( यहाँ NCERT की कक्षा 9वीं की हिंदी की पाठ्य पुस्तक 'क्षतिज भाग 1' में संकलित 'साँवले सपनों की याद' अध्याय के मूल पाठ तथा अभ्यास के प्रश्नों को दिया गया है | )
सुनहरे परिंदों के खूबसूरत पंखों पर सवार साँवले सपनों का एक हुजूम मौत की खामोश वादी की तरफ़ अग्रसर है। कोई रोक-टोक सके, कहाँ संभव है।
इस हुजूम में आगे-आगे चल रहे हैं, सालिम अली। अपने कंधों पर, सैलानियों की तरह अपने अंतहीन सफ़र का बोझ उठाए। लेकिन यह सफ़र पिछले तमाम सफ़रों से भिन्न है। भीड़-भाड़ की जिंदगी और तनाव के माहौल से सालिम अली का यह आखिरी पलायन है। अब तो वो उस वन-पक्षी की तरह प्रकृति में विलीन हो रहे हैं, जो जिंदगी का आखिरी गीत गाने के बाद मौत की गोद में जा बसा हो। कोई अपने जिस्म की हरारत और दिल की धड़कन देकर भी उसे लौटाना चाहे तो वह पक्षी अपने सपनों के गीत दोबारा कैसे गा सकेगा!
मुझे नहीं लगता, कोई इस सोए हुए पक्षी को जगाना चाहेगा। वर्षों पूर्व, खुद सालिम अली ने कहा था कि लोग पक्षियों को आदमी की नज़र से देखना चाहते हैं। यह उनकी भूल है, ठीक उसी तरह, जैसे जंगलों और पहाड़ों, झरनों और आबशारों को वो प्रकृति की नजर से नहीं, आदमी की नजर से देखने को उत्सुक रहते हैं। भला कोई आदमी अपने कानों से पक्षियों की आवाज का मधुर संगीत सुनकर अपने भीतर रोमांच का सोता फूटता महसूस कर सकता है?
एहसास की ऐसी ही एक ऊबड़-खाबड़ जमीन पर जन्मे मिथक का नाम है, सालिम अली।
पता नहीं, इतिहास में कब कृष्ण ने वृंदावन में रासलीला रची थी और शोख गोपियों को अपनी शरारतों का निशाना बनाया था। कब माखन भरे भाँड़े फोड़े थे और दूध-छाली से अपने मुँह भरे थे। कब वाटिका में, छोटे-छोटे किंतु घने पेड़ों की छाँह में विश्राम किया था। कब दिल की धड़कनों को एकदम से तेज करने वाले अंदाज में बंसी बजाई थी। और, पता नहीं, कब वृंदावन की पूरी दुनिया संगीतमय हो गई थी। पता नहीं, यह सब कब हुआ था। लेकिन कोई आज भी वृंदावन जाए तो नदी का साँवला पानी उसे पूरे घटना-क्रम की याद दिला देगा। हर सुबह, सूरज निकलने से पहले, जब पतली गलियों से उत्साह भरी भीड़ नदी की ओर बढ़ती है, तो लगता है जैसे उस भीड़ को चीरकर अचानक कोई सामने आएगा और बंसी की आवाज पर सब किसी के कदम थम जाएँगे। हर शाम सूरज ढलने से पहले, जब वाटिका का माली सैलानियों को हिदायत देगा तो लगता है जैसे बस कुछ ही क्षणों में वो कहीं से आ टपकेगा और संगीत का जादू वाटिका के भरे-पूरे माहौल पर छा जाएगा। वृंदावन कभी कृष्ण की बाँसुरी के जादू से खाली हुआ है क्या !
मिथकों की दुनिया में इस सवाल का जवाब तलाश करने से पहले एक नज़र कमज़ोर काया वाले उस व्यक्ति पर डाली जाए जिसे हम सालिम अली के नाम से जानते हैं। उम्र को शती तक पहुँचने में थोड़े ही दिन तो बच रहे थे। संभव है, लंबी यात्राओं की थकान ने उनके शरीर को कमजोर कर दिया हो, और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी उनकी मौत का कारण बनी हो। लेकिन अंतिम समय तक मौत उनकी आँखों से वह रोशनी छीनने में सफल नहीं हुई जो पक्षियों की तलाश और उनकी हिफ़ाज़त के प्रति समर्पित थी। सालिम अली की आँखों पर चढ़ी दूरबीन उनकी मौत के बाद ही तो उतरी थी।
उन जैसा ‘बर्ड वाचर’ शायद ही कोई हुआ हो। लेकिन एकांत क्षणों में सालिम अली बिना दूरबीन भी देखे गए हैं। दूर क्षितिज तक फैली जमीन और झुके आसमान को छूने वाली उनकी नजरों में कुछ-कुछ वैसा ही जादू था, जो प्रकृति को अपने घेरे में बाँध लेता है। सालिम अली उन लोगों में थे जो प्रकृति के प्रभाव में आने की बजाए प्रकृति को अपने प्रभाव में लाने के कायल होते हैं। उनके लिए प्रकृति में हर तरफ़ एक हँसती खेलती रहस्य भरी दुनिया पसरी थी। यह दुनिया उन्होंने बड़ी मेहनत से अपने लिए गढ़ी थी। इसके गढ़ने में उनकी जीवन-साथी तहमीना ने काफ़ी मदद पहुँचाई थी। तहमीना स्कूल के दिनों में उनकी सहपाठी रही थीं।
अपने लंबे रोमांचकारी जीवन में ढेर सारे अनुभवों के मालिक सालिम अली एक दिन केरल की ‘साइलेंट वैली’ को रेगिस्तानी हवा के झोंकों से बचाने का अनुरोध लेकर चौधरी चरण सिंह से मिले थे। वे प्रधानमंत्री थे। चौधरी साहब गाँव की मिट्टी पर पड़ने वाली पानी की पहली बूँद का असर जानने वाले नेता थे। पर्यावरण के संभावित खतरों का जो चित्र सालिम अली ने उनके सामने रखा, उसने उनकी आँखें नम कर दी थीं।
आज सालिम अली नहीं हैं। चौधरी साहब भी नहीं हैं। कौन बचा है, जो अब सोंधी माटी पर उगी फसलों के बीच एक नए भारत की नींव रखने का संकल्प लेगा? कौन बचा है, जो अब हिमालय और लद्दाख की बरफीली जमीनों पर जीने वाले पक्षियों की वकालत करेगा?
सालिम अली ने अपनी आत्मकथा का नाम रखा था ‘फॉल ऑफ ए स्पैरो’ (Fall of a Sparrow)। मुझे याद आ गया, डी एच लॉरेंस की मौत के बाद लोगों ने उनकी पत्नी फ्रीडा लॉरेंस से अनुरोध किया कि वह अपने पति के बारे में कुछ लिखे। फ्रीडा चाहती तो ढेर सारी बातें लॉरेंस के बारे में लिख सकती थी। लेकिन उसने कहा-मेरे लिए लॉरेंस के बारे में कुछ लिखना असंभव सा है। मुझे महसूस होता है, मेरी छत पर बैठने वाली गोरैया लॉरेंस के बारे में ढेर सारी बातें जानती है। मुझसे भी ज्यादा जानती है। वो सचमुच इतना खुला खुला और सादा-दिल आदमी था। मुमकिन है, लॉरेंस मेरी रगों में, मेरी हड्डियों में समाया हो। लेकिन मेरे लिए कितना कठिन है, उसके बारे में अपने अनुभवों को शब्दों का जामा पहनाना। मुझे यकीन है, मेरी छत पर बैठी गौरैया उसके बारे में, और हम दोनों ही के बारे में, मुझसे ज्यादा जानकारी रखती है।
जटिल प्राणियों के लिए सालिम अली हमेशा एक पहेली बने रहेंगे। बचपन के दिनों में, उनकी एयरगन से घायल होकर गिरने वाली, नीले कंठ की वह गौरैया सारी जिंदगी उन्हें खोज के नए-नए रास्तों की तरफ़ ले जाती रही। जिंदगी की ऊँचाइयों में उनका विश्वास एक क्षण के लिए भी डिगा नहीं। वो लॉरेंस की तरह, नैसर्गिक जिंदगी का प्रतिरूप बन गये थे।
सालिम अली प्रकृति की दुनिया में एक टापू बनने की बजाए अथाह सागर बनकर उभरे थे। जो लोग उनके भ्रमणशील स्वभाव और उनकी यायावरी से परिचित हैं, उन्हें महसूस होता है कि वो आज भी पक्षियों के सुराग में ही निकले हैं, और बस अभी गले में लंबी दूरबीन लटकाए अपने खोजपूर्ण नतीजों के साथ लौट आएँगे।
जब तक वो नहीं लौटते, क्या उन्हें गया हुआ मान लिया जाए!
मेरी आँखें नम हैं, सालिम अली, तुम लौटोगे ना!
अभ्यास के प्रश्न ( साँवले सपनों की याद )
प्रश्न 1. किस घटना ने सालिम अली के जीवन की दिशा को बदल दिया और उन्हें पक्षी प्रेमी बना दिया?
उत्तर– बचपन मेें सालिम अली की एयरगन से नीले कं ठ की एक गौरैया घायल हो गयी थी। इस घटना ने सालिम अली के जीवन की दिशा को बदल दिया। वे उस गौरैया की देखभाल करने लगे और धीरे-धीरे पक्षियोंसे प्रेम करने लगे।
प्रश्न 2. सालिम अली ने पूर्व प्रधानमंत्री के सामने पर्यावरण से सम्बंधित किन संभावित खतरों का चित्र खींचा होगा जिससे उनकी आँखें नम हो गई थीं?
उत्तर– सालिम अली ने पूर्व प्रधानमंत्री के सामने ‘साइलेंट वैली’ को रेगिस्तानी हवा के झोंकों से खतरे का मुद्दा उठाया होगा। उन्होंने पक्षियों और पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति चिंता प्रकट की होगी। उनका निस्वार्थ सेवा भाव देखकर प्रधानमंत्री की आँखें नम हो गई थीं।
प्रश्न 3. लॉरेन्स की पत्नी फ्रीडा ने ऐसा क्यों कहा होगा कि “मेरी छत पर बैठने वाली गौरैया लॉरेन्स के बारे में ढेर सारी बातें जानती है?
उत्तर– लॉरेन्स बहुत सरल हृदय और सीधे व्यक्ति थे। उनके बारे में कोई बात किसी से छिपी नहीं थी। वे एक अच्छे ‘बर्ड वॉचर’ भी थे और उन्हें प्रकृति से गहरा लगाव था। पक्षियों के कलरव को प्रेरणा बनाकर उन्होंने कई कविताएँ लिखी थीं। वे अपनी छत पर बैठी गौरैया को अक्सर देखा करते थे, इसलिए फ्रीडा ने उक्त कथन कहा।
प्रश्न 4. आशय स्पष्ट कीजिए–
(क) वो लॉरेन्स की तरह, नैसर्गिक ज़िन्दगी का प्रतिरूप बन गए थे।
(ख) कोई अपने ज़िस्म की हरारत और दिल की धड़कन देकर भी उसे लौटाना चाहे तो वह पक्षी अपने सपनों के गीत दोबारा कै से गा सकेगा।
(ग) सालिम अली प्रकृति की दनिु या मेें एक टापू बनने की बजाय अथाह सागर बनकर उभरे थे।
उत्तर–(क) लॉरेन्स बहुत सीधे स्वभाव के व्यक्ति थे और प्रकृति से अथाह प्रेम करते थे। सालिम अली भी पक्षियों से प्रेम करते थे और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे।
(ख) सालिम अली की मृत्यु के बाद उनके जैसा पक्षी प्रेमी कोई नहीं हो सकता। वे मौलिक थे, और चाहे कोई अपने प्राण भी सालिम अली में डाल दे, तो भी वे पुनर्जीवित नहीं हो सकते। भाव यह है कि सालिम अली के समान पक्षी प्रेमी प्रयासों से भी उत्पन्न नहीं हो सकता।
(ग) टापू बन्धन का और सागर खुलेपन का प्रतीक है। सालिम अली को किसी पक्षी विशेष या स्थान विशेष से प्रेम नहीं था; वे तो प्रत्येक स्थान और प्रत्येक पक्षी से प्रेम करते थे। उन्होंने खुद को किसी बन्धन में नहीं बाँधा।
प्रश्न 5. इस पाठ के आधार पर लेख की भाषा-शैली की चार विशेषताएँ बताइये |
उत्तर– लेखक की भाषा शैली की चार विशेषताएँ निम्नलिखित हैं–
(1) मिश्रित शब्दों का प्रयोग, अर्थात् हिन्दी भाषा के शब्दों के साथ-साथ उर्दू, तत्सम, तद्भव, देशज, अंग्रेज़ी तथा संस्कृत के शब्दों का प्रयोग।
(2) चित्रात्मक और डायरी शैली का प्रयोग।
(3) अलंकृत भाषा और मुहावरों का प्रयोग।
(4) भावानुकूल भाषा का प्रयोग।
प्रश्न 6. इस पाठ में लेखक ने सालिम अली के व्यक्तित्व का जो चित्र खींचा है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर–सालिम अली को पक्षियों से गहरा लगाव था। वे दूरबीन को अपने गले में लटकाए या आँखों पर लगाए रहते थे। उनकी नज़र में ऐसा जादू था कि वे प्रकृति को अपने घेरे में बाँध लेते थे। उन्हें प्रकृति के संरक्षण की बहुत चिंता थी, इसलिए उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से मिलकर केरल की ‘साइलेंट वैली’ को रेगिस्तानी हवा से बचाने का अनुरोध किया। वे भ्रमणशील स्वभाव के थे, और लंबी-लंबी यात्राओं के कारण उनका शरीर कुछ कमजोर हो गया था। व्यवहार में वे सीधे और सरल इंसान थे। उनमें कृत्रिमता लेशमात्र भी नहीं थी। उन्होंने अपने आप को किसी बंधन में कैद नहीं किया। वे आजीवन सागर की तरह स्वच्छंद होकर भ्रमण करते रहे।
प्रश्न 7. ‘‘साँवले सपनों की याद’ शीर्षक की सार्थकता पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर– साँवले सपने उन सपनों को कहते हैं, जिनमें किसी व्यक्ति की इच्छाएँ समाहित होती हैं। ये सपने सालिम अली के हैं, जिनमें वह जीवन भर खोए रहे। वे आजीवन पक्षियों की खोज और सुरक्षा के सपने देखते रहे। जब सालिम अली की मृत्यु हो जाती है तो लेखक उनके सपनों को याद करते हुए व्यथित हो जाता है और उन्हें डायरी शैली में लिखने लगता है।
अतः ‘साँवले सपनों की याद’ शीर्षक सार्थक है, परंतु कुछ जटिल भी है, क्योंकि पाठक इसे पढ़कर यह सोचता है कि सपने साँवले क्या हैं, क्यों हैं और किसके हैं?
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