़क उठी। अब जनता को समझ आ गया था कि उन्हें क्या करना है, और बिना किसी नेता के ही पूरे देश की जनता सड़कों पर उभर आई। जनता के इस भारी उभार में एक हुंकार थी कि अंग्रेजों का यह सोचना गलत है कि क्रांति मिट गई है।
देखते ही देखते भारतवासियों ने अंग्रेजी शासन की शक्ति के मुख्य केंद्रों—पुलिस थानों, डाकघरों और रेलवे स्टेशनों—को आग की लपटों के हवाले कर दिया। इन घटनाओं के कारण सरकारी केंद्रों का संपर्क देहातों से पूरी तरह टूट गया और अंग्रेजी शासन के हाथ-पैर सुन्न पड़ गए। पूरा भारत देश एक विशाल युद्ध-भूमि में बदल गया, जहाँ जो व्यक्ति इस लड़ाई में शामिल नहीं था, उसे गद्दार माना जाने लगा।

पटना में छात्रों का ऐतिहासिक मार्च — आंदोलन की यह आग छोटे-छोटे देहातों से लेकर बड़े शहरों तक फैल गई थी। लेखक बिहार की राजधानी पटना का एक रोंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य प्रस्तुत करते हैं। उन दिनों पटना में कोई भी व्यक्ति चिड़ियों की चहचहाहट सुनकर नहीं जागता था। भोर होने से पहले ही शहर की गलियाँ विद्यार्थियों की प्रभात फेरियों और उनके देशभक्ति से भरे नारों तथा गीतों से गूँज उठती थीं। इन छोटे-छोटे विद्यार्थियों के मन में मौत का कोई खौफ नहीं था; वे पूरी निश्चिंतता के साथ अपनी जान कुर्बान करने के गीत गाते हुए चलते थे।
दोपहर के समय कुछ कर गुजरने की चाहत रखने वाले इन वीर युवाओं की एक भारी भीड़ बिहार सरकार के सेक्रेटेरिएट (सचिवालय) की ओर चल पड़ी। हालांकि उनके पैरों के नीचे साफ-सुथरी सड़क थी, लेकिन यह यात्रा बिल्कुल भी आसान नहीं थी। रास्ते में उन्हें पुलिस और कई अंग्रेज अफसर मिलते थे जो भीड़ को वापस लौट जाने का हुक्म देते थे। जब भीड़ नहीं रुकती थी, तो अफसरों के आदेश पर पुलिस के सिपाही उन पर बेरहमी से लाठियां बरसाते थे। लोगों के सिर फूटते, हड्डियां टूटतीं और वे बेहोश होकर गिर जाते थे। भीड़ थोड़ी देर के लिए बिखरती, लेकिन फिर से नए नारों और जोश के साथ आगे बढ़ने लगती थी।

सचिवालय पर तिरंगा फहराने की ज़िद और शहादत — रुकते-बढ़ते और मार खाते हुए जब यह निडर भीड़ सेक्रेटेरिएट के पास पहुँची, तो वहाँ का दृश्य अत्यंत तनावपूर्ण था। वहाँ एक अंग्रेज जिलाधीश गोरखा पल्टन की एक टुकड़ी लेकर पहले से ही मौजूद था। इतनी भारी और सशस्त्र फौज को देखकर भी कोई भारतीय पीछे नहीं हटा, बल्कि उनका जोश और बढ़ गया। वहां मौजूद नारों की गूँज इतनी तेज थी कि मानो पेड़-पत्ते भी “भारत छोड़ो” और “इन्कलाब ज़िंदाबाद” बोल रहे हों।
जब किशोर उम्र के छात्र अपने हाथों में तिरंगा झंडा लिए सेक्रेटेरिएट के गोल गुंबद की ओर बढ़े, तो गोरखा फौज दीवार की तरह उनके सामने खड़ी हो गई। अंग्रेज जिलाधीश ने कड़क कर पूछा कि तुम लोग क्या चाहते हो। भीड़ में से उभरकर एक छात्र ने निडरता से जवाब दिया कि वे सेक्रेटेरिएट पर अपना तिरंगा झंडा लगाएँगे। इस पर अंग्रेज अफसर ने गुलामी का ताना मारते हुए कहा कि वहां उनका झंडा नहीं, बल्कि ब्रिटेन का “यूनियन जैक” फहराता है। लेकिन विद्यार्थी ने भी तुरंत जवाब दिया कि अब वहां यूनियन जैक नहीं, बल्कि उनका तिरंगा ही फहराएगा।
अंग्रेज अफसर तमतमा उठा और उसने अहंकार में गुर्राते हुए चुनौती दी कि जो भी झंडा फहराना चाहता है, वह आगे आए। इस चुनौती को सुनते ही भीड़ में से ग्यारह विद्यार्थी एक साथ आगे आ गए। इनमें जो विद्यार्थी सबसे आगे था, उसकी उम्र मुश्किल से चौदह साल थी, लेकिन उसके सीने और कंधों का तनाव ऐसा था कि पहाड़ भी शरमा जाएं। क्रूर अंग्रेज अफसर ने जब उससे पूछा कि क्या वह भी झंडा फहराएगा, तो उस बालक ने पूरे गर्व से कहा- “हाँ, क्यों नहीं?”। यह आवाज़ सिर्फ उस बालक की नहीं, बल्कि भारत की जाग्रत आत्मा की आवाज़ थी।
इसके बाद जो हुआ वह दिल दहला देने वाला था। ग्यारह भोले-भाले किशोर एक पंक्ति में सीना तानकर खड़े थे। जिलाधीश ने अमानवीय क्रूरता दिखाते हुए “फायर” का आदेश दिया। एक साथ ग्यारह राइफलें गरजीं और पलक झपकते ही वे ग्यारह भारत माँ के लाल खून से लथपथ होकर धरती पर गिर पड़े। इसके बावजूद भीड़ पीछे नहीं हटी। फिर गोलियां चलीं और कई लोग घायल हुए। तभी किसी ने भीड़ में से फिर जोश भरा नारा लगाया और जाने किधर से एक विद्यार्थी सेक्रेटेरिएट के गुंबद पर जा चढ़ा। उसने वहां तिरंगा फहरा दिया और वहीं से नारे लगाने लगा। झल्लाए हुए अंग्रेज अफसर ने फिर “फायर” कहा और वह वीर किशोर गोली खाकर टूटते हुए तारे की तरह नीचे आ गिरा। जब अस्पताल में डाक्टर ने उसे बताया कि गोली उसकी छाती में लगी है, तो उस वीर ने अंतिम सांस लेते हुए संतोष से कहा, “तब ठीक है, मैंने पीठ पर गोली नहीं खाई है”।

अंग्रेजों की हैवानियत और अमानवीय अत्याचार — लेखक बताते हैं कि इन शहीदों के शरीरों से जो गोलियां निकाली गईं, वे प्रतिबंधित ‘दमदम’ बुलेट थीं, जिनका इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार युद्ध में भी मना था। लेकिन उन दिनों अंग्रेजी शासन के लिए कोई नियम या कानून नहीं रह गया था। खुलेआम लोगों को गोली मारना, जेलों में ठूँसना, घरों को जलाना और गांवों को उजाड़ देना उनके लिए मामूली बातें थीं। पुलिस और फौज को गांवों में लूटमार और मनमानी करने की पूरी छूट दे दी गई थी।
अंग्रेजों के मन में भारतीयों के प्रति इतनी नफरत थी कि वे इंसानों और जानवरों में फर्क नहीं करते थे। लेखक एक घटना का जिक्र करते हैं जहाँ एक गोरा सैनिक ट्रेन से एक कुत्ते पर निशाना साध रहा था; उस समय बिहार में गोरे सैनिकों के लिए आदमी और कुत्ते में कोई ज्यादा अंतर नहीं रह गया था। अंग्रेजों की इस नृशंसता का सबसे भयानक उदाहरण पटना के एक सम्मानित नागरिक राम सिंह की हत्या थी। राम सिंह के साफ-सुथरे घर में घुसकर गोरे फौजियों ने उन्हें एक लोहे के नोकदार खूँटे पर जबरदस्ती बैठा दिया और उनके कंधों पर तब तक भारी दबाव डाला जब तक कि वह खूँटा उनके शरीर को चीरता हुआ खोपड़ी से बाहर नहीं निकल गया। इसके बाद उनकी लाश को कई दिनों तक एक कलाकृति की तरह निर्लज्जता से इधर-उधर घुमाया गया। यह क्रूरता की ऐसी पराकाष्ठा थी जिसे सुनकर नरक का दरोगा भी काँप जाए।

निष्कर्ष : 15 अगस्त 1947 की विजयी भोर — लेखक संस्मरण के अंत में कहते हैं कि यह सारा खौफनाक तांडव 10 से 15 अगस्त 1947 के बीच हुआ था। उस समय जो अंग्रेज बेखौफ होकर और निर्दयता से भारतवासियों पर गोलियां बरसा रहे थे, उन्हें इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि आज से ठीक पाँच साल बाद, 15 अगस्त 1947 को उनका घमंड टूट जाएगा। उन्हें नहीं पता था कि जिस ‘यूनियन जैक’ को बचाने के लिए वे मासूम बच्चों का खून बहा रहे हैं, वह यूनियन जैक उसी दिन यहाँ से ऐसे खिसक जाएगा जैसे कोई बिना टिकट यात्रा करने वाला यात्री टिकट चेकर को देखकर चुपके से खिसक जाता है। और उस दिन भारत का तिरंगा झंडा आसमान में ऐसी शान से फहराएगा कि आकाशगंगा की लहरें भी उसके सम्मान में झुक जाएंगी।
कुल मिलाकर, यह संस्मरण हमें बताता है कि 1942 का आंदोलन भले ही तात्कालिक रूप से दबा दिया गया हो, लेकिन उसमें बहाया गया निहत्थे छात्रों और आम जनता का खून ही वह खाद बना जिसने पाँच साल बाद स्वतंत्रता के वृक्ष को सींचा और भारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाया।

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