राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद ( तुलसीदास )

( यहाँ NCERT की कक्षा 10वीं की हिंदी की पाठ्य पुस्तक 'क्षतिज भाग 2' में संकलित 'राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद ( तुलसीदास)' अध्याय के मूल पाठ, व्याख्या तथा अभ्यास के प्रश्नों को दिया गया है | )

(1)

चौपाई

नाथ संभुधनु भंजनिहारा । होइहि केउ एक दास तुम्हारा ।।
आयेसु काह कहिअ किन मोही । सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही ।।
सेवकु सो जो करै सेवकाई । अरिकरनी करि करिअ लराई ।।
सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा । सहसबाहु सम सो रिपु मोरा ।।
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा । न त मारे जैहहिं सब राजा ।।
सुनि मुनिबचन लखन मुसुकाने । बोले परसुधरहि अवमाने ।
बहु धनुही तोरी लरिकाईं । कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं ।।
येहि धनु पर ममता केहि हेतू । सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू ।।

दोहा

रे नृपबालक कालबस बोलत तोहि न सँभार ।
धनुही सम त्रिपुरारिधनु बिदित सकल संसार ||

व्याख्या – श्री राम जी के द्वारा शिव धनुष तोड़े जाने के कारण जब परशुराम जी क्रोधित हो जाते हैं तब उन के क्रोध को देखकर जब जनक के दरबार में सभी लोग भयभीत हो गए तो श्री राम ने आगे बढ़कर परशुराम जी से कहा कि हे नाथ ! भगवान शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई एक दास ही होगा। आप की क्या आज्ञा है , आप मुझसे क्यों नहीं कहते ? राम के वचन सुनकर क्रोधित परशुराम जी बोले – सेवक वह कहलाता है , जो सेवा का कार्य करता है। शत्रुता का काम करके तो लड़ाई ही मोल ली जाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि आप किसी को कष्ट दे कर उसको खुशी नहीं दे सकते।

हे राम ! मेरी बात सुनो , जिसने भगवान शिव जी के इस धनुष को तोड़ा है , वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है। अर्थात जिसने भी भगवान् शिव के धनुष को तोड़ा है , उसकी चाहे हज़ार भुजाएँ हों वह फिर भी मेरा शत्रु है। फिर वो राजसभा की तरफ देखते हुए कहते हैं कि जिसने भी शिव धनुष तोड़ा है वह व्यक्ति खुद बखुद इस समाज से अलग हो जाए , नहीं तो यहाँ उपस्थित सभी राजा मारे जाएँगे। परशुराम जी के इन क्रोधपूर्ण वचनों को सुनकर लक्ष्मण जी मुस्कुराए और परशुराम जी का अपमान करते हुए बोले – हे गोसाईं ( संत ) ! बचपन में हमने ऐसे छोटे – छोटे बहुत से धनुष तोड़ डाले थे , किंतु ऐसा क्रोध तो कभी किसी ने नहीं किया , जिस प्रकार आप कर रहे हैं। इसी धनुष पर आपकी इतनी ममता क्यों है ?

लक्ष्मण की व्यंग्य भरी बातें सुनकर परशुराम जी क्रोधित स्वर में बोले – अरे राजा के पुत्र ! मृत्यु के वश में होने से तुझे यह भी होश नहीं कि तू क्या बोल रहा है ? तू सँभल कर नहीं बोल पा रहा है । समस्त विश्व में विख्यात भगवान शिव का यह धनुष क्या तुझे बचपन में तोड़े हुए धनुषों के समान ही दिखाई देता है ?

(2)

चौपाई

लखन कहा हसि हमरे जाना । सुनहु देव सब धनुष समाना ।।
का छति लाभु जून धनु तोरें । देखा राम नयन के भोरें ।।
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू । मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू ।।
बोले चितै परसु की ओरा । रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा ।।
बालकु बोलि बधौं नहि तोही । केवल मुनि जड़ जानहि मोही ।।
बाल ब्रह्मचारी अति कोही । बिस्वबिदित क्षत्रियकुल द्रोही ।।
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही । बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही । ।
सहसबाहुभुज छेदनिहारा । परसु बिलोकु महीपकुमारा ।।

दोहा

मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर ।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।

व्याख्या – परशुराम जी का शिव धनुष की ओर इतना प्रेम देख कर और उसके टूट जाने पर अत्यधिक क्रोधित होता हुआ देख कर लक्ष्मण जी हँसकर परशुराम जी से बोले कि हे देव ! सुनिए , मेरी समझ के अनुसार तो सभी धनुष एक समान ही होते हैं ।

लक्ष्मण श्रीराम की ओर देखकर बोले कि इस धनुष के टूटने से क्या लाभ है तथा क्या हानि , यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही है। श्री राम जी ने तो इसे केवल छुआ था , लेकिन यह धनुष तो छूते ही टूट गया । फिर इसमें श्री राम जी का क्या दोष है ? मुनिवर ! आप तो बिना किसी कारण के क्रोध कर रहे हैं ? कहने का तात्पर्य यह है कि लक्ष्मण जी परशुराम जी के क्रोध को बेमतलब का मान रहे थे क्योंकि उन्हें नहीं पता था कि उस धनुष के साथ परशुराम जी के क्या भाव जुड़े थे।

लक्ष्मण जी की व्यंग्य भरी बातों को सुनकर परशुराम जी का क्रोध और बढ़ गया और वह अपने फरसे की ओर देखकर बोले कि अरे दुष्ट ! क्या तूने मेरे स्वभाव के विषय में नहीं सुना है ? मैं केवल बालक समझकर तुम्हारा वध नहीं कर रहा हूँ। अरे मूर्ख ! क्या तू मुझे केवल एक मुनि समझता है ? मैं बाल ब्रह्मचारी और अत्यंत क्रोधी स्वभाव का व्यक्ति हूँ ।मैं पूरे विश्व में क्षत्रिय कुल के घोर शत्रु के रूप में प्रसिद्ध हूँ ।

मैंने अपनी इन्हीं भुजाओं के बल से पृथ्वी को कई बार राजाओं से रहित करके उसे ब्राह्मणों को दान में दे दिया था। हे राजकुमार ! मेरे इस फरसे को देख , जिससे मैंने सहस्रबाहु अर्थात हजारों लोगों की भुजाओं को काट डाला था ।

अरे राजा के बालक लक्ष्मण ! तू मुझसे भिड़कर अपने माता – पिता को चिंता में मत डाल अर्थात अपनी मौत को न बुला । मेरा फरसा बहुत भयंकर है । यह गर्भ में पल रहे बच्चों का भी नाश कर डालता है अर्थात मेरे फरसे की गर्जना सुनकर गर्भवती स्त्रियों का गर्भपात हो जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि परशुराम जी लक्ष्मण जी को समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि उन्हें जब क्रोध आता है तो वे किसी बालक को भी मारने से नहीं हिचकिचाते।

(3)

चौपाई

बिहसि लखनु बोले मृदु बानी । अहो मुनीसु महाभट मानी ।।
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारु । चहत उड़ावन फूँकि पहारू ।।
इहाँ कुम्हड़बतिआ कोउ नाहीं । जे तरजनी देखि मरि जाहीं ।।
देखि कुठारु सरासन बाना । मैं कछु कहा सहित अभिमाना ।।
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी । जो कछु कहहु सहौं रिस रोकी ।।
सुर महिसुर हरिजन अरु गाईं । हमरे कुल इन्ह पर न सुराई ।।
बधें पापु अपकीरति हारें । मारतहू पा परिअ तुम्हारें ।।
कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा । ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा ।।

दोहा

जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर ।
सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गंभीर ।।

व्याख्या – परशुराम जी के क्रोध से भरे वचनों को सुनकर लक्ष्मण जी बहुत ही अधिक कोमल वाणी में हँसकर उनसे बोले कि हे मुनिवर ! आप तो अपने आप को बहुत बड़ा योद्धा समझते हैं और बार – बार मुझे अपना फरसा दिखाते हैं। मुझे तो ऐसा लगता है कि आप फूँक से पहाड़ उड़ाना चाहते हैं , परंतु हे मुनिवर ! यहाँ पर कोई भी सीता फल अर्थात कुम्हड़े के छोटे फल के समान नहीं हैं , जो तर्जनी उँगली को देखते ही मर जाएँ। ( यहाँ लक्षमण जी ने , तर्जनी उँगली को देखते ही मर जाएँ , ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि परशुराम जी ने क्रोध में अपनी तर्जनी उँगली दिखा कर कहा था कि अगर वह व्यक्ति सभा से अलग नहीं हो जाता अर्थात उनके सामने नहीं आ जाता जिसने उनके आराध्य शिव जी का धनुष तोड़ा है तो वे वहाँ सभा में उपस्थित सभी राजाओं का वध कर देंगे )

मुनि जी ! मैंने आपके हाथ में फरसा और धनुष – बाण देखकर ही अभिमानपूर्वक आपसे कुछ कहा था। कहने का तात्पर्य यह है कि एक क्षत्रिय ही दूसरे क्षत्रिय से अभिमान पूर्वक कुछ कह सकता है। जनेऊ से तो आप एक भृगुवंशी ब्राह्मण जान पड़ते हैं इन्हें देखकर ही , जो कुछ भी आपने कहा उसे सहन कर अपने क्रोध को रोक रहा हूँ। हमारे कुल की यह परंपरा है कि हम देवता , ब्राह्मण , भगवान के भक्त और गाय , इन सभी पर वीरता नहीं दिखाया करते , क्योंकि इन्हें मारने से पाप लगता है और इनसे हार जाने पर अपकीर्ति अथवा अपयश ( बदनामी ) होता है । इसीलिए आप मारें तो भी , हमें आपके पैर पकड़ने चाहिए। हे महामुनि ! आपका तो एक – एक वचन ही करोड़ों वज्रों के समान कठोर है। आपने व्यर्थ में ही फरसा और धनुष – बाण धारण किया हुआ है।

आपके धनुष बाण और कुठार (फरसे) को देखकर अगर मैंने कुछ अनुचित कह दिया हो तो हे मुनिवर ! आप मुझे क्षमा कीजिए। लक्ष्मण के यह व्यंग्य – वचन सुनकर भृगुवंशी परशुराम क्रोध में आकर गंभीर स्वर में बोलने लगे।

(4)

चौपाई 4

कौसिक सुनहु मंद येहु बालकु | कुटिलु कालबस निज कुल घालकु ।।
भानुबंस राकेस कलंकू । निपट निरंकुसु अबुधु असंकू ।।
कालकवलु होइहि छन माहीं । कहौं पुकारि खोरि मोहि नाहीं ।।
तुम्ह हटकहु जौ चहहु उबारा । कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा ।।
लखन कहेउ मुनि सुजसु तुम्हारा । तुम्हहि अछत को बरनै पारा ।।
अपने मुहु तुम्ह आपनि करनी । बार अनेक भाँति बहु बरनी ।।
नहि संतोषु त पुनि कछु कहहू । जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू ।।
बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा । गारी देत न पावहु सोभा ।।

दोहा

सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु ।
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु ।।

व्याख्या – लक्ष्मण जी की व्यंग्य भरी बातों को सुनकर परशुराम जी को और क्रोध आ गया और वह विश्वामित्र से बोले कि हे विश्वामित्र ! यह बालक ( लक्ष्मण ) बहुत कुबुद्धि और कुटिल लगता है। और यह काल (मृत्यु ) के वश में होकर अपने ही कुल का घातक बन रहा है। यह सूर्यवंशी बालक चंद्रमा पर लगे हुए कलंक के समान है। यह बालक मूर्ख , उदंण्ड , निडर है और इसे भविष्य का भान तक नहीं है।

अभी यह क्षणभर में काल का ग्रास हो जाएगा अर्थात् मैं क्षणभर में इसे मार डालूँगा। मैं अभी से यह बात कह रहा हूँ , बाद में मुझे दोष मत दीजिएगा। यदि तुम इस बालक को बचाना चाहते हो तो , इसे मेरे प्रताप , बल और क्रोध के बारे में बता कर अधिक बोलने से मना कर दीजिए।

लक्ष्मण जी इतने पर भी नहीं माने और परशुराम को क्रोध दिलाते हुए बोले कि हे मुनिवर ! आपका सुयश आपके रहते हुए दूसरा कौन वर्णन कर सकता है ? आप तो अपने ही मुँह से अपनी करनी और अपने विषय में अनेक बार अनेक प्रकार से वर्णन कर चुके हैं।

यदि इतना सब कुछ कहने के बाद भी आपको संतोष नहीं हुआ हो , तो कुछ और कह दीजिए। अपने क्रोध को रोककर असह्य दुःख को सहन मत कीजिए। आप वीरता का व्रत धारण करने वाले , धैर्यवान और क्षोभरहित हैं , आपको गाली देना शोभा नहीं देता।

जो शूरवीर होते हैं वे व्यर्थ में अपनी बड़ाई नहीं करते , बल्कि युद्ध भूमि में अपनी वीरता को सिद्ध करते हैं। शत्रु को युद्ध में उपस्थित पाकर भी अपने प्रताप की व्यर्थ बातें करने वाला कायर ही हो सकता है। अर्थात युद्ध में अपने शत्रु को सामने देखकर अपनी झूठी प्रशंसा तो कायर करते हैं।

(5)

चौपाई

तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा । बार बार मोहि लागि बोलावा ।।
सुनत लखन के बचन कठोरा । परसु सुधारि धरेड कर घोरा ।।
अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू । कटुबादी बालकु बधजोगू ।।
बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा । अब येहु मरनिहार भा साँचा ।।
कौसिक कहा छमिअ अपराधू । बाल दोष गुन गनहिं न साधू ।।
खर कुठार मैं अकरुन कोही । आगे अपराधी गुरुद्रोही ।।
उतर देत छोड़ौं बिनु मारे । केवल कौसिक सील तुम्हारे ।।
न त येहि काटि कुठार कठोरे । गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरे ।।

दोहा

गाधिसूनु कह हृदय हसि मुनिहि हरियरे सूझ ।
अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ ।।

व्याख्या – लक्ष्मण जी परशुराम जी के वचनों को सुनकर उन से बोले कि ऐसा लग रहा है मानो आप तो काल ( यमराज ) को आवाज लगाकर बार-बार मेरे लिए बुला रहे हो। लक्ष्मण जी के ऐसे कठोर वचन सुनते ही परशुराम जी का क्रोध और बढ़ गया। उन्होंने अपने भयानक फरसे को घुमाकर अपने हाथ में ले लिया और बोले अब मुझे कोई दोष नहीं देना। इतने कड़वे वचन बोलने वाला यह बालक मारे जाने योग्य है। बालक देखकर इसे मैंने बहुत बचाया , लेकिन लगता है कि अब इसकी मृत्यु निकट आ गई है।

परशुराम जी को क्रोधित होते देखकर विश्वामित्र जी बोले हे मुनिवर ! आप इसके अपराध को क्षमा कर दीजिए क्योंकि साधु लोग तो बालकों के गुण और दोष की गिनती नहीं करते हैं। तब परशुराम जी ने क्रोधित होते हुए कहा मै दयारहित और क्रोधी हूँ कि ये मेरा दुष्ट फरसा है , मैं स्वयं दयारहित और क्रोधी हूँ , उस पर यह गुरुद्रोही मेरे सामने …….

उत्तर दे रहा हैं फिर भी मैं इसे बिना मारे छोड़ रहा हूँ। हे विश्वामित्र ! सिर्फ तुम्हारे प्रेम के कारण। नहीं तो इसे इस कठोर फरसे से काटकर थोड़े ही परिश्रम से गुरु के ऋण से मुक्त हो जाता।

परशुराम जी के वचन सुनकर विश्वामित्र जी ने मन ही मन में हँसकर सोचा कि मुनि परशुराम जी को हरा – ही – हरा सूझ रहा है अर्थात् चारों ओर विजयी होने के कारण ये राम और लक्ष्मण को साधारण क्षत्रिय ही समझ रहे हैं। मुनि अब भी नहीं समझ रहे हैं कि ये दोनों बालक लोहे की बनी हुई तलवार हैं , गन्ने के रस की नहीं , जो मुँह में लेते ही गल जाएँ अर्थात् राम – लक्ष्मण सामान्य वीर न होकर बहुत पराक्रमी योद्धा हैं। परशुराम जी अभी भी इनकी साहस , वीरता व क्षमता से अनभिज्ञ हैं।

(6)

चौपाई

कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा । को नहि जान बिदित संसारा ।।
माता पितहि उरिन भये नीकें । गुररिनु रहा सोचु बड़ जी कें ।।
सो जनु हमरेहि माथें काढ़ा । दिन चलि गये ब्याज बड़ बाढ़ा ।।
अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली । तुरत देउँ मैं थैली खोली ।।
सुनि कटु बचन कुठार सुधारा । हाय हाय सब सभा पुकारा ।
भृगुबर परसु देखाबहु मोही । बिप्र बिचारि बचौं नृपद्रोही ।।
मिले न कबहूँ सुभट रन गाढ़े । द्विजदेवता घरहि के बाढ़े ।।
अनुचित कहि सबु लोगु पुकारे । रघुपति सयनहि लखनु नेवारे ।।

दोहा

लखन उतर आहुति सरिस भृगुबरकोपु कृसानु ।
बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु ||

व्याख्या – परशुराम जी के क्रोध से पूर्ण वचनों को सुन कर लक्ष्मण जी ने परशुराम जी से कहा कि हे मुनिश्रेष्ठ ! आपके पराक्रम को कौन नहीं जानता। वह सारे संसार में प्रसिद्ध है। आपने अपने माता पिता का ऋण तो चुका ही दिया हैं और अब अपने गुरु का ऋण चुकाने की सोच रहे हैं। जिसका आपके जी पर बड़ा बोझ है। और अब आप ये बात भी मेरे माथे डालना चाहते हैं। बहुत दिन बीत गये। इसीलिए उस ऋण में ब्याज बहुत बढ़ गया होगा। बेहतर है कि आप किसी हिसाब करने वाले को बुला लीजिए। मैं आपका ऋण चुकाने के लिए तुरंत थैली खोल दूंगा। लक्ष्मण जी के कडुवे वचन सुनकर परशुराम जी ने अपना फरसा उठाया और लक्ष्मण जी पर आघात करने को दौड़ पड़े । सारी सभा हाय – हाय पुकारने लगी। इस पर लक्ष्मण जी बोले हे मुनिश्रेष्ठ ! आप मुझे बार बार फरसा दिखा रहे हैं। हे क्षत्रिय राजाओं के शत्रु ! मैं आपको ब्राह्मण समझ कर बार – बार बचा रहा हूँ। मुझे लगता है आपको कभी युद्ध के मैदान में वीर योद्धा नहीं मिले हैं। हे ब्राह्मण देवता ! आप घर में ही अपनी वीरता के कारण फूले – फूले फिर रहे हैं अर्थात् अत्यधिक खुश हो रहे हैं। लक्ष्मण जी के ऐसे वचन सुनकर सभा में उपस्थित सभी लोग यह अनुचित है , यह अनुचित है ‘ कहकर पुकारने लगे। यह देखकर श्री राम जी ने लक्ष्मण जी को आँखों के इशारे से रोक दिया।

लक्ष्मण जी के उत्तर परशुराम जी की क्रोधाग्नि में आहुति के सदृश कार्य कर रहे थे। इस क्रोधाग्नि को बढ़ते देख रघुवंशी सूर्य राम , लक्ष्मण जी के वचनों के विपरीत , जल के समान शांत करने वाले वचनों का प्रयोग करते हुए परशुराम जी से लक्ष्मण को क्षमा करने की विनती करने लगे। लक्ष्मण जी के उत्तरों ने , परशुराम जी के क्रोध रूपी अग्नि में आहुति का काम किया। जिससे उनका क्रोध अत्यधिक बढ़ गया। जब श्री राम ने देखा कि परशुराम जी का क्रोध अत्यधिक बढ़ चुका है। अग्नि को शांत करने के लिए जैसे जल की आवश्यकता होती हैं। वैसे ही क्रोध रूपी अग्नि को शांत करने के लिए मीठे वचनों की आवश्यकता होती हैं। श्री राम ने भी वही किया। श्री राम ने अपने मीठे वचनों से परशुराम जी का क्रोध शांत करने का प्रयास किया।

अभ्यास के प्रश्न

राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद ( तुलसीदास )/ Ram Lakshman Parashuram Samvad (Tulsidas )

प्रश्न 1 – परशुराम के क्रोध करने पर लक्ष्मण ने धनुष के टूट जाने के लिए कौन – कौन से तर्क दिए ?

उत्तर – परशुराम के क्रोध करने पर लक्ष्मण ने धनुष के टूट जाने के लिए तर्क देते हुए कहा कि आप किसलिए इतना क्रोध कर रहे हैं। इस धनुष से आपकी इतनी ममता क्यों है। श्री राम ने इसे केवल छुआँ था और उनके छूते ही धनुष खुद टूट गया। ऐसे कई धनुष तो हमने बचपन में तोडें है और किसी ने हम पर क्रोध नहीं किया। इस धनुष को तोड़ते हुए उन्होंने किसी लाभ व हानि के विषय में नहीं सोचा।

प्रश्न 2 – परशुराम के क्रोध करने पर राम और लक्ष्मण की जो प्रतिक्रियाएँ हुईं उनके आधार पर दोनों के स्वभाव की विशेषताएँ अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर – परशुराम जी के क्रोध करने पर श्री राम ने बहुत ही शांत बुद्धि से काम लिया। उन्होंने बहुत ही नम्रता से शांत व् मधुर वचनों का सहारा लेकर परशुराम जी के क्रोध को शांत करने का प्रयास किया। परशुराम जी बहुत क्रोध में थे जिसके कारण श्री राम ने खुद को उनका सेवक बताया व उनसे निवेदन किया कि वह उनको किसी भी प्रकार की आज्ञा दे। उनकी भाषा बेहद आदर सत्कार वाली थी , वह जानते थे कि परशुराम जी बहुत क्रोधित हैं , जिसके कारण उन्होने अपनी मीठी वाणी से वातावरण में कोमलता बनाए रखने का प्रयास किया। परशुराम जी की तरह लक्ष्मण जी भी क्रोधित व्यवहार के माने जाते हैं , निडरता उनके स्वभाम में कूट – कूट के भरी हुई है। लक्ष्मण जी परशुराम जी के पास अपने वचनों का सहारा ले कर अपनी बात बहुत अच्छी तरह उनके सामने प्रस्तुत करते हैं और वह इस बात की परवाह भी नहीं करते की परशुराम जी उनसे क्रोधित हो सकते हैं। वह परशुराम जी के क्रोध को न्याय के बराबर नहीं मानते इसलिए वह परशुराम जी के न्याय के विरोध में खड़े हो जाते हैं। यहाँ श्री राम बहुत ही शांत स्वभाव , बुद्धिमानी , धैर्यवान , मृदुभाषी व्यक्ति है दूसरी और लक्ष्मण जी निडर , साहसी , क्रोधी व अन्याय विरोध स्वभाव के मने जाते हैं।

प्रश्न 3 – लक्ष्मण और परशुराम के संवाद का जो अंश आपको सबसे अच्छा लगा उसे अपने शब्दों में संवाद शैली में लिखिए।

उत्तर – लक्ष्मण – हे मुनि ! बचपन में हमने खेल – खेल में ऐसे बहुत से धनुष तोड़े हैं , तब तो आप कभी क्रोधित नहीं हुए थे। फिर इस धनुष के टूटने पर इतना क्रोध क्यों कर रहे हैं ?
परशुराम – अरे राजा के पुत्र ! मृत्यु के वश में होने से तुझे यह भी होश नहीं कि तू क्या बोल रहा है ? तू सँभल कर नहीं बोल पा रहा है । समस्त विश्व में विख्यात भगवान शिव का यह धनुष क्या तुझे बचपन में तोड़े हुए धनुषों के समान ही दिखाई देता है ?

प्रश्न 4 – परशुराम ने अपने विषय में सभा में क्या – क्या कहा , निम्न पद्यांश के आधार पर लिखिए।
बाल ब्रह्मचारी अति कोही बिस्वबिदित क्षत्रियकुल द्रोही॥
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही ।।
सहसबाहुभुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा॥
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर ॥

उत्तर – परशुराम ने अपने बारे में कहा कि मैं बाल ब्रह्मचारी और अत्यंत क्रोधी स्वभाव का व्यक्ति हूँ। मैं पूरे विश्व में क्षत्रिय कुल के घोर शत्रु के रूप में प्रसिद्ध हूँ।
मैंने अपनी इन्हीं भुजाओं के बल से पृथ्वी को कई बार राजाओं से रहित करके उसे ब्राह्मणों को दान में दे दिया था। हे राजकुमार ! मेरे इस फरसे को देख, जिससे मैंने सहस्रबाहु अर्थात हजारों लोगों की भुजाओं को काट डाला था। अरे राजा के बालक लक्ष्मण ! तू मुझसे भिड़कर अपने माता – पिता को चिंता में मत डाल अर्थात अपनी मौत को न बुला। मेरा फरसा बहुत भयंकर है। यह गर्भ में पल रहे बच्चों का भी नाश कर डालता है अर्थात मेरे फरसे की गर्जना सुनकर गर्भवती स्त्रियों का गर्भपात हो जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि परशुराम जी अपने विषय में बता कर लक्ष्मण जी को समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि उन्हें जब क्रोध आता है तो वे किसी बालक को भी मारने से भी नहीं हिचकिचाते।

प्रश्न 5 – लक्ष्मण ने वीर योद्धा की क्या – क्या विशेषताएँ बताईं ?

उत्तर – लक्ष्मण ने वीर योद्धा की निम्नलिखित विशेषताएं बताई है –

▪️वीर पुरुष अपनी महानता का गुणगान खुद नहीं करते।
▪️युद्धभूमि में शूरवीर युद्ध करते हैं न की अपने प्रताप का गुणगान करते हैं।
▪️स्वयं किए गए प्रसिद्ध कार्यों पर कभी अभिमान नहीं करते।
▪️वीर पुरुष किसी के खिलाफ गलत शब्दों का प्रयोग नहीं करते।
▪️वह अन्याय के विरुद्ध हमेशा खड़े रहते हैं।
▪️वीर योद्धा शांत , विनम्र , और साहसी हृदय के होते हैं।

प्रश्न 6 – साहस और शक्ति के साथ विनम्रता हो तो बेहतर है। इस कथन पर अपने विचार लिखिए।

उत्तर – यह पूर्णतया सत्य है कि व्यक्ति को जीवन में आगे बढ़ने के लिए साहस व् शक्ति की आवश्यकता होती है। लेकिन अगर व्यक्ति के अंदर साहस और शक्ति के साथ – साथ विनम्रता भी हो तो वह व्यक्ति कभी किसी परिस्थिति में हार नहीं मानेगा और हारेगा भी नहीं। विनम्रता के अभाव में व्यक्ति उद्दंड हो जाता है। वह अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते हुए दूसरों का अहित करने लगता है। विनम्रता हमें दुसरों का आदर – सम्मान करना सिखाती है। प्रभु श्री राम जी इसका जीता जगता उदहारण है। राम लक्ष्मण परशुराम संवाद कविता के आधार पर देखें, तो लक्ष्मण जी साहसी और शक्तिशाली तो थे , लेकिन उनमें विनम्रता का अभाव था , वहीं श्री राम साहसी व शक्तिशाली होने के साथ ही विनम्र भी थे। इसीलिए उन्होंने धैर्य के साथ परशुराम जी को अपनी बात समझाई और क्षमा मांगी , जिससे बात ज्यादा नहीं बिगड़ी और परशुराम जी शांत हो गए।

प्रश्न 7 – भाव स्पष्ट कीजिए –
( क ) बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महाभट मानी॥
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारु। चहत उड़ावन पूँकि पहारू।


उत्तर – भावार्थ – भाव यह है की लक्ष्मण जी मुस्कुराते हुए मधुर वाणी से परशुराम जी पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि हे मुनि ! आप अपने अभिमान के वश में हैं। आप अपने आप को इस पुरे संसार का एक मात्र योद्धा मान रहे हैं। किन्तु आप मुझे बार – बार अपना फरसा दिखा कर डरने की कोशिश कर रहे हैं। आपको देख कर ऐसा लगता है कि आप पहाड़ को अपनी एक फूंक से ही उड़ाना चाहते हैं अर्थात जैसे की एक ही फूंक में आप एक पहाड़ को नहीं हिला सकते उसी प्रकार आप मुझे एक बच्चा न समझे। मैं बच्चों की तरह आपके फरसे से डरने वालो में से नहीं हूँ।

( ख ) इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं ।।
देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।।

उत्तर – भावार्थ – भाव यह है कि लक्ष्मण जी वीरता और साहस का परिचय देते हुए परशुराम जी से कहते हैं कि हम भी कोई ऐसे ही नहीं है जो कुछ भी देख कर डर जाएँ और मैंने फरसे और धनुष – बाण को अच्छी तरह से देख लिया है इसलिए मैं ये सब आप से अभिमान सहित ही बोल रहा हूँ अर्थात हम कोई एक कोमल फल नहीं है जो हाथ लगाने भर से टूट जाएँ। हम बालक जरूर हैं लेकिन फरसे और धनुष – बाण भी बहुत देखे हैं इसलिए हमें नादान बालक न समझे।

(ग) गाधिसूनु कह हृदय हसि मुनिहि हरियरे सूझ।
अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ ।।


उत्तर – भावार्थ – भाव यह है कि विश्वामित्र अपने मन – ही – मन में मुस्कुराते हुए परशुराम जी की बुद्धि पर तरस खाते हुए मन – ही – मन में कहते हैं कि परशुराम जी को चारों ओर हरा – ही – हरा दिखाई दे रहा है अर्थात चारों ओर विजयी होने के कारण ये राम और लक्ष्मण को साधारण क्षत्रिय ही समझ रहे हैं। वह दशरथ पुत्रों को ( राम व् लक्ष्मण ) साधारण क्षत्रिय बालकों की तरह ही मान रहे हैं जिन्हें वह गन्ने की खांड समझ रहे हैं। वह तो लोहे से बनी तलवार हैं। इस समय परशुराम जी की स्थिति सावन के अंधे की भांति हो गयी है जिसे चारो ओर हरा – ही – हरा दिखाई पड़ रहा है अर्थात इनकी समझ क्रोध व् अन्धकार से घिरी हुई है।

प्रश्न 8 – पाठ के आधार पर तुलसी के भाषा सौंदर्य पर दस पंक्तियाँ लिखिए।

उत्तर – तुलसीदास की भाषा सरल , सरस , सहज और अत्यंत लोकप्रिय भाषा है। तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस अवधि भाषा में लिखी गयी है। यह काव्यांश रामचारितमानस के बालकाण्ड से लिया गया है इसमें अवधि भाषा का बहुत ही शुद्ध उपयोग देखने को मिलता है। तुलसीदास ने इसमें दोहे , छंद व् चौपाई का बेहद ही अद्भुत प्रकार से प्रयोग किया है। इसमें चौपाई छंदों के प्रयोग से गेयता और संगीतात्मकता बढ़ गई है। जिसके कारण काव्य के सौन्दर्य तथा आनंद में वृद्धि आई है। उन्हें अवधी और ब्रजे दोनों भाषाओं पर समान अधिकार है। तुलसीदास के काव्य में वीर रस एवं हास्य रस की सहज अभिव्यक्ति हुई है।
तुलसीदास जी रस सिद्ध और अलंकारप्रिय कवि हैं। तुलसीदास ने इन चौपाइयों में अलंकारों का प्रयोग कर इसे और भी सुंदर बना दिया है। इसकी भाषा में अनुप्रास अलंकार , रूपक अलंकार , उत्प्रेक्षा अलंकार व् पुनरुक्ति अलंकार की अधिकता पाई जाती है। जैसे
अनुप्रास – बालकु बोलि बधौं नहिं तोही।
उपमा – कोटि कुलिस सम वचन तुम्हारा।
रूपक – भानुवंश राकेश कलंकू। निपट निरंकुश अबुध अशंकू।।
उत्प्रेक्षा – तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा।।
वक्रोक्ति – अहो मुनीसु महाभट मानी।
यमक – अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहु न बूझ, अबूझ
पुनरुक्ति प्रकाश – पुनि-पुनि मोह देखाव कुठारू।

प्रश्न 9 – इस पूरे प्रसंग में व्यंग्य का अनूठा सौंदर्य है। उदाहरण के साथ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – तुलसीदास द्वारा रचित परशुराम – लक्ष्मण संवाद मूल रूप से व्यंग्य काव्य है उदाहरण के लिए –

( क ) बहु धनुही तोरी लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस किन्हि गोसाईँ॥
येहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥
इन पंक्तियों में लक्ष्मण जी परशुराम जी से धनुष के तोड़ने का व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि हमने अपने बचपन में ऐसे कई धनुषों की तोड़ा है तब तो अपने हम पर कभी क्रोध व्यक्त नहीं किया। तो आज इस धनुष पर आपको इतनी ममता क्यों आ रही है।

( ख ) मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर॥
इन पंक्तियों में परशुराम जी क्रोध में लक्ष्मण जी से कहते हैं कि अरे राजा के बालक ! तू अपने माता – पिता को सोच में मत डाल। अर्थात अपनी मृत्यु को बुलावा न भेज। मेरा फरसा बड़ा ही भयानक है। यह गर्भ में जीने वाले बच्चो को भी मार सकता है।

( ग ) गाधिसूनु कह हृदय हसी मुनिहि हरियरे सूझ।
अयमय खांड न ऊखमय अजहुँ न बुझ अबूझ।।
इन पंक्तियों में विश्वामित्र जी परशुराम जी की बुद्धि पर मन – ही – मन कहते है कि परशुराम जी राम , लक्षमण को साधारण बालक समझ रहे हैं। उनको तो चारो ओर से हरा – ही – हरा सूझ रहा है। जो लोहे की तलवार को गन्ने की खांड से तोल रहे है इस समय परशुराम जी की स्थिति सावन के अंधे जैसी हो चुकी है।

प्रश्न 10 – निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार पहचानकर लिखिए –
(क) बालकु बोलि बधौं नहि तोही।

उत्तर- ‘ब ’ वर्ण की आवृत्ति के कारण – अनुप्रास अलंकार।

(ख) कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा।

उत्तर – उक्त पंक्ति में ‘क’ वर्ण का बार-बार प्रयोग हुआ है – अनुप्रास अलंकार।
कोटि कुलिस सम बचनु में उपमा अलंकार भी है।

(ग) तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। ।
बार बार मोहि लागि बोलावा ॥

उत्तर – ‘काल हाँक जनु लावा’ में उत्प्रेक्षा अलंकार है क्योंकि यहां जनु उत्प्रेक्षा का वाचक शब्द है। ‘बार-बार’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है क्योंकि एक ही शब्द को दो बार लिखा है।

(घ) लखन उतर आहुति सरिस भृगुबरकोपु कृसानु।
बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु॥


उत्तर – उतर आहुति सरिस भृगुबरकोपु कृसानु में उपमा अलंकार है।
जल सम बचन में भी उपमा अलंकार है क्योंकि यहां एक से दूसरे की समानता बताई है।
रघुकुलभानु में रुपक अलंकार है , यहाँ श्री राम के गुणों की समानता सूर्य से की गई है।
भृगुवर कोप कृसानु में भी रूपक अलंकार है।

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