मानवीय करुणा की दिव्य चमक ( सर्वेश्वर दयाल सक्सेना )

( यहाँ NCERT की कक्षा 10वीं की हिंदी की पाठ्य पुस्तक 'क्षतिज भाग 2' में संकलित 'मानवीय करुणा की दिव्य चमक ( सर्वेश्वर दयाल सक्सेना )' अध्याय का मूल पाठ तथा अभ्यास के प्रश्नों को दिया गया है | )

Manviy Karuna Ki Divya Chamak ( Sarveshwar Dayal Saksena )

फ़ादर को जहरबाद से नहीं मरना चाहिए था। जिसकी रगों में दूसरों के लिए मिठास भरे अमृत के अतिरिक्त और कुछ नहीं था उसके लिए इस जहर का विधान क्यों हो? यह सवाल किस ईश्वर से पूछें? प्रभु की आस्था ही जिसका अस्तित्व था। वह देह की इस यातना की परीक्षा उम्र की आखिरी देहरी पर क्यों दे? एक लंबी, पादरी के सफ़ेद चोगे से ढकी आकृति सामने है-गोरा रंग, सफ़ेद झाँई मारती भूरी दाढ़ी, नीली आँखें बाँहें खोल गले लगाने को आतुर। इतनी ममता, इतना अपनत्व इस साधु में अपने हर एक प्रियजन के लिए उमड़ता रहता था। मैं पैंतीस साल से इसका साक्षी था। तब भी जब वह इलाहाबाद में थे और तब भी जब वह दिल्ली आते थे। आज उन बाँहों का दबाब मैं अपनी छाती पर महसूस करता हूँ।

फ़ादर को याद करना एक उदास शांत संगीत को सुनने जैसा है। उनको देखना करुणा के निर्मल जल में स्नान करने जैसा था और उनसे बात करना कर्म के संकल्प से भरना था।

मुझे ‘परिमल’ के वे दिन याद आते हैं जब हम सब एक पारिवारिक रिश्ते में बँधे जैसे थे जिसके बड़े फ़ादर बुल्के थे। हमारे हँसी-मजाक में वह निर्लिप्त शामिल रहते, हमारी गोष्ठियों में वह गंभीर बहस करते, हमारी रचनाओं पर बेबाक राय और सुझाव देते और हमारे घरों के किसी भी उत्सव और संस्कार में वह बड़े भाई और पुरोहित जैसे खड़े हो हमें अपने आशीषों से भर देते। मुझे अपना बच्चा और फ़ादर का उसके मुख में पहली बार अन्न डालना याद आता है और नीली आँखों की चमक में तैरता वात्सल्य भी जैसे किसी ऊँचाई पर देवदारु की छाया में खड़े हों।

कहाँ से शुरू करें! इलाहाबाद की सड़कों पर फ़ादर की साइकिल चलती दीख रही है। वह हमारे पास आकर रुकती है, मुसकराते हुए उतरते हैं, ‘देखिए देखिए मैंने उसे पढ़ लिया है और मैं कहना चाहता हूँ…’ उनको क्रोध में कभी नहीं देखा, आवेश में देखा है और ममता तथा प्यार में लबालब छलकता महसूस किया है। अकसर उन्हें देखकर लगता कि बेल्जियम में इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में पहुँचकर उनके मन में संन्यासी बनने की इच्छा कैसे जाग गई जबकि घर भरा-पूरा था दो भाई, एक बहिन, माँ, पिता सभी थे।
“आपको अपने देश की याद आती है?”

“मेरा देश तो अब भारत है।”

“मैं जन्मभूमि की पूछ रहा हूँ?”

“हाँ आती है। बहुत सुंदर है मेरी जन्मभूमि रेम्सचैपल।”

“घर में किसी की याद?”

“माँ की याद आती है बहुत याद आती है।”

फिर अकसर माँ की स्मृति में डूब जाते देखा है। उनकी माँ की चिट्ठियाँ अकसर उनके पास आती थीं। अपने अभिन्न मित्र डॉ. रघुवंश को वह उन चिट्ठियों को दिखाते थे। पिता और भाइयों के लिए बहुत लगाव मन में नहीं था। पिता व्यवसायी थे। एक भाई वहीं पादरी हो गया है। एक भाई काम करता है, उसका परिवार है। बहन सख्त और जिद्दी थी। बहुत देर से उसने शादी की। फ़ादर को एकाध बार उसकी शादी की चिंता व्यक्त करते उन दिनों देखा था। भारत में बस जाने के बाद दो या तीन बार अपने परिवार से मिलने भारत से बेल्जियम गए थे।

“लेकिन मैं तो संन्यासी हूँ।”

“आप सब छोडकर क्यों चले आए?”

“प्रभु की इच्छा थी।” वह बालकों की सी सरलता से मुसकराकर कहते, “माँ ने बचपन में ही घोषित कर दिया था कि लड़का हाथ से गया। और सचमुच इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष की पढ़ाई छोड़ फ़ादर बुल्के संन्यासी होने जब धर्म गुरु के पास गए और कहा कि मैं संन्यास लेना चाहता हूँ तथा एक शर्त रखी (संन्यास लेते समय संन्यास चाहने वाला शर्त रख सकता है) कि मैं भारत जाऊँगा।”

“भारत जाने की बात क्यों उठी?”

“नहीं जानता, बस मन में यह था।”

उनकी शर्त मान ली गई और वह भारत आ गए। पहले ‘जिसेट संघ’ में दो साल पादरियों के बीच धर्माचार की पढ़ाई की। फिर 9-10 वर्ष दार्जिलिंग में पढ़ते रहे। कलकत्ता (कोलकाता) से बी.ए. किया और फिर इलाहाबाद से एम.ए.। उन दिनों डॉ. धीरेंद्र वर्मा हिंदी विभाग के अध्यक्ष थे। शोधप्रबंध प्रयाग विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में रहकर 1950 में पूरा किया ‘रामकथा उत्पत्ति और विकास।’ ‘परिमल’ में उसके अध्याय पढ़े गए थे। फ़ादर ने मातरलिंक के प्रसिद्ध नाटक ‘ब्लू बर्ड’ का रूपांतर भी किया है ‘नीलपंछी’ के नाम से। बाद में वह सेंट जेवियर्स कॉलिज, राँची में हिंदी तथा संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष हो गए और यहीं उन्होंने अपना प्रसिद्ध अंग्रेजी-हिंदी कोश तैयार किया और बाइबिल का अनुवाद भी… और वहीं बीमार पड़े, पटना आए। दिल्ली आए और चले गए-47 वर्ष देश में रहकर और 73 वर्ष की जिंदगी जीकर।

फ़ादर बुल्के संकल्प से संन्यासी थे। कभी-कभी लगता है वह मन से संन्यासी नहीं थे। रिश्ता बनाते थे तो तोड़ते नहीं थे। दसियों साल बाद मिलने के बाद भी उसकी गंध महसूस होती थी। वह जब भी दिल्ली आते जरूर मिलते-खोजकर, समय निकालकर, गर्मी, सर्दी, बरसात झेलकर मिलते, चाहे दो मिनट के लिए ही सही। यह कौन संन्यासी करता है? उनकी चिंता हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखने की थी। हर मंच से इसकी तकलीफ़ बयान करते, इसके लिए अकाट्य तर्क देते। बस इसी एक सवाल पर उन्हें झुंझलाते देखा है और हिंदी वालों द्वारा ही हिंदी की उपेक्षा पर दुख करते उन्हें पाया है। घर-परिवार के बारे में, निजी दुख-तकलीफ़ के बारे में पूछना उनका स्वभाव था और बड़े से बड़े दुख में उनके मुख से सांत्वना के जादू भरे दो शब्द सुनना एक ऐसी रोशनी से भर देता था जो किसी गहरी तपस्या से जनमती है। ‘हर मौत दिखाती है जीवन को नयी राह।’ मुझे अपनी पत्नी और पुत्र की मृत्यु याद आ रही है और फ़ादर के शब्दों से झरती विरल शांति भी।

आज वह नहीं है। दिल्ली में बीमार रहे और पता नहीं चला। बाँहें खोलकर इस बार उन्होंने गले नहीं लगाया। जब देखा तब वे बाँहें दोनों हाथों की सूजी उँगलियों को उलझाए ताबूत में जिस्म पर पड़ी थीं। जो शांति बरसती थी वह चेहरे पर थिर थी। तरलता जम गई थी। वह 18 अगस्त 1982 की सुबह दस बजे का समय था। दिल्ली में कश्मीरी गेट के निकलसन कब्रगाह में उनका ताबूत एक छोटी-सी नीली गाड़ी में से उतारा गया। कुछ पादरी, रघुवंश जी का बेटा और उनके परिजन राजेश्वरसिंह उसे उतार रहे थे। फिर उसे उठाकर एक लंबी सँकरी, उदास पेड़ों की घनी छाँह वाली सड़क से कब्रगाह के आखिरी छोर तक ले जाया गया जहाँ धरती की गोद में सुलाने के लिए कब्र अवाक् मुँह खोले लेटी थी। ऊपर करील की घनी छाँह थी और चारों ओर कब्रें और तेज धूप के वृत्त। जैनेंद्र कुमार, विजयेंद्र स्नातक, अजित कुमार, डॉ. निर्मला जैन और मसीही समुदाय के लोग, पादरीगण, उनके बीच में गैरिक वसन पहने इलाहाबाद के प्रसिद्ध विज्ञान-शिक्षक डॉ. सत्यप्रकाश और डॉ. रघुवंश भी जो अकेले उस सँकरी सड़क की ठंडी उदासी में बहुत पहले से खामोश दुख की किन्हीं अपरिचित आहटों से दबे हुए थे, सिमट आए थे कब्र के चारों तरफ़। फ़ादर की देह पहले कब्र के ऊपर लिटाई गई। मसीही विधि से अंतिम संस्कार शुरू हुआ। राँची के फ़ादर पास्कल तोयना के द्वारा। उन्होंने हिंदी में मसीही विधि से प्रार्थना की फिर सेंट जेवियर्स के रेक्टर फ़ादर पास्कल ने उनके जीवन और कर्म पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा, ‘फ़ादर बुल्के धरती में जा रहे हैं। इस धरती से ऐसे रत्न और पैदा हों।’ डॉ. सत्यप्रकाश ने भी अपनी श्रद्धांजलि में उनके अनुकरणीय जीवन को नमन किया। फिर देह कब्र में उतार दी गई…।

मैं नहीं जानता इस संन्यासी ने कभी सोचा था या नहीं कि उसकी मृत्यु पर कोई रोएगा। लेकिन उस क्षण रोने वालों की कमी नहीं थी। (नम आँखों को गिनना स्याही फैलाना है।) इस तरह हमारे बीच से वह चला गया जो हममें से सबसे अधिक छायादार फल-फूल गंध से भरा और सबसे अलग, सबका होकर, सबसे ऊँचाई पर, मानवीय करुणा की दिव्य चमक में लहलहाता खड़ा था। जिसकी स्मृति हम सबके मन में जो उनके निकट थे किसी यज्ञ की पवित्र आग की आँच की तरह आजीवन बनी रहेगी। मैं उस पवित्र ज्योति की याद में श्रद्धानत हूँ |

अभ्यास के प्रश्न

( मानवीय करुणा की चमक : सर्वेश्वर दयाल सक्सेना )

प्रश्न 1. फादर की उपस्थिति देवदार की छाया जैसी क्यों लगती थी?

उत्तर- जिस प्रकार देवदार का वृक्ष आकार में लम्बा चौड़ा और सघन होकर सबको शीतल छाया प्रदान करता है. कई तरह से उपयोगी सिद्ध होता है. ठीक उसी प्रकार फादर बुल्के के सबके साथ घनिष्ठ संबंध बन जाता था व सभागार में मनाए जाने वाले उत्सवों में बड़े भाई और पुरोहित के रूप में आकर आशीर्वाद देते थे उनके चेहरे और आँखों से वात्सल्य टपकता प्रतीत होता था।

प्रश्न 2. फादर बुल्के भारतीय संस्कृति के एक अभिन्न अंग हैं, किस आधार पर ऐसा कहा गया है?

उत्तर- फादर बुल्के ने भारत आकर दो साल पादरियों से धर्माचार की पढ़ाई की, कोलकाता से बी०ए० और इलाहाबाद एम०ए० की उपाधि प्राप्त की। प्रयाग विश्वविद्यालय से ‘रामकथाः उत्पत्ति और विकास’ शीर्षक पर शोध प्रबंध किया। सेंट जेवियर्स कॉलेज रांची में हिन्दी और संस्कृत के विभागाध्यक्ष रहे। उनका हिन्दी से विशेष लगाव था और हिन्दी की राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते थे। इन सभी तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि फादर बुल्के भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग हैं।

प्रश्न 3. पाठ में आए उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए जिनसे फ़ादर बुल्के का हिंदी प्रेम प्रकट होता है?

उत्तर- फादर बुल्के हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखने के लिए चिंतित रहते थे। वे जहाँ कहीं भी मंच पर जाते हिन्दी के पक्ष में अकाट्य तर्क देते। उन्हें केवल इसी बात पर झुंझलाते हुए देखा गया था कि लोग हिन्दी क्षेत्र के होकर भी हिन्दी की उपेक्षा कर रहे थे। हिन्दी की उपेक्षा करने का दुख और हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखने को उनकी चाह उनके हिन्दी प्रेम को प्रकट करती है।

प्रश्न 4. इस पाठ के आधार पर फादर कामिल बुल्के की जो छवि उभरती है उसे अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर- फादर कामिल बुल्के का जन्म बेल्जियम के रैम्स चैपल नामक नगर में हुआ अवश्य था किंतु आचरण, व्यवहार आदि से वे विशुद्ध भारतीय प्रतीत होते थे। फादर बुल्के मिलनसार व्यक्ति थे। वे एक बार जिससे मिल लेते थे उसे भूलते नहीं थे। दूसरी के प्रति उनके मन में असीम वात्सल्य और अपनत्व भरा हुआ था। वे करुणा रूपी निर्मल जल था उनके उपदेश और विचार कार्य करने का दृढ़ संकल्प देते थे। उनको कभी क्रोध करते हुए नहीं देखा गया। हमेशा दूसरों पर उनका प्यार और ममता ही छलकती देखी जाती थी वे फल-फूल, गंध युक्त ऊँचे-लंबे-चौड़े महाकाय वृक्ष के समान सबका आश्रय स्थल थे। अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण वे संन्यासी होते हुए भी संन्यासी नहीं थे।

प्रश्न 5. लेखक ने फादर बुल्के को ‘मानवीय करूणा की दिव्य चमक’ क्यों कहा है?

उत्तर- लेखक द्वारा फादर बुल्के को ‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ कहा गया है। फादर बुल्के करुणा से भरे शांत स्वभाव के व्यक्ति थे। उनके मन में सबके प्रति प्रेम और वात्सल्य था। वे सभी के सुख-दुख में सम्मिलित होते थे उनके द्वारा कहे गए सांत्वना के दो शब्द बड़े-से-बड़े दुख को सहन करने की शक्ति देते थे संन्यासी होने पर भी सबसे मधुर पारिवारिक घनिष्ट संबंध बना लेते थे। वे जल्दी से किसी को भूलते भी नहीं थे। सबसे अलग होकर भी वे सबके थे।

प्रश्न 6. फ़ादर बुल्के ने संन्यासी की परंपरागत छवि से अलग एक नयी छवि प्रस्तुत की है, कैसे?

उत्तर- सामान्यतः संन्यासी सांसारिक मोह-माया. सामाजिक संबंधों और वस्तुओं के उपभोग से विरक्त रहता है। जबकि फादर बुल्के संन्यासी होते हुए भी अपने मधुर, ममतामयी, स्नेह भरे स्वभाव से सबको अपना बनाते चले गए। सभी से परिवार के सदस्य के समान घनिष्ट संबंध बना लेते थे। सभी के उत्सवों में एक बडे भाई और पुरोहित की तरह आते और उन्हें अनेक तरह के आशीर्वाद देते। इस तरह फादर बुल्के ने संन्यासी की एक परंपरागत छवि से अलग एक नयी छवि प्रस्तुत की है।

प्रश्न 7. आशय स्पष्ट कीजिए :

(क ) नम आँखों को गिनना स्याही फैलाना है।

(ख) फादर को याद करना एक उदास शांत संगीत को सुनने जैसा है।

उत्तर — (क ) प्रस्तुत पंक्ति का आशय है कि फादर बुल्के के इस संसार से विदा होने पर एक-दो आँखें नहीं बल्कि वहाँ उमड़ा पूरा जनसैलाब रो रहा था। फादर बुल्के ने तो अनुमान भी नहीं लगाया था कि उनको चाहने वाले इतने ज्यादा लोग होंगे।

(ख ) प्रस्तुत पंक्ति का आशय है कि फादर बुल्के का संपूर्ण जीवन शांति और करुणा के भाव में व्यतीत हुआ। जिस प्रकार करुणा और उदासी से भरा शांत संगीत प्रेम की वेदना को उजागर करने का माध्यम बनता है, उसी प्रकार फादर बुल्के दूसरों की उदासी का विरेचन करने वाले थे।

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▪️हिंदी ( कक्षा 9) — क्षितिज भाग 1 और कृतिका भाग 1

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