संस्कृति ( भदंत आनंद कौसल्यायन) / Sanskriti ( Bhadant Ananad Kausalyayan )

( यहाँ NCERT की कक्षा 10वीं की हिंदी की पाठ्य पुस्तक 'क्षतिज भाग 2' में संकलित 'संस्कृति ( भदंत आनंद कौसल्यायन)' अध्याय का सार तथा अभ्यास के प्रश्नों को दिया गया है | )

पाठ का सार

भदंत आनंद कौसल्यायन द्वारा रचित निबंध ‘संस्कृति’, सभ्यता और संस्कृति के बीच के सूक्ष्म अंतर को गहराई से स्पष्ट करता है। लेखक के अनुसार, इन दोनों शब्दों का प्रयोग अक्सर एक-दूसरे के पर्याय के रूप में किया जाता है, जिससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। इस निबंध का मुख्य उद्देश्य यह बताना है कि संस्कृति मनुष्य की वह आंतरिक योग्यता है जिसके बल पर वह किसी नई चीज़ का आविष्कार करता है, जबकि सभ्यता उस आविष्कार का परिणाम या सुख-साधन है।

लेखक समझाते हैं कि ‘संस्कृति’ मूलतः एक योग्यता, प्रेरणा या प्रवृत्ति है। उदाहरण के तौर पर, जिस व्यक्ति ने सबसे पहले आग का आविष्कार किया होगा या जिसने सबसे पहले सुई-धागे की खोज की होगी, वह उसकी ‘सांस्कृतिक योग्यता’ थी। आग की खोज ने मानव को अंधकार और कच्चे भोजन से मुक्ति दिलाई, जबकि सुई-धागे ने शरीर को ढंकने और ठंड से बचने का मार्ग प्रशस्त किया। अतः वह व्यक्ति जिसने अपनी बुद्धि और विवेक से इन वस्तुओं का पहली बार आविष्कार किया, वह ‘संस्कृत’ पुरुष कहलाया।

इसके विपरीत, ‘सभ्यता’ वह साधन है जो हमें अपने पूर्वजों से विरासत में मिलती है। आज हम आग का प्रयोग करते हैं और सिले हुए कपड़े पहनते हैं, लेकिन इसके लिए हमने स्वयं कोई नया आविष्कार नहीं किया है। हम केवल अपने पूर्वजों द्वारा खोजी गई वस्तुओं का उपभोग कर रहे हैं। लेखक के शब्दों में, “संस्कृति का अर्थ है वह शक्ति जिससे कोई नया आविष्कार किया जाए, और सभ्यता वह है जो उस आविष्कार के फलस्वरूप प्राप्त सुख-सुविधाओं का समूह है।” इसलिए, आग की खोज करने वाला व्यक्ति ‘संस्कृत’ था, जबकि हम जो उस आग का उपयोग कर रहे हैं, ‘सभ्य’ तो कहे जा सकते हैं लेकिन उसी अर्थ में ‘संस्कृत’ नहीं।

निबंध में लेखक ने संस्कृति के दो महत्वपूर्ण पक्षों पर प्रकाश डाला है। पहला पक्ष वह है जो मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, जैसे भोजन, वस्त्र और आवास के लिए किए गए आविष्कार। दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण पक्ष वह है जो मनुष्य की ‘अनादि तृष्णा’ या जिज्ञासा से जुड़ा है। रात के तारों को देखकर उन्हें समझने की कोशिश करने वाला मनीषी या मानवता के कल्याण के लिए अपना सर्वस्व त्यागने वाला व्यक्ति भी ‘संस्कृत’ की श्रेणी में आता है। यहाँ लेखक स्पष्ट करते हैं कि संस्कृति केवल भौतिक वस्तुओं के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आध्यात्मिक और नैतिक मूल्य भी शामिल हैं।

लेखक ने सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) का उदाहरण देते हुए बताया कि उन्होंने मानवता को दुखों से मुक्ति दिलाने के लिए अपना राजपाट और गृह त्याग दिया। इसी तरह कार्ल मार्क्स ने मजदूरों के हक के लिए अपना पूरा जीवन कष्टों में बिताया। इन महापुरुषों के भीतर की वह प्रेरणा, जिसने उन्हें मानवता के भले के लिए कार्य करने को प्रेरित किया, उनकी संस्कृति थी।

निबंध का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ‘असभ्यता’ और ‘असंस्कृति’ की चर्चा करता है। लेखक चेतावनी देते हैं कि जब मनुष्य की आविष्कार करने की शक्ति मानव कल्याण की भावना से अलग हो जाती है, तो वह ‘असंस्कृति’ बन जाती है। उदाहरण के लिए, यदि हम ऐसे हथियारों का आविष्कार करते हैं जो पूरी मानवता का विनाश कर सकें, तो उस योग्यता को संस्कृति नहीं कहा जा सकता। ऐसी शक्ति से जो विनाश होता है, उसे ‘असभ्यता’ कहा जाएगा। सच्चा संस्कृत व्यक्ति वही है जिसकी बुद्धि और कौशल में ‘कल्याणकारी’ भावना निहित हो।

निष्कर्षतः, यह अध्याय हमें सिखाता है कि संस्कृति कोई जड़ या स्थिर वस्तु नहीं है, बल्कि यह एक निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है। संस्कृति का आधार ‘मानव-कल्याण’ होना चाहिए। लेखक का मानना है कि जो संस्कृति मनुष्य को मनुष्य से अलग करती है या विनाश की ओर ले जाती है, वह टिक नहीं सकती। सच्ची संस्कृति वह है जो मनुष्य को अधिक उदार, जिज्ञासु और परोपकारी बनाए। अंत में लेखक कहते हैं कि सभ्यता संस्कृति का बाहरी रूप है, लेकिन संस्कृति वह आत्मा है जो मानव जीवन को सार्थकता और नवीनता प्रदान करती है। सरल शब्दों में, संस्कृति ‘बीज’ है और सभ्यता उस बीज से विकसित हुआ ‘वृक्ष’ और उसके ‘फल’ हैं।

अभ्यास के प्रश्न

प्रश्न 1 – लेखक की दृष्टि में ‘सभ्यता’ और ‘संस्कृति’ की सही समझ अब तक क्यों नहीं बन पाई है ?

उत्तर – लेखक के अनुसार सभ्यता और संस्कृति की सही समझ इसलिए नहीं बन पाई है क्योंकि लोग इन शब्दों का प्रयोग तो बहुत करते हैं, लेकिन इनके सही अर्थ नहीं जानते। लोग बिना समझे मनमाने ढंग से इन शब्दों का प्रयोग करते हैं। बाद में इनके साथ भौतिक और आध्यात्मिक जैसे शब्द जोड़कर इनके अर्थ को और उलझा देते हैं। इस कारण हर व्यक्ति इन्हें अपने अनुसार समझने लगता है और इनके वास्तविक अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाते।

प्रश्न 2 – आग की खोज एक बहुत बड़ी खोज क्यों मानी जाती है ? इस खोज के पीछे रही प्रेरणा के मुख्य स्रोत क्या रहे होंगे ?

उत्तर – आग की खोज को बहुत बड़ी खोज इसलिए माना जाता है क्योंकि इससे मनुष्य के जीवन में बड़ा परिवर्तन आया। आग से भोजन पकाया जाने लगा, जिससे भोजन स्वादिष्ट और पचने योग्य बना। इससे सर्दी से बचाव हुआ और प्रकाश भी मिला। आग के कारण जंगली जानवरों का डर कम हुआ। इस खोज ने मनुष्य को सभ्य बनने की दिशा में आगे बढ़ाया।
आग की खोज के पीछे मुख्य प्रेरणाएँ पेट की भूख, सर्दी से बचाव, प्रकाश की आवश्यकता और जंगली जानवरों से सुरक्षा रही होंगी।

प्रश्न 3 – वास्तविक अर्थों में ‘संस्कृत व्यक्ति’ किसे कहा जा सकता है ?

उत्तर – वास्तविक अर्थों में संस्कृत व्यक्ति वह है जो पेट भरने और तन ढकने के बाद भी खाली नहीं बैठता। वह अपनी बुद्धि और विवेक से नए तथ्य खोजता है और समाज के लिए उपयोगी कार्य करता है। जैसे न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की खोज की। इसी प्रकार सिद्धार्थ ने मानव कल्याण के लिए अपने सुख छोड़ दिए।
अर्थात संस्कृत व्यक्ति वह है जो अपनी समझ और क्षमता से ऐसा कार्य करे जो सभी के लिए लाभदायक हो।

प्रश्न 4 – न्यूटन को संस्कृत मानव कहने के पीछे कौन-से तर्क दिए गए हैं ? न्यूटन के सिद्धांतों को जानने वाले लोग भी न्यूटन की तरह संस्कृत क्यों नहीं कहलाते ?

उत्तर – न्यूटन को संस्कृत मानव इसलिए कहा गया है क्योंकि उन्होंने गुरुत्वाकर्षण जैसे नए सिद्धांत की खोज की। उन्होंने नए ज्ञान का सृजन किया।
कुछ लोग न्यूटन के सिद्धांतों के साथ-साथ अन्य बहुत-सी बातें जानते हैं, जो न्यूटन नहीं जानते थे, फिर भी वे संस्कृत नहीं कहलाते क्योंकि उन्होंने कोई नया आविष्कार नहीं किया। ऐसे लोग केवल सभ्य कहलाते हैं, संस्कृत नहीं।

प्रश्न 5 – किन महत्त्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सुई-धागे का आविष्कार हुआ होगा ?

उत्तर – सुई-धागे का आविष्कार मुख्य रूप से दो आवश्यकताओं के लिए हुआ होगा—
पहली, सर्दी और गर्मी से बचाव के लिए कपड़े सिलने की आवश्यकता।
दूसरी, सुंदर दिखने और शरीर को सजाने की इच्छा। इससे पहले मनुष्य पेड़ों की छाल और पत्तों से शरीर ढकता था।

प्रश्न 6 – “मानव संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है।” किन्हीं दो प्रसंगों का उल्लेख कीजिए जब—

(क) मानव संस्कृति को विभाजित करने की चेष्टाएँ की गईं।

उत्तर – समय-समय पर मानव संस्कृति को धर्म और संप्रदाय के नाम पर बाँटने का प्रयास किया गया। कुछ असामाजिक तत्वों ने हिंदू-मुस्लिम के बीच नफरत फैलाने की कोशिश की। वे भाषणों, त्योहारों और धार्मिक प्रतीकों के माध्यम से लोगों को भड़काते रहे। मस्जिद के सामने बाजा बजाने या ताजिए के समय विवाद खड़ा कर मानव संस्कृति को बाँटने का प्रयास किया गया।

(ख) जब मानव संस्कृति ने अपने एक होने का प्रमाण दिया।

उत्तर – मानव संस्कृति का मूल भाव कल्याण है। समय-समय पर लोगों ने इसे अपने कार्यों से सिद्ध किया है। जैसे—
▪️भूखे को भोजन देना,
▪️बीमार बच्चे की माँ का रात-भर जागना,
▪️कार्ल मार्क्स का मजदूरों के लिए संघर्ष,
▪️लेनिन का अपनी रोटी भूखों को देना,
▪️और सिद्धार्थ का मानव कल्याण के लिए राजसुख त्यागना।
ये सभी मानव संस्कृति की एकता का प्रमाण हैं।

प्रश्न 7 – आशय स्पष्ट कीजिए—

(क) मानव की जो योग्यता उससे आत्मविनाश के साधनों का आविष्कार कराती है, हम उसे संस्कृति कहें या असंस्कृति ?

उत्तर – संस्कृति का संबंध कल्याण की भावना से होता है। जब मनुष्य अपनी योग्यता का उपयोग मानव कल्याण के लिए करता है, तब वह संस्कृति कहलाती है। लेकिन जब वही योग्यता आत्मविनाश या विनाशकारी साधनों के निर्माण में लगाई जाती है, तो वह असंस्कृति बन जाती है। जहाँ कल्याण की भावना नहीं होती, वहाँ संस्कृति नहीं बल्कि असंस्कृति होती है।

यह भी पढ़ें :

▪️हिंदी ( कक्षा 9) — क्षितिज भाग 1 और कृतिका भाग 1

▪️हिंदी ( कक्षा 10) — क्षितिज भाग 2 और कृतिका भाग 2

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