कवित्त और सवैया ( देव कवि ) / Kavitt Aur Savaiya ( Dev Kavi )

( यहाँ NCERT की कक्षा 10वीं की हिंदी की पाठ्य पुस्तक 'क्षतिज भाग 2' में संकलित ' कवित्त और  सवैया ( देव )' अध्याय के मूल पाठ, व्याख्या तथा अभ्यास के प्रश्नों को दिया गया है | )

(1)

पाँयनि नूपुर मंजु बजै , कटि किंकिनि कै धुनि की मधुराई।
साँवरे अंग लसै पट पीत , हिये हुलसै बनमाल सुहाई।
माथे किरीट बड़े दृग चंचल , मंद हँसी मुखचंद जुन्हाई।
जै जग – मंदिर – दीपक सुंदर , श्रीब्रजदूलह ‘ देव ’ सहाई॥

शब्दार्थ

पाँयनि – पैरों के /में
नूपुर – पायल
मंजु – मधुर
बजै – बजना
कटि – कमर
किंकिनि – करधनी
धुनि – धुन
साँवरे – साँवले
अंग – शरीर
लसै – लिपटा
पट – वस्त्र
पीत – पीला
हिये – हृदय पर
बनमाल – तुलसी , कुंद , मंदार , परजाता और कमल इन पाँच चीजों की बनी हुई माला
सुहाई – सुशोभित होना
किरीट – मुकुट
दृग – आँखें
मंद – धीरे
मुखचंद – चाँद जैसा मुँह
जुन्हाई – चाँदनी
जै – जैसे
जग – संसार
श्रीब्रजदूलह – श्री कृष्ण
सहाई – सहायता करने वाला

व्याख्या – इस सवैये में कवि देव ने श्री कृष्ण के रूप का वर्णन अत्यधिक मनोरम ढंग से किया है। कवि का कहना है कि श्री कृष्ण के पैरों की पायल मधुर धुन पैदा कर रही है। श्री कृष्ण के कमर में बंधी करघनी अर्थात कमर का आभूषण भी मधुर आवाज कर रहा है। उनके साँवले शरीर पर पीला वस्त्र लिपटा हुआ है अर्थात श्री कृष्ण के साँवले शरीर पर पिले वस्त्र सुशोभित हो रहे हैं और उनके हृदय पर तुलसी , कुंद , मंदार , परजाता और कमल इन पाँच चीजों की बनी हुई माला अर्थात जंगली फूलों की माला सुशोभित हो रही है। उनके सिर पर मुकुट सजा हुआ है और उनकी बड़ी – बड़ी चंचल आँखें बहुत सुंदर लग रही हैं। उनका मुँह चाँद जैसा लग रहा है , जिससे मंद – मंद मुसकान की चाँदनी बिखर रही है। श्री कृष्ण संसार रूपी मंदिर में सुंदर दीपक के सामान ऐसे सुशोभित हैं जैसे वे सभी की मदद करने के लिए संसार को प्रकाशित किए हुए हों।

(2)

डार द्रुम पलना बिछौना नव पल्लव के ,
सुमन झिंगूला सोहै तन छबि भारी दै।
पवन झूलावै , केकी – कीर बतरावैं ‘ देव ’ ,
कोकिल हलावै हुलसावै कर तारी दै।।
पूरित पराग सों उतारो करै राई नोन ,
कंजकली नायिका लतान सिर सारी दै।
मदन महीप जू को बालक बसंत ताहि ,
प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दै॥

शब्दार्थ

डार – डाल
द्रुम – पेड़
पलना – पालना
बिछौना – बिस्तर
नव पल्लव – नई पत्तियाँ
सुमन – फूल
झिंगूला – झूला
सोहै – शोभा
तन – शरीर
पवन – हवा
झूलावै – झुलाना
केकी – मोर
कीर – तोते
बतरावैं – बातें करना
कोकिल – कोयल
हलावै – हिलाना
कर तारी दै – हाथ से ताली बजाना
पूरित – पूर्ण किया या भरा हुआ
सों – ऐसी
उतारो – उतारना
राई – एक प्रकार की छोटी सरसों
नोन – नमक
कंजकली – कमल की कली
लतान – लता रूपी
सारी – साड़ी
मदन – कामदेव
महीप – महाराज
प्रातहि – सुबह – सुबह
जगावत – जागना
चटकारी दै – चुटकी बजाकर

व्याख्या – इस कवित्त में कवि देव द्वारा बसंत ऋतु की सुंदरता का वर्णन किया गया है। बसंत ऋतु को कवि एक नन्हे से बालक के रूप में देख रहे हैं। कवि वर्णन करते हैं कि बसंत के आगमन पर , बसंत के लिए किसी पेड़ की डाल का पालना बना हुआ है और उन डालियों पर उग आये नए – नए कोमल पत्ते उस पालने में बिछौने के समान है। बसंत ने फूलों से बने हुए कपड़े पहने हैं , जिससे उस नन्हे शिशु यानि बसंत का शरीर अत्यधिक शोभायमान हो रहा है। पवन के झोंके उसे झूला झुला रहे हैं। मोर व तोते अपनी – अपनी आवाज में उससे बातें कर रहे है। कोयल भी प्रसन्न होकर तालियां बजाकर – बजाकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त कर रही हैं। कवि देव कहते हैं कि कमल की कली रूपी नायिका जिसने अपने सिर तक लता रूपी साड़ी पहनी है , वह अपने पराग कणों रूपी नमक , राई से बसंत रूपी नन्हे शिशु की नजर उतार रही हैं। यह बसंत रूपी नन्हा शिशु कामदेव महाराज का पुत्र है , जिसे सुबह होते ही गुलाब की कलियाँ चुटकी बजाकर जगाती हैं। दरअसल गुलाब की कली पूरी खिलने से पहले थोड़ी चटकती हैं। इसी का वर्णन कवि देव ने इस तरह अद्धभुत तरीके से किया है।

(3)

फटिक सिलानि सौं सुधारयौ सुधा मंदिर ,
उदधि दधि को सो अधिकाइ उमगे अमंद।
बाहर ते भीतर लौं भीति न दिखैए ‘ देव ’ ,
दूध को सो फेन फैल्यो आँगन फरसबंद।
तारा सी तरुनि तामें ठाढ़ी झिलमिली होति ,
मोतिन की जोति मिल्यो मल्लिका को मकरंद।
आरसी से अंबर में आभा सी उजारी लगै ,
प्यारी राधिका को प्रतिबिंब सो लगत चंद॥

शब्दार्थ

फटिक – स्फटिक
सिलानि – शिला
सौं – जैसे
सुधारयौ – पारदर्शी
सुधा – चाँदनी
उदधि – समुद्र
दधि – दहीं
को सो – के जैसा
अधिकाइ – अत्यधिक
उमगे – उमड़ना
अमंद – श्रेष्ठ , उत्तम
को सो – के जैसा
फेन – झाग
फैल्यो – फैलना
फरसबंद – फर्श पर
तरुनि – चाँदनी, चाँद
तामें – रात में
ठाढ़ी झिलमिली – झीनी और पारदर्शी
जोति – चमकमिल्यो – मिलना
मल्लिका – चमेली , एक प्रकार का फूल
मकरंद – फूलों का रस
आरसी – दर्पण , आईना , शीशा
अंबर – आकाश
आभा – चमक
उजारी – उज्जवल
प्रतिबिंब – परछाईं

व्याख्या – इस कवित्त में पूर्णमासी की चाँदनी रात में धरती और आकाश के सौंदर्य को निहारते हुए कवि कहते हैं कि चाँदनी का तेज ऐसे बिखर रहा है जैसे यह संसार स्फटिक की शिला (पत्थर) से बना हुआ एक सुंदर मंदिर हो। कवि की नजरें जहां तक़ जाती हैं वहां तक उन्हें चांदनी ही चाँदनी नजर आती हैं। उसे देखकर कवि को ऐसा प्रतीत हो रहा हैं जैसे धरती पर दही का समुद्र हिलोरा ले रहा हो। और चांदनी रूपी दही का समंदर उन्हें समस्त आकाश में भी उमड़ता हुआ नजर आ रहा है। इस प्रकाश में दूर दूर तक बाहर और अंदर सब कुछ साफ – साफ दिख रहा है। ऐसा लगता है कि पूरे आँगन में फर्श पर दूध का झाग फैल गया है। कवि को इस चाँदनी रात में आकाश के तारे भी सुंदर सुसज्जित खड़ी किशोरियों ( युवा लड़कियों ) की भाँति लग रहे हैं। ऐसा लगता है कि मोतियों को चमक मिल गई है या जैसे बेले के फूल को रस मिल गया है। पूरा आसमान किसी दर्पण की तरह लग रहा है जिसमें चारों तरफ रोशनी की चमक उज्ज्वलित हो रही है। इन सब के बीच पूर्णमासी का चाँद ऐसे लग रहा है जैसे उस दर्पण में राधा का प्रतिबिंब दिख रहा हो।

अभ्यास के प्रश्न

प्रश्न 1 – कवि ने ‘ श्रीब्रजदूलह ’ किसके लिए प्रयुक्त किया है और उन्हें संसार रूपी मंदिर का दीपक क्यों कहा है?

उत्तर – कवि ने ‘ श्रीब्रजदूलह ’ शब्द श्री कृष्ण के लिए प्रयुक्त किया है। उन्हें श्री कृष्ण को संसार रूपी मंदिर का दीपक इसलिए कहा है क्योंकि जिस प्रकार एक दीपक सम्पूर्ण मंदिर को पवित्रता और सकारात्मकता के भाव से भर देता है , ठीक उसी प्रकार से श्री कृष्ण सम्पूर्ण संसार को पवित्रता और सकारात्मकता के भाव से भर देते हैं।

प्रश्न 2 – पहले सवैये में से उन पंक्तियों को छाँटकर लिखिए जिनमें अनुप्रास और रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है ?

उत्तर – अनुप्रास अलंकार का प्रयोग –

कटि किंकिनि कै धुनि की मधुराई – ‘क’ वर्ण की आवृत्ति के कारण।
साँवरे अंग लसै पट पीत – में ‘प’ वर्ण की आवृत्ति के कारण।
हिये हुलसै बनमाल सुहाई – में ‘ह’ वर्ण की आवृत्ति के कारण।

रूपक अलंकार का प्रयोग –

मंद हँसी मुखचंद जुन्हाई – मुख रूपी चंद्रमा
जै जग – मंदिर – दीपक सुंदर – जग (संसार) रूपी मंदिर के दीपक।

प्रश्न 3 – निम्नलिखित पंक्तियों का काव्य – सौंदर्य स्पष्ट कीजिए –

पाँयनि नूपुर मंजु बजें , कटि किंकिनि कै धुनि की मधुराई।
साँवरे अंग लसै पट पीत , हिये हुलसै बनमाल सुहाई।।

उत्तर – प्रस्तुत पंक्तियाँ देवदत्त द्विवेदी द्वारा रचित सवैया से ली गई है। इसमें देव द्वारा श्री कृष्ण के सौंदर्य का बखान किया गया है।

देव जी कहते हैं कि श्री कृष्ण के पैरों में पड़ी हुई पायल बहुत मधुर ध्वनि कर रही है और कमर में बंधा हुआ कमरबन्ध भी मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रहा है। श्री कृष्ण के साँवले सलोने शरीर पर पीले रंग का वस्त्र सुशोभित हो रहा है और उनके गले में पड़ी हुई बनमाला बहुत ही सुंदर जान पड़ती है।

काव्य – सौंदर्य – उक्त पंक्तियों में सवैया छंद का सुंदर प्रयोग किया गया है। छंद में ब्रज भाषा के प्रयोग से मधुरता व् सरसता का मिश्रण है। उक्त पंक्तियों में कटि किंकिनि , पट पीत , हिये हुलसै में ‘ क ‘ , ‘ प ‘ , ‘ ह ‘ वर्ण कि एक से अधिक बार आवृत्ति के कारण अनुप्रास की अधिकता मिलती है।

प्रश्न 4 – दूसरे कवित्त के आधार पर स्पष्ट करें कि ऋतुराज वसंत के बाल – रूप का वर्णन परंपरागत वसंत वर्णन से किस प्रकार भिन्न है।

उत्तर – दूसरे कवित्त में कवि ने ऋतुराज वसंत के बाल – रूप का जिस प्रकार वर्णन किया है वह परंपरागत वसंत के वर्णन से पूर्णतया भिन्न है। वसंत के परंपरागत वर्णन में प्रकृति में चारों और बिखरे सौंदर्य , फूलों के खिलने , मन को प्रसन्न करने वाले वातावरण का होना , पशु – पक्षियों एवं अन्य प्राणियों के आनंदित होने , नायक – नायिका की संयोग अवस्था का वर्णन एवं चारों ओर प्रसन्नाता के वातावरण का वर्णन होता है। परन्तु इस कवित्त में ऋतुराज वसंत को कामदेव के नवजात शिशु के रूप में चित्रित किया है। इस बालक के साथ पूरी प्रकृति अपने – अपने तरीके से निकटता प्रकट करती है। इस बालक का पालना पेड़ – पौधे की डालियाँ हैं , उसका बिछौना , नए – नए पल्लव हैं , उसके वस्त्र फूलों के हैं तथा हवा के द्वारा उसके पालने को झुलाते हुए दर्शाया गया है। प्रकृति के अनेक पक्षी उस बालक को प्रसन्न करने के लिए उससे बातें करते हैं। साथ – ही – साथ कमल की कली उसे बुरी नजर से बचाती है और गुलाब चटककर प्रात:काल उसे जगाता है। इस तरह का वर्णन अपने आप में ही अनोखा और अत्यधिक अद्भुत है।

प्रश्न 5 – ‘ प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दै ’ – इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – ‘ प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दै ’ – इस पंक्ति का भाव यह है कि वसंत रुपी बालक , पेड़ की डाल रुपी पालने और नए – नए पल्लव रूपी बिछौने में सोया हुआ है। प्रात:काल ( सुबह ) होने पर उसे गुलाब का फूल चटकारी अर्थात् चुटकी दे कर जगा रहा है। तात्पर्य यह है कि वसंत आने पर प्रात:काल गुलाब के फूलों का वसंत के समय सुबह चटकर खिलना कवि को ऐसा आभास दिलाता है मानो वसंत रुपी सोए हुए बालक को गुलाब चुटकी बजाकर जगाने का प्रयास कर रहा है।

प्रश्न 6 – चाँदनी रात की सुंदरता को कवि ने किन – किन रूपों में देखा है ?

उत्तर – चाँदनी रात की सुंदरता को कवि ने निम्नलिखित रूपों में देखा है –

▪️आकाश में फैली चाँदनी को पारदर्शी शिलाओं से बने सुधा मंदिर के रूप में , जिससे सब कुछ देखा जा सकता है।
▪️सफेद दही के उमड़ते समुद्र के रूप में।
▪️ऐसी फ़र्श जिस पर दूध का झाग ही झाग फैली है।
▪️आकाश के तारों को सुंदर सुसज्जित खड़ी किशोरियों के रूप में।
▪️आसमान को स्वच्छ निर्मल दर्पण के रूप में।

प्रश्न 7 – ‘ प्यारी राधिका को प्रतिबिंब सो लगत चंद ’ – इस पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताएँ कि इसमें कौन – सा अलंकार है ?

उत्तर – ‘ प्यारी राधिका को प्रतिबिंब सो लगत चंद ’ – इस पंक्ति का भाव यह है कि कवि ने यहाँ ‘ चन्द्रमा सौन्दर्य का श्रेष्ठतम उदाहरण हैं ‘ इस उदाहरण के विपरीत राधिका की सुन्दरता को चाँद की सुन्दरता से श्रेष्ठ दर्शाया है तथा चाँद के सौन्दर्य को राधिका का प्रतिबिम्ब मात्र बताया है।
उपरोक्त पंक्ति में आपको उपमा अलंकार का आभास हो सकता हो परन्तु यहाँ चाँद के सौन्दर्य की उपमा राधा के सौन्दर्य से नहीं की गई है बल्कि चाँद को राधा से हीन बताया गया है , इसलिए यहाँ व्यतिरेक अलंकार है , उपमा अलंकार नहीं है।

प्रश्न 8 – तीसरे कवित्त के आधार पर बताइए कि कवि ने चाँदनी रात की उज्ज्वलता का वर्णन करने के लिए किन – किन उपमानों का प्रयोग किया है ?

उत्तर – तीसरे कवित्त में कवि ने चाँदनी रात की उज्ज्वलता के वर्णन के लिए कवि ने निम्नलिखित उपमानों का वर्णन किया है –

▪️स्फटिक शिला से निर्मित सुधा मंदिर
▪️दही का समुद्र
▪️दूध का झाग
▪️मोतियों की चमक
▪️दर्पण की स्वच्छता

प्रश्न 9 – पठित कविताओं के आधार पर कवि देव की काव्यगत विशेषताएँ बताइए।

उत्तर – पठित कविताओं के आधार पर कवि देव की काव्यगत विशेषताएँ –

▪️प्रकृति का अद्भुत चित्रण
▪️ब्रज भाषा का सुंदर प्रयोग
▪️अलंकारों से परिपूर्ण पंक्तियाँ
▪️लयबद्धता एवं संगीतात्मकता से पूर्ण
▪️कवित्त एवं सवैया छंद का प्रयोग
▪️मानवीकरण अलंकार का अद्भुत प्रयोग
▪️तत्सम शब्दों का सुंदर प्रयोग

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