जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित उपन्यास ‘सुनीता’ (1934) की केंद्रीय पात्र और नायिका ‘सुनीता’ हिंदी साहित्य के सबसे सशक्त और मनोवैज्ञानिक रूप से जटिल स्त्री चरित्रों में से एक है। वह प्रेमचंद युगीन ‘आदर्शवादी’ नारी और आधुनिक ‘यथार्थवादी’ नारी के बीच की एक ऐसी कड़ी है, जिसमें परंपरा का संस्कार भी है और आधुनिकता का निर्भीक साहस भी। जैनेंद्र ने सुनीता को केवल एक पत्नी या गृहिणी के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र ‘व्यक्तित्व’ (Individual) के रूप में गढ़ा है। उसका चरित्र-चित्रण घटनाओं से अधिक उसकी मानसिक प्रतिक्रियाओं और अंतर्मन की दृढ़ता के आधार पर किया गया है।
यहाँ सुनीता के चरित्र की विस्तृत विवेचना पाँच विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत दी जा रही है, जो उपन्यास के मूल पाठ पर आधारित है।
1. बाह्य व्यक्तित्व: भारतीय गृहिणी का आदर्श और सहज सौंदर्य
उपन्यास के आरंभ में सुनीता का जो रूप हमारे सामने आता है, वह एक नितांत पारंपरिक और मध्यमवर्गीय भारतीय गृहिणी का है। वह श्रीकांत की पत्नी है, घर की मालकिन है और अपनी गृहस्थी में पूरी तरह रमी हुई है। जैनेंद्र ने उसके सौंदर्य का वर्णन किसी रीतिकालीन नायिका की तरह नहीं, बल्कि एक गरिमामयी महिला के रूप में किया है। उसके व्यक्तित्व में एक ‘ठहराव’ है। वह चंचल नहीं है, बल्कि गंभीर और शांत है। उसका घर व्यवस्थित है, और वह अपने पति श्रीकांत की हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रखती है।
पाठ के आधार पर देखें तो सुनीता का जीवन रसोई, पति की सेवा और घर के प्रबंध तक सीमित लगता है। लेकिन यह केवल उसका बाहरी आवरण है। जैनेंद्र यह स्थापित करते हैं कि घरेलू होना स्त्री की कमजोरी नहीं, बल्कि उसका एक सशक्त पहलू हो सकता है। सुनीता अपने इस दायरे में खुश है। उसे बाहर की दुनिया, राजनीति या क्रांति से कोई विशेष लेना-देना नहीं है। जब श्रीकांत उसे देश-दुनिया की बातें बताता है या हरिप्रसन्न की क्रांतिकारी गतिविधियों का जिक्र करता है, तो सुनीता की प्रतिक्रिया बहुत ही सहज और व्यावहारिक होती है। वह हवा में महल बनाने वाली स्त्री नहीं है।
सुनीता के चरित्र की यह सहजता ही उसे विशिष्ट बनाती है। वह एक ‘तृप्त’ नारी है। आधुनिक उपन्यासों में अक्सर अतृप्त और विद्रोही नायिकाओं का चित्रण होता है, लेकिन सुनीता का विद्रोह अभाव से नहीं, बल्कि परिस्थितियों के दबाव और आत्म-सम्मान की रक्षा से उपजता है। वह श्रीकांत के प्रेम में सुरक्षित महसूस करती है। उसका सौंदर्य हरिप्रसन्न को विचलित करता है, लेकिन सुनीता अपने सौंदर्य को लेकर कतई अहंकारी या प्रदर्शनकारी नहीं है। वह अपनी देह के प्रति सचेत नहीं है, बल्कि वह अपने ‘स्व’ (Self) में स्थित है। उसका यह ‘सहज’ रूप ही हरिप्रसन्न जैसे जटिल और कुंठित व्यक्ति के लिए पहेली बन जाता है। वह समझ नहीं पाता कि एक साधारण गृहिणी में इतना आत्म-बल कहाँ से आता है। इस खंड में हम देखते हैं कि सुनीता वह धुरी है जिस पर पूरा उपन्यास घूमता है; वह शांत है, लेकिन निष्क्रिय नहीं।
2. श्रीकांत के साथ संबंध: समर्पण, मूक संवाद और विश्वास
सुनीता के चरित्र का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण पहलू उसका अपने पति श्रीकांत के साथ संबंध है। यह संबंध सामान्य पति-पत्नी जैसा नहीं है। इसमें प्रेम है, लेकिन अधिकार की भावना (Possessiveness) का अभाव है, विशेषकर श्रीकांत की ओर से। सुनीता श्रीकांत को बहुत चाहती है, लेकिन वह उससे बौद्धिक स्तर पर बहस नहीं करती। वह श्रीकांत की इच्छाओं को सिर-माथे पर लेती है, यहाँ तक कि जब वे इच्छाएँ उसे असहज करती हैं, तब भी।
जब श्रीकांत अपने मित्र हरिप्रसन्न को घर लाता है और चाहता है कि सुनीता उसके साथ खुले-मिले, तो सुनीता का ‘अंतर्मन’ संकुचित होता है। एक भारतीय पत्नी के रूप में वह पर-पुरुष के साथ इतनी घनिष्ठता को स्वीकार नहीं कर पाती। लेकिन चूंकि यह उसके पति का आदेश (या आग्रह) है, वह इसे स्वीकार करती है। यहाँ सुनीता का ‘समर्पण’ (Submission) दिखाई देता है। लेकिन यह समर्पण कमजोरी नहीं है। वह श्रीकांत पर अटूट विश्वास करती है। वह मानती है कि अगर श्रीकांत कुछ कह रहे हैं, तो उसमें कुछ भलाई ही होगी।
हालांकि, उपन्यास के सूक्ष्म पाठ से यह भी झलकता है कि सुनीता के मन में कहीं न कहीं एक ‘मूक प्रश्न’ भी है। वह श्रीकांत के इस ‘प्रयोगवादी’ रवैये से कभी-कभी आहत भी होती है। उसे लगता है कि श्रीकांत उसे एक ‘स्वतंत्र व्यक्ति’ मानकर भी उसे एक ‘वस्तु’ की तरह हरिप्रसन्न के अकेलेपन को दूर करने के लिए सौंप रहे हैं। फिर भी, वह शिकायत नहीं करती। उसका चरित्र यह दर्शाता है कि प्रेम में स्त्री अपने अहं को विसर्जित कर देती है। श्रीकांत और सुनीता के बीच संवादों में अक्सर चुप्पी (Silence) अधिक मुखर होती है। सुनीता की यह चुप्पी उसकी महानता है। वह जानती है कि उसका पति उसे ‘मुक्त’ करना चाहता है, लेकिन वह अपनी मर्यादाओं में ही अपनी मुक्ति खोजती है। उसका पातिव्रत्य धर्म किसी शास्त्र के डर से नहीं, बल्कि उसके अपने अंतःकरण के प्रेम से संचालित है। वह श्रीकांत की ‘बौद्धिक सनक’ को भी अपने ‘भावनात्मक स्थैर्य’ से संभाल लेती है।
3. हरिप्रसन्न और सुनीता: वात्सल्य, भय और मनोवैज्ञानिक द्वंद्व
उपन्यास का सबसे जटिल हिस्सा सुनीता और हरिप्रसन्न का संबंध है। हरिप्रसन्न सुनीता के जीवन में एक तूफ़ान की तरह आता है। उसके प्रति सुनीता का व्यवहार बहुस्तरीय (Multi-layered) है। आरंभ में वह उससे संकोच करती है, लजाती है। लेकिन धीरे-धीरे, श्रीकांत के प्रोत्साहन और अपनी सहज करुणा के कारण, वह हरिप्रसन्न के करीब आती है। यहाँ सुनीता के चरित्र में ‘मातृत्व’ का एक प्रबल पक्ष उभरता है।
जैनेंद्र दिखाते हैं कि सुनीता हरिप्रसन्न को एक ‘पुरुष’ के रूप में कम और एक ‘भटके हुए बालक’ के रूप में अधिक देखती है। हरिप्रसन्न के भीतर जो कुंठा, गुस्सा और अस्थिरता है, उसे सुनीता अपनी ममता से शांत करना चाहती है। हरिप्रसन्न उसे कभी ‘माँ’ कहता है, तो कभी प्रेमिका की दृष्टि से देखता है। सुनीता इस द्वंद्व को बहुत परिपक्वता से संभालती है। वह उसकी वासनापूर्ण दृष्टि को पहचानती है, फिर भी वह उसे दुत्कारती नहीं, बल्कि उसे सुधारने या समझने का प्रयास करती है। यह सुनीता के चरित्र की विशालता है।
लेकिन, सुनीता के भीतर भी एक अवचेतन मन है। हरिप्रसन्न का उग्र पौरुष और उसकी दीवानगी उसे कहीं न कहीं आकर्षित भी करती है—यह आकर्षण प्रेम का नहीं, बल्कि ‘अनजाने रहस्य’ का है। जब हरिप्रसन्न उसे घर की चारदीवारी से बाहर निकलने की चुनौती देता है, तो सुनीता उस चुनौती को स्वीकार करती है। वह उसके साथ जंगल में जाने को तैयार हो जाती है। यह कदम एक पारंपरिक गृहिणी के लिए असंभव सा है। यहाँ सुनीता का चरित्र एक नया मोड़ लेता है। वह दिखाती है कि वह केवल ‘श्रीकांत की पत्नी’ नहीं है, उसका अपना एक अस्तित्व है जो जोखिम उठा सकता है। वह हरिप्रसन्न के साथ जाकर यह सिद्ध करना चाहती है कि उसकी पवित्रता और आत्मबल बाहरी सुरक्षा का मोहताज नहीं है। वह शेरनी की तरह निर्भीक होकर उसके साथ जाती है, यह जानते हुए भी कि हरिप्रसन्न की नीयत में खोट हो सकती है। यह उसका ‘आत्म-विश्वास’ है जो उसे एक साधारण नायिका से ऊपर उठा देता है।
4. सुनीता की आधुनिकता: रूढ़ियों का भंजन और अस्मिता की पहचान
सुनीता को अक्सर हिंदी आलोचना में एक ‘रहस्यमयी’ नारी कहा गया है, लेकिन यदि ध्यान से देखा जाए तो वह अपनी अस्मिता (Identity) के प्रति बहुत जागरूक है। जैनेंद्र के उपन्यासों में स्त्री अक्सर पुरुष से अधिक सशक्त होती है, और सुनीता इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। हरिप्रसन्न जो कि एक क्रांतिकारी है, वह वास्तव में विचारों का गुलाम है, जबकि सुनीता जो घर में रहती है, वह वास्तव में मानसिक रूप से मुक्त है।
सुनीता की आधुनिकता उसके कपड़ों या बातों में नहीं, उसके निर्णयों में है। जब हरिप्रसन्न उसे ‘सतीत्व’ और ‘परंपरा’ के ताने देता है, तो सुनीता विचलित नहीं होती। वह जानती है कि सतीत्व शरीर का धर्म नहीं, मन की अवस्था है। वह हरिप्रसन्न की कुंठाओं को अपने ऊपर हावी नहीं होने देती। उपन्यास के एक प्रसंग में जब हरिप्रसन्न राजनीतिक और दार्शनिक बातें करता है, तो सुनीता उसे बहुत सरल शब्दों में जीवन का सत्य समझा देती है। वह बताती है कि जीवन सिद्धांतों के लिए नहीं, जीने के लिए है।
सुनीता का चरित्र चित्रण यह स्पष्ट करता है कि वह पुरुष की बनाई हुई ‘देवी’ की प्रतिमा में कैद नहीं रहना चाहती। हरिप्रसन्न और श्रीकांत दोनों ही अपने-अपने तरीके से उसे एक साँचे में ढालना चाहते हैं। श्रीकांत उसे ‘आधुनिक और मुक्त’ देखना चाहता है, हरिप्रसन्न उसे ‘शक्ति और रहस्य’ के रूप में देखना चाहता है। लेकिन सुनीता इन दोनों छवियों को तोड़ती है। वह न तो श्रीकांत की कठपुतली बनती है और न ही हरिप्रसन्न की फंतासी। वह वही करती है जो उसका मन और विवेक कहता है। उसका चरित्र इस बात का प्रतीक है कि स्त्री को समझने के लिए पुरुष के पास जो पैमाने हैं (चाहे वह पारंपरिक हों या क्रांतिकारी), वे सब छोटे पड़ जाते हैं। सुनीता का मौन विद्रोह, उसका धैर्य और उसकी निर्णय क्षमता उसे एक कालजयी पात्र बनाती है।
5. चरमोत्कर्ष: ‘नग्नता’ का प्रसंग और ‘महाशक्ति’ के रूप में रूपांतरण
सुनीता के चरित्र का सबसे विस्फोटक और निर्णायक पहलू उपन्यास के अंत में सामने आता है। यह वह दृश्य है जिसने हिंदी साहित्य जगत को हिला कर रख दिया था—हरिप्रसन्न के सामने उसका निर्वस्त्र होना। यह कृत्य किसी साधारण चरित्र के बस की बात नहीं थी। यहाँ सुनीता ‘मानवीय धरातल’ से उठकर एक ‘दैवीय या आदिम शक्ति’ (Primal Force) के स्तर पर पहुँच जाती है।
हरिप्रसन्न, अपनी दमित वासनाओं के वशीभूत होकर, यह हठ करता है कि वह सुनीता को आवरण-रहित देखना चाहता है। वह इसे ‘सत्य के साक्षात्कार’ का नाम देता है। एक सामान्य स्त्री इस स्थिति में या तो रोती, गिड़गिड़ाती या भाग जाती। लेकिन सुनीता न भागती है, न रोती है। वह हरिप्रसन्न की आँखों में आँखें डालकर खड़ी होती है और अपने वस्त्र उतार देती है। यह सुनीता के चरित्र की सर्वोच्च अवस्था है। यह उसका ‘नैतिक साहस’ (Moral Courage) है।
इस कृत्य के पीछे सुनीता का मनोविज्ञान अत्यंत गहरा है। वह हरिप्रसन्न को यह अहसास दिलाना चाहती है कि जिस नग्नता को वह इतना बड़ा रहस्य और आकर्षण मान रहा है, वह महज मांस और चाम है। वह अपनी नग्नता से हरिप्रसन्न की वासना पर प्रहार करती है। जैसे ही वह निर्वस्त्र होती है, वह एक ‘भोग्या’ नहीं रहती, बल्कि ‘जगदंबा’ या ‘माँ’ का रौद्र रूप धारण कर लेती है। उसकी इस तेजस्विता के सामने हरिप्रसन्न का पौरुष, उसका अहंकार और उसकी काम-वासना सब पानी हो जाते हैं। वह भयभीत होकर उसके चरणों में गिर पड़ता है।
सुनीता का यह रूप दर्शाता है कि पवित्रता कपड़ों में नहीं होती। वह नग्न होकर भी अपवित्र नहीं होती, बल्कि और अधिक पवित्र और सशक्त हो जाती है। उसने अपनी देह का उपयोग पुरुष के अहंकार को तोड़ने के लिए एक अस्त्र की तरह किया। यह दृश्य सिद्ध करता है कि सुनीता एक अबला नारी नहीं, बल्कि अपार आत्मबल की स्वामिनी है जो पुरुष को उसी के खेल में परास्त कर सकती है। अंत में वह वापस अपने घर, अपनी रसोई में लौट आती है, जैसे कुछ हुआ ही न हो। यह ‘निर्विकार भाव’ उसके चरित्र को एक अद्भुत ऊँचाई प्रदान करता है।
निष्कर्षतः ‘सुनीता’ उपन्यास की नायिका सुनीता हिंदी साहित्य की एक अद्वितीय सृष्टि है। वह बाहर से जितनी शांत और सरल है, भीतर से उतनी ही आग और ऊर्जा से भरी हुई है। उसका चरित्र चित्रण जैनेंद्र कुमार की मनोवैज्ञानिक दृष्टि का उत्कृष्ट उदाहरण है। सुनीता श्रीकांत के लिए एक समर्पित पत्नी है, हरिप्रसन्न के लिए एक पहेली और अंततः एक मार्गदर्शक शक्ति है।
उसका चरित्र इस बात का प्रमाण है कि स्त्री की शक्ति उसकी सहनशीलता में तो है ही, समय आने पर रूढ़ियों को तोड़कर अपनी शर्तों पर सत्य का सामना करने में भी है। वह हरिप्रसन्न की कुंठाओं का ‘शिकार’ नहीं बनती, बल्कि उनका ‘उपचार’ करती है। अपने वस्त्र उतारकर उसने अपनी लज्जा नहीं खोई, बल्कि पुरुष की उस दूषित दृष्टि को नंगा कर दिया जो स्त्री को केवल देह समझती है। सुनीता एक ऐसी नायिका है जो पाठकों के मन पर अपनी करुणा, दृढ़ता और अदम्य साहस की अमिट छाप छोड़ जाती है।
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