यमराज की दिशा ( चंद्रकांत देवताले )/ Yamraj Ki Disha ( Chandrakant Devtale )

( यहाँ NCERT की कक्षा 9वीं की हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘क्षतिज भाग 1’ में संकलित ‘यमराज की दिशा (चंद्रकांत देवताले) ‘ अध्याय के मूल पाठ, व्याख्या तथा अभ्यास के प्रश्नों को दिया गया है | )

(1)

माँ की ईश्वर से मुलाकात हुई या नहीं
कहना मुश्किल है
पर वह जताती थीं जैसे
ईश्वर से उसकी बातचीत होती रहती है
और उससे प्राप्त सलाहों के अनुसार
जिंदगी जीने और दुख बरदाश्त करने के
रास्ते खोज लेती है।

व्याख्या – कवि कहते हैं कि यह कहना कठिन है कि मेरी माँ ईश्वर से कभी मिली थीं या नहीं। लेकिन वे दिखाती थीं कि ईश्वर से उनका वार्तालाप होता रहता है। वे उन्हीं की सलाह के अनुसार जीवन बिताने और कष्ट को झेलने के मार्ग तलाश लेती थीं। इससे लगता है कि ईश्वर पर उनका गहरा विश्वास था।

(2)

माँ ने एक बार मुझसे कहा था
दक्षिण की तरफ पैर करके मत सोना
यह मृत्यु की दिशा है
और यमराज को क्रुद्ध करना
बुद्धिमानी की बात नहीं
तब मैं छोटा था
और मैंने यमराज के घर का पता पूछा था
उसने बताया था
तुम जहाँ भी हो वहाँ से हमेशा दक्षिण में

व्याख्या – कवि कहते हैं कि एक बार माँ ने मुझसे कहा था कि तुम दक्षिण दिशा की ओर पैर करके कभी मत सोना, क्योंकि यह मृत्यु की दिशा है साथ ही बताया था कि दक्षिण दिशा की ओर पैर करके सोकर मृत्यु के देव यमराज को क्रोधित करना समझदारी की बात नहीं है।
जिस समय माँ ने मुझसे यह बात कही थी, उस समय मैं छोटा था। मैंने बाल स्वभाव से यमराज के घर का पता पूछ लिया था। उस समय माँ ने मुझे बताया था कि जहाँ भी हो ठीक उसके दक्षिण में यमराज रहते हैं।

(3)

मैं दक्षिण में दूर-दूर तक गया
और मुझे हमेशा माँ याद आई
दक्षिण को लाँघ लेना सम्भव नहीं था
होता छोर तक पहुँच पाना
तो यमराज का घर देख लेता

व्याख्या – कवि कहते हैं कि दक्षिण दिशा में दूर-दूर तक जाने के अवसर मुझे मिले और जब भी दक्षिण में गया तब मुझे माँ की याद आती रही। दक्षिण दिशा को पार करना असम्भव था। यदि दक्षिण के अन्तिम किनारे तक पहुँच पाना सम्भव होता तो मैं यमराज का निवास देख लेता। परन्तु यह असम्भव ही रहा, मैं यमराज का घर नहीं देख पाया।

(4)

पर आज जिधर भी पैर करके सोओ
वही दक्षिण दिशा हो जाती है।
सभी दिशाओं में यमराज के आलीशान महल हैं
और वे सभी में एक साथ
अपनी दहकती आँखों सहित विराजते हैं
माँ अब नहीं है
और यमराज की दिशा भी बह नहीं रही
जो माँ जानती थी।

व्याख्या – कवि कहते हैं कि आज मात्र दक्षिण दिशा ही नहीं, सभी दिशाओं में यमराज का निवास है। जिस भी दिशा में पैर करके सो जाओ वही दक्षिण दिशा हो जाती है। सभी दिशाओं में यमराज के विशाल महल मौजूद हैं और उन सभी महलों में यमराज अपनी ज्वाला की तरह धधकती आँखों को फैलाए मौजूद हैं। वे विध्वंश, विनाश के लिए आतुर हैं।
कवि कहते हैं कि दक्षिण में यमराज का घर बताने वाली माँ आज नहीं रहीं और यमराज की दिशा भी अब मात्र दक्षिण नहीं है जिसे माँ जानती थी। आज तो सभी दिशाओं में यमराज के महल मौजूद हैं।

अभ्यास के प्रश्न

(यमराज की दिशा : चंद्रकांत देवताले )

प्रश्न 1 – कवि को दक्षिण दिशा पहचानने में कभी मुश्किल क्यों नहीं हुई?

उत्तर – माँ के बार-बार समझाने अर्थात् बचपन से मिले गहरे संस्कारों के कारण कवि को दक्षिण दिशा पहचानने में कभी मुश्किल नहीं हुई।

प्रश्न 2 — कवि ने ऐसा क्यों कहा कि दक्षिण को लाँघ लेना संभव नहीं था?

उत्तर- दक्षिण दिशा का कोई ओर-छोर नहीं है। वह अनंत है। इसलिए उसे लाँघ लेना संभव नहीं था। प्रतीकार्थ यह है कि शोषण-व्यवस्था का कोई निश्चित स्वरूप नहीं होता। यह मनोभावना नए-नए रूप धारण करती रहती है और अमर रहती है। इसलिए कोई हमेशा-हमेशा के लिए इससे मुक्त नहीं हो सकता।

प्रश्न 3 कवि के अनुसार आज हर दिशा दक्षिण दिशा क्यों हो गई है?

उत्तर- कवि के अनुसार, दक्षिण दिशा दक्षिणपंथी विचारधारा या पूँजीवादी विचारधारा की प्रतीक है। यह विचारधारा पूँजीवादियों और शोषकों को बढ़ावा देती है। कवि को आज की स्थितियाँ देखकर लगता है कि आज सब ओर पूँजीवादी शोषकों का बोलबाला हो गया है। जहाँ भी देखें, वहीं आम मनुष्य का शोषण हो रहा है।

प्रश्न 4 भाव स्पष्ट कीजिए-
सभी दिशाओं में यमराज के आलीशान महल हैं।
और वे सभी में एक साथ
अपनी दहकती आँखों सहित विराजते हैं।

उत्तर- कवि कहता है कि शोषण करने वाले लोग यमराज की भाँति क्रूर हैं। वे सर्वत्र ठाठ-बाट से निवास करते हैं। सब जगह उनका एक-सा हाल है। वे क्रोध, घृणा और क्रूरता से भरे हुए हैं। वे सबके साथ कठोरता से पेश आते हैं।

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