मेघ आए ( सर्वेश्वर दयाल सक्सेना )/ Megh Aaye ( Sarveshvar Dayal Saksena )

( यहाँ NCERT की कक्षा 9वीं की हिंदी की पाठ्य पुस्तक 'क्षतिज भाग 1' में संकलित 'मेघ आए ( सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ) ' अध्याय के मूल पाठ, व्याख्या तथा अभ्यास के प्रश्नों को दिया गया है | )

(1)

मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के ।
आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली,
दरवाज़े-खिड़कियाँ खुलने लगीं गली-गली,
पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।

व्याख्या- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने वर्षा ऋतु के आगमन पर गाँव में उत्पन्न होने वाले आनंद और उत्साह का सजीव चित्रण किया है। कवि ने बादलों को एक विशेष अतिथि के रूप में प्रस्तुत किया है, जो बड़े बन-ठनकर गाँव में आए हैं, जैसे कोई दामाद अपने ससुराल सज-धज कर आता है। उनके स्वागत में ठंडी हवा नाचती-गाती चल रही है, मानो उनके आगमन का संदेश पूरे गाँव में फैला रही हो। बादलों के आगमन से गाँव में उमंग की लहर दौड़ जाती है, लोग उत्सुकता से अपने घरों की खिड़कियाँ और दरवाज़े खोलकर इस प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने लगते हैं, जैसे किसी सम्मानित मेहमान के स्वागत में पूरा गाँव उमंग से भर उठता है।

(2)

पेड़ झुक झाँकने लगे गरदन उचकाए,
आँधी चली, धूल भागी घाघरा उठाए,
बाँकी चितवन उठा, नदी ठिठकी, घूँघट सरके।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।

व्याख्या- कवि वर्षा ऋतु के आगमन को एक सुंदर दृश्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं। बादलों के छाने और आँधी चलने पर धूल इस तरह उड़ने लगती है, जैसे गाँव की महिलाएँ घाघरा उठाकर दौड़ रही हों। हवा के प्रभाव से पेड़ झुककर ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे अपनी गर्दन उठा उठाकर उत्सुकता से मेहमान (बादलों) को देखने का प्रयास कर रहे हों। वहीं, नदी रूपी औरतें ठिठककर संकोच भरी नजरों से बादलों को निहार रही है, जैसे कि उन लोगों ने अपना घूँघट हल्का-सा सरका लिया हो। इस प्रकार, पूरे प्राकृतिक वातावरण में उल्लास और उत्सुकता का भाव उमड़ आया है, जो बादलों के आगमन को एक स्वागत करने योग्य अवसर के रूप में दर्शाता है।

(3)

बूँढ़े पीपल ने आगे बढ़कर जुहार की,
‘बरस बाद सुधि लीन्हीं’-
बोली अकुलाई लता ओट हो किवार की,
हरसाया ताल लाया पानी परात भर के।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।

व्याख्या- कवि ने वर्षा ऋतु के आगमन को मानवीय भावनाओं से जोड़कर उसका सुंदर चित्रण किया है। जिस प्रकार कोई दामाद लंबे समय बाद ससुराल लौटता है, तो परिवार के बड़े-बुजुर्ग झुककर उसका आदरपूर्वक स्वागत करते हैं, वैसे ही बूढ़ा पीपल भी झुककर बादलों का अभिवादन करता है। वहीं, लता रूपी नवविवाहिता मानो दरवाजे की ओट से नखरे से कह रही हो— “इतने दिनों बाद ही तुम्हें हमारी याद आई?” इसी खुशी में तालाब भी उमंग से भरकर अतिथि का स्वागत करने के लिए पानी से परात भर लाया है, जैसे कोई मेहमान के पाँव धोने के लिए जल लाता हो। इस प्रकार, कवि ने प्रकृति के माध्यम से बादलों के स्वागत को एक पारिवारिक मिलन की तरह दर्शाया है, जिसमें प्रेम, उलाहना, और उत्साह का भाव स्पष्ट रूप से झलकता है।

(4)

क्षितिज अटारी गहराई दामिनि दमकी,
‘क्षमा करो गाँठ खुल गई अब भरम की’,
बाँध टूटा झर-झर मिलन के अश्रु ढरके।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।

व्याख्या- कवि ने यहाँ बादलों के आगमन को प्रियतम के आगमन से जोड़ा है। अब तक प्रेमिका को उनके आने की सूचना मात्र एक भ्रम लग रही थी, लेकिन जब बादल क्षितिज रूपी अटारी तक पहुँच जाते हैं और बिजली चमक उठती है, तो मानो उसके हृदय में भी प्रेम की चिंगारी जाग उठती है। प्रियतम को सामने देखकर उसका सारा संदेह दूर हो जाता है, और वह मन ही मन अपने संकोच व अविश्वास के लिए क्षमा माँगने लगती है। फिर मिलन की इस अपार खुशी में, जैसे बाँध टूट जाता है और प्रेम के अश्रु झर-झर बहने लगते हैं, ठीक वैसे ही वर्षा की बूँदें पृथ्वी पर बरसने लगती हैं, जो मिलन की मधुरता को और भी गहरा बना देती हैं।

अभ्यास के प्रश्न

प्रश्न 1 — बादलों के आने पर प्रकृति में जिन गतिशील क्रियाओं को कवि ने चित्रित किया है, उन्हें लिखिए।

उत्तर– बादलों के आने पर प्रकृति में कई गतिशील क्रियाएँ होती हैं, जिन्हें कवि ने सुंदर रूप में चित्रित किया है। ठंडी हवा नाचती-गाती चलती है, जिससे पूरा वातावरण उल्लास से भर जाता है। गाँव के लोग उत्साह में आकर अपने घरों की खिड़कियाँ और दरवाज़े खोल देते हैं, मानो किसी विशेष मेहमान का स्वागत कर रहे हों। आँधी चलने पर धूल इस तरह उड़ती है, जैसे गाँव की महिलाएँ घाघरा उठाकर दौड़ रही हों। पेड़ झुककर अपनी गर्दन उचकाते हैं, मानो बादलों को देखने की कोशिश कर रहे हों। नदी ठिठककर घूँघट सरकाती है, जैसे किसी प्रियजन को देखने के लिए संकोच से पर्दा हटाया गया हो। बूढ़ा पीपल झुककर बादलों का अभिवादन करता है, और तालाब खुशी से भरकर अतिथि के स्वागत के लिए पानी से परात भर लाता है। अंत में, बिजली चमकने के साथ प्रेमिका (पृथ्वी) का भ्रम दूर हो जाता है, और बारिश की झर-झर बूंदों के रूप में मिलन के अश्रु बहने लगते हैं। इन सभी गतिशील क्रियाओं से बादलों के आगमन की सुंदरता और उत्साह स्पष्ट रूप से प्रकट होता है।

प्रश्न 2– निम्नलिखित किसके प्रतीक हैं?
– धूल, पेड़, नदी, लता, ताल |

उत्तर — धूल – गाँव की उन महिलाओं का प्रतीक है जो घाघरा उठाकर दौड़ती हैं।
पेड़ – एक जिज्ञासु व्यक्ति का प्रतीक है, जो गर्दन उचकाकर बादलों (अतिथि) को देखने का प्रयास करता है।
नदी – एक संकोची स्त्री का प्रतीक है, जो घूँघट सरकाकर प्रियतम (बादलों) को देखने की कोशिश करती है।
लता – एक नवविवाहिता स्त्री का प्रतीक है, जो नखरे के साथ प्रियतम (बादलों) से देर से आने की शिकायत करती है।
ताल – एक आनंदित मेजबान (मेहमान का स्वागत करने वाला) का प्रतीक है, जो बादलों के स्वागत के लिए पानी से परात भरकर प्रस्तुत करता है, मानो प्रेम और सम्मान दर्शा रहा हो।

प्रश्न 3– लता ने बादल रूपी मेहमान को किस तरह देखा और क्यों?

उत्तर– लता ने बादल रूपी मेहमान को संकोच और उलाहना भरी नजरों से दरवाजे की ओट से देखा। उसने शिकायत भरे भाव में कहा— “बरस बाद सुधि लीन्हीं” (अर्थात, “इतने दिनों बाद ही तुम्हें हमारी याद आई?”)।
लता यहाँ नवविवाहिता स्त्री का प्रतीक है, जो अपने प्रियतम (बादल) के देर से आने पर शिकायत करती है, लेकिन भीतर ही भीतर उसके आगमन से प्रसन्न भी होती है।

प्रश्न 4– भाव स्पष्ट कीजिए-
(क) क्षमा करो गाँठ खुल गई अब भरम की
(ख) बाँकी चितवन उठा, नदी ठिठकी, घूँघट सरके।

उत्तर– (क) “क्षमा करो गाँठ खुल गई अब भरम की”
इस पंक्ति में कवि ने संदेह के समाप्त होने और प्रेम की स्वीकृति को व्यक्त किया है। बादलों के आने से पहले प्रकृति को यह आशंका थी कि वे शायद इस बार भी नहीं आएँगे, लेकिन जब बादल सच में आ गए और बिजली चमक उठी, तो संदेह समाप्त हो गया। यह ऐसा ही है जैसे किसी प्रिय व्यक्ति के लंबे इंतजार के बाद उसके आने पर सारे भ्रम और गलतफहमियाँ दूर हो जाती हैं। यहाँ भरम की गाँठ खुलने का अर्थ है कि जो संदेह और अविश्वास था, वह अब समाप्त हो गया है और प्रेम-भाव की स्वीकृति हो गई है।

(ख) “बाँकी चितवन उठा, नदी ठिठकी, घूँघट सरके।”
इस पंक्ति में कवि ने नदी को एक नवविवाहित स्त्री के रूप में प्रस्तुत किया है, जो बादलों के आने पर लज्जा और संकोच से ठिठक जाती है। उसकी बाँकी चितवन उठती है यानी वह लाजभरी नजरों से बादलों को देखती है। घूँघट सरकना प्रतीक है कि वह धीरे-धीरे अपनी संकोचपूर्ण स्थिति से बाहर आ रही है, मानो वह अपने प्रियतम (बादलों) के स्वागत में धीरे-धीरे अपनी भावनाएँ प्रकट कर रही हो।

प्रश्न 5– मेघ रूपी मेहमान के आने से वातावरण में क्या परिवर्तन हुए?

उत्तर– मेघ रूपी मेहमान के आने से पूरे वातावरण में उत्साह और उमंग छा गई। ठंडी हवा नाचती-गाती चली, जिससे घरों के दरवाजे और खिड़कियाँ खुलने लगे, जैसे कोई विशेष अतिथि आया हो। पेड़ अपनी गर्दन उचकाकर बादलों को देखने लगे, आँधी चली और धूल इस तरह उड़ी जैसे कोई महिला अपना घाघरा उठाकर दौड़ रही हो।
नदी संकोच भरी दृष्टि से बादलों को देखने लगी, मानो नववधू अपने प्रियतम के आने पर घूँघट सरका रही हो। बूढ़ा पीपल झुककर बादलों का अभिवादन करने लगा, और तालाब खुशी से पानी से भर गया, मानो स्वागत के लिए परात में जल लाया हो। बादलों के आते ही बिजली चमकी और भ्रम दूर हो गया, जिससे प्रेम और मिलन की भावना प्रकट हुई। अंततः वर्षा शुरू हुई, जिससे धरती का सौंदर्य और भी बढ़ गया।

प्रश्न 6– मेघों के लिए ‘बन-ठन के, सँवर के’ आने की बात क्यों कही गई है?

उत्तर- कवि ने मेघों के लिए “बन-ठन के, सँवर के” आने की बात इसलिए कही है क्योंकि वह बादलों को एक विशेष मेहमान के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, जो पूरे ठाट-बाट और शान-शौकत के साथ आए हैं। यह दर्शाता है कि मेघ का आगमन किसी दामाद या सम्मानित अतिथि की तरह होता है, जिसे देखने के लिए पूरी प्रकृति उत्साहित हो जाती है। बादलों का काला-घना रूप, बिजली की चमक, और गरज-बरस के साथ उनका आना, मानो वे विशेष रूप से सज-धजकर आए हों। उनके स्वागत में हवा नाचती-गाती चलती है, पेड़ झुककर प्रणाम करते हैं, और नदी संकोच भरी दृष्टि से देखती है। इस प्रकार, कवि ने वर्षा ऋतु के आगमन को एक सुंदर, हर्षोल्लास भरे अवसर के रूप में चित्रित किया है।

प्रश्न 7– कविता में आए मानवीकरण तथा रूपक अलंकार के उदाहरण खोजकर लिखिए।

उत्तर– मानवीकरण अलंकार-
उदाहरण:
“आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली,”- यहाँ हवा (बयार) को नाचने और गाने की क्रिया दी गई है, जो केवल मनुष्य कर सकता है।
“बूढ़े पीपल ने आगे बढ़कर जुहार की,”- यहाँ पीपल वृक्ष को एक बूढ़े व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है, जो बादलों का स्वागत कर रहा है।
“बाँकी चितवन उठा, नदी ठिठकी, घूँघट सरके।”- यहाँ नदी को एक संकोची नवयौवना के रूप में दिखाया गया है, जो संकोचवश ठिठक रही है और घूँघट हटा रही है।

रूपक अलंकार
उदाहरण:
“धूल भागी घाघरा उठाए,”- यहाँ धूल की तुलना किसी स्त्री से की गई है, जो घाघरा उठाकर दौड़ रही हो।
“हरसाया ताल लाया पानी परात भर के,”- यहाँ तालाब को एक व्यक्ति के रूप में दर्शाया गया है, जो अतिथि के स्वागत में जल से भरी परात (थाली) लेकर आया हो।
“बाँध टूटा झर-झर मिलन के अश्रु ढरके।”- यहाँ वर्षा की बूंदों को मिलन के आनंद में बहते हुए अश्रुओं (आंसू) के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

प्रश्न 8– कविता में जिन रीति-रिवाजों का मार्मिक चित्रण हुआ है, उनका वर्णन कीजिए।

उत्तर– इस कविता में कवि ने भारतीय समाज में अतिथि के स्वागत और पारिवारिक संबंधों से जुड़े रीति-रिवाजों को अत्यंत भावनात्मक रूप से प्रस्तुत किया है। मेघ के आगमन को एक विशिष्ट मेहमान, विशेष रूप से दामाद, के आगमन की तरह दर्शाया गया है, जिससे कई सांस्कृतिक परंपराएँ उजागर होती हैं। जब कोई खास अतिथि, विशेषकर दामाद, ससुराल आता है, तो पूरा परिवार हर्षोल्लास से उसका स्वागत करता है।
कविता में बूढ़े पीपल का झुककर जुहार करना यह दर्शाता है कि बुजुर्ग अपने प्रियजनों का सम्मान और स्वागत करते हैं। तालाब का पानी से परात भर लाना इस बात का प्रतीक है कि भारतीय संस्कृति में अतिथि के चरण धोने की परंपरा महत्वपूर्ण रही है। वहीं, लता का ओट में छिपकर उलाहना देना यह दर्शाता है कि जब कोई प्रियजन लंबे समय बाद लौटता है, तो प्रेम और शिकायत दोनों भाव उमड़ते हैं। यह नवविवाहिता के संकोच को भी दर्शाता है, जो अपने प्रियतम के देर से आने पर स्नेह से शिकायत करती है। पूरा गाँव उत्साह से भरकर खिड़कियाँ और दरवाज़े खोल लेता है, ठंडी बयार नाचती है, पेड़ झुककर बादलों को देखने लगते हैं—यह सब सामूहिक उत्सव और आनंद की भावना को प्रकट करता है, जो भारतीय संस्कृति की विशेषता है।

प्रश्न 9– कविता में कवि ने आकाश में बादल और गाँव में मेहमान (दामाद) के आने का जो रोचक वर्णन किया है, उसे लिखिए।

उत्तर– कवि ने बादलों के आगमन को गाँव में आए सजे-धजे मेहमान, विशेष रूप से दामाद, के रूप में चित्रित किया है, जिससे पूरा वातावरण उमंग से भर जाता है। ठंडी हवा नाचती-गाती चलती है, दरवाज़े-खिड़कियाँ उत्सुकता से खुलने लगती हैं। पेड़ झुककर बादलों को देखने लगते हैं, धूल इस तरह उड़ती है जैसे महिलाएँ घाघरा उठाकर दौड़ रही हों। नदी संकोची नवविवाहिता की तरह ठिठककर बादलों को निहारती है। बूढ़ा पीपल झुककर उनका स्वागत करता है, लता शिकायत करती है, और तालाब खुशी में जल से परात भर लाता है। अंत में, बिजली चमकते ही धरती प्रेमाश्रुओं की तरह झर-झर बरसती बूंदों से भीग जाती है।

प्रश्न 10– काव्य-सौंदर्य लिखिए–
पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के ।

उत्तर– इन पंक्तियों में उपमा और मानवीकरण अलंकार के माध्यम से बादलों के आगमन को गाँव में आए किसी विशेष अतिथि, विशेषकर दामाद, के रूप में दर्शाया गया है। “पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के” में उपमा अलंकार है, जहाँ बादलों की तुलना किसी प्रतिष्ठित मेहमान से की गई है।
“मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के” में मानवीकरण अलंकार है, जहाँ बादलों को सज-धजकर आने वाले व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। इन पंक्तियों में ग्रामीण जीवन की सहज अभिव्यक्ति, भाषा की मधुरता, और प्रकृति के मानवीकरण से काव्य-सौंदर्य निखरकर आता है, जिससे कविता सजीव और भावनात्मक रूप से प्रभावशाली बन जाती है।

यह भी पढ़ें :

▪️हिंदी ( कक्षा 9) — क्षितिज भाग 1

Leave a Comment

error: Content is proteced protected !!