कैदी और कोकिल ( माखनलाल चतुर्वेदी ) कक्षा 9

( यहाँ NCERT की कक्षा 9वीं की हिंदी की पाठ्य पुस्तक 'क्षतिज भाग 1' में संकलित 'कैदी और कोकिल ( माखनलाल चतुर्वेदी )' अध्याय के मूल पाठ, व्याख्या तथा अभ्यास के प्रश्नों को दिया गया है | )

(1)

क्या गाती हो?
क्यों रह-रह जाती हो?
कोकिल बोलो तो!
क्या लाती हो?
संदेशा किसका है?
कोकिल बोलो तो!

ऊँची काली दीवारों के घेरे में,
डाकू, चोरों, बटमारों के डेरे में,
जीने को देते नहीं पेट-भर खाना,
मरने भी देते नहीं, तड़प रह जाना!
जीवन पर अब दिन-रात कड़ा पहरा है,
शासन है, या तम का प्रभाव गहरा है?
हिमकर निराश कर चला रात भी काली,
इस समय कालिमामयी जगी क्यूँ आली?

शब्दार्थ-
कोकिल- कोयल (यहाँ क्रांति का प्रतीक)
बटमार – रास्ते में यात्रियों को लूटने वाला
तम- अन्धकार
हिमकर – चंद्रमा
कालिमामयी- काली
आली- सखी

व्याख्या- कवि आधी रात में कोयल की आवाज़ सुनकर चौंक उठता है और बेचैनी से उससे पूछता है कि वह बार-बार क्यों गा रही है और उसके इस गीत का क्या अर्थ है। वह जानना चाहता है कि क्या उसमें कोई संदेश या विशेष प्रेरणा छिपी है और यदि ऐसा है, तो वह संदेश किसका है। अंत में, वह कोयल से आग्रह करता है कि वह स्पष्ट रूप से इस बात को बताए।

इसके बाद कवि अपने कारागार की दयनीय स्थिति का वर्णन करता है। वह कहता है कि वह जिस स्थान पर कैद है, वह मनुष्य के जीने योग्य नहीं है। वहाँ की दीवारें ऊँची और भयानक रूप से काली हैं। चारों ओर अपराधियों, चोरों और डाकुओं का बसेरा है। जेल में कैदियों को जीने लायक भोजन भी नहीं मिलता, भरपेट भोजन की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। भूख और अत्याचार से मन और शरीर तड़पकर रह जाता है। अंग्रेज सिपाही न तो मरने देते हैं और न ही ठीक से जीने देते हैं। हर ओर कड़ा पहरा है, जिससे मुक्ति की कोई आशा नहीं बची है। कवि सोचता है कि चारों ओर जो गहरा अंधकार फैला है, वह केवल रात का अंधेरा है या फिर अंग्रेजी शासन का कष्टदायक प्रभाव, जिसने सब कुछ निराशा में डुबो दिया है। उसे लगता है कि यह अंधकार इतना गहरा है कि आशा रूपी चंद्रमा भी हारकर अपना प्रकाश खो चुका है। अंत में, वह कोयल से पूछता है कि इस घोर अंधकार और निराशा के समय में वह क्यों जाग रही है और क्या वह कोई महत्वपूर्ण संदेश देना चाहती है।

(2)


क्यों हूक पड़ी ?
वेदना बोझ वाली-सी;
कोकिल बोलो तो!
क्या लूटा?
मृदुल वैभव की
रखवाली-सी,
कोकिल बोलो तो!

क्या हुई बावली?
अर्द्धरात्रि को चीखी,
कोकिल बोलो तो!
किस दावानल की
ज्वालाएँ हैं दीखीं?
कोकिल बोलो तो!

शब्दार्थ-
हूक- कसक युक्त आवाज़
वेदना- पीड़ा
मृदुल- कोमल
वैभव- समृद्धि
बावली- पगली
अर्द्धरात्रि- आधी रात
दावानल – जंगल की आग
ज्वालाएँ- आग की लपटें

व्याख्या- कवि कोयल की पीड़ा भरी आवाज़ सुनकर चौंक जाता है और उससे प्रश्न करता है कि उसकी तान में इतना दुःख क्यों झलक रहा है। वह पूछता है कि यह कैसी हूक (गहरी पीड़ा) है जो उसकी कूक में सुनाई दे रही है। क्या कोई भारी दुःख या संकट उस पर आ पड़ा है? कवि कोयल से आग्रह करता है कि वह बताए कि आखिर ऐसा क्या हुआ है जिससे उसकी आवाज़ इतनी दर्द भरी हो गई है। इसके बाद, कवि कोयल से पूछता है कि क्या उसका कोई बहुमूल्य सुख या संपत्ति लुट गई है, जिसके कारण वह इतनी बेचैन हो उठी है? क्या वह अपनी मधुरता और वैभव की रखवाली नहीं कर पाई और अब उस अपार दुःख को व्यक्त कर रही है? कोयल, जो अपनी कोमल और मधुर तान के लिए जानी जाती है, अचानक इतनी दुखी क्यों हो गई?

फिर कवि आश्चर्यचकित होकर पूछता है कि कोयल अचानक इतनी बावली (पागल सी) क्यों हो गई? आधी रात के इस सन्नाटे में वह इतनी जोर से क्यों चीख रही है? क्या उसने किसी भयंकर संकट या विनाश को देख लिया है? क्या उसे किसी जंगल की आग की भयंकर लपटें दिख रही हैं? अंत में, कवि फिर से कोयल से आग्रह करता है कि वह स्पष्ट रूप से बताए कि उसकी इस पीड़ा और व्याकुलता का कारण क्या है।

(3)

क्या?- देख न सकती जंजीरों का गहना?
हथकड़ियाँ क्यों? यह ब्रिटिश-राज का गहना,
कोल्हू का चर्रक चूँ?-जीवन की तान,
गिट्टी पर अँगुलियों ने लिखे गान!
हूँ मोट खींचता लगा पेट पर जूआ,
खाली करता हूँ ब्रिटिश अकड़ का कूँआ।
दिन में करुणा क्यों जगे, रुलानेवाली,
इसलिए रात में गज़ब ढा रही आली?

इस शांत समय में,
अंधकार को बेध, रो रही क्यों हो?
कोकिल बोलो तो!
चुपचाप, मधुर विद्रोह-बीज
इस भाँति बो रही क्यों हो?
कोकिल बोलो तो।

शब्दार्थ-
जंजीर – बेड़ियाँ
गहना – आभूषण
हथकड़ी – हाथ में पहनाई जाने वाली जंजीर
कोल्हू – बैलों द्वारा चलाया जाने वाला तेल निकालने का यंत्र
चर्रक-चूँ – कोल्हू की आवाज़
तान – संगीत की धुन
गिट्टी – छोटे पत्थर
अँगुली – हाथ की उंगली
मोट – पुर चरसा (चमड़े का डोल जिससे कुँए आदि से पानी निकाला जाता है।)
जूआ (जुआ) – बैलों के कंधों पर रखी जाने वाली लकड़ी
अकड़ – घमंड, अभिमान
कूँआ – कुआँ ( यहाँ शोषण का प्रतीक)
करुणा – दया, संवेदना
गज़ब ढाना – अत्याचार करना
आली – रानी, शासक वर्ग
अंधकार – अँधेरा, अज्ञान
बेध – चीरना, पार करना
मधुर विद्रोह-बीज – मीठे शब्दों में क्रांति का संदेश
भाँति – प्रकार, तरीके

व्याख्या- कवि कोयल से पूछता है कि क्या वह रात में रोकर यह जताना चाहती है कि उसे हमारी ये बेड़ियाँ पसंद नहीं हैं? अगर वह इन जंजीरों को दुख और बंधन का प्रतीक मान रही है, तो उसे समझना चाहिए कि ये बेड़ियाँ हमारे लिए गुलामी का प्रतीक नहीं, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ हमारे संघर्ष का सम्मान हैं। हमने इन्हें खुशी-खुशी स्वीकार किया है, क्योंकि ये स्वतंत्रता सेनानियों के लिए गहनों की तरह हैं। हमें गर्व है कि हम जेल में रहकर भी अपने लक्ष्य से नहीं हटे। कवि आगे कहता है कि जेल में कोल्हू की चरमराती आवाज़ अब हमारे लिए संगीत बन चुकी है। हम पत्थरों को तोड़ते हुए अपने हाथों से आज़ादी का गीत लिख रहे हैं। जिस तरह हम कठोर पत्थरों को टुकड़ों में बदल देते हैं, उसी तरह हम एक दिन ब्रिटिश शासन को भी नष्ट कर देंगे। मैं अपने शरीर पर भारी बोझ लिए कोल्हू चला रहा हूँ, लेकिन असल में मैं ब्रिटिश शासन के अहंकार को धीरे-धीरे खत्म कर रहा हूँ। इसके बाद, कवि कोयल के गाने का अर्थ समझ जाता है। वह कहता है कि दिन में जब हम संघर्ष और यातनाओं में डूबे होते हैं, तब हम तुम्हारी मधुर आवाज़ नहीं सुन पाते। लेकिन अब समझ आया कि रात में जब चारों ओर शांति है, तब तुम हमारी पीड़ा को कम करने और हमें हिम्मत देने आई हो। कवि कोयल से पूछता है कि क्या उसकी ध्वनि सिर्फ एक सामान्य गीत है, या वह सच में हमारे भीतर विद्रोह की आग जगा रही है? क्या वह हमें संघर्ष और स्वतंत्रता के लिए प्रेरित कर रही है? कवि व्याकुलता से कोयल से उत्तर माँगता है—”कोयल, बोलो तो!”

(4)

काली तू, रजनी भी काली,
शासन की करनी भी काली,
काली लहर कल्पना काली,
मेरी काल कोठरी काली,
टोपी काली, कमली काली,
मेरी लौह-शृंखला काली,
पहरे की हुंकृति की ब्याली,
तिस पर है गाली, ऐ आली!

इस काले संकट-सागर पर
मरने की, मदमाती!
कोकिल बोलो तो!
अपने चमकीले गीतों को
क्योंकर हो तैराती!
कोकिल बोलो तो!

शब्दार्थ-
काली – काला रंग
रजनी – रात
शासन – सरकार, सत्ता
करनी – कर्म, कार्य
लहर – तरंग
कल्पना – विचार
काल कोठरी – अंधकारमय कारागार
कमली – ऊनी चादर
लौह-शृंखला – लोहे की जंजीरें, बेड़ियाँ
हुंकृति – हुँकार
ब्याली – सर्पिणी
गाली – अपमानजनक शब्द
संकट-सागर – कठनाईयों से भरा जीवन
मरने की, मदमाती – मौत को गले लगाने की चाहत
चमकीले गीत – क्रांति के प्रेरणादायक शब्द
तैराना – बहाना, फैलाना

व्याख्या- कवि कोयल से कहता है—”हे कोयल! तुम्हारा रंग काला है, आज की रात भी घनी काली है और ब्रिटिश शासन के अत्याचार भी उतने ही काले हैं।” मैं इस कारागार में चोरों और डाकुओं के बीच कैद हूँ, जिससे मेरे मन में भी भयावह और अंधकारमयी विचार उठ रहे हैं। मेरी जेल की कोठरी भी अंधेरे से भरी हुई है। मुझे जो कंबल ओढ़ने के लिए मिला है, वह भी काला है, और जो टोपी पहनने को दी गई है, वह भी काली है। मेरी बेड़ियाँ, जिससे मुझे बाँधकर रखा गया है, वे भी लोहे की काली जंजीरें हैं। इस अंधकारमय माहौल में, रात के समय पहरेदार की कठोर आवाज़ मुझे किसी जहरीले सर्प की फुफकार की तरह चुभती है। इसके अलावा, मुझे जेल के सिपाहियों की गालियाँ भी सहनी पड़ती हैं। यहाँ जीवन पूरी तरह से अशांत और तकलीफ़ से भरा हुआ है। “हे सखी कोयल! तुम इस जेल के इस घुटन भरे माहौल में क्यों चली आई हो? क्या तुम्हें यह एहसास नहीं कि यहाँ तुम्हारे प्राण भी सुरक्षित नहीं हैं?” तुम अपने मधुर स्वर से आनंद और आशा का संदेश देना चाहती हो, लेकिन इस जेल की कठोर दीवारों के बीच, यह स्वर फालतू चला जाएगा। यहाँ निराशा और पीड़ा के बीच, तुम्हारे गीतों का कोई असर नहीं होगा। इस अंधेरी रात में, इस कारागार में, तुम अपने मधुर स्वर से क्यों गा रही हो? “हे कोयल! मुझे अपने मुख से बताओ, तुम यहाँ क्यों आई हो? तुम्हारी इस पीड़ा भरी पुकार का क्या अर्थ है?”


(5)

तुझे मिली हरियाली डाली,
मुझे नसीब कोठरी काली!
तेरा नभ-भर में संचार
मेरा दस फुट का संसार!
तेरे गीत कहावें वाह,
रोना भी है मुझे गुनाह!
देख विषमता तेरी-मेरी,
बजा रही तिस पर रणभेरी!

इस हुंकृति पर,
अपनी कृति से और कहो क्या कर दूँ?
कोकिल बोलो तो!
मोहन के व्रत पर,
प्राणों के आसव किसमें भर दूँ!
कोकिल बोलो तो!

शब्दार्थ-

कोठरी काली – अंधेरी जेल
नभ – आकाश
संचार – गति, स्वतंत्रता
दस फुट का संसार – जेल की छोटी सी कोठरी
गुनाह – अपराध
विषमता – असमानता, भेदभाव
रणभेरी – युद्ध का बिगुल, संघर्ष का आह्वान
कृति – कार्य, कर्म
मोहन – मोहनदास करमचंद गाँधी
व्रत – संकल्प
प्राणों के आसव – जीवन का सार, आत्मा
भर दूँ – समर्पित कर दूँ

व्याख्या- कवि कोयल से कहता है—”हे कोयल! तू कितनी भाग्यशाली है कि तुझे बैठने के लिए हरी-भरी डालियाँ मिली हैं, लेकिन मैं इस अंधेरी, घुटनभरी जेल की कोठरी में कैद हूँ।” तुझे उड़ने के लिए खुला आसमान मिला है, पर मैं इस दस फुट की संकरी कोठरी से बाहर भी नहीं निकल सकता। “जब तू गाती है, तो लोग आनंद से वाह-वाह करते हैं, लेकिन मेरा रोना भी किसी को पसंद नहीं आता। मेरी पीड़ा को कोई सुनना तक नहीं चाहता।” तू स्वतंत्र है, खुले आकाश में रहती है, और मैं परतंत्र हूँ, इस जेल का कैदी हूँ। “इतना सब कुछ जानने के बाद भी, तू इस अंधेरी रात में युद्ध और स्वतंत्रता का गीत गा रही है। बता, मैं क्या करूँ? मेरी विवशता को तू भी समझ रही है।” सोच, मैं इस कैद में रहकर कर भी क्या सकता हूँ? हाँ, तेरी प्रेरणा से मैं यहाँ बैठकर कविताएँ तो लिख ही रहा हूँ। “अब तू ही बता, मैं और क्या करूँ? किस दिशा में अपनी शक्ति लगाऊँ ताकि गांधीजी के स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान दे सकूँ?” हे कोयल! तू ही मेरा मार्गदर्शन कर, मुझे बता !

अभ्यास के प्रश्न

(कैदी और कोकिल : माखनलाल चतुर्वेदी )

प्रश्न 1. कोयल की कूक सुनकर कवि की क्या प्रतिक्रिया थी?
उत्तर-
 कवि कोयल की कूक सुनकर बेचैन हो उठता है। वह आश्चर्यचकित होकर कोयल से पूछता है कि वह बार-बार क्यों गा रही है और उसकी इस कूक का क्या अर्थ है। कवि को ऐसा प्रतीत होता है कि कोयल कोई विशेष संदेश या प्रेरणा दे रही है। वह कोयल से आग्रह करता है कि वह स्पष्ट रूप से बताए कि उसकी कूक में कौन-सा संदेश छिपा है। कवि कोयल की पीड़ा भरी आवाज़ सुनकर महसूस करता है कि उसमें किसी गहरे दुख या संघर्ष की झलक है। वह सोचता है कि कोयल की यह पुकार ब्रिटिश शासन के अत्याचारों के खिलाफ एक चेतावनी है और स्वतंत्रता संग्राम में कैदियों का मनोबल बढ़ाने के लिए है। कवि कहता है कि कोयल उसकी पीड़ा में सहभागी बनकर उसे साहस देने आई है, ताकि वह अपने संघर्ष में डटा रहे और स्वतंत्रता प्राप्ति के लक्ष्य से न हटे।

प्रश्न 2. कवि ने कोकिल के बोलने के किन कारणों की संभावना बताई?
उत्तर- 
कवि ने कोकिल के बोलने के कई संभावित कारण बताए हैं। वह कोकिल की रह-रहकर आने वाली कूक को सुनकर आश्चर्यचकित होता है और सोचता है कि वह क्यों गा रही है। उसे लगता है कि कोयल की आवाज़ में कोई गहरी पीड़ा या कसक छिपी हो सकती है, शायद उसे कोई बड़ा दुख हुआ है। कवि को कोयल की कूक में विद्रोह का संकेत भी सुनाई देता है, मानो वह अन्याय के खिलाफ आवाज उठा रही हो।
कवि यह भी सोचता है कि कहीं कोयल स्वतंत्रता संग्राम का संदेश तो नहीं फैला रही। इस प्रकार, कवि को कोयल की कूक में पीड़ा, विद्रोह, प्रेरणा और संघर्ष के संदेश की संभावना दिखती है।

प्रश्न 3. किस शासन की तुलना तम के प्रभाव से की गई है और क्यों?
उत्तर- 
कवि ने ब्रिटिश शासन की तुलना तम (अंधकार) के प्रभाव से की है। ब्रिटिश शासन को अंधकार के समान माना गया है क्योंकि उसने भारतीय जनता पर घोर अत्याचार और अन्याय किए, जिससे उनके जीवन में निराशा और दुख का अंधकार छा गया। यह शासन लोगों की स्वतंत्रता छीनकर उन्हें कारागारों में कैद कर रहा था, जहाँ न तो उन्हें जीने की उचित सुविधा दी जाती थी और न ही मरने का अवसर।
कवि को ऐसा प्रतीत होता है कि इस अत्याचारी शासन का प्रभाव इतना गहरा है कि आशा का प्रकाश, जिसे चंद्रमा के रूप में दर्शाया गया है, भी इसे दूर नहीं कर पा रहा है। इस प्रकार, ब्रिटिश शासन को तम के प्रभाव के समान मानकर, कवि ने उसकी क्रूरता और अत्याचारी नीतियों को उजागर किया है।

प्रश्न 4. कविता के आधार पर पराधीन भारत की जेलों में दी जाने वाली यंत्रणाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर- 
कविता के आधार पर पराधीन भारत की जेलों में दी जाने वाली यंत्रणाओं का वर्णन अत्यंत भयावह और अमानवीय रूप में किया गया है। ब्रिटिश शासन के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों और अन्य कैदियों को जेलों में बहुत ज्यादा कष्ट दिया जाता था, जो उनके शरीर और मन दोनों को तोड़ने के लिए बनाई गई थीं।
कैदियों को अंधेरी और सड़ी-गली कोठरियों में बंद कर दिया जाता था, जहाँ हवा और रोशनी का नाम तक नहीं था। वहाँ भूख और प्यास से तड़पते हुए उन्हें दिन-रात कठोर श्रम करने के लिए मजबूर किया जाता था। उनकी पीठ पर कोड़ों की मार पड़ती थी, जिससे उनके शरीर से खून बहता रहता था, लेकिन उन्हें कोई राहत नहीं मिलती थी।
इन जेलों में कैदियों को मानसिक रूप से भी प्रताड़ित किया जाता था। उन्हें अपमानित किया जाता, अमानवीय व्यवहार सहना पड़ता और उनके आत्म-सम्मान को कुचलने की कोशिश की जाती थी। जेलों में हर तरफ अत्याचार, चीख-पुकार और दर्द का माहौल था, जहाँ कैदी सिर्फ अपने शरीर की पीड़ा ही नहीं, बल्कि अपनी आत्मा को भी तड़पते हुए महसूस करते थे।
इस प्रकार, ब्रिटिश शासन की जेलें केवल कैद की जगह नहीं थीं, बल्कि वहाँ कैदियों को शारीरिक और मानसिक रूप से तोड़ने के लिए अत्याचार किया जाता था।

प्रश्न 5. भाव स्पष्ट कीजिए–
(क) मृदुल वैभव की रखवाली-सी, कोकिल बोलो तो!
(ख) हूँ मोट खींचता लगा पेट पर जूआ, खाली करता हूँ ब्रिटिश अकड़ का कूँआ।

(क) मृदुल वैभव की रखवाली-सी, कोकिल बोलो तो!
उत्तर- इस पंक्ति में कवि ने कोयल के मधुर स्वर की तुलना सौम्य और कोमल ऐश्वर्य (मृदुल वैभव) की रखवाली से की है।
इस पंक्ति के माध्यम से कवि कोयल से पूछता है कि क्या उसका कोई बहुमूल्य सुख या संपत्ति लुट गई है, जिसके कारण वह इतनी बेचैन हो उठी है? क्या वह अपनी मधुरता और वैभव की रखवाली नहीं कर पाई और अब उस अपार दुःख को व्यक्त कर रही है? कोयल, जो अपनी कोमल और मधुर तान के लिए जानी जाती है, अचानक इतनी दुखी क्यों हो गई?

(ख) हूँ मोट खींचता लगा पेट पर जूआ, खाली करता हूँ ब्रिटिश अकड़ का कूँआ।
उत्तर- इस पंक्ति में कवि ने भारतीय किसानों और श्रमिकों की दयनीय स्थिति का चित्रण किया है। “हूँ मोट खींचता लगा पेट पर जूआ” का अर्थ है कि कवि स्वयं को एक ऐसे बैल के रूप में देखता है, जो अपने पेट पर भारी जुआ (हल या भार) बांधकर कठिन श्रम कर रहा है। यह ब्रिटिश शासन के तहत भारतीय किसानों और मजदूरों के शोषण को दर्शाता है, जहाँ वे दिन-रात मेहनत करने के बावजूद गरीबी और भूखमरी का सामना कर रहे थे।
“खाली करता हूँ ब्रिटिश अकड़ का कूँआ” से तात्पर्य है कि भारतीय श्रमिक अपनी कड़ी मेहनत और परिश्रम से ब्रिटिश साम्राज्य की अकड़ और अहंकार को बनाए रखते हैं। अंग्रेजों की ऐश्वर्यपूर्ण जीवनशैली भारतीयों के खून-पसीने की कमाई पर निर्भर थी। इस प्रकार, यह पंक्ति ब्रिटिश शासन के शोषणकारी रवैये की ओर संकेत करती है, जहाँ भारतीयों की मेहनत से अंग्रेजों का ऐश्वर्य बढ़ता था, जबकि भारतीय खुद अत्यंत कष्ट सह रहे थे।

प्रश्न 6. अद्धरात्रि में कोयल की चीख से कवि को क्या अंदेशा है?
उत्तर- 
अर्द्धरात्रि में कोयल की चीख से कवि को यह अंदेशा होता है कि उसने किसी भयंकर संकट या विनाश को देख लिया है। कवि आश्चर्यचकित होकर पूछता है कि कोयल अचानक इतनी व्याकुल और बावली क्यों हो गई है। वह सोचता है कि क्या कोयल को जंगल में भयंकर आग की लपटें दिखाई दे रही हैं या वह किसी अनहोनी की पूर्व सूचना दे रही है। कवि को कोयल की पीड़ा और व्याकुलता असामान्य लगती है, इसलिए वह बार-बार उससे आग्रह करता है कि वह स्पष्ट रूप से बताए कि उसकी इस चीख का कारण क्या है।

प्रश्न 7. कवि को कोयल से ईर्ष्या क्यों हो रही है?
उत्तर- 
कवि को कोयल से ईर्ष्या इसलिए हो रही है क्योंकि कोयल स्वतंत्र होकर खुले आकाश में उड़ सकती है, हरी-भरी डालियों पर बैठ सकती है और अपनी मधुर वाणी में गा सकती है, जबकि कवि पराधीनता के कारण जेल की संकरी, घुटनभरी कोठरी में कैद है। कोयल का गाना लोगों को आनंदित करता है, जबकि कवि की पीड़ा को कोई सुनना तक नहीं चाहता। कोयल स्वतंत्रता का गीत गा रही है, जबकि कवि स्वयं परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। इसी कारण कवि को कोयल से ईर्ष्या हो रही है।

प्रश्न 8. कवि के स्मृति-पटल पर कोयल के गीतों की कौन सी मधुर स्मृतियाँ अंकित हैं, जिन्हें वह अब नष्ट करने पर तुली है?
उत्तर- 
कवि के स्मृति-पटल पर कोयल के गीतों की वे मधुर स्मृतियाँ अंकित हैं, जब वह स्वतंत्रता के वातावरण में कोयल के मधुर स्वर का आनंद लेता था।
लेकिन अब, जब कवि जेल की अंधेरी कोठरी में कैद है, कोयल की चीख उसे व्याकुल कर रही है। उसे लगता है कि कोयल अपने उस मधुर स्वर को छोड़कर अब कोई भयानक संदेश सुना रही है, जैसे वह किसी बड़े संकट की चेतावनी दे रही हो। इस प्रकार, कवि को लगता है कि कोयल स्वयं उसकी पुरानी सुखद स्मृतियों को नष्ट करने पर तुली है।

प्रश्न 9. हथकड़ियों को गहना क्यों कहा गया है?
उत्तर-
 कवि ने हथकड़ियों को “गहना” इसलिये कहा है क्योंकि वे स्वतंत्रता संग्राम में उनकी तपस्या और बलिदान का प्रतीक हैं। स्वतंत्रता सेनानियों के लिए जेल की यातनाएँ और हथकड़ियाँ किसी अभिशाप की तरह नहीं, बल्कि गर्व और सम्मान की चीज़ थीं। जिस प्रकार गहने व्यक्ति की शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार ये हथकड़ियाँ भी स्वतंत्रता के संघर्ष में उनके साहस और बलिदान की शोभा बढ़ा रही थीं।
इस प्रकार, कवि हथकड़ियों को गहनों के समान मानकर यह दर्शाता है कि वे अन्याय और परतंत्रता के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक हैं, जिन्हें पहनकर वे स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं।

प्रश्न 10. ‘काली तू ….. ऐ आली!’– इन पंक्तियों में ‘काली’ शब्द की आवृत्ति से उत्पन्न चमत्कार का विवेचन कीजिए।
उत्तर-
 “काली तू ….. ऐ आली!” इन पंक्तियों में ‘काली’ शब्द की आवृत्ति से कविता में गहरा प्रभाव उत्पन्न होता है। कवि ने ‘काली’ शब्द को बार-बार प्रयोग करके अंधकार, अन्याय और अत्याचार की भयावहता को प्रकट किया है। कोयल का काला रंग, घनी काली रात, ब्रिटिश शासन का काला स्वरूप, जेल का अंधकार, काले कंबल, काली टोपी और लोहे की काली जंजीरें—ये सभी चीजें परतंत्र भारत की पीड़ा और यातनाओं का प्रतीक बन जाती हैं।
यह शब्द अंधकारमय माहौल को और भी भयावह बना देता है और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतवासियों को मिलने वाली कठोर यातनाओं को उजागर करता है। 

प्रश्न 11. काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए–
 (क) किस दावानल की ज्वालाएँ हैं दीखीं?
(ख) तेरे गीत कहावें वाह, रोना भी है मुझे गुनाह!
देख विषमता तेरी-मेरी, बजा रही तिस पर रणभेरी!

(क) किस दावानल की ज्वालाएँ हैं दीखीं?
उत्तर- “किस दावानल की ज्वालाएँ हैं दीखीं?” पंक्ति में कवि ने प्रश्नवाचक शैली का प्रयोग किया है, जो पाठक के मन में जिज्ञासा और रहस्य उत्पन्न करती है। यह शैली कविता में प्रभाव और गहराई लाने का कार्य करती है।
इसके अलावा, इस पंक्ति में रूपक अलंकार का प्रयोग किया गया है। ‘दावानल’ केवल अग्नि को ही नहीं दर्शाता, बल्कि यह सामाजिक या राजनैतिक उथल-पुथल, संघर्ष या विनाश का प्रतीक बन जाता है। यह संकेत करता है कि कोयल ने किसी भयावह विपत्ति को देखा है, जो आगे चलकर बड़े विनाश का कारण बन सकती है।
संक्षेप में, यह पंक्ति कविता की गूढ़ता, प्रतीकात्मकता और काव्यात्मक सौंदर्य को बढ़ाने में सहायक है।

(ख) तेरे गीत कहावें वाह, रोना भी है मुझे गुनाह! देख विषमता तेरी-मेरी, बजा रही तिस पर रणभेरी!
उत्तर- इस पंक्ति में कवि ने विरोधाभास का प्रयोग किया है। एक ओर कोयल के गीतों की सराहना होती है—”तेरे गीत कहावें वाह”, तो दूसरी ओर, कवि के रोने को अपराध समझा जाता है—”रोना भी है मुझे गुनाह!”। यह दर्शाता है, जहाँ एक पक्ष को स्वतंत्रता और प्रशंसा प्राप्त है, जबकि दूसरा पक्ष बंदी बनकर अपनी पीड़ा भी व्यक्त नहीं कर सकता।

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