ल्हासा की ओर ( राहुल सांकृत्यायन )/ Lhasa Ki Or ( Rahul Sankrityayan )

( यहाँ NCERT की कक्षा 9वीं की हिंदी की पाठ्य पुस्तक 'क्षतिज भाग 1' में संकलित 'ल्हासा की ओर' अध्याय के मूल पाठ तथा अभ्यास के प्रश्नों को दिया गया है | )

वह नेपाल से तिब्बत जाने का मुख्य रास्ता है। फरी-कलिङ्पोङ् का रास्ता जब नहीं खुला था, तो नेपाल ही नहीं हिंदुस्तान की भी चीज़ें इसी रास्ते तिब्बत जाया करती थीं। यह व्यापारिक ही नहीं सैनिक रास्ता भी था, इसीलिए जगह-जगह फ़ौजी चौकियाँ और क़िले बने हुए हैं, जिनमें कभी चीनी पलटन रहा करती थी। आजकल बहुत से फ़ौजी मकान गिर चुके हैं। दुर्ग के किसी भाग में, जहाँ किसानों ने अपना बसेरा बना लिया है, वहाँ घर कुछ आबाद दिखाई पड़ते हैं। ऐसा ही परित्यक्त एक चीनी क़िला था। हम वहाँ चाय पीने के लिए ठहरे। तिब्बत में यात्रियों के लिए बहुत सी तकलीफ़ें भी हैं और कुछ आराम की बातें भी। वहाँ जाति-पाँति, छुआछूत का सवाल ही नहीं है और न औरतें पर्दा ही करती हैं। बहुत निम्न श्रेणी के भिखमंगों को लोग चोरी के डर से घर के भीतर नहीं आने देते; नहीं तो आप बिलकुल घर के भीतर चले जा सकते हैं। चाहे आप बिलकुल अपरिचित हों, तब भी घर की बहू या सासु को अपनी झोली में से चाय दे सकते हैं। वह आपके लिए उसे पका देगी। मक्खन और सोडा-नमक दे दीजिए, वह चाय चोङी में कूटकर उसे दूधवाली चाय के रंग की बना के मिट्टी के टोटीदार बरतन (खोटी) में रखके आपको दे देगी। यदि बैठक की जगह चूल्हे से दूर है और आपको डर है कि सारा मक्खन आपकी चाय में नहीं पड़ेगा, तो आप ख़ुद जाकर चोङी में चाय मथकर ला सकते हैं। चाय का रंग तैयार हो जाने पर फिर नमक-मक्खन डालने की ज़रूरत होती है।
परित्यक्त चीनी क़िले से जब हम चलने लगे, तो एक आदमी राहदारी माँगने आया। हमने वह दोनों चिटें उसे दे दीं। शायद उसी दिन हम थोङ्ला के पहले के आख़िरी गाँव में पहुँच गए। यहाँ भी सुमति के जान-पहचान के आदमी थे और भिखमंगे रहते भी ठहरने के लिए अच्छी जगह मिली। पाँच साल बाद हम इसी रास्ते लौटे थे और भिखमंगे नहीं, एक भद्र यात्री के वेश में घोड़ों पर सवार होकर आए थे; किंतु उस वक़्त किसी ने हमें रहने के लिए जगह नहीं दी, और हम गाँव के एक सबसे ग़रीब झोपड़े में ठहरे थे। बहुत कुछ लोगों की उस वक़्त की मनोवृत्ति पर ही निर्भर है, ख़ासकर शाम के वक़्त छङ् पीकर बहुत कम होश-हवास को दुरुस्त रखते हैं।

अब हमें सबसे विकट डाँड़ा थोङ्ला पार करना था। डाँड़े तिब्बत में सबसे ख़तरे की जगहें हैं। सोलह-सत्रह हज़ार फ़ीट की ऊँचाई होने के कारण उनके दोनों तरफ़ मीलों तक कोई गाँव-गिराँव नहीं होते। नदियों के मोड़ और पहाड़ों के कोनों के कारण बहुत दूर तक आदमी को देखा नहीं जा सकता। डाकुओं के लिए यही सबसे अच्छी जगह है। तिब्बत में गाँव में आकर ख़ून हो जाए, तब तो ख़ूनी को सज़ा भी मिल सकती है, लेकिन इन निर्जन स्थानों में मरे हुए आदमियों के लिए कोई परवाह नहीं करता। सरकार खुफ़िया-विभाग और पुलिस पर उतना ख़र्च नहीं करती और वहाँ गवाह भी तो कोई नहीं मिल सकता। डकैत पहिले आदमी को मार डालते हैं, उसके बाद देखते हैं कि कुछ पैसा है कि नहीं। हथियार का क़ानून न रहने के कारण यहाँ लाठी की तरह लोग पिस्तौल, बंदूक़ लिए फिरते हैं। डाकू यदि जान से न मारे तो ख़ुद उसे अपने प्राणों का ख़तरा है। गाँव में हमें मालूम हुआ कि पिछले ही साल थोङ्ला के पास ख़ून हो गया। शायद ख़ून की हम उतनी परवाह नहीं करते, क्योंकि हम भिखमंगे थे और जहाँ-कहीं वैसी सूरत देखते, टोपी उतार जीभ निकाल, कुची-कुची (दया-दया) एक पैसा कहते भीख माँगने लगते। लेकिन पहाड़ की ऊँची चढ़ाई थी, पीठ पर सामान लादकर कैसे चलते? और अगला पड़ाव 16-17 मील से कम नहीं था। मैंने सुमति से कहा कि यहाँ से लङ्कोर तक के लिए दो घोड़े कर लो, सामान भी रख लेंगे और चढ़े चलेंगे।
दूसरे दिन हम घोड़ों पर सवार होकर ऊपर की ओर चले। डाँड़े से पहिले एक जगह चाय पी और दुपहर के वक़्त डाँड़े के ऊपर जा पहुँचे। हम समुद्रतल से 17-18 हज़ार फ़ीट ऊँचे खड़े थे। हमारी दक्खिन तरफ़ पूरब से पच्छिम की ओर हिमालय के हज़ारों श्वेत शिखर चले गए थे। भीटे की ओर दीखने वाले पहाड़ बिलकुल नंगे थे, न वहाँ बर्फ़ की सफ़ेदी थी, न किसी तरह की हरियाली। उत्तर की तरफ़ बहुत कम बर्फ़वाली चोटियाँ दिखाई पड़ती थीं। सर्वोच्च स्थान पर डाँड़े के देवता का स्थान था, जो पत्थरों के ढेर, जानवरों की सींगों और रंग-बिरंगे कपड़े की झडियों से सजाया गया था। अब हमें बराबर उतराई पर चलना था। चढ़ाई तो कुछ दूर थोड़ी मुश्किल थी, लेकिन उतराई बिलकुल नहीं। शायद दो-एक और सवार साथी हमारे साथ चल रहे थे। मेरा घोड़ा कुछ धीमे चलने लगा। मैंने समझा कि चढ़ाई की थकावट के कारण ऐसा कर रहा है, और उसे मारना नहीं चाहता था। धीरे-धीरे वह बहुत पिछड़ गया और मैं दोन्क्विक्स्तो की तरह अपने घोड़े पर झूमता हुआ चला जा रहा था। जान नहीं पड़ता था कि घोड़ा आगे जा रहा है या पीछे। जब मैं ज़ोर देने लगता, तो वह और सुस्त पड़ जाता। एक जगह दो रास्ते फूट रहे थे, मैं बाएँ का रास्ता ले मील-डेढ़ मील चला गया। आगे एक घर में पूछने से पता लगा कि लङ्कोर का रास्ता दाहिने वाला था। फिर लौटकर उसी को पकड़ा। चार-पाँच बजे के क़रीब मैं गाँव से मील-भर पर था, तो सुमति इंतज़ार करते हुए मिले। मंगोलों का मुँह वैसे ही लाल होता है और अब तो वह पूरे ग़ुस्से में थे। उन्होंने कहा—मैंने दो टोकरी कंडे फूँ डाले, तीन-तीन बार चाय को गर्म किया। मैंने बहुत नर्मी से जवाब दिया—लेकिन मेरा कसूर नहीं है मित्र! देख नहीं रहे हो, कैसा घोड़ा मुझे मिला है! मैं तो रात तक पहुँचने की उम्मीद रखता था। ख़ैर, सुमति को जितनी जल्दी ग़ुस्सा आता था, उतनी ही जल्दी वह ठंडा भी हो जाता था। लङ्कोर में वह एक अच्छी जगह पर ठहरे थे। यहाँ भी उनके अच्छे यजमान थे। पहिले चाय-सत्तू खाया गया, रात को गर्मागर्म थुक्पा मिला।

अब हम तिङ्री के विशाल मैदान में थे, जो पहाड़ों से घिरा टापू-सा मालूम होता था, जिसमें दूर एक छोटी-सी पहाड़ी मैदान के भीतर दिखाई पड़ती है। उसी पहाड़ी का नाम है तिङ्री-समाधि-गिरि। आसपास के गाँव में भी सुमति के कितने ही यजमान थे, कपड़े की पतली-पतली चिरी बत्तियों के गंडे ख़त्म नहीं हो सकते थे, क्योंकि बोधगया से लाए कपड़े के ख़त्म हो जाने पर किसी कपड़े से बोधगया का गंडा बना लेते थे। वह अपने यजमानों के पास जाना चाहते थे। मैंने सोचा, यह तो हफ़्ता-भर उधर ही लगा देंगे। मैंने उनसे कहा कि जिस गाँव में ठहरना हो, उसमें भले ही गंडे बाँट दो, मगर आसपास के गाँवों में मत जाओ; इसके लिए मैं तुम्हें ल्हासा पहुँचकर रुपए दे दूँगा। सुमति ने स्वीकार किया। दूसरे दिन हमने भरिया ढूँढ़ने की कोशिश की, लेकिन कोई न मिला। सवेरे ही चल दिए होते तो अच्छा था, लेकिन अब 10-11 बजे की तेज़ धूप में चलना पड़ रहा था। तिब्बत की धूप को ढाँक लें, तो गर्मी ख़त्म हो जाती है। आप 2 बजे सूरज की ओर मुँह करके चल रहे हैं, ललाट धूप से जल रहा है और पीछे का कंधा बर्फ़ हो रहा है। फिर हमने पीठ पर अपनी-अपनी चीज़ें लादी, डंडा हाथ में लिया और चल पड़े। यद्यपि सुमति के परिचित तिङ्री में भी थे, लेकिन वह एक और यजमान से मिलना चाहते थे, इसलिए आदमी मिलने का बहाना कर शेकर विहार की ओर चलने के लिए कहा। तिब्बत की ज़मीन बहुत अधिक छोटे-बड़े जागीरदारों में बँटी है। इन जागीरों का बहुत ज़्यादा हिस्सा मठों (विहारों) के हाथ में है। अपनी-अपनी जागीर में हरेक जागीरदार कुछ खेती ख़ुद भी कराता है, जिसके लिए मज़दूर बेगार में मिल जाते हैं। खेती का इंतज़ाम देखने के लिए वहाँ कोई भिक्षु भेजा जाता है, जो जागीर के आदमियों के लिए राजा से कम नहीं होता। शेकर की खेती के मुखिया भिक्षु (नम्से) बड़े भद्र पुरुष थे। वह बहुत प्रेम से मिले, हालाँकि उस वक़्त मेरा भेष ऐसा नहीं था कि उन्हें कुछ भी ख़याल करना चाहिए था। यहाँ एक अच्छा मंदिर था; जिसमें कंजुर (बुद्धवचन-अनुवाद) की हस्तलिखित 103 पोचियाँ रखी हुई थी, मेरा आसन भी वहीं लगा। वह बड़े मोटे काग़ज़ पर अच्छे अक्षरों में लिखी हुई थीं, एक-एक पोथी 15-15 सेर से कम नहीं रही होगी। सुमति ने फिर आसपास अपने यजमानों के पास जाने के बारे में पूछा, मैं अब पुस्तकों के भीतर था, इसलिए मैंने उन्हें जाने के लिए कह दिया। दूसरे दिन वह गए। मैंने समझा था 2-3 दिन लगेंगे, लेकिन वह उसी दिन दुपहर बाद चले आए। तिङ्री गाँव वहाँ से बहुत दूर नहीं था। हमने अपना-अपना सामान पीठ पर उठाया और भिक्षु नम्से से विदाई लेकर चल पड़े।

अभ्यास के प्रश्न ( ल्हासा की ओर )

  1. थोड्ला के पहले के आखिरी गाँव पहुँचने पर भिखमंगे के वेश में होने के बावजूद लेखक को ठहरने के लिए उचित स्थान मिला जबकि दूसरी यात्रा के समय भद्र वेश भी उन्हें उचित स्थान नहीं दिला सका। क्यों ?

उत्तर- थोड्ला के पहले के आखिरी गाँव में पहली यात्रा के दौरान लेखक को भिखमंगे के वेश में ठहरने के लिए जगह मिली क्योंकि सुमति के जान-पहचान के लोग गाँव में थे और भिखमंगों को उस समय सहानुभूति मिलती थी। दूसरी यात्रा में, भद्र वेश में होने के बावजूद, लोगों की मनोवृत्ति बदल चुकी थी। शाम के समय छड् पीने के कारण उनके होश-हवास दुरुस्त नहीं रहते थे, जिससे वे मेहमाननवाज़ी नहीं कर सके और लेखक को सबसे गरीब झोपड़ी में ठहरना पड़ा।

  1. उस समय के तिब्बत में हथियार का कानून न रहने के कारण यात्रियों को किस प्रकार का भय बना रहता था?

उत्तर- उस समय के तिब्बत में हथियार का कानून न होने के कारण लोग पिस्तौल, बंदूक लिए घूमते रहते थे, यात्रियों को डाकुओं का भय बना रहता था। डाकू पहले व्यक्ति को मार डालते थे और बाद में देखते थे कि उसके पास पैसा है या नहीं। उस समय लोग बिना झिझक हमला कर सकते थे, और डाकुओं के लिए निर्जन स्थानों में हत्या कर देना आसान था क्योंकि वहाँ कोई गवाह या सुरक्षा नहीं थी।

3. लेखक लङ्‌ङ्कोर के मार्ग में अपने साथियों से किस कारण पिछड़ गया?

उत्तर- लेखक को जो घोड़ा मिला था वह बहुत सुस्त था और दो रास्ते दिखाई देने पर लेखन ने बाएँ रास्ते को चुन लिया। वहाँ से लगभग डेढ़ मील चलने पर पता चला कि लङ्ङ्कोर का रास्ता दाहिने वाला था। वे वापस लौटकर दाहिने रास्ते की तरफ चले। इस कारण से लेखक लङ्‌ङ्कोर के मार्ग में अपने साथियों से पिछड़ गये।

4. लेखक ने शेकर विहार में सुमति को उनके यजमानों के पास जाने से रोका, परंतु दूसरी बार रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया?

उत्तर- लेखक ने दूसरी बार सुमति को रोकने का प्रयास इसलिए नहीं किया क्योंकि वे कन्जुर की हस्तलिखित पोथियाँ पढ़ने में लीन हो गए थे और वे उन पोथियों को पढ़ना चाहते थे। जब तक लेखक इन पोथियों को पढ़कर पूरा करते तब तक सुमति वापस आ जायेगा। ऐसा सोचकर सुमति को जाने की अनुमति दे दी।

5. अपनी यात्रा के दौरान लेखक को किन कठनाईयों का सामना करना पड़ा?

उत्तर- रास्ता दुर्गम था और घोड़ा भी बहुत थका हुआ था। उन्हें एक ओर तो बहुत ठण्ड का सामना करना पड़ा और दूसरी ओर तेज धूप का। भिखारी का वेश धारण करते हुए उन्हें यात्रा करनी पड़ी। देर से पहुँचने पर सुमति के गुस्से का सामना भी करना पड़ा। पाँच साल बाद जब वे भद्र यात्री के वेश में लौट रहे थे तब उन्हें गाँव के सबसे गरीब झोपड़े में ठहरना पड़ा। उन्हें भरिया (भार उठाने वाला) भी नहीं मिला, जिसके कारण उन्हें अपना सामान खुद लादना पड़ा।

6. प्रस्तुत यात्रा-वृत्तांत के आधार पर बताईये कि उस समय का तिब्बती समाज कैसा था?

उत्तर- उस समय के तिब्बती समाज में जाति-पाँति, छुआछूत नहीं था और न औरतें परदा किया करती थीं। जागीरदारी व्यवस्था में मठों का महत्वपूर्ण स्थान था और भिक्षुओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी। हर एक स्थान सुनसान लगता था और रास्ते बहुत ही खतरनाक थे। बेगार (कभी-कभी मुफ्त में काम करने वाले) प्रथा थी। समाज को कठोर भौगोलिक परिस्थितयों का सामना करना पड़ता था।

  1. ‘मैं अब पुस्तकों के भीतर था।’ नीचे दिए गए विकल्पों में से कौन सा इस वाक्य का अर्थ बतलाता है-

(क) लेखक पुस्तकें पढ़ने में रम गया।

(ख) लेखक पुस्तकों की शैल्फ़ के भीतर चला गया।

(ग) लेखक के चारों ओर पुस्तकें ही थीं।

(घ) पुस्तक में लेखक का परिचय और चित्र छपा था।

उत्तर- (क) लेखक पुस्तकें पढ़ने में रम गया।

यह भी देखें :

▪️हिंदी ( कक्षा 9) — क्षितिज भाग 1 ( पूरा सिलेबस अभ्यास के प्रश्नों सहित )

▪️राहुल सांकृत्यायन का साहित्यिक परिचय / Rahul Sankrityayan Ka Sahityik Parichay

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