( यहाँ NCERT की कक्षा 9वीं की हिंदी की पाठ्य पुस्तक 'क्षतिज भाग 1' में संकलित 'वाख ( ललद्यद ) ' अध्याय के मूल पाठ तथा अभ्यास के प्रश्नों को दिया गया है | )
(1)
रस्सी कच्चे धागे की, खींच रही मैं नाव।
जाने कब सुन मेरी पुकार, करें देव भवसागर पार।
पानी टपके कच्चे सकोरे, व्यर्थ प्रयास हो रहे मेरे।
जी में उठती रह-रह हूक, घर जाने की चाह है घेरे।।
शब्दार्थ-
वाख – वाणी, यह चार पंक्तियों में बद्ध कश्मीरी शैली की गेय रचना है।
रस्सी कच्चे धागे की – कमज़ोर सहारे
कच्चे सकोरे – स्वाभाविक रूप से कमज़ोर
नाव – जीवन रूपी नाव
हूक- तड़प
चाह- इच्छा।
भावार्थ- इन पंक्तियों में कवयित्री ने मानव जीवन के नष्ट होने और ईश्वर-प्राप्ति की तीव्र आकांक्षा को व्यक्त किया है। वह कहती हैं कि उनका जीवन एक नाव की तरह है, जिसे वह सांसों की कच्ची और कमजोर रस्सी के सहारे खींच रही हैं। यह दर्शाता है कि जीवन कितना नाजुक और अस्थिर है। कवयित्री ईश्वर से प्रार्थना करती हैं कि वह उनकी पुकार सुनें और संसाररूपी भवसागर को पार करा दें।
वह यह भी महसूस करती हैं कि उनका शरीर कच्ची मिट्टी से बने सकोरे (मटके) की तरह है, जिससे पानी टपक-टपक कर कम होता जा रहा है। इसका अर्थ यह है कि समय धीरे-धीरे बीत रहा है और उनके प्रयास व्यर्थ जा रहे हैं। इस असफलता के कारण उनकी आत्मा में व्याकुलता बढ़ती जा रही है, और बार-बार यह तड़प उठती है कि वह अपने असली घर, अर्थात् परमात्मा के पास जल्द ही पहुँच जाएँ।
(2)
खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं,
न खाकर बनेगा अहंकारी।
सम खा तभी होगा समभावी,
खुलेगी साँकल बंद द्वार की।
शब्दार्थ-
सम (शम) – अंत:करण तथा बाह्य-इंद्रियों का निग्रह
समभावी – समानता की भावना
खुलेगी साँकल बंद द्वार की – चेतना व्यापक होगी, मन मुक्त होगा
भावार्थ- प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री ने भोग-विलास और त्याग के चरम पर जाकर मनुष्य के जीवन के सही मार्ग को उजागर किया है। वह कहती हैं कि यदि कोई व्यक्ति केवल भोग-विलास में लिप्त रहता है, तो उसे जीवन में कुछ भी स्थायी रूप से प्राप्त नहीं होगा। सांसारिक सुख-सुविधाएँ उसे कभी संतुष्टि नहीं दे पाएंगी। वहीं, यदि कोई व्यक्ति सब कुछ त्यागकर तपस्या करता है, तो वह अहंकार से भर सकता है, जो ईश्वर-प्राप्ति की राह में सबसे बड़ा बाधक है।
कवयित्री यह समझाती हैं कि भोग और त्याग के बीच मध्य मार्ग अपनाना ही सही राह है। जब व्यक्ति सुख-दुःख, भोग-त्याग, लाभ-हानि जैसी स्थितियों से ऊपर उठकर समभाव (संतुलन) अपनाता है, तब उसकी चेतना में शुद्धता आती है। यही समभाव ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग है, और इसी से जीवन के बंद द्वार (आध्यात्मिक ज्ञान और ईश्वर-प्राप्ति का द्वार) खुलते हैं। इस प्रकार, जीवन में संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ा आध्यात्मिक गुण है।
(3)
आई सीधी राह से, गई न सीधी राह।
सुषुम-सेतु पर खड़ी थी, बीत गया दिन आह!
जेब टटोली, कौड़ी न पाई।
माझी को दूँ, क्या उतराई ?
शब्दार्थ-
गई न सीधी राह – जीवन में सांसारिक छ्ल-छद्मों के रास्ते पर चल रही
सुषुम-सेतु – सुषुम्ना नाड़ी रूपी पुल, हठयोग में शरीर की तीन प्रधान नाड़ियों में से एक नाड़ी (सुषुम्ना), जो नासिक के मध्य भाग (ब्रह्मरंध्र) में स्थित है।
जेब टटोली – आत्मालोचन किया
कौड़ी न पाई – कुछ प्राप्त न हुआ
माझी – ईश्वर, गुरु, नाविक
उतराई – सद्कर्म रूपी मेहताना
भावार्थ- प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री ने गहरे आत्मनिरीक्षण और पश्चाताप को व्यक्त किया है। वह कहती हैं कि जब वह संसार में आईं, तो उनका मार्ग सीधा और स्पष्ट था, अर्थात् वह ईश्वर-प्राप्ति की सच्ची राह पर थीं। लेकिन संसार की मोहमाया और भौतिक इच्छाओं के चक्कर में पड़कर वह अपने मार्ग से भटक गईं।
वह कहती हैं कि उन्होंने जीवनभर साधना और आध्यात्मिक प्रयास किए, लेकिन इन प्रयासों में स्थिरता या सही दिशा की कमी रही। सुषुम-सेतु (सुषुम्ना नाड़ी, जो योग और कुंडलिनी जागरण का मार्ग है) पर खड़ी रहीं, लेकिन समय बीतता गया, और अब मृत्यु का समय भी पास है।
जब वह अपने बिताए हुए जीवन को देखती हैं, तो उन्हें महसूस होता है कि उनके पास पुण्यकर्म (आध्यात्मिक पूंजी) नहीं है। अब जब वह भवसागर पार कराने वाले माझी (ईश्वर) के सामने खड़ी हैं, तो उनके पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है। यह स्थिति उनके मन में गहरे पछतावे और असंतोष को जन्म देती है।
(4)
थल-थल में बसता है शिव ही,
भेद न कर क्या हिंदू-मुसलमां।
ज्ञानी है तो स्वयं को जान,
वही है साहिब से पहचान।
शब्दार्थ-
थल-थल – सर्वत्र
शिव – ईश्वर
साहिब – स्वामी, ईश्वर
भावार्थ- प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री ने ईश्वर के सर्वव्यापक स्वरूप और मानवता के लिए एकता का संदेश दिया है। वह कहती हैं कि शिव (ईश्वर) हर स्थान पर मौजूद हैं, चाहे वह जड़ (हमारा शरीर है, जो नश्वर है) हो या चेतन (हमारी आत्मा है)। इसका अर्थ है कि ईश्वर कण-कण में व्याप्त हैं और हर जगह उनका वास है। वह मनुष्य को जाति और धर्म के भेदभाव से ऊपर उठने का संदेश देती हैं। हिंदू-मुसलमान के आधार पर खुद को अलग-अलग मानना, ईश्वर की व्यापकता को न समझ पाने का प्रतीक है। ईश्वर को जानने के लिए यह आवश्यक है कि पहले मनुष्य खुद को पहचाने।
कवयित्री का यह कहना है कि आत्मा में ही परमात्मा का निवास है। जब व्यक्ति आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है, तब उसे परमात्मा का सच्चा ज्ञान हो जाता है। आत्मा को समझने और पहचानने के बाद ही ईश्वर को समझा जा सकता है।
अभ्यास के प्रश्न
प्रश्न 1 कवयित्री द्वारा मुक्ति के लिए किए जाने वाले प्रयास व्यर्थ क्यों जा रहे हैं?
उत्तर – कवयित्री के परिपक्व प्रयास नहीं हैं। उसके कच्चे, अधूरे प्रयास हैं। जैसे मिट्टी के कच्चे सकोरे से पानी टपकता है वैसे ही उनके कच्चे प्रयासों से मुक्ति नहीं मिल पा रही है। साधना के द्वारा ठोस प्रयत्नों से मुक्ति मिलना सम्भव है।
प्रश्न 2. कवयित्री का ‘घर जाने की चाह’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर – घर जाने की चाह का तात्पर्य है कि कवयित्री इस संसार सागर से मुक्त होकर परमात्मा से मिलने की इच्छुक हैं। वे ईश्वर से साक्षात्कार करने के लिए आतुर हैं।
प्रश्न 3. भाव स्पष्ट कीजिए –
(क) जेब टटोली कौड़ी न पाई।
उत्तर – सामान्यतः रुपये पैसे जेब में रखे जाते हैं वैसे ही जीवात्मा द्वारा किए गए सद्कर्मो का संचय होता है। जब जीवात्मा के सद्कर्म होते हैं तो उसे संसार के कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। कवयित्री कहती हैं कि जब जीवात्मा ने अपने कर्मों को झाँककर देखा तो उसके द्वारा किया गया एक भी श्रेष्ठ कर्म नहीं मिला। इसलिए बिना सद्कर्मों के मुक्ति मिलन असम्भव है। उसकी सद्कर्मों की जेब खाली थी।
(ख) खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं।
न खाकर बनेगा अहंकारी॥
उत्तर – यहाँ जीवात्मा को सचेत किया गया है कि यदि खाने में ही जीवन गँवा दिया तो कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। और यदि खाना पूरी तरह बन्द कर दिया तो निराहारी होने का अहंकार तुझमें भर जाएगा। ये दोनों ही स्थितियाँ अच्छी नहीं हैं। इन दोनों ही आडम्बरों से कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। इसलिए जीव जब संयम के द्वारा सम-भाव वाला हो जाएगा तब माया के बन्धनों से मन छूटेगा तथा मोक्ष प्राप्त कर पाएगा।
प्रश्न 4. बन्द द्वार की सांकल खोलने के लिए ललद्यद ने क्या उपाय सुझाया है?
उत्तर – कवयित्री मानती हैं कि हर जीव में ईश्वर विद्यमान है। अहंकार, स्वार्थ आदि मायावी अंधकार के कारण जीव उनके दर्शन कर पाता है। जब भी मायावी अंधकार पर विजय प्राप्त कर लेगा ज्ञानी होकर अज्ञान को दूर भगा देगा, तब उसमें सभी प्राणियों के प्रति समभाव हो जाएगा। उसके बाद उसके अंतःकरण के बन्द दरवाजे की सांकल खुल जाएगी। उसका मन ईश्वर भक्ति में रम जाएगा। इस तरह कवयित्री ने समभावी होने का उपाय सुझाया है जिससे बंद दरवाजे की सांकल खुलेगी।
प्रश्न 5. ‘ज्ञानी’ से कवयित्री का क्या अभिप्राय है?
उत्तर – ज्ञानी वह होता है जो आत्मा में झाँककर ईश्वर का साक्षात्कार कर सके। संसार के प्रत्येक जीव में परमात्मा व्याप्त हैं। अज्ञान के अंधकार के कारण जीव उनका साक्षात्कार नहीं कर पाता है। जब जीव का अज्ञान मिट जाता है तो ज्ञानवान हो जाता है और आत्मावलोकन कर ईश्वर से साक्षात्कार कर लेता है। इस प्रकार कवयित्री ने अज्ञान से मुक्त जीव को ज्ञानी माना है जिसे आत्मा में परमात्मा के दर्शन हो जाते हैं।
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