कन्यादान ( ऋतुराज )/ Kanyadan (Rituraj )

( यहाँ NCERT की कक्षा 10वीं की हिंदी की पाठ्य पुस्तक 'क्षतिज भाग 2' में संकलित 'कन्यादान ( ऋतुराज )' अध्याय के मूल पाठ, व्याख्या तथा अभ्यास के प्रश्नों को दिया गया है | )

कन्यादान ( ऋतुराज )

(1)

कितना प्रामाणिक था उसका दुख
लड़की को दान में देते वक्त
जैसे वही उसकी अंतिम पूँजी हो

व्याख्या – उपरोक्त पंक्तियों में कवि ने कन्यादान करते वक्त एक माता के दुःख का बड़े ही मनमोहक तरीके से वर्णन किया हैं। कवि कहते हैं कि उस माँ के दुःख की सत्यता पर कोई संदेह नहीं कर सकता कि उसे अपनी बेटी के कन्यादान के समय कितना अधिक दुःख हुआ होगा। उसके दुःख को देख कर ऐसा लग रहा था जैसे उसकी वह बेटी ही उसकी जीवन भर की कमाई गई दौलत हो और उस दौलत को वह आज दान कर रही हो। कहने का तात्पर्य यह है कि एक माँ को उसकी बेटी की विदाई के समय कितना दुःख होता है यह केवल उस माँ का मन ही जानता है। उस दुःख की कल्पना मात्र भी कोई नहीं कर सकता।

(2)

लड़की अभी सयानी नहीं थी
अभी इतनी भोली सरल थी
कि उसे सुख का आभास तो होता था
लेकिन दुख बाँचना नहीं आता था
पाठिका थी वह धुँधले प्रकाश की
कुछ तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों की

व्याख्या – उपरोक्त पंक्तियों में कवि ऋतुराज कहते हैं कि लड़की अभी सयानी नहीं हुई थी कहने का तात्पर्य यह है कि हालाँकि वह लड़की जिसकी शादी हो रही है वह बड़ी हो गई थी लेकिन उसमें अभी भी दुनियादारी की पूरी तरह से समझने की बुद्धिमानी और अनुभव की कमी थी। वह इतनी भोली – भाली और छल – कपट से दूर थी कि खुशियाँ मनाने तो उसे आता था लेकिन उसे यह नहीं पता था कि दुख का सामना कैसे किया जाए। अर्थात उसे अभी तक यह नहीं पता था कि अगर जीवन में कठिनाइयों का सामना करना पड़े तो किस तरह निडर और आत्मविश्वास से भरपूर रहना है। उसके लिए बाहरी दुनिया किसी धुँधली तसवीर की तरह थी या फिर किसी गीत के किसी अंश की तरह थी। जिसे वह अभी केवल समझने का ही प्रयास कर रही थी। अर्थात अभी वह अपने जीवन में आने वाली कठिनायों का सामना करना सीख ही रही थी , उसमें वह निपुण नहीं हुई थी।

(3)

माँ ने कहा पानी में झाँककर
अपने चेहरे पर मत रीझना
आग रोटियाँ सेंकने के लिए है
जलने के लिए नहीं
वस्त्र और आभूषण शाब्दिक भ्रमों की तरह
बंधन हैं स्त्री जीवन के
माँ ने कहा लड़की होना
पर लड़की जैसी दिखाई मत देना।

व्याख्या – कविता की इन आखरी पंक्तियों में कवि वर्णन करते हैं कि माँ अपनी बेटी को कई नसीहतें दे रही है। माँ कहती हैं कि कभी भी अपनी सुंदरता पर इतराना नहीं चाहिए क्योंकि बाहरी सुंदरता तो अस्थाई हैं। असली सुंदरता तो मन की सुंदरता होती है। फिर माँ अपनी बेटी को कहती है कि आग का प्रयोग सिर्फ खाना बनाने या रोटियाँ सेंकने के लिए ही करना। लेकिन अगर आग का प्रयोग जलने या जलाने के लिए करते हुए देखो तो तुरंत उसका विरोध करना। कवि इन पंक्तियों के माध्यम से उन लोगों पर कटाक्ष करना चाहते हैं जो दहेज के लालच में आकर अपनी बहुओं को आग के हवाले करने में भी नहीं हिचकिचाते हैं। वस्त्र और आभूषण महिलाओं को बहुत आकर्षित करते हैं। लेकिन माँ , वस्त्र और आभूषणों को सौंदर्य बढ़ाने वाली वस्तु न मानकर , इनको महिलाओं के लिए एक बंधन मानती है। इसीलिए वो अपनी बेटी से कहती है कि वस्त्र और आभूषणों के लालच में कभी मत पड़ना क्योंकि ये सब महिलाओं के लिए किसी बंधन से कम नहीं हैं। उपरोक्त पंक्तियों में माँ अपनी बेटी को अबला व कमजोर नारी की जगह एक सशक्त व मजबूत इंसान बनने को कहती हैं ताकि वह अपनी सुरक्षा व अधिकारों के प्रति जागरूक रह कर , हर विपरीत परिस्थिति का पूरी दृढ़ता के साथ सामना कर सके क्योंकि लोग महिलाओं को कमजोर समझ कर उनका शोषण व अत्याचार करते हैं।

अभ्यास के प्रश्न

(कन्यादान : ऋतुराज )

प्रश्न 1 – आपके विचार से माँ ने ऐसा क्यों कहा कि लड़की होना पर लड़की जैसा मत दिखाई देना ?

उत्तर – ” लड़की होना पर लड़की जैसी मत दिखाई देना ” हमारे विचार से लड़की की माँ ने ऐसा इसलिए कहा होगा ताकि लड़की अपने नारी सुलभ गुणों अर्थात सरलता , निश्छलता , विनम्रता आदि गुणों को तो बनाए रखे परंतु वह इतनी कमजोर भी न होने पाए कि लड़की समझकर ससुराल के लोग उसका शोषण करने लगे। इसके अलावा वह भावी जीवन की कठिनाइयों का साहसपूर्वक मुकाबला कर सके। अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठा सके।

प्रश्न 2 – ‘ आग रोटियाँ सेंकने के लिए है।
जलने के लिए नहीं। ‘
( क ) इन पंक्तियों में समाज में स्त्री की किस स्थिति की ओर संकेत किया गया है ?
( ख ) माँ ने बेटी को सचेत करना क्यों जरूरी समझा ?

उत्तर – ( क ) इन पंक्तियों में समाज में स्त्रियों की कमज़ोर स्थिति और ससुराल में परिजनों द्वारा शोषण करने की ओर संकेत किया गया है। कभी – कभी बहुएँ इस शोषण से मुक्ति पाने के लिए स्वयं को आग के हवाले करके अपनी जीवन – लीला समाप्त कर लेती है। या ससुराल वाले ही दहेज के कारण अपनी बहुओं को जला डालते हैं।
( ख ) माँ ने बेटी को इसलिए सचेत करना उचित समझा क्योंकि उसकी बेटी अभी भोली और नासमझ थी , जिसे दुनियादारी और छल – कपट का पता न था। वह लोगों की शोषण प्रवृत्ति और सामाजिक बुराइयों से अनजान थी। इसके अलावा वह शादी – विवाह को सुखमय एवं मोहक कल्पना का साधन समझती थी। वह ससुराल के दूसरे पक्ष से अनभिज्ञ थी। इसी कारण माँ ने अपनी बेटी को जाते हुए सचेत करना उचित समझा ताकि वह निडर हो कर सभी कठिनाइयों का सामना कर सके।

प्रश्न 3 – ‘ पाठिका थी वह धुंधले प्रकाश की
कुछ तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों की ’
इन पंक्तियों को पढ़कर लड़की की जो छवि आपके सामने उभरकर आ रही है उसे शब्दबद्ध कीजिए।

उत्तर – उपर्युक्त काव्य पंक्तियों को पढ़कर हमारे मन में लड़की की जो छवि उभरती है वह कुछ इस प्रकार है:

. लड़की अभी सयानी नहीं है।
.लड़की दुनिया की सही जानकारी नहीं है वह दुनिया के एक पक्ष को तो जानते हैं परंतु दूसरे पक्ष जिसके अंतर्गत छल,कपट, शोषण इत्यादि है; उसकी जानकारी उसे बिल्कुल भी नहीं है।
. लड़की विवाह की सुखद कल्पना में खोई है।
.उसे केवल सुखों का अहसास है, दुखों का नहीं।
. उसे ससुराल की प्रतिकूल परिस्थितियों का ज्ञान नहीं है।

प्रश्न 4 – माँ को अपनी , बेटी ‘ अंतिम पूँजी ’ क्यों लग रही थी ?

उत्तर – माँ को अपनी बेटी ‘ अंतिम पूँजी ‘ इसलिए लग रही थी क्योंकि कन्यादान के बाद माँ एकदम अकेली रह जाएगी। उसकी बेटी ही उसके दुख – सुख की साथी थी , जिसके साथ वह अपनी निजी बातें बाँट लिया करती थी। इसके अलावा बेटी माँ के लिए सबसे प्रिय वस्तु ( पूँजी ) की तरह थी , जिसे अब वह दूसरे के हाथ में सौंपने जा रही थी। इसके बाद वह नितांत अकेली रह जाएगी।

प्रश्न 5 – माँ ने बेटी को क्या – क्या सीख दी ?

उत्तर – माँ ने कन्यादान के बाद अपनी बेटी को विदा करते समय निम्नलिखित सीख दी –

. वह ससुराल में दूसरों द्वारा की गई प्रशंसा से अपने रूप – सौंदर्य पर आत्ममुग्ध न हो जाए।
. आग का उपयोग रोटियाँ पकाने के लिए करना। उसका दुरुपयोग अपने जलने के लिए मत करना अर्थात कभी कमजोर मत पड़ना |
. वस्त्र – आभूषणों के मोह में फँसकर इनके बंधन में न बँध जाना।
. नारी सुलभ गुण बनाए रखना पर कमजोर मत पड़ना।

यह भी पढ़ें :

▪️हिंदी ( कक्षा 10) — क्षितिज भाग 2 और कृतिका भाग 2

▪️हिंदी ( कक्षा 9) — क्षितिज भाग 1 और कृतिका भाग 1

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