(1)
दया, माया, ममता लो आज,
मधुरिमा लो, अगाध विश्वास;
हमारा हृदय रत्न निधि स्वच्छ
तुम्हारे लिए खुला है पास।
प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन और वार्तालाप का वर्णन किया गया है |
व्याख्या : श्रद्धा मनु से कह रही है कि तुम मेरे हृदय की दया, माया, ममता, माधुर्य और अगाध विश्वास के अधिकारी हो अत: इनमें से जिसे भी चाहो स्वेच्छा से ग्रहण कर सकते हो तथा तुम्हारे लिए इसमें कुछ भी रुकावट नहीं होगी। श्रद्धा का कहना है कि मेरा हृदय तो स्वच्छ भाव रत्नों का ख़ज़ाना है अर्थात् उसमें असंख्य निर्मल भावनाएँ हैं और वे सब तुम्हारे लिए ही हैं अत: तुम जो भी चाहो सुगमता से प्राप्त कर सकते हो।
(2)
बनो संसृति के मूल रहस्य
तुम्हीं से फैलेगी वह बेल;
विश्व भर सौरभ से भर जाए
सुमन खेलो सुंदर खेल।
व्याख्या : श्रद्धा मनु को संबोधित कर कहती है कि मेरी अभिलाषा यह है कि तुम इस सृष्टि के मूल रहस्य अर्थात् मूलाधार बनो और भावी संस्कृति की यह लता तुम्हीं से फले-फूले अर्थात् तुम्हारे द्वारा ही सृष्टि का विकास हो। साथ ही जिस प्रकार लता के फूल वातावरण को सुरभित बनाए रखते हैं उसी प्रकार मेरी यही मनोकामना है कि फूलों की भाँति तुम्हारी सुंदर संतति के सुकार्यों से तुम्हारा यश समस्त सृष्टि में व्याप्त हो उठे।
(3)
और यह क्या तुम सुनते नहीं
विधाता का मंगल वरदान—
‘शक्तिशाली हो, विजयी बनो,
विश्व में गूँज रहा जय गान।
व्याख्या : कवि कह रहा है कि अपने उद्गारों को व्यक्ति करते समय श्रद्धा ने मनु को कर्म क्षेत्र में प्रवृत्त होने की प्रेरणा देते हुए कहा है कि तुम विधाता के इस कल्याणकारी वरदान को नहीं सुन रहे कि शक्तिशाली होकर विजयश्री प्राप्त करो! इसका अभिप्राय यह है कि ईश्वर भी यही चाहता है कि मानव प्राणी शक्तिवान होकर विजयी बने और मनुष्य हाथ पर हाथ धरे न बैठा रहे। श्रद्धा मनु से कहती है कि तुम्हें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि आज समस्त सृष्टि में देवताओं की यही वाणी गूँज रही है और जब वे स्वयं देव संतान हैं तो उन्हें इस प्रकार कर्म से विमुख होकर पलायनवादी दृष्टिकोण न अपनाना चाहिए।
(4)
“डरो मत अरे अमृत संतान
अग्रसर है मंगलमय वृद्धि;
पूर्ण आकर्षण जीवन केंद्र
खिंची आवेगी सकल समृद्धि।
व्याख्या : श्रद्धा मनु से कह रही है कि जब तुम स्वयं देव पुत्र हो तो तुम्हें निडर होकर कर्म पथ पर अग्रसर होना चाहिए र किसी भी प्रकार का आलस्य दिखाना या अज्ञान आशंकाओं से भयभीत होना उचित नहीं है। श्रद्धा मनु से कहती है कि तुम्हारा भविष्य अंधकारपूर्ण नहीं है बल्कि मंगलमय वृद्धि अर्थात् कल्याणकारी विधान तुम्हारे सामने है और जब तुम अपने जीवन को आकर्षण का शक्तिशाली केंद्र बनाओगे तब तुम्हारे सामने विश्व का समस्त सुख एवं वैभव खिंचता चला आएगा। इस प्रकार तुम्हें भयभीत होकर या आलस्यवश कर्तव्य क्षेत्र से विमुख होकर पलायन के प्रति प्रेम न दिखाना चाहिए।
(5)
देव-असफलताओं का ध्वंस
प्रचुर उपकरण जुटाकर आज;
पड़ा है बन मानव संपत्ति
पूर्ण हो मन का चेतन राज।
व्याख्या : श्रद्धा का कहना है कि जिस प्रकार जीर्ण-क्षीर्ण पुरानी वस्तुओं को गलाकर नवीन वस्तुओं का निर्माण किया जाता है उसी प्रकार देवताओं की असफलताओं के कारणों अर्थात् जिन कारणों से उनका विनाश हुआ है उस पर विचार कर इस नवीन विचारधारा के आधार पर मानव संस्कृति का निर्माण किया जा सकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि जिस मार्ग का अवलंब ग्रहण करने से देव जाति का विनाश हुआ है उस पथ से हटकर यदि मनुष्य दूसरे मार्ग को ग्रहण करे तो निस्संदेह मानव-मन की चेतना का राज्य पूर्ण हो जाएगा अर्थात् मन का संसार पूर्ण रूप से निर्मित हो सकेगा। अतएव मानव संस्कृति का विकास करते समय हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि देवताओं की असफलताओं के क्या कारण थे और क्यों वे विनाश की अवस्था को प्राप्त हुए।
(6)
चेतना का सुंदर इतिहास
अखिल मानव भावों का सत्य;
विश्व के हृदय-पटल पर दिव्य
अक्षरों से अंकित हो नित्य।
व्याख्या : श्रद्धा का कहना है कि वास्तव में संपूर्ण मानव-भावों का जो सत्य है वही चेतना का सुंदर इतिहास है अर्थात् समस्त मानवता की संपूर्ण अनुभूतियों की सत्यता ही चेतना का इतिहास कहला सकती है लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि सृष्टि के समस्त प्राणियों के मानस पटल पर यह मानव भावों की सत्यता नित्य दिव्य अक्षरों में अंकित होती रहे और इस प्रकार चेतना का एक सुंदर इतिहास निर्मित किया जाए। कहने का अभिप्राय यह है कि विश्व के समस्त प्राणी यह बात भली भाँति समझ लें कि मनोभावनाओं को उनके प्राकृतिक रूप में ग्रहण करना ही वास्तविक जीवन है अर्थात् कभी भी किसी भी प्रकार के संकोच या भय से किसी प्राकृतिक इच्छा का दमन नहीं होना चाहिए। इस प्रकार जब मनोभावनाओं को यथार्थ रूप से ग्रहण कर उन्हें अनुकूल वातावरण में विकसित किया जाएगा तभी उनका चेतना से पूर्ण होना भी संभव है।
(7)
विधाता की कल्याणी सृष्टि
सफल हो इस भूतल पर पूर्ण;
पटें सागर, बिखरें ग्रह-पुंज
और ज्वालामुखियाँ हों चूर्ण।
व्याख्या : श्रद्धा ने पुन: कहा कि मेरी हार्दिक अभिलाषा तो यही है कि ईश्वर द्वारा रची गई यह मंगलमयी सृष्टि इस पृथ्वी पर पूर्ण रूप से सफल हो और चाहे सभी स्थानों पर समुद्र ही दिखाई पड़े अर्थात् जल फैल जाए और सूर्य, चंद्र व तारे आदि ग्रह अपने स्थानों से विचलित हो उठें तथा चाहे अनेक ज्वालामुखी पर्वत फटने लगे परंतु मनुष्य को कभी भी किसी भी प्रकार विचलित न होना चाहिए। इस प्रकार भयंकर से भयंकर परिस्थितियों में भी मानव प्राणी को अविचलित रह उसे मंगलमयी सृष्टि की सत्ता को सार्थक सिद्ध करना चाहिए।
(8)
उन्हें चिंगारी सदृश सदर्प
कुचलती रहे खड़ी सानंद;
आज से मानवता की कीर्ति
अनिल, भू, जल में रहे न बंद।
व्याख्या : श्रद्धा का कहना है कि जिस प्रकार हम गर्व और आनंद के साथ अपने पद तल से आग की भयंकर चिंगारी को कुचल देते हैं उसी प्रकार हमें आपदाओं को तुच्छ समझ कर उल्लासपूर्वक अपना मस्तक ऊँचा उठाए प्रगति पथ पर अग्रसर होना चाहिए जिससे कि मानवता का यश जल, थल और पवन तक सीमित न रहे ।
(9)
जलधि में फूटें कितने उत्स
द्वीप, कच्छप डूबें-उतराएँ;
किंतु वह खड़ी रहे दृढ़ मूर्ति
अभ्युदय का कर रही उपाय।
व्याख्या : श्रद्धा मनु को प्रोत्साहित करते हुए कह रही है कि समुद्र चाहे कितनी ही जलधाराओं के रूप में बहने लगे और कछुए की भाँति द्वीप समूह चाहे उनमें कितनी ही बार डूबें या बाहर आएँ लेकिन मनुष्य दृढ़तापूर्वक अपने स्थान पर डटे रहना चाहिए और मानव जाति के अभ्युदय का उपाय सोचना चाहिए। वस्तुत: मनु जल प्लावन की भयंकरता को देख हताश हो गए थे अत: स्वाभाविक ही उन्हें प्रेरणा देने के लिए श्रद्धा ने उनसे कहा कि उन्हें पृथ्वी को जल मग्न देख हताश न होना चाहिए क्योंकि यह जल प्लावन तो सृष्टि के नियमानुकूल ही है और इसमें परिवर्तन का नियम लागू होता है।
(10)
विश्व की दुर्बलता बल बने,
पराजय का बढ़ता व्यापार
हँसाता रहे उसे सविलास
शक्ति का क्रीड़ामय संचार।
व्याख्या : श्रद्धा का कहना है कि जगत के सभी प्राणियों को अपनी कमज़ोरियों से निराश न होना चाहिए बल्कि उन्हें यही समझना चाहिए कि कमज़ोरी ही शक्ति के रूप में परिणित हो उठती है और हम ज्यो-ज्यों अपनी दुर्बलता पर विजय प्राप्त करते है त्यों-त्यों हमारे हृदय में अपूर्व बल भी बढ़ता जाता है। यदि मानव जीवन में बार-बार पराजय ही मिले तो भी भयभीत या निराश होकर पलायनवादी विचारधारा को अपनाना बुद्धिमानी नहीं है बल्कि प्रसन्नतापूर्वक हृदय में शक्ति एकत्र कर प्रत्येक कठिनाई का सामना करने को तैयार रहना चाहिए और चाहे कितनी ही भयानक से भयानक परिस्थिति क्यों न आए लेकिन कभी भी साहस नहीं खोना चाहिए।
(11)
शक्ति के विद्युत्कण, जो व्यस्त
विकल बिखरे हैं, हो निरुपाय;
समन्वय उसका करें समस्त
विजयिनी मानवता हो जाए।
व्याख्या : श्रद्धा कह रही है कि जिस प्रकार विद्युत्कण शून्य में इधर-उधर बिखरे पड़े रहने पर कुछ भी करने में असमर्थ रहते हैं परंतु ज्यों ही उनका एकीकरण हो जाता है त्यों ही वे सब मिलकर अगणित लोकों की सृष्टि करते हैं उसी प्रकार जब तक मनुष्य की शक्ति इधर-उधर बिखरी रहती है तब तक वह अशांत और असहाय-सा जान पड़ता। इस प्रकार मनुष्य को चाहिए कि वह बिखरी हुई शक्ति को एकत्र कर शक्ति समन्वित हो जाए और ऐसा करने पर ही मानवता की विजय निर्विवाद रूप से होगी।
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