आचार्य शुक्ल से पूर्व हिंदी साहित्येतिहास लेखन

हिंदी साहित्य का इतिहास आज जिस विकसित और वैज्ञानिक रूप में हमारे सामने उपस्थित है, वह आचार्य रामचंद्र शुक्ल के (1900–1941) प्रयासों का परिणाम है। किंतु उनके पहले भी हिंदी साहित्य का संकलन, वर्गीकरण और विवरण गंभीरता से किया जा रहा था। 19वीं सदी और 20वीं सदी के पूर्वार्ध में हिंदी भाषा और साहित्य के अध्ययन की आवश्यकता दो दिशाओं से उत्पन्न हुई—एक ओर यूरोपीय विद्वान थे जो भारत की भाषाओं के उद्गम और साहित्यिक परंपराओं का विश्लेषण औपनिवेशिक प्रशासन और ओरिएंटल स्टडीज़ के दृष्टिकोण से कर रहे थे, और दूसरी ओर भारतीय विद्वान थे जो हिंदी साहित्य की स्वदेशी परंपरा को व्यवस्थित रूप देने की इच्छा रखते थे। इन्हीं प्रयासों के अंतर्गत गार्सां द तासी, ग्रियर्सन, मिश्र बंधु, रामनरेश त्रिपाठी, नागरी प्रचारिणी सभा और अन्य विद्वानों ने साहित्येतिहास लेखन के शुरुआती आधार निर्मित किए। इनका कार्य पूर्ण वैज्ञानिक तो नहीं था, किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि उन्होंने हिंदी भाषा की बोलियों, मध्यकालीन ग्रंथों, संत-कवियों, रीतिकवियों और लोक साहित्य के सुव्यवस्थित संकलन को संभव बनाया।

शुक्ल-पूर्व हिंदी साहित्येतिहास की दृष्टि

आचार्य शुक्ल से पहले हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने की दृष्टि मुख्यतः ग्रंथ-संग्रह, कवि-चरित, और भाषावैज्ञानिक सर्वेक्षण पर आधारित थी, न कि साहित्यिक प्रवृत्तियों के विकास पर। इतिहास लेखन को आज जिस वैज्ञानिक, समाजशास्त्रीय और ऐतिहासिक क्रम में देखा जाता है, वह 19वीं सदी के उत्तरार्ध तक विकसित नहीं हुआ था। शुक्ल-पूर्व इतिहासकार साहित्य को मुख्यतः दो रूपों में देखते थे—पहला, कवियों और ग्रंथों का गौरवपूर्ण विवरण; दूसरा, भाषाओं और बोलियों का भौगोलिक और व्युत्पत्तिगत अध्ययन। उदाहरण के लिए, गार्सां द तासी ने हिंदी साहित्य को यूरोपीय विद्वानों की दृष्टि से सांस्कृतिक दस्तावेज के रूप में समझने की कोशिश की, जबकि ग्रियर्सन ने इसे भाषिक परिवारों के संदर्भ में देखा। मिश्र बंधु और त्रिपाठी जैसे भारतीय विद्वानों के यहाँ साहित्य की प्रवृत्तियों की चर्चा तो मिलती है, पर वह मुख्यतः भावप्रधान और चरितप्रधान रहती है। इन लेखकों के लिए साहित्येतिहास का अर्थ था—कवियों का वर्णन, महत्वपूर्ण ग्रंथों की सूची और भाषा के विकास का सामान्य खाका। सामाजिक चेतना, ऐतिहासिक परिस्थिति और साहित्यिक धाराओं के बीच संबंधों पर तुलनात्मक चर्चा न के बराबर थी। अतः यह कहा जा सकता है कि शुक्ल-पूर्व दृष्टि ने इतिहास लेखन का प्रारंभिक ढाँचा तो तैयार कर दिया, परंतु उसकी वैज्ञानिकता अधूरी थी। यही वह भूमि थी जिस पर आगे चलकर शुक्लजी ने साहित्य को समाज, मनोविज्ञान, इतिहास और संस्कृति के बहुआयामी संदर्भ में देखने की विधि विकसित की।

(1) गार्सां द तासी का साहित्येतिहास में योगदान

फ्रांसीसी विद्वान गार्सां द तासी (Garcin de Tassy, 1794–1878) हिंदी साहित्येतिहास के प्रथम सुव्यवस्थित शोधकर्ताओं में गिने जाते हैं। उनकी विश्वविख्यात कृति ‘Histoire de la Littérature Hindoui et Hindoustani’ (1839–1869) तीन खंडों में प्रकाशित हुई, जो हिंदी-उर्दू साहित्य का पहला विस्तृत और प्रामाणिक यूरोपीय अध्ययन माना जाता है। इस ग्रंथ में तासी ने भारतीय भाषाओं के उद्भव, हिंदी की बोलियों, संस्कृत-प्राकृत-अवहट्ट परंपरा, दरबारी काव्य, सूफी साहित्य, कबीर, सूर, तुलसीदास जैसे मध्यकालीन कवियों और लोकगीतों का अत्यंत सूक्ष्म विवरण प्रस्तुत किया। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने उपलब्ध भारतीय पांडुलिपियों, फोर्ट विलियम कॉलेज में संकलित हस्तलिपियों और बनारस, आगरा, दिल्ली के कवियों की जानकारी के आधार पर साहित्य को ऐतिहासिक-भाषिक क्रम में समझने की कोशिश की। तासी ने पहली बार हिंदी साहित्य को भक्ति और रीति जैसी दो बड़ी धाराओं में बाँटकर देखा। यद्यपि उनका वर्गीकरण आधुनिक मानकों से पूर्ण नहीं था, फिर भी यह प्रयास महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे हिंदी साहित्य को यूरोप में एक गंभीर साहित्यिक परंपरा के रूप में पहचान मिली। तासी का दृष्टिकोण औपनिवेशिक-शोधात्मक था, इसलिए वे साहित्य को सांस्कृतिक-जातीय मिश्रण के संदर्भ में देखते हैं। उन्होंने हिंदुस्तानी साहित्य को फारसी, अरबी और भारतीय परंपराओं का संयुक्त रूप माना। उनकी आलोचना का स्वर वर्णनात्मक है, परंतु उनका विस्तृत संग्रह, सटीक उद्धरण और भाषा-शास्त्रीय विवेचन उन्हें शुक्ल-पूर्व इतिहासकारों में अग्रणी बनाता है। तासी का योगदान हिंदी साहित्य को विश्व के ओरिएंटल स्टडीज़ में स्थापित करने और उसके वैज्ञानिक अध्ययन की दिशा में पहला निर्णायक कदम था।

(2) जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन का योगदान

जॉर्ज ए. ग्रियर्सन (1851–1941) हिंदी भाषा और साहित्य के इतिहास में अत्यंत प्रामाणिक नाम है। उनका महान कार्य ‘Linguistic Survey of India’ (प्रारंभिक संकलन 1894; प्रकाशन 1903–1928) न केवल भाषावैज्ञानिक शोध का वैश्विक आदर्श है, बल्कि हिंदी साहित्येतिहास के लिए भी अति महत्वपूर्ण स्रोत है। ग्रियर्सन ने पहली बार भारतीय भाषाओं और बोलियों का वैज्ञानिक वर्गीकरण किया। उन्होंने ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मगही, मैथिली, राजस्थानी, हरियाणवी, खड़ीबोली, पहाड़ी बोलियों इत्यादि को विस्तृत उदाहरणों सहित प्रस्तुत किया। इससे स्पष्ट हुआ कि हिंदी साहित्य एकाधिक भाषिक स्रोतों से विकसित हुआ है। ग्रियर्सन ने विद्यापति, कबीर, तुलसी, सूरदास आदि मध्यकालीन कवियों की रचनाओं का भाषिक विश्लेषण करते हुए यह दर्शाया कि किस प्रकार अवहट्ट, अपभ्रंश और लोकबोलियाँ मिलकर हिंदी साहित्य का आधार बनाती हैं। ग्रियर्सन की दृष्टि साहित्यिक न होकर भाषाशास्त्रीय थी, इसलिए वे साहित्य को सौंदर्यशास्त्र, भाषा-व्यंजना या सामाजिक संदर्भों से नहीं जोड़ते। फिर भी उन्होंने उपलब्ध पांडुलिपियों और ग्रंथों से भाषा और साहित्य के विकास की प्रामाणिक सूची तैयार की। उनका कार्य यह सिद्ध करने में महत्वपूर्ण रहा कि हिंदी एक स्वतंत्र भाषिक इकाई है, जिसकी अनेक बोलियाँ हैं और जिनकी अपनी-अपनी साहित्यिक परंपराएँ हैं। शुक्लजी ने अपने इतिहास लेखन में जिस “विकासवादी दृष्टि” की नींव रखी, उसके लिए ग्रियर्सन का भाषिक वर्गीकरण एक आवश्यक आधार सिद्ध हुआ। अतः यद्यपि ग्रियर्सन ने साहित्य को समाजधर्मी दृष्टि से नहीं देखा, पर उनका योगदान हिंदी साहित्य के ऐतिहासिक निर्धारण के लिए मूलभूत है।

(3) शिवसिंह सेंगर का ‘शिवसिंह सरोज’

शुक्ल-पूर्व हिंदी साहित्य–इतिहास लेखन में शिवसिंह सेंगर का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने उस समय साहित्य–इतिहास का रूप तैयार किया, जब हिंदी में व्यवस्थित, प्रमाण-सम्मत और आलोचनात्मक दृष्टि वाला इतिहास लेखन आरंभ ही हुआ था। सेंगर का प्रमुख ग्रंथ ‘शिवसिंह सरोज’ (1903) केवल एक शब्दकोश नहीं, बल्कि एक प्रकार से हिंदी के प्रारम्भिक साहित्य–इतिहास का आधार–ग्रंथ है। इसमें कवियों, रचनाओं, ग्रंथों और साहित्यिक प्रवृत्तियों का जो विस्तृत संकलन मिलता है, वह उनकी विद्वत्ता और व्यापक अध्ययन का प्रमाण है। इस ग्रंथ के कारण सेंगर को हिंदी के “जीवित विश्वकोश” जैसे विशेषण भी प्राप्त हुए।

शिवसिंह सेंगर का योगदान मुख्यतः तीन स्तरों पर महत्त्वपूर्ण है—(1) ऐतिहासिक सामग्री का संकलन, (2) कवियों की वंशावली और ग्रंथावली का संग्रह, और (3) साहित्यिक परंपरा की निरंतरता का निर्धारण। उन्होंने हिंदी भाषा के विभिन्न रूपों—ब्रह्मभाषा, अपभ्रंश, अवहट्ठ, प्रारंभिक काव्यभाषा आदि—का संदर्भ देते हुए यह बताया कि हिंदी साहित्य का विकास किस प्रवाह और परंपरा में हुआ। सेंगर ने पहली बार अनेक ऐसे कवियों का परिचय दिया, जिनके बारे में बाद में शुक्ल, वर्मा, हरिऔध और अन्य इतिहासकारों ने विस्तार से चर्चा की। ‘शिवसिंह सरोज’ की विशिष्टता यह भी है कि यह केवल साहित्यिक इतिहास नहीं, बल्कि एक दस्तावेज़ी ग्रंथ है—इसमें पांडुलिपियों, लोककथाओं, जनश्रुतियों, अभिलेखों और मौखिक परंपराओं से प्राप्त सामग्री को एकत्र कर हिंदी के साहित्यिक भूगोल का मानचित्र तैयार किया गया है।

शुक्ल-पूर्व इतिहासकारों के बीच सेंगर की सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने साहित्य को जातीय, जातीय-भाषीय और सांस्कृतिक आधार से जोड़कर देखा। वे साहित्य को किसी युग की अनुगूँज मानते थे और इसीलिए उनके इतिहास में केवल कवि नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, राजनीतिक पृष्ठभूमि और सांस्कृतिक आंदोलनों की भी झलक मिलती है। उदाहरण के लिए, उन्होंने आल्हा-ऊदल परंपरा, निर्गुण संत-परंपरा, रीतिकालीन कवियों की सामंती पृष्ठभूमि और ब्रजभाषा के काव्य-लोक को बड़े विस्तार से दर्ज किया है।

यह कहना उचित होगा कि शिवसिंह सेंगर ने अपने समय की उपलब्ध सामग्री, अभिलेखों और मौखिक इतिहास को संकलित कर हिंदी साहित्य को एक दस्तावेजी आधार प्रदान किया। रामचंद्र शुक्ल जैसे आलोचक भले वैज्ञानिक पद्धति के प्रवर्तक माने जाते हों, परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि यदि सेंगर जैसे विद्वानों ने विशाल सामग्री न जुटाई होती, तो आगे का इतिहास लेखन इतना समृद्ध और सत्यनिष्ठ नहीं हो पाता। इसलिए शुक्ल-पूर्व इतिहासकारों में सेंगर का स्थान आधार-शिला की भांति है, जिनके प्रयासों ने हिंदी साहित्य–इतिहास को पहली विस्तृत संरचना दी।

(4) मिश्रबंधु ( श्याम बिहारी मिश्र और गणेश बिहारी मिश्र का साहित्य–इतिहास में योगदान )

शुक्ल-पूर्व हिंदी साहित्य–इतिहास लेखन में मिश्रबंधु (श्याम बिहारी मिश्र और गणेश बिहारी मिश्र) का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण और व्यवस्थित रूप में मिलता है। दोनों भाइयों ने संयुक्त रूप से हिंदी काव्य, कवियों और साहित्यिक परंपराओं के इतिहास को व्यापक रूप देकर एक ऐसा ग्रंथ तैयार किया जिसने आगे आने वाले इतिहास-लेखकों को दिशा और सामग्री प्रदान की। उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध इतिहास–ग्रंथ ‘मिश्रबंधु विनोद’ (तीन खंडों में) हिंदी साहित्य–इतिहास की उन आरंभिक कृतियों में से है, जिनमें व्यापकता, तथ्य-संग्रह और साहित्यिक दृष्टि—तीनों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

मिश्रबंधु विनोद की विशेषता यह है कि इसमें हिंदी साहित्य को व्यापक भारतीय परंपरा और विभिन्न भाषाई-सांस्कृतिक शाखाओं से जोड़कर देखा गया है। उन्होंने हिंदी साहित्य की पंद्रहवीं से उन्नीसवीं सदी तक की काव्य-धारा को विस्तार से प्रस्तुत किया। विशेष रूप से भक्ति साहित्य, रीतिकाल, ब्रजभाषा की काव्य-परंपरा, लोककाव्य, और अल्पज्ञात कवियों पर उनकी सामग्री आज भी शोधार्थियों के लिए प्रामाणिक स्रोत मानी जाती है। रामचंद्र शुक्ल ने अपने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में जिन उदाहरणों और अभिलेखों का उपयोग किया, उनमें से अनेक सामग्री मिश्रबंधुओं के संकलन से ही आती है—यह उनकी शोध-वृत्ति की गहराई का प्रमाण है।

मिश्रबंधु की शैली अत्यंत सरल, प्रवाहपूर्ण और तथ्यनिष्ठ है। वे किसी युग या कवि का वर्णन करते समय केवल प्रशंसा या निंदा नहीं करते, बल्कि उनके काव्य की विशेषताओं, सामाजिक संदर्भ, भाषा-शैली और ऐतिहासिक स्थिति का संतुलित विवेचन प्रस्तुत करते हैं। उनकी दृष्टि में साहित्य केवल सौंदर्यबोध का विषय नहीं, बल्कि संस्कृति का दर्पण भी है। इसलिए मिश्रबंधु विनोद में सामाजिक स्थितियों, भाषाई विविधताओं, धर्म-संप्रदाय, लोक-आंदोलनों और सांस्कृतिक प्रभावों का विस्तृत संदर्भ मिलता है। उन्होंने तुलसीदास, सूरदास, कबीर, रसखान, बिहारी, देव, पद्माकर आदि जैसे महान कवियों के साथ-साथ छोटे, क्षेत्रीय और अल्पज्ञात कवियों के काव्य को भी इतिहास में स्थान दिया—जो उनकी लोकतांत्रिक साहित्यिक दृष्टि का प्रतीक है।

मिश्रबंधु का एक महत्त्वपूर्ण योगदान यह भी है कि उन्होंने ग्रंथ-खोज के कार्य को गंभीरता से किया। उन्होंने अनेक हस्तलिपियों को ढूँढकर, उनकी तुलना करके और पाठ-भेदों को समझकर इतिहास को दृढ़ आधार प्रदान किया। यह पद्धति बाद में रामचंद्र शुक्ल, रामनारायण शुक्ल, रामचंद्र शर्मा, हजारीप्रसाद द्विवेदी आदि ने अपनाई।

इस प्रकार मिश्रबंधु न केवल सामग्री-संग्रह के अग्रणी विद्वान थे, बल्कि हिंदी साहित्य को सांस्कृतिक–ऐतिहासिक धरातल पर समझने की एक प्रारम्भिक वैज्ञानिक दृष्टि भी प्रदान करते हैं। शुक्ल-पूर्व इतिहासकारों में उनका स्थान इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है कि उन्होंने साहित्य की परंपरा को शास्त्रीय विवेक और व्यापक दृष्टि से संयोजित किया, जो आगे चलकर हिंदी साहित्य–इतिहास के मानक रूप के निर्माण में सहायक बना।

शुक्ल-पूर्व इतिहास लेखन की प्रमुख विशेषताएँ

शुक्ल-पूर्व इतिहास लेखन की सबसे बड़ी विशेषता थी—संकलनात्मक वृत्ति। इन इतिहासकारों ने पांडुलिपियों, ग्रंथों, लोकगीतों, संत-साहित्य, रीति-काव्य, दफ्तरों और दंतकथाओं को इकट्ठा करके साहित्य की उपलब्ध सामग्री का प्रथम भंडार तैयार किया। दूसरी विशेषता थी—भाषावैज्ञानिक दृष्टि। तासी और ग्रियर्सन जैसे विद्वानों ने भाषा के विकास, बोलियों की संरचना और उद्गम पर विस्तृत अध्ययन किया, जिससे हिंदी साहित्य की भाषिक नींव स्पष्ट हुई। तीसरी विशेषता—कवि-चरित और काव्य-गौरव का विवरण—मिश्र बंधु और त्रिपाठी जैसे भारतीय विद्वानों द्वारा दी गई। चौथी विशेषता यह कि इस काल में इतिहास लेखन में औपनिवेशिक शोध-पद्धति का प्रभाव था, विशेषकर विदेशी विद्वानों में, जो साहित्य को भाषिक दस्तावेज़ के रूप में देखते थे। संपूर्ण रूप से यह कहा जा सकता है कि इस दौर का इतिहास लेखन सामग्री-संग्रह, भाषा-गोत्र पहचान और कवि-वर्णन पर आधारित था।

शुक्ल-पूर्व इतिहासलेखन की सीमाएँ

इन इतिहासकारों की महत्ता के साथ-साथ सीमाएँ भी स्पष्ट दिखती हैं। सबसे पहली कमी यह थी कि उनके यहाँ समाजधर्मी, मनोवैज्ञानिक और प्रवृत्तिपरक दृष्टि नहीं थी। साहित्य को इतिहास और समाज के परस्पर संबंधों में पढ़ने की विधि अनुपस्थित थी। दूसरी सीमा थी कि तासी और ग्रियर्सन जैसे विद्वानों का दृष्टिकोण कभी-कभी औपनिवेशिक पूर्वाग्रहों से प्रभावित था, जिसके कारण वे भारतीय साहित्य को यूरोपीय मानदंडों से तौलते थे। तीसरी कमी यह कि भारतीय विद्वानों का लेखन अत्यधिक भावुक और चरितप्रधान था, जिसमें आलोचनात्मक विश्लेषण की कमी थी। चौथी सीमा यह थी कि काल-क्रम, प्रवृत्तियों और साहित्यिक आंदोलनों का विकास-विवेचन नहीं मिल पाता। इन सीमाओं के कारण यह इतिहास लेखन आधुनिक अर्थ में “वैज्ञानिक साहित्येतिहास” नहीं बन पाया।

हिंदी साहित्येतिहास लेखन में शुक्ल-पूर्व प्रयासों का महत्व

इन सभी सीमाओं के बावजूद शुक्ल-पूर्व इतिहासलेखन का महत्व अत्यंत बड़ा है। पहली बात यह कि इन विद्वानों ने विशाल सामग्री-संग्रह किया, जो शुक्लजी के लिए आधार-स्रोत बना। तासी, ग्रियर्सन और मिश्र बंधु द्वारा उपलब्ध कराए गए उद्धरण, पांडुलिपियाँ, भाषा-वर्गीकरण और कवि-चरित आगे चलकर साहित्येतिहास और आलोचना के वैज्ञानिक विकास का आधार बने। दूसरी बात यह कि इन आरंभिक प्रयासों के कारण हिंदी साहित्य आधुनिक अकादमिक अध्ययन का विषय बना। तीसरी बात यह कि इन लेखनों ने साहित्य के प्रति जागरूकता और सम्मान की भावना उत्पन्न की, जिसने 20वीं सदी में हिंदी आलोचना और साहित्येतिहास को नई दिशा दी। अतः कहा जा सकता है कि शुक्ल-पूर्व प्रयास बीज-रूप थे, जिनसे साहित्येतिहास का वृक्ष विकसित हुआ।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल से पूर्व हिंदी साहित्य–इतिहास लेखन के क्षेत्र में हुए प्रारंभिक प्रयास अपनी सीमाओं के बावजूद अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए। विदेशी विद्वान गार्सां द तासी ने पहली बार हिंदी की काव्य–परंपरा को यूरोपीय दृष्टि से व्यवस्थित किया, जबकि जॉर्ज ग्रियर्सन ने भाषिक–आधार पर हिंदी क्षेत्र और उसकी साहित्यिक परंपराओं का वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रस्तुत किया। भारतीय पक्ष में शिवसिंह सेंगर ने ‘शिवसिंह सरोज’ के माध्यम से कवि–परंपरा और साहित्यिक सामग्री का अद्भुत भंडार दिया, और मिश्रबंधुओं ने ‘मिश्रबंधु विनोद’ के द्वारा हिंदी काव्य–इतिहास को पहली ठोस संरचना प्रदान की। ये सभी प्रयास मिलकर वह आधार बने, जिस पर आगे चलकर शुक्ल ने हिंदी साहित्य–इतिहास को वैज्ञानिक, तर्कसम्मत और क्रमबद्ध रूप में स्थापित किया।

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