यह दंतुरित मुस्कान और फ़सल ( नागार्जुन )

( यहाँ NCERT की कक्षा 10वीं की हिंदी की पाठ्य पुस्तक 'क्षतिज भाग 2' में संकलित 'यह दंतुरित मुस्कान और फ़सल ( नागार्जुन )' अध्याय के मूल पाठ, व्याख्या तथा अभ्यास के प्रश्नों को दिया गया है | )

यह दंतुरित मुस्कान ( नागार्जुन )

(1)

तुम्हारी यह दंतुरित मुस्कान
मृतक में भी डाल देगी जान
धूलि – धूसर तुम्हारे ये गात ………
छोङकर तालाब मेरी झोपङी में खिल रहे , जलजात
परस पाकर तुम्हारा ही प्राण ,
पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण

व्याख्या – कवि अपने छोटे से बच्चे की मन को हरने वाली मुस्कान को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि तुम्हारी ये छोटे – छोटे दातों वाली मुस्कान इतनी मनमोहक है कि वह किसी मुर्दे अर्थात मरे हुए व्यक्ति में भी जान डाल सकती हैं। कहने का आशय यह है कि तुम्हारी ये निश्छल मुस्कान जीवन की कठिन परिस्थितियों से निराश – हताश हो चुके व्यक्तियों और यहाँ तक कि बेजान व्यक्ति को भी जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं , अगर कोई तुम्हारी इस छोटे – छोटे दातों वाली मुस्कान को देख ले तो वह भी एक बार प्रसन्नता से खिल उठे। उसके भी मन में इस दुनिया की ओर आकर्षण जाग उठे।
आगे कवि कहते हैं कि तुम्हारे इस धूल से सने हुए नन्हें तन को देखता हूँ तो ऐसा लगता है कि मानों कमल के फूल तालाब को छोङकर मेरी झोंपङी में खिल उठते हो। कहने का आशय यह है कि तुम्हारे धूल से सने नन्हें से तन को निहारने पर मेरा मन कमल के फूल के समान खिल उठा है अर्थात् प्रसन्न हो गया है।
ऐसा लगता है कि तुम जैसे प्राणवान का स्पर्श पाकर ये कठोर चट्टानें पिघल कर जल बन गई होगी। कहने का आशय यह है कि बच्चे की मधुर मुस्कान देख कर पत्थर जैसे कठोर हृदय वाले मनुष्य का मन भी पिघलाकर अति कोमल हो जाता है।

(2)

छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल
बाँस था कि बबूल ?
तुम मुझे पाए नहीं पहचान ?
देखते ही रहोगे अनिमेष !
थक गए हो ?
आँख लूँ मैं फेर ?

व्याख्या – कवि को ऐसा लगता है कि उनके उस छोटे से बच्चे के निश्छल चेहरे में वह जादू है कि उसको छू लेने से बाँस या बबूल से भी शेफालिका के फूल गिरने लगते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन की विपरीत परिस्थितियों के कारण कवि का मन बाँस और बबूल की भाँति शुष्क और कठोर हो गया था। बच्चे की मधुर मुस्कराहट को देखकर उसका मन अथवा स्वभाव भी पिघल कर शेफालिका के फूलों की भाँति सरस और सुंदर हो गया है। बच्चा पहली बार अपने पिता ( कवि ) को देख रहा हैं। इस कारण कवि आगे उस छोटे से बच्चे से कहते हैं कि ऐसा लगता है कि तुम ( छोटा बच्चा ) मुझे ( कवि / पिता ) पहचान नहीं पाये हो क्योंकि बच्चा कवि को अपलक अर्थात बिना पलक झपकाए देख रहा है। कवि उस बच्चे से कहते हैं कि यदि वह बच्चा इस तरह अपलक कवि को देखते – देखते थक गया हो तो उसकी सुविधा के लिए कवि उससे आँखें फेर लेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि कवि बच्चे से उसके पास खङा होकर पूछता है कि तुम मुझे इस तरह लगातार देखते हुए थक गए होंगे। इसलिए लो मैं तुम पर से अपनी नजर स्वयं हटा लेता हूँ। ताकि बच्चा भी अपनी पलकें झपकाए और उसे आराम मिले।

(3)

क्या हुआ यदि हो सके परिचित न पहली बार ?
यदि तुम्हारी माँ न माध्यम बनी होती आज
मैं न सकता देख
मैं न पाता जान
तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
धन्य तुम , माँ भी तुम्हानी धन्य !
चिर प्रवासी मैं इतर , मैं अन्य !

व्याख्या – कवि अपने नन्हें शिशु को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि तुम मुझे पहली बार देख रहे हो , इसलिए यदि मुझे पहचान भी न पाए तो वह स्वाभाविक ही है। कहने का तात्पर्य यह है कि कवि को इस बात का जरा भी अफसोस नहीं है कि बच्चे से पहली बार में उसकी जान पहचान नहीं हो पाई है। एक माँ ही बच्चे को जन्म देकर इस धरती पर लाती हैं। इसीलिए कवि कह रहे हैं कि तुम्हारी माँ के माध्यम से ही आज मैं तुमसे मिल पाया हूँ। अगर तुम्हारी माँ ने माध्यम बनकर मुझे तुमसे ना मिलाया होता तो , मैं तुम्हें नहीं जान पाता। इसलिए मैं तुम्हारा और तुम्हारी माँ का आभारी हूँ। और तुम दोनों को दिल से धन्यवाद देता हूँ। अर्थात कवि इस बात के लिए उस बच्चे की माँ अर्थात अपनी पत्नी और अपने बच्चे का शुक्रिया अदा करना चाहता है कि उनके कारण ही कवि को भी उस बच्चे के सौंदर्य का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। तुम्हारी माँ अर्थात कवि की पत्नी ने ही उन्हें बताया कि वह बच्चा उनकी ही संतान है , नही तो मैं तुम्हारे दाँतों से झलकती मुस्कान को भी नहीं जान पाता। कवि आगे कहते हैं कि मैं सदा घर से बाहर (अन्य प्रदेश या जगह) रहता हूँ और बहुत दिनों बाद आज घर आया हूँ। इसलिए मैं तुम्हारे लिए किसी अनजान व्यक्ति की तरह या किसी मेहमान की तरह ही हूँ। अर्थात कवि तो उस बच्चे के लिए एक अजनबी है , परदेसी है इसलिए वह खूब समझता है कि उससे उस बच्चे की कोई जान पहचान नहीं है।

(4)

इस अतिथि से प्रिय तुम्हारा क्या रहा संपर्क
उँगलियाँ माँ की कराती रही है मधुपर्क
देखते तुम इधर कनखी मार
ओर होती जब कि आँखें चार
तब तुम्हारी दंतुरित मुसकान
मुझे लगती बङी ही छविमान !

व्याख्या – कवि अपने आपको किसी मेहमान की तरह बताते हुए कहते हैं कि वे हमेशा ही काफी लम्बे समय तक घर से दूर रहते हैं जिस कारण वे न तो अपनी पत्नी से मिल पाए और न ही अपने बच्चे से , इसीलिए कवि अपने बच्चे से कहते हैं कि मुझ जैसे अतिथि से तुम्हारा सम्पर्क नहीं रहा अर्थात् मैं तुम्हारे लिए अनजान ही रहा हूँ। यह तो तुम्हार माँ है जो तुम्हें अपनी उँगलियों से तुम्हें मधुपर्क चढ़ाती रही अर्थात् तुम्हें वात्सल्य भरा प्यार देती रही। कहने का तात्पर्य यह है कि बच्चा अपनी माँ की उँगली चूस रहा है तो ऐसा लगता है कि उसकी माँ उसे पंचामृत का पान करा रही है। इस बीच वह बच्चा तिरछी निगाह से कवि को देखता है। तब कवि उसकी इन हरकतों पर कहते हैं कि अब तुम इतने बङे हो गये हो कि तुम तिरछी नजर से मुझे देखकर अपना मुँह फेर लेते हो , इस समय भी तुम वही कर रहे हो। इसके बाद जब मेरी आँखें तुम्हारी आँखों से मिलती है अर्थात् तुम्हारा – मेरा स्नेह प्रकट होता है , तब तुम मुस्कुरा पङते हो। इस स्थिति में तुम्हारे निकलते हुए दाँतों वाली तुम्हारी मधुर मुस्कान मुझे बहुत सुन्दर लगती है और मैं तुम्हारी उस मधुर मुस्कान पर मुग्ध हो जाता हूँ।

फ़सल ( नागार्जुन )

(1)

एक के नहीं ,
दो के नहीं ,
ढ़ेर सारी नदियों के पानी का जादू ;
एक के नहीं ,
दो के नहीं ,
लाख – लाख कोटि – कोटि हाथों के स्पर्श की गरिमा ;
एक की नहीं ,
दो की नहीं ,
हजार – हजार खेतों की मिट्टी का गुण धर्म ;

व्याख्या – उपरोक्त पंक्तियों में कवि कहते हैं कि एक या दो नहीं बल्कि अनेक नदियों का पानी अपना जादुई असर दिखाता है , तब जाकर फसल पैदा होती हैं। आगे कवि कहते है कि एक नहीं दो नहीं बल्कि लाखों – करोड़ों हाथों के अथक परिश्रम का परिणाम से एक अच्छी फसल तैयार होती है। अर्थात हजारों खेतों पर दुनिया भर के लाखों – करोड़ों किसान दिन रात मेहनत करते हैं। अपनी फसल की देखभाल करते हैं। उसको समय – समय पर खाद , पानी और जरूरी पोषक तत्व देते हैं। तब जाकर कहीं फसल खेतों पर लहलहा उठती है। अच्छी फसल उगाने के लिए खेतों की मिट्टी अच्छी होनी चाहिए। इसीलिए कवि कहते हैं कि एक या दो नहीं बल्कि हजारों खेतों की उपजाऊ मिट्टी के पोषक तत्व भी इन फसलों के अंदर छुपे हुए हैं। क्योंकि मिट्टी की विशेषताएं भी फसलों की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। यानी मिट्टी से मिलने वाले जरूरी पोषक तत्व फसलों के लिए जरूरी होते हैं और अलग – अलग तरह की फसलों को उगाने के लिए अलग – अलग तरह की मिट्टी व उसके गुण आवश्यक होते हैं।

(2)

फसल क्या है ?
और तो कुछ नहीं है वह
नदियों के पानी का जादू है वह
हाथों के स्पर्श की महिमा है
भूरी – काली – संदली मिट्टी का गुण धर्म है
रूपांतर है सूरज की किरणों का
सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का !

व्याख्या – उपरोक्त पंक्तियों में कवि पहले तो प्रश्न पूछते हैं कि फसल क्या हैं ? फिर उसी प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि नदियों के पानी का जादू फसल के रूप दिखाई देता हैं क्योंकि बिना पानी के फसल का उगना नामुकिन हैं। करोड़ों किसानों की दिन – रात की मेहनत का नतीजा फसल के रूप में मिलता हैं। भूरी , काली व खुशबूदार हल्की पीली मिट्टी यानि अलग – अलग प्रकार की मिट्टी के पोषक तत्व और सूरज की किरणें भी अपना रूप बदल कर इन फसलों के अंदर समाहित रहती हैं। क्योंकि सूरज की रोशनी और हवा में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड गैस को अवशोषित कर ही पौधे अपनी पत्तियों के दवारा भोजन बनाते हैं। जिसे कविता में कवि ने सूरज की किरणों का परिवर्तित रूप और हवा की भावों के साथ पैरों को उठाते , गिराते एवं हिलाते हुए नाचने का नाम दिया हैं।

अभ्यास के प्रश्न ( यह दंतुरित मुस्कान)

प्रश्न 1- बच्चे की दंतुरित मुसकान का कवि के मन पर क्या प्रभाव पड़ता है ?

उत्तर – कवि अपने बच्चे की दंतुरित मुसकान को देख कर अंदर तक अत्यधिक प्रसन्न हो जाता है। उसे लगता है उस मुसकान ने कवि में एक नए जीवन का संचार कर दिया है। कवि उस छोटे बच्चे की मुस्कान को अपने जीवन की सुंदरता बताते हैं और उस छोटे बच्चे की मुस्कराहट को इतना प्रभावशाली बताते हैं कि अगर कोई कठोर हृदय वाला व्यक्ति भी उसकी मुस्कराहट को देख ले तो वह भी अपने आप को मुस्कुराने से नहीं रोक पाएगा। कवि बताते हैं कि इस छोटे – छोटे नए दाँतों वाली मुस्कराहट की मोहकता तब और बढ़ जाती है जब उसके साथ नज़रों का तिरछापन जुड़ जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जब कोई बालक किसी व्यक्ति को नहीं पहचानता है तो उसे सीधी नज़रों से नहीं देखता , लेकिन एक बार पहचान लेने के बाद वो उसे टकटकी लगाकर देखता रहता है। कवि को ऐसा लगता है जैसे कि वह उस बच्चे की सुंदरता को देखकर वह धन्य हो गया है। क्योंकि अपने काम के कारण कवि काफी लम्बे समय तक अपने घर से दूर रहता था और उसका व्यवहार भी अत्यधिक कठोर हो गया था। लेकिन बच्चे की दंतुरित मुसकान को देखकर न केवल कवि के व्यवहार में परिवर्तन आया बल्कि अब कवि का मन घर पर लगने लगा है।

प्रश्न 2 – बच्चे की मुसकान और एक बड़े व्यक्ति की मुसकान में क्या अंतर है ?

उत्तर – बच्चे की मुसकान हमेशा निश्छल होती है। अर्थात बच्चे किसी भी प्रकार का छल – कपट नहीं जानते , उनकी मुस्कराहट को देख कर हर किसी का मन खुशियों से भर उठता है। इसके विपरीत बड़ों की मुसकान में कई अर्थ छिपे हो सकते हैं। कभी – कभी यह मुसकान कुटिल हो सकती है , तो कभी किसी उम्मीद से भरी हो सकती है। ऐसा बहुत कम होता है कि किसी वयस्क की मुसकान उतनी निश्छल हो जितनी कि किसी बच्चे की।

प्रश्न 3 – कवि ने बच्चे की मुसकान के सौंदर्य को किन – किन बिंबों के माध्यम से व्यक्त किया है ?

उत्तर – कवि ने बच्चे की मुसकान के सौंदर्य को निम्नलिखित बिंबों के माध्यम से व्यक्त किया है :

▪️कवि को लगता है कि कमल तालाब छोड़कर इसकी झोपड़ी में खिल गये हैं।
▪️ऐसा लगता है जैसे पत्थर पिघलकर जलधारा के रूप में बह रहे हों।
▪️बाँस या बबूल से शेफालिका के फूल झरने लगे हों।

प्रश्न 4 – भाव स्पष्ट कीजिए –
( क ) छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात।

उत्तर – बच्चे के धूल से सने हुए नन्हें तन को जब कवि देखता है तो ऐसा लगता है कि मानों कमल के फूल तालाब को छोङकर उसकी झोंपङी में खिल उठते हो। कहने का आशय यह है कि बच्चे के धूल से सने हुए नन्हें से तन को निहारने पर कवि का मन कमल के फूल के समान खिल उठा है अर्थात् प्रसन्न हो गया है।

( ख ) छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल
बाँस था कि बबूल?

उत्तर – कवि को ऐसा लगता है कि उनके उस छोटे से बच्चे के निश्छल चेहरे में वह जादू है कि उसको छू लेने से बाँस या बबूल से भी शेफालिका के फूल गिरने लगते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन की विपरीत परिस्थितियों के कारण कवि का मन बाँस और बबूल की भाँति शुष्क और कठोर हो गया था। बच्चे की मधुर मुस्कराहट को देखकर उसका मन अथवा स्वभाव भी पिघल कर शेफालिका के फूलों की भाँति सरस और सुंदर हो गया है।

अभ्यास के प्रश्न ( फ़सल)

प्रश्न 1 – कवि के अनुसार फसल क्या है ?

उत्तर – कवि के अनुसार नदियों के पानी का जादू फसल के रूप दिखाई देता हैं क्योंकि बिना पानी के फसल का उगना नामुकिन हैं। करोड़ों किसानों की दिन – रात की मेहनत का नतीजा फसल के रूप में मिलता हैं। भूरी , काली व खुशबूदार हल्की पीली मिट्टी यानि अलग – अलग प्रकार की मिट्टी के पोषक तत्व और सूरज की किरणें भी अपना रूप बदल कर इन फसलों के अंदर समाहित रहती हैं। क्योंकि सूरज की रोशनी और हवा में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड गैस को अवशोषित कर ही पौधे अपनी पत्तियों के दवारा भोजन बनाते हैं। असल में संक्षेप में कहा जाए तो फसल करोड़ों किसानों की लगन व मेहनत का नतीजा , नदियों के पानी का जादू , मिट्टी में पाए जाने वाले जरूरी अवयव , सूर्य की किरणें व हवा में पायी जाने वाली कार्बन डाइऑक्साइड गैस के मिलन का नतीजा है।

प्रश्न 2 – कविता में फसल उपजाने के लिए आवश्यक तत्वों की बात कही गई है। वे आवश्यक तत्व कौन – कौन से हैं ?

उत्तर- किसान की मेहनत के साथ – साथ पानी , मिट्टी का गुणवत्तापूरक , अलग – अलग तरह की मिट्टी में अलग- अलग तरह के पोषक तत्व , पौधों को बढ़ने के लिए सूरज की किरणें व कार्बन डाइऑक्साइड गैस आदि की आवश्यकता होती है। करोड़ों किसानों की दिन- रात की मेहनत , नदियों के पानी का जादू , भूरी , काली व खुशबूदार मिट्टी यानि अलग – अलग प्रकार की मिट्टी के पोषक तत्व और सूरज की किरणें भी अपना रूप बदल कर इन फसलों के अंदर समाहित रहती हैं। ये सभी फसल उगाने के लिए बहुत आवश्यक हैं।

प्रश्न 3 – फसल को “ हाथों के स्पर्श की गरिमा ” और “ महिमा ” कहकर कवि क्या व्यक्त करना चाहता है?

उत्तर – “ हाथों के स्पर्श की गरिमा ” और “ महिमा ” कहकर कवि किसान की अथक मेहनत को सम्मानित करते हैं। क्योंकि किसान की लगन व कठिन परिश्रम के बिना खेतों में फसल नहीं उग सकती हैं। फसल के फलने – फूलने में एक या दो नहीं बल्कि लाखों – करोड़ों किसानों के हाथों के स्पर्श की गरिमा विद्यमान होती है। कवि कहते हैं कि मिट्टी और पानी के पोषक तत्व तथा सूरज की उर्जा भी तभी सार्थक होती है , जब किसानों के हाथों का स्पर्श इसे गरिमा प्रदान करता हैं।

प्रश्न 4 – भाव स्पष्ट कीजिए :
“ रूपांतर है सूरज की किरणों का
सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का ! ”

उत्तर – भोजन बनाने के लिए पौधों को सूरज की रोशनी व हवा की आवश्यकता होती है। सूरज की किरणें भी अपना रूप बदल कर इन फसलों के अंदर समाहित रहती हैं। क्योंकि सूरज की रोशनी और हवा में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड गैस को अवशोषित कर ही पौधे अपनी पत्तियों के दवारा भोजन बनाते हैं। जिसे कविता में कवि ने सूरज की किरणों का परिवर्तित रूप और हवा की भावों के साथ पैरों को उठाते , गिराते एवं हिलाते हुए नाचने का नाम दिया हैं। इसीलिए कवि कहते हैं कि एक ओर जहाँ सूरज की किरणें अपना रूप बदल कर इन फसलों के अंदर समाहित है वही दूसरी ओर हवा की थिरकन भी इन पौधों को फलने – फूलने में मदद करती हैं।

यह भी पढ़ें :

▪️हिंदी ( कक्षा 10) — क्षितिज भाग 2 और कृतिका भाग 2

▪️हिंदी ( कक्षा 9) — क्षितिज भाग 1 और कृतिका भाग 1

▪️नागार्जुन का साहित्यिक परिचय / जीवन परिचय

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