आचार्य रामचंद्र शुक्ल से पूर्व हिंदी आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल से पूर्व हिंदी आलोचना एक स्वतंत्र, विकसित और वैज्ञानिक विधा के रूप में स्थापित नहीं हुई थी। यद्यपि हिंदी साहित्य का इतिहास अत्यंत पुराना है, पर आलोचना की अवधारणा आरंभिक स्तर पर ही थी। यह आलोचना कभी धार्मिक टिप्पणियों, कभी काव्य-शास्त्रीय व्याख्याओं, तो कभी भाषा और समाज-सुधार संबंधी लेखों के रूप में दिखाई देती है। इस काल की आलोचना में विवेचना तो है, परंतु उसमें वह गहराई, दृष्टि, तर्क और वस्तुनिष्ठता नहीं है, जो आधुनिक आलोचना की विशेषता है। इसलिए यह काल आलोचना की “भूमिका” या “तैयारी का चरण” कहा जा सकता है। भक्ति, रीति, भारतेंदु और द्विवेदी युग के साहित्य में आलोचना के अलग-अलग रूप मिलते हैं, पर वे विखंडित और सीमित हैं। इसी पृष्ठभूमि से शुक्ल जैसी वैज्ञानिक आलोचना का जन्म संभव हुआ।

(1) प्राचीन भारतीय आलोचना का प्रभाव : नाट्यशास्त्र से साहित्यदर्पण तक

    हिंदी आलोचना के स्वरूप को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि वह सीधे भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा से प्रभावित होकर विकसित हुई। भरतमुनि का नाट्यशास्त्र, आनंदवर्धन का ध्वन्यालोक, मम्मट का काव्यप्रकाश और विश्वनाथ का साहित्यदर्पण भारतीय साहित्यिक सौंदर्यशास्त्र के मूल ग्रंथ रहे हैं। इन ग्रंथों में रस, अलंकार, ध्वनि, रीति, औचित्य, गुण-दोष आदि की विस्तृत चर्चा है। हिंदी के आरंभिक कवियों और टीकाकारों ने इन्हीं सिद्धांतों का उपयोग अपने ग्रंथों की व्याख्या में किया। इसलिए शुक्ल-पूर्व आलोचना भारतीय परंपरा का अनुसरण करती है। यह आलोचना मुख्यतः रसवाद और अलंकारवाद पर आधारित थी। हिंदी आलोचना की प्रारंभिक टीकाओं में इन सिद्धांतों की छाया स्पष्ट दिखाई देती है। हालांकि ये सिद्धांत गहरे हैं, पर हिंदी में उनका उपयोग सीमित और आंशिक रहा।

    (2) भक्तिकाल की आलोचना : आध्यात्मिकता और नैतिक मूल्यांकन

      भक्तिकाल में आलोचना का स्वरूप धार्मिक और नैतिक था। इस समय साहित्य का लक्ष्य भक्तिभाव, आध्यात्मिक अनुभव और सामाजिक सुधार था, इसलिए आलोचना भी इन्हीं केंद्रों के आसपास घूमती थी। कबीर ने समाज के पाखंड, बाह्याचार और ढोंग का तीखा विरोध किया—यह सामाजिक आलोचना का प्रारंभिक रूप है। तुलसीदास के यहाँ चरित्र-विश्लेषण और आदर्श प्रस्तुतिकरण मिलता है, जो नैतिक आलोचना कहा जा सकता है। सूरदास में वात्सल्य और मनोवैज्ञानिक भावों की सूक्ष्म व्याख्या दिखाई देती है। परंतु इस युग में साहित्य की कलात्मकता, संरचना, शैली या इतिहास की दृष्टि से कोई आलोचनात्मक चर्चा नहीं मिलती। आलोचना अधिकतर आस्था, निष्ठा और धार्मिक धारणाओं पर आधारित थी। इसलिए यह युग आलोचना की भावनात्मक और अध्यात्मप्रधान भूमिका माना जाता है।

      (3) रीतिकालीन आलोचना : अलंकार और रस की प्रधानता

        रीतिकाल में आलोचना का अर्थ काव्य के गुण–अलंकारों की व्याख्या करना था। इस युग में कवि और टीकाकार मुख्यतः संस्कृत काव्यशास्त्र की परंपरा पर निर्भर थे, विशेषकर रसवाद और अलंकारवाद पर। केशवदास की रसिकप्रिया और कविप्रिया इस काल की आलोचनात्मक ग्रंथी परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं, जहाँ नायक-नायिका भेद, शृंगार-रस, सौंदर्य और व्यवहार नियमों की चर्चा प्रमुख है। आलोचना का लक्ष्य साहित्य के कला पक्ष का सौंदर्य-वर्णन था, न कि उसका मूल्यांकन। इसलिए डॉ. नगेंद्र इसे “अलंकार-गणना की आलोचना” कहते हैं। इस युग में न इतिहास-दृष्टि थी, न समाज-दृष्टि, न लेखक की मौलिकता पर विचार। आलोचना का केंद्र केवल काव्य की शोभा और शृंगार था। यद्यपि ये ग्रंथ महत्वपूर्ण थे, पर उन्होंने आलोचना को आधुनिक दिशा नहीं दी।

        (4) 18वीं–19वीं शताब्दी : आधुनिक आलोचना के बीज

          18वीं और 19वीं सदी में आधुनिक हिंदी गद्य का उदय हुआ, जिसने आलोचना के विकास का मार्ग खोला। फोर्ट विलियम कॉलेज के समय अनुवादों, टीकाओं और शिक्षाप्रद गद्य ने भाषा को परिष्कृत किया। इसी दौर में साहित्य को नए ढंग से देखने की आवश्यकता महसूस हुई। आलोचना का प्रारंभिक रूप टिप्पणियों और व्याख्याओं के रूप में सामने आया, लेकिन यह अभी स्वतंत्र विधा नहीं थी। अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी साहित्य के संपर्क से हिंदी लेखकों में तर्क, विवेचन और सामाजिक दृष्टि का विकास हुआ। यद्यपि यह आलोचना बहुत सीमित थी, पर इसने नई सोच को जन्म दिया—साहित्य समाज का दर्पण है, साहित्य शिक्षा का उपकरण है, भाषा सुधार का माध्यम है आदि। यह चरण आलोचना के आधुनिक रूप की आधारभूमि बना।

          (5) भारतेंदु युग : चेतना और सामाजिक दृष्टि का विकास

            भारतेंदु हरिश्चंद्र (1868–1885) ने हिंदी आलोचना को जागरूकता, उद्देश्य और सामाजिकता प्रदान की। उन्होंने साहित्य को राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक सुधार और आधुनिक जीवन से जोड़ने का कार्य किया। उनके निबंधों में भाषा-समस्या, नारी-शिक्षा, स्वदेशी, पत्रकारिता, साहित्य की उपयोगिता जैसे प्रश्न उठाए गए—ये आलोचना के सामाजिक पक्ष को मजबूत करते हैं। बालकृष्ण भट्ट ने हिंदी प्रदीप में तार्किक, वैज्ञानिक और विवेचनात्मक लेख लिखकर आलोचना की नींव को मजबूत किया। प्रतापनारायण मिश्र ने साहित्य को हास्य-व्यंग्य और नैतिकता से जोड़ा। इस युग की आलोचना में भावनात्मकता की जगह तर्क और समाज-दृष्टि का प्रवेश हुआ। कुछ सीमाओं के बावजूद यह काल आधुनिक आलोचना की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण चरण है।

            (6) द्विवेदी युग : आलोचना की बौद्धिक और नैतिक दिशा

              महावीरप्रसाद द्विवेदी (1900–1920) ने आलोचना को बौद्धिकता और गंभीरता प्रदान की। उन्होंने सरस्वती पत्रिका के माध्यम से भाषा, साहित्य, समाज और राष्ट्र पर विस्तृत विवेचन किया। उनके अनुसार साहित्य का उद्देश्य लोक-कल्याण है, इसलिए आलोचना भी साहित्य को नैतिकता, चरित्र निर्माण और सामाजिक उपयोगिता के आधार पर परखती है। उन्होंने छंद, व्याकरण, भाषा-शुद्धता और लेखन-कौशल पर स्पष्ट विचार दिए। उनकी आलोचना में तर्क और विश्लेषण है, पर कला-सौंदर्य की अपेक्षा नैतिक मूल्यांकन अधिक है। डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार द्विवेदीजी की आलोचना बौद्धिक तेज तो देती है, पर उसमें कलात्मक संवेदना और इतिहास-दृष्टि की कमी है। फिर भी यह काल आलोचना के विचार, तर्क और बौद्धिकता के विकास में अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

              (7) शुक्ल-पूर्व आलोचना की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

                शुक्ल-पूर्व आलोचना में कुछ निश्चित प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। पहली प्रवृत्ति व्यक्तिपरकता की है—कवियों और आलोचकों के निर्णय तर्क की बजाय व्यक्तिगत मत पर आधारित थे। दूसरी प्रवृत्ति धार्मिक या नैतिक दृष्टि की है—भक्ति और द्विवेदी युग में साहित्य को धर्म या नैतिकता की कसौटी पर परखा गया। तीसरी प्रवृत्ति अलंकारवाद की है—विशेषकर रीतिकाल में साहित्य की सुंदरता, रस और अलंकार ही प्रमुख मानक थे। चौथी प्रवृत्ति इतिहास-दृष्टि के अभाव की है—न तो साहित्य को युगानुसार देखा गया, न किसी परंपरा में जोड़कर। पाँचवीं प्रवृत्ति अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव से विकसित तर्क और समाज-दृष्टि की है, जिसने आधुनिक आलोचना के द्वार खोले। ये प्रवृत्तियाँ भले ही आधुनिक न हों, पर शुक्ल की आलोचना के लिए मंच तैयार करती हैं।

                (8) शुक्ल-पूर्व आलोचना की सीमाएँ

                  शुक्ल-पूर्व आलोचना की सबसे बड़ी सीमा यह है कि उसमें आलोचना के सिद्धांत, उद्देश्य और वैज्ञानिकता का अभाव था। भक्ति युग में आलोचना धार्मिकता और उपदेश पर आधारित थी, जबकि रीतिकाल में वह केवल अलंकार-प्रधान हो गई थी। भारतेंदु और द्विवेदी युग में आलोचना का स्वरूप तो विकसित हुआ, पर वह या तो नैतिकता से बंधा रहा या सामाजिक सुधार तक सीमित रहा। साहित्य की गहराई, मनोविज्ञान, कला, संरचना और इतिहास के तत्वों पर विचार नहीं हुआ। आलोचना का कोई व्यवस्थित इतिहास नहीं था, न कोई संगठित पद्धति। यह आलोचना विखंडित, असंगत और व्यक्तिपरक थी। इसलिए शुक्ल के आने से पहले हिंदी आलोचना में वह परिपक्वता नहीं थी, जिसे आधुनिक आलोचना की कसौटी माना जाता है।

                  निष्कर्ष — समग्रतः देखा जाए तो शुक्ल-पूर्व आलोचना हिंदी साहित्य में नए विचारों का प्रारंभ है। भक्तिकाल ने मनुष्य और समाज की संवेदना दी, रीतिकाल ने काव्य-सौंदर्य की चेतना दी, भारतेंदु युग ने सामाजिक दृष्टि दी और द्विवेदी युग ने बौद्धिकता प्रदान की। इन सभी प्रवृत्तियों ने आलोचना के अलग-अलग पहलुओं को जन्म दिया, पर इनमें एकरूपता, वैज्ञानिकता और इतिहास-दृष्टि का अभाव था। शुक्लजी ने इन सभी बिखरे हुए तत्वों को संयोजित कर आलोचना को आधुनिक, तर्कसंगत, वस्तुपरक और ऐतिहासिक बनाया। इसलिए कहा जाता है कि शुक्लपूर्व आलोचना तैयारी है, शुक्लजी उसकी परिणति हैं। शुक्लजी के आने से पहले जो वातावरण बना, वही उनके आलोचनात्मक दृष्टिकोण के लिए आधारभूमि सिद्ध हुआ।

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