( यहाँ NCERT की कक्षा 9वीं की हिंदी की पाठ्य पुस्तक 'क्षतिज भाग 1' में संकलित 'सवैये ( रसखान )' अध्याय के मूल पाठ, व्याख्या तथा अभ्यास के प्रश्नों को दिया गया है | )
सवैयों की व्याख्या
सवैया (1)
मानुष हौं तो वही रसखानि
बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पशु हौं तो कहा बस मेरो
चरौं नित नंद की धेनु मँझारन।
पाहन हौं तो वही गिरि को
जो कियो हरि छत्र पुरंदर धारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं
मिलि कालिंदी कूल कदंब की डारन॥
व्याख्या – कवि रसखान कहते हैं कि अगले जन्म में मैं यदि मनुष्य के रूप में जन्म लूँ तो मेरी इच्छा है कि मैं गोकुल गाँव के ग्वाल बालों के बीच निवास करूँ। वे कहते हैं कि यद्यपि यह मेरे वश की बात नहीं है किन्तु मैं चाहता हूँ कि यदि मेरा जन्म पशु के रूप में हो तो मैं रोजाना नन्द की गायों के बीच ही रहूँ। यदि मैं पत्थर बनूँ तो उसी गोवर्धन पर्वत का बनूँ जिसे श्रीकृष्ण ने इन्द्र के प्रकोप से ब्रज की रक्षा करने के लिए अपनी अंगुली पर छत्र के रूप में धारण किया था। और यदि मैं पक्षी के रूप में आगामी जन्म लूँ तो मेरी इच्छा है कि यमुना के किनारे के कदंबों पर बैठने वाले पक्षियों के बीच मेरा निवास हो।
सवैया (2)
या लकुटी अरु कामरिया पर
राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहु सिद्धि नवौ निधि के सुख
नंद की गाइ चराइ विसारौं।
रसखान कबौं इन आँखिन सौं
ब्रज के बन बाग तडाग निहारौं।
कोटिक ए कलधौत के घास
करील के कुंजन ऊपर वारों॥
व्याख्या – कवि रसखान कहते हैं कि श्रीकृष्ण की इस लाठी तथा कंबल के ऊपर मैं तीनों लोकों का राज्य सिंहासन भी त्याग दूँगा। नंद बाबा की गायों को चराने में मिलने वाले सुख की तुलना में आठों सिद्धियों और नौ निधियों के सुख को भी भुला दूँगा। रसखान की इच्छा है कि उन्हें कभी ब्रज के वन, बाग-बगीचे, तालाब आदि को देखने का सुअवसर मिले। वे आनंद प्रदान करने वाले करील की कुंजों के ऊपर सोने-चाँदी के बने करोड़ों महलों को न्यौछावर करने को तैयार हैं।
सवैया (3)
मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं,
गुंज की माल गरें पहिरौंगी।
ओढ़ि पितम्बर ले लकुटी बन
गोधन ग्वालनि संग फिरौंगी।।
भावतो बोहि मेरो रसखानि सों
तेरे कहे सब स्वांग करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की
अधरान घरी अधरा न धरौंगी।।
व्याख्या – हे सखी तुम्हारे कहने के अनुसार मैं श्रीकृष्ण का वेश धारण कर लूँगी, मैं सिर पर मोर पंख का मुकुट धारण कर लूँगी, गले में गुंजाफल की माला भी पहन लूंगी। मैं पीताम्बर ओढ़ लूँगी और हाथ में लाठी लेकर वन में ग्वालाओं के साथ गाय, बछड़ा आदि के पीछे-पीछे घूमती फिरूंगी। रसखान कवि के शब्दों में गोपी कहती है कि प्रेंमरस के अवतार श्रीकृष्ण को जो भी प्रिय है, तुम्हारे कहने से मैं सब कुछ करूँगी। किन्तु जिस वंशी को श्रीकृष्ण ने अपने होठों पर रखा उसे मैं अपने होठों पर धारण नहीं करूँगी।
सवैया (4)
काननि दै अंगुरी रहिबो
जबहीं मुरली धुनि मंद बजैहै।
मोहनी ताननि सों रसखानि
अटा चढ़ि गोधन गैहै तो गैहैं।
टेर कहाँ सिगरे बृजलोगनि
काल्हि कोऊ कितनो समुझै है।
माइरी वा मुख की मुसकानि
सम्हारी न जैहैं, न जैहै, न जैहै॥
व्याख्या – कृष्ण की वंशी के स्वर से आनंदित होने वाली गोपी कहती है कि यदि श्रीकृष्ण धीमे स्वर में वंशी बजायेंगे तो मैं अपने कानों में अंगुली लगा लूँगी। मुझे मंद स्वर में वंशी नहीं सुननी है। कवि रसखान के शब्दों में गोपी कहती है कि वे अट्टालिका पर चढ़कर गोधन गीत गाएँ तो गाते रहें, मुझे वह गीत नहीं सुनना है किन्तु गोपी साफ-साफ शब्दों में ब्रज के लोगों को पुकार पुकार कर कहती है कि कल मुझे कोई समझाने का कितना ही प्रयास करता रहे, मैं समझने में असमर्थ रहूँगी। मैं उनके और सभी व्यवहारों को तो सहन कर लूँगी किन्तु हे माइ, उनकी मुस्कान के चमत्कारी प्रभाव को संभालने में मैं असमर्थ रहूँगी। मैं उनकी मुस्कान के सामने मजबूर होकर रह जाऊँगी।
अभ्यास के प्रश्न
प्रश्न 1 – ब्रजभूमि के प्रति कवि का प्रेम किन-किन रूपों में अभिव्यक्त हुआ है?
उत्तर- ब्रजभूमि के प्रति कवि का प्रेम निम्नलिखित रूपों में अभिव्यक्त हुआ है। कवि को ब्रजभूमि से गहरा प्रेम है क्योंकि वे चाहते हैं कि अगर उन्हें अगले जन्म में मनुष्य योनि मिले तो वे गोकुल के गाँव के ग्वालों के बीच रहें। पशु योनि प्राप्त हो तो रोज़ नन्द बाबा की गायों के साथ चरें। अगर वे पत्थर भी बन जाएँ तो भी वे उस गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनें जिसे श्री कृष्ण ने अपनी कनिष्ठा ऊँगली पर उठाया था। अगर वे पक्षी बने, तो वे यमुना किनारे कदम्ब की डालों में अपना खोंसला बनाएँ। रसखान ब्रजभूमि और श्री कृष्ण से जुड़ी हर वस्तु से प्रेम करते हैं जिस कारण वे कोई भी जन्म लेकर किसी भी रूप में श्री कृष्ण का साथ चाहते हैं।
प्रश्न 2 – कवि का ब्रज के वन, बाग और तालाब को निहारने के पीछे क्या कारण हैं?
उत्तर – कवि का ब्रज के वन-बाग और तालाब निहारने का कारण यह है कि ब्रज की वह इन सबसे भूमि से श्रीकृष्ण का जुड़ाव है और कवि इस जुड़ाव को महसूस करता है। कवि श्रीकृष्ण का अनन्य भक्त है। वे अपने आराध्य से जुड़े उन सभी स्थानों को देखना चाहते हैं जहाँ-जहाँ श्री कृष्ण घूमा करते होंगे। इस सभी से कवि को शांति और आनंद की अनुभूति होती है।
प्रश्न 3 – एक लकुटी और कामरिया पर कवि सब कुछ न्योछावर करने को क्यों तैयार है?
उत्तर- कवि श्री कृष्ण के प्रेम में पूरी तरह डूबे हुए हैं। इसी कारण जिस लाठी और छोटे कंबल को लेकर कृष्ण गाय चराने के लिए जाते थे उस लाठी और छोटे कंबल को पाने के लिए अगर उन्हें तीनों लोकों का राज्य भी त्यागना पड़े तो भी वे उसे भी त्यागने को तैयार हैं। क्योंकि कवि के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण कृष्ण ही हैं। इसलिए कृष्ण की एक-एक चीज़ भी उसके लिए महत्त्वपूर्ण है।
प्रश्न 4 – सखी ने गोपी से कृष्ण का कैसा रूप धारण करने का आग्रह किया था? अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।
उत्तर- सखी ने गोपी से कृष्ण का ठीक वैसा ही रूप धारण करने का अग्रह किया था जैसा कृष्ण दिखते थे। उसने आग्रह किया था कि वह कृष्ण की तरह मोर पंख से बना मुकुट अपने सिर पर धारण करें, अपने गले में कृष्ण की ही तरह गुंज की माला धारण करें। कृष्ण की ही तरह पीले वस्त्र धारण करके हाथ में लाठी लेकर ग्वालों के साथ वन में गाय चराते हुए घूमें।
प्रश्न 5 – आपके विचार से कवि पशु, पक्षी और पहाड़ के रूप में भी कृष्ण का सान्निध्य क्यों प्राप्त करना चाहता है?
उत्तर– हमारे विचार से कवि पशु, पक्षी और पहाड़ के रूप में भी कृष्ण का सान्निध्य इसलिए प्राप्त करना चाहता है क्योंकि इन सबके साथ श्रीकृष्ण का जुड़ाव किसी न किसी रूप में रहा था। कवि कृष्ण का अनन्य भक्त है। वे उन सभी वस्तुओं के समीप रहना चाहते हैं जिनका सम्बन्ध किसी न किसी रूप में कृष्ण से रहा है।
प्रश्न 6 – चौथे सवैये के अनुसार गोपियाँ अपने आप को क्यों विवश पाती हैं?
उत्तर – चौथे सवैये के अनुसार गोपियाँ अपने आपको इसलिए विवश पाती हैं क्योंकि श्रीकृष्ण की मुसकान अत्यंत आकर्षक व् मनमोहक है। इस मुसकान के आकर्षण से बच पाना उनके लिए कठिन हो जाता है। वे पूरी कोशिश करती है कि वे न तो कृष्ण की बाँसुरी की धुन सुने और न ही उनके वश में रहें। परन्तु कृष्ण कि मोहक मुसकान के कारण वे अपने तन-मन पर अपना नियंत्रण नहीं रख पाती है।
प्रश्न 7 – भाव स्पष्ट कीजिए-
(क) कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं।
(ख) माइ री वा मुख की मुसकानि सम्हारी न जैहै, न जैहै, न जैहै।
उत्तर – (क) रसखान ब्रजभूमि से इतना प्रेम करते हैं कि वे ब्रजभूमि की काँटेदार झाड़ियों के लिए करोड़ों महलों के सुखों को भी न्योछावर करने को तैयार हैं। भाव यह है कि वे महलों की सुख-सुविधा त्यागकर भी उस ब्रजभूमि पर रहना पसंद करते हैं। चाहे इससे उन्हें कितना भी कष्ट पहुंचे।
(ख) गोपी कृष्ण की मधुर-मोहिनी मुसकान से बचने की पूरी कोशिश करती है परन्तु कृष्ण की मुस्कान इतनी मोहक है कि उससे कृष्ण की मोहकता झेली नहीं जाती। वह पूरी तरह उस पर समर्पित हो गई है।
प्रश्न 8 – ‘कालिंदी कुल कदंब की डारन’ में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर-‘कालिंदी कूल कदंब की डारन’ में ‘क’ वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है।
प्रश्न 9 – काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए
या मुरली मुरलीधर की अधरा न धरी अधरा न धरौंगी।।
उत्तर– इसमें यमक अलंकार है। ‘मुरली मुरलीधर’ में सभंग यमक है। ‘अधरान’ धरी ‘अधरा न’ में भी सभंग यमक है।
अधरान – अधरों पर
अधरा न – अधरों पर नहीं।
अनुप्रास अलंकार भी है।
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