जैनेंद्र कुमार का उपन्यास ‘सुनीता’ (1934) हिंदी साहित्य के इतिहास में एक युगांतरकारी कृति मानी जाती है। इसे हिंदी का पहला मनोविश्लेषणात्मक (Psychoanalytical) उपन्यास मानने के पीछे ठोस कारण हैं। प्रेमचंद युगीन उपन्यासों में जहाँ समाज, आर्थिक विषमता और बाह्य संघर्ष केंद्र में थे, वहीं जैनेंद्र ने ‘सुनीता’ के माध्यम से पहली बार हिंदी पाठक को पात्रों के ‘अंतर्मन’ (Inner self) की गुत्थियों में उलझाया। यहाँ घटनाएँ बाहर कम और पात्रों के मन के भीतर अधिक घटती हैं।
यहाँ ‘सुनीता’ उपन्यास का विस्तृत विश्लेषण किया गया है जो यह सिद्ध करता है कि यह हिंदी का प्रथम मनोविश्लेषणात्मक उपन्यास क्यों है।
1. स्थूल सामाजिक यथार्थ से सूक्ष्म अंतर्मन की ओर प्रस्थान
हिंदी उपन्यास के विकास यात्रा में ‘सुनीता’ वह पड़ाव है जहाँ से उपन्यासकार की दृष्टि समाज के चौराहों से हटकर व्यक्ति के नितांत निजी कक्ष और उसके अवचेतन मन की ओर मुड़ी। इससे पूर्व के उपन्यासों में चरित्रों का निर्माण सामाजिक मूल्यों के आधार पर होता था—पात्र या तो ‘आदर्श’ होते थे या ‘यथार्थ’। लेकिन जैनेंद्र ने ‘सुनीता’ में इस ढांचे को तोड़ दिया। इस उपन्यास को मनोविश्लेषणात्मक मानने का सबसे बड़ा कारण यह है कि इसमें ‘कहानी’ का लोप है और ‘पात्रों की मानसिक स्थिति’ ही कथानक है। उपन्यास में कोई बहुत बड़ी बाहरी घटना नहीं घटती—न कोई युद्ध है, न कोई बड़ा सामाजिक आंदोलन जो केंद्र में हो, और न ही कोई पारिवारिक कलह। जो कुछ भी है, वह सुनीता, श्रीकांत और हरिप्रसन्न के मन के भीतर चल रहा द्वंद्व है।
जैनेंद्र कुमार ने फ्रायड और युंग जैसे मनोवैज्ञानिकों के सिद्धांतों का सीधा प्रयोग भले न किया हो, लेकिन ‘सुनीता’ में ‘इड’, ‘ईगो’ और ‘सुपर-ईगो’ का संघर्ष स्पष्ट दिखाई देता है। उपन्यास का आरंभ बहुत ही शांत और घरेलू वातावरण में होता है, लेकिन जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, यह स्पष्ट होता जाता है कि यह शांति केवल सतह पर है। भीतर एक ज्वालामुखी धधक रहा है। लेखक ने यह दिखाया है कि एक व्यक्ति जो समाज की नजर में एक साधारण गृहिणी (सुनीता) या एक क्रांतिकारी (हरिप्रसन्न) है, वह अपने एकांत में, अपने विचारों में कितना अलग और जटिल हो सकता है।
मनोविश्लेषणात्मक उपन्यास की पहली शर्त होती है—’व्यक्ति की प्रधानता’। ‘सुनीता’ में समाज गौण है। श्रीकांत और सुनीता का दांपत्य जीवन सुखी है, फिर भी एक खालीपन है। यह खालीपन सामाजिक नहीं, मनोवैज्ञानिक है। श्रीकांत का अपने मित्र हरिप्रसन्न को घर लाना और अपनी पत्नी को उसे सौंप देना, यह सामान्य सामाजिक बुद्धि से परे की बात है। यहाँ जैनेंद्र यह स्थापित करते हैं कि मनुष्य के कार्य-व्यापार हमेशा सामाजिक नैतिकता (Social Morality) से संचालित नहीं होते, बल्कि कई बार वे अवचेतन में दबी हुई कुंठाओं, जिज्ञासाओं और प्रयोगधर्मिता से संचालित होते हैं। श्रीकांत का यह व्यवहार कि वह अपनी पत्नी को एक ‘वस्तु’ या ‘प्रयोग’ की तरह अपने मित्र के सामने प्रस्तुत करता है, ताकि मित्र का एकाकीपन दूर हो सके, यह हिंदी साहित्य में एक नई और चौंकाने वाली मनोवैज्ञानिक दृष्टि थी। यह प्रसंग पाठक को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या प्रेम में अधिकार की भावना का त्याग इतना निरपेक्ष हो सकता है, या इसके पीछे श्रीकांत का कोई गुप्त मनोवैज्ञानिक संतोष (Voyeuristic pleasure या Masochism) छिपा है? इस प्रकार, जैनेंद्र ने पहली बार हिंदी उपन्यास में ‘कार्य-कारण’ के स्थूल सिद्धांत को नकार कर मन की अतल गहराइयों को ही अपना विषय बनाया।
2. हरिप्रसन्न का मनोविज्ञान: दमित काम-भावना और कुंठा का चित्रण
’सुनीता’ को मनोविश्लेषणात्मक उपन्यास का दर्जा दिलाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका हरिप्रसन्न के चरित्र की है। हरिप्रसन्न हिंदी साहित्य के सबसे जटिल चरित्रों में से एक है। वह एक क्रांतिकारी है, देश को आजाद कराने के सपने देखता है, लेकिन आंतरिक रूप से वह एक बेहद कुंठित, डरा हुआ और यौनिक रूप से दमित (Sexually Repressed) व्यक्ति है। मनोविश्लेषण विज्ञान कहता है कि जब किसी प्राकृतिक इच्छा (जैसे काम-वासना) का बलपूर्वक दमन किया जाता है, तो वह विकृत रूप में बाहर आती है। हरिप्रसन्न के साथ ठीक यही होता है। वह स्त्रियों से दूर भागता है, विवाह का विरोधी है, लेकिन असल में वह स्त्री के प्रति सर्वाधिक आसक्त है।
उपन्यास में हरिप्रसन्न का व्यवहार अत्यंत विरोधाभासी है। वह सुनीता को ‘माँ’ भी कहता है और उसी साँस में उसके सौंदर्य पर मुग्ध भी होता है। यह ‘ओडिपस कॉम्प्लेक्स’ (Oedipus Complex) की एक झलक प्रस्तुत करता है, जहाँ पुरुष स्त्री में मातृ-छवि और प्रेमिका-छवि के बीच झूलता रहता है। हरिप्रसन्न का अक्खड़पन, उसका गुस्सा और उसकी दार्शनिक बातें, दरअसल उसकी अपनी कमजोरियों को छिपाने का आवरण (Defense Mechanism) हैं। वह सुनीता के करीब जाना चाहता है, लेकिन अपने क्रांतिकारी होने के अहंकार और नैतिकता के तथाकथित बोझ के कारण वह इस इच्छा को स्वीकार नहीं कर पाता। फलस्वरूप, उसकी यह इच्छा ‘आक्रामकता’ (Aggression) और ‘सनक’ का रूप ले लेती है।
पाठ के आधार पर देखें तो हरिप्रसन्न बार-बार सुनीता को चुनौती देता है। वह उसे घर की चारदीवारी से बाहर निकलने को कहता है। यह ऊपरी तौर पर एक प्रगतिशील विचार लगता है, लेकिन गहराई में जाने पर पता चलता है कि हरिप्रसन्न सुनीता को श्रीकांत से अलग कर उस पर अपना मानसिक अधिपत्य जमाना चाहता है। वह चाहता है कि सुनीता अपने ‘सतीत्व’ के खोल से बाहर आए। उसका यह आग्रह कि सुनीता उसके साथ जंगल में चले, या अंत में उसका सुनीता के नग्न रूप को देखने की जिद्द करना, यह सब एक ‘मनोवैज्ञानिक ग्रंथि’ (Complex) का परिणाम है। वह स्त्री को एक रहस्य मानता है और उस रहस्य को भेदने के लिए वह उसे निर्वस्त्र देखना चाहता है, यह सोचकर कि शायद शरीर के पार जाकर उसे कोई सत्य मिल जाएगा। लेकिन जैनेंद्र बड़ी सूक्ष्मता से दिखाते हैं कि यह सत्य की खोज नहीं, बल्कि उसकी अपनी दमित वासना का ही प्रकटीकरण है जिसे वह आध्यात्म या दर्शन का जामा पहना रहा है। हरिप्रसन्न का चरित्र यह स्पष्ट करता है कि एक व्यक्ति के चेतन मन के आदर्श (क्रांति, त्याग) और अवचेतन मन की इच्छाएँ (भोग, अधिकार) एक-दूसरे के कितने विरोधी हो सकते हैं। यही द्वंद्व इस उपन्यास को मनोवैज्ञानिक गहराई प्रदान करता है।
3. सुनीता: पारंपरिक नारी और अवचेतन विद्रोह का मनोवैज्ञानिक अध्ययन
उपन्यास की नायिका सुनीता, हिंदी उपन्यास की परम्परागत नायिकाओं से सर्वथा भिन्न है। वह न तो पूरी तरह ‘त्यागमयी देवी’ है और न ही पूरी तरह ‘विद्रोही’। वह इन दोनों के बीच के एक ऐसे मनोवैज्ञानिक धरातल पर खड़ी है, जहाँ उसका अपना व्यक्तित्व आकार ले रहा है। जैनेंद्र ने सुनीता के माध्यम से स्त्री के अवचेतन मन की परतों को खोला है। शुरू में सुनीता एक आदर्श पत्नी लगती है जो श्रीकांत की हर बात मानती है। लेकिन जब श्रीकांत उसे हरिप्रसन्न के साथ घुलने-मिलने की छूट (बल्कि आदेश) देता है, तो सुनीता के भीतर एक सोई हुई नारी जागृत होती है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो सुनीता के भीतर भी एक अतृप्ति है। श्रीकांत का प्रेम बहुत ही सात्विक, शांत और बौद्धिक है। उसमें वह ‘आग’ नहीं है जो शायद सुनीता के अवचेतन को चाहिए। हरिप्रसन्न का पौरुष, उसका उग्र स्वभाव और उसकी दीवानगी सुनीता को एक अजीब तरह से आकर्षित करती है, और साथ ही भयभीत भी। यह आकर्षण ‘निषिद्ध के प्रति आकर्षण’ (Attraction towards the forbidden) है। सुनीता जानती है कि वह एक पत्नी है, लेकिन वह हरिप्रसन्न के साथ अकेले जाने के प्रस्ताव को ठुकरा नहीं पाती। यहाँ जैनेंद्र यह दिखाते हैं कि नैतिकता सामाजिक दबाव है, जबकि मन की गति स्वतंत्र है।
उपन्यास का वह प्रसंग जहाँ सुनीता हरिप्रसन्न के साथ जाती है, स्त्री मनोविज्ञान का अद्भुत उदाहरण है। वह हरिप्रसन्न के सामने कमजोर नहीं पड़ती। जब हरिप्रसन्न अपनी कुंठाओं के कारण आक्रामक होता है, तब सुनीता उसे थप्पड़ नहीं मारती, न ही भागती है, बल्कि वह उसे अपनी ‘मातृ-शक्ति’ और ‘आत्म-विश्वास’ से परास्त करती है। वह हरिप्रसन्न के सामने निर्वस्त्र होने को तैयार हो जाती है। यह दृश्य अश्लील नहीं, बल्कि घोर मनोवैज्ञानिक है। यहाँ सुनीता हरिप्रसन्न को यह अहसास दिलाती है कि जिस शरीर के लिए वह इतना बेचैन है, वह केवल मांस का लोथड़ा है, असली शक्ति उसके मन और आत्मा में है। सुनीता का यह कदम हरिप्रसन्न के ‘पौरुष के अहंकार’ को चकनाचूर कर देता है।
जैनेंद्र ने दिखाया है कि सुनीता श्रीकांत के कहने पर हरिप्रसन्न के पास जाती जरूर है, लेकिन वह वहां अपनी शर्तों पर रहती है। वह हरिप्रसन्न की ‘फंतासी’ (Fantasy) का खिलौना नहीं बनती, बल्कि उस फंतासी को तोड़कर उसे वास्तविकता के धरातल पर पटक देती है। यह एक स्त्री का मनोवैज्ञानिक सशक्तिकरण है। वह पति की आज्ञा का पालन करती है, लेकिन उस पालन में भी वह अपनी अस्मिता (Identity) को नहीं खोती। सुनीता का चरित्र यह सिद्ध करता है कि स्त्री का मन केवल ‘समर्पण’ नहीं जानता, उसमें अदम्य साहस और पुरुष की वासना को नियंत्रित करने की अद्भुत मनोवैज्ञानिक क्षमता भी होती है।
4. श्रीकांत का चरित्र: विश्वास, प्रयोगधर्मिता और अव्यक्त ईर्ष्या का विश्लेषण
श्रीकांत इस उपन्यास का ‘सूत्रधार’ भी है और सबसे बड़ा रहस्य भी। एक पति के रूप में श्रीकांत का व्यवहार सामान्य मनोविज्ञान के नियमों के विरुद्ध लगता है, और यही असामान्य व्यवहार उपन्यास को मनोवैज्ञानिक बनाता है। श्रीकांत अपनी पत्नी सुनीता को अपने मित्र हरिप्रसन्न के साथ समय बिताने के लिए न केवल अनुमति देता है, बल्कि उसे इसके लिए प्रेरित भी करता है। वह कहता है, “सुनीता, तुम जाओ। हरिप्रसन्न को तुम्हारी जरूरत है।” एक सामान्य दृष्टि से यह ‘त्याग’ लग सकता है, लेकिन मनोविश्लेषण की दृष्टि से यह एक जटिल ग्रंथि है।
क्या श्रीकांत वास्तव में इतना उदार है? या वह अपनी पत्नी और मित्र के बीच के संबंधों को देखकर किसी प्रकार का परोक्ष आनंद (Vicarious Pleasure) ले रहा है? या फिर वह इतना अधिक आत्म-केंद्रित (Self-centered) और बौद्धिक है कि उसके लिए मानवीय भावनाएँ और ईर्ष्या कोई मायने नहीं रखतीं? जैनेंद्र ने श्रीकांत को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में गढ़ा है जो भावनाओं को बुद्धि से नियंत्रित करने का प्रयास करता है। वह हरिप्रसन्न को समझता है। वह जानता है कि हरिप्रसन्न कुंठित है और उसे स्त्री-संसर्ग की आवश्यकता है (भले ही वह मित्र के रूप में हो)। इसलिए वह सुनीता को एक ‘थेरेपिस्ट’ या ‘औषधि’ के रूप में इस्तेमाल करता है।
लेकिन यह प्रयोग श्रीकांत के लिए भी जोखिम भरा है। उपन्यास के पाठ में कई जगह ऐसे संकेत मिलते हैं जहाँ श्रीकांत की चुप्पी बहुत कुछ कहती है। वह सब कुछ जानते हुए भी अनजान बना रहता है। यह ‘डिनायल’ (Denial) की स्थिति है। वह अपनी पत्नी पर पूर्ण विश्वास का दावा करता है, लेकिन यह विश्वास कहीं न कहीं उसके अहंकार का हिस्सा है। उसे लगता है कि उसका सुनीता पर इतना अधिकार है कि कोई तीसरा उसे छीन नहीं सकता। यह ‘स्वामित्व की भावना’ का एक अत्यंत सूक्ष्म और परिष्कृत रूप है।
श्रीकांत का मनोविज्ञान आधुनिकता और परंपरा के बीच झूलता है। वह वैचारिक रूप से आधुनिक बनना चाहता है, इसलिए वह पत्नी को ‘मुक्त’ करता है, लेकिन अवचेतन रूप से वह पारंपरिक पति ही है जो अंत में पत्नी को अपने पास ही चाहता है। जब सुनीता वापस आती है, तो श्रीकांत का व्यवहार बहुत ही सामान्य होता है, जैसे कुछ हुआ ही न हो। यह सामान्यता ही सबसे अधिक असामान्य है। यह दर्शाता है कि श्रीकांत ने अपनी भावनाओं का इतना अधिक उदात्तीकरण (Sublimation) कर लिया है कि वह अब सामान्य मानवीय प्रतिक्रियाओं से परे हो गया है। यह ‘निर्विकार भाव’ ही उसके चरित्र की मनोवैज्ञानिक गुत्थी है, जो पाठक को अंत तक उलझाए रखती है।
5. नग्नता का प्रसंग और नैतिकता का मनोवैज्ञानिक विखंडन: उपन्यास का चरम
उपन्यास का चरमोत्कर्ष (Climax) वह दृश्य है जो इसे हिंदी के अन्य सभी उपन्यासों से अलग करता है और इसे विशुद्ध मनोवैज्ञानिक श्रेणी में स्थापित करता है। यह दृश्य है—सुनीता का हरिप्रसन्न के सामने निर्वस्त्र होना। यह दृश्य पाठकों और उस समय के समाज के लिए अत्यंत चौंकाने वाला था। लेकिन जैनेंद्र के लिए यह शरीर का प्रदर्शन नहीं, बल्कि ‘मन का उद्घाटन’ था।
हरिप्रसन्न सुनीता से कहता है कि वह उसे “उसी रूप में देखना चाहता है, जिस रूप में वह सत्य है।” हरिप्रसन्न की यह मांग उसकी दमित काम-वासना का चरम रूप है, जिसे वह दार्शनिक आवरण में प्रस्तुत करता है। वह सोचता है कि कपड़े उतार देने से रहस्य खुल जाएगा। यहाँ जैनेंद्र यह दिखाते हैं कि पुरुष की दृष्टि अक्सर शरीर तक सीमित रहती है, वह शरीर के माध्यम से ही मन तक पहुँचने का प्रयास करता है।
सुनीता द्वारा इस मांग को स्वीकार कर लेना, इस उपन्यास का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक मोड़ है। अगर सुनीता मना कर देती, तो वह एक साधारण ‘सती’ होती। अगर वह लज्जित होकर भाग जाती, तो वह एक सामान्य ‘अबला’ होती। लेकिन वह स्वयं अपने वस्त्र हटाती है और हरिप्रसन्न के सामने खड़ी हो जाती है। उस समय उसकी आँखों में न लज्जा है, न काम-भावना, बल्कि एक ऐसा तेज है जो हरिप्रसन्न को डरा देता है। सुनीता कहती है—”लो, देख लो। यही है सत्य। अब बताओ, तुम्हें क्या मिला?”
यह क्षण हरिप्रसन्न के ‘अहंकार’ और उसकी ‘कल्पना’ की मृत्यु का क्षण है। जैसे ही सुनीता निर्वस्त्र होती है, हरिप्रसन्न की काम-वासना लुप्त हो जाती है और उसके स्थान पर ग्लानि और भय आ जाता है। वह सुनीता के चरणों में गिर पड़ता है। फ्रायड के मनोविज्ञान के अनुसार, यह क्षण ‘कामेच्छा’ (Libido) का ‘भय’ (Anxiety) में रूपांतरण है। सुनीता का नग्न शरीर हरिप्रसन्न के लिए भोग की वस्तु नहीं, बल्कि एक ‘देवी’ या ‘माता’ का रौद्र रूप बन जाता है।
जैनेंद्र ने इस प्रसंग के माध्यम से यह स्थापित किया कि नैतिकता कपड़ों में नहीं, मन की दृष्टि में होती है। सुनीता नग्न होकर भी पवित्र रहती है, जबकि हरिप्रसन्न कपड़ों में रहकर भी मन से नग्न हो जाता है। यह दृश्य पारंपरिक नैतिकता (Conventional Morality) पर एक करारा प्रहार था और मनोवैज्ञानिक सत्य की स्थापना थी। यहाँ शरीर गौण हो जाता है और दो मनों का संघर्ष—एक कुंठित (हरिप्रसन्न) और दूसरा मुक्त (सुनीता)—प्रमुख हो जाता है। इस एक दृश्य ने हिंदी उपन्यास को नैतिकता के उपदेशात्मक घेरे से बाहर निकालकर मनोविज्ञान के खुले आकाश में खड़ा कर दिया।
निष्कर्षतः, जैनेंद्र कुमार कृत ‘सुनीता’ को हिंदी का प्रथम मनोविश्लेषणात्मक उपन्यास कहना सर्वथा उचित है। यह उपन्यास बाह्य घटनाओं के बजाय पात्रों के आंतरिक जगत की उथल-पुथल को अपना कथानक बनाता है। इसमें प्रेमचंद युगीन आदर्शवाद का स्थान ‘व्यक्तिवाद’ और ‘मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद’ ने ले लिया है। हरिप्रसन्न की दमित कुंठाएँ, श्रीकांत का जटिल उदारवाद और सुनीता का अपने अस्तित्व को लेकर किया गया साहसिक प्रयोग—ये सब मिलकर एक ऐसी कथा का निर्माण करते हैं जो पाठकों को नैतिक निर्णय (Moral Judgment) लेने के बजाय मानव मन की जटिलताओं को समझने के लिए प्रेरित करती है।
’सुनीता’ में जैनेंद्र ने दिखाया कि मनुष्य का मन एक सीधी रेखा में नहीं चलता। उसमें अंतर्विरोध होते हैं, पाप और पुण्य की परिभाषाएँ धुंधली होती हैं, और कई बार हम जो कहते हैं, हमारा अवचेतन उससे ठीक उलट चाहता है। हरिप्रसन्न का सुनीता के प्रति आकर्षण और फिर विकर्षण, और सुनीता का पतिव्रता होते हुए भी पर-पुरुष के साथ एकांत में जाना, यह सब फ्रायड के सिद्धांतों का साहित्यिक रूपांतरण जैसा प्रतीत होता है। इस उपन्यास ने हिंदी साहित्य में ‘पात्र’ को एक ‘टाइप’ (Type) से निकालकर एक ‘व्यक्ति’ (Individual) में बदल दिया, जिसके अपने अंधेरे और उजाले हैं। यही सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि ‘सुनीता’ को हिंदी साहित्य का एक कालजयी और प्रथम मनोविश्लेषणात्मक दस्तावेज बनाती है।
यह भी देखें :
▪️हिंदी उपन्यास( एम ए प्रथम सेमेस्टर ) पेपर -3 ( KUK )