चिंता सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 1 )

(1)

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह,
एक पुरुष, भींगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह ।
नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन,
एक तत्व की ही प्रधानता-कहो उसे जड़ या चेतन ।

प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘चिंता सर्ग’ से अवतरित है | प्रस्तुत काव्यांश में जलप्रलय के बाद मनु की मनोस्थिति का वर्णन है जहाँ मनु प्रलय के कारणों व ‘चिंता’ के स्वरूप पर विचार करता है |

व्याख्या : हिमालय पर्वत की ऊँची चोटी पर एक शिला की शीतल छाया में बैठा हुआ एक पुरुष अश्रु पूर्ण नेत्रों से जल प्रलय के फलस्वरूप उत्पन्न हुई अपार जलराशि को देख रहा था।
वह पुरुष अपने चारों ओर जल तत्व की ही प्रधानता देखता था। शिला-खंड के पास से प्रवाहित होने वाला जल द्रव रूप में था, और बर्फ़ के रूप में ठोस था लेकिन जल या बर्फ़ वास्तव जल तत्व के ही दो रूप हैं। कवि का अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार जल तत्व एक होते हुए भी तरल और सघन रूपों में विद्यमान है, उसी प्रकार ईश्वर की सत्ता एक होने पर भी सृष्टि में विविध रूपों में प्रतिभासित होती है।

(2)

दूर-दूर तक विस्तृत था हिम स्तब्ध उसी के हृदय-समान,
नीरवता-सी शिला-चरण से टकराता फिरता पवमान।
तरुण तपस्वी-सा वह बैठा साधन करता सुर-श्मशान,
नीचे प्रलयसिंधु लहरों का होता था सकरुण अवसान।

व्याख्या : जिस प्रकार दूर-दूर तक फैली हुई बर्फ़ बिल्कुल जड़ जान पड़ती थी, उसी प्रकार उस व्यक्ति का हृदय भी स्पंदनहीन जान पड़ता था। जैसे पवन की नीरव चोटों से शिला की स्थिरता नहीं टूटती, वैसे ही मनु का हृदय चट्टान के ही सदृश्य था और उनकी शांति किसी भी प्रकार भंग नहीं हो रही थी।
वह तरुण पुरुष तपस्वी की भांति दैवीय शक्ति की साधना में लीन जान पड़ता था। इस प्रलय कालीन सागर की लहरें रह-रह शिलाखंड से आकर टकराती थीं और अत्यंत करुणा पूर्ण ध्वनि उत्पन्न कर वहीं समाप्त सी हो जाती थी।

(3)

उसी तपस्वी-से लंबे थे देवदारु दो चार खड़े,
हुए हिम-धवल, जैसे पत्थर बन कर ठिठुरे रहे अड़े।
अवयव की दृढ़ मांस-पेशियाँ, ऊर्जस्वित था वीर्य अपार,
स्फीत शिराएँ, स्वस्थ रक्त का होता था जिनमें संचार।

व्याख्या : पास में ही उस तरुण तपस्वी के सदृश्य लंबे-लंबे कुछ देवदारु के वृक्ष थे, जो कि हिमाच्छादित हो जाने के कारण न केवल बिल्कुल सफ़ेद जान पड़ते थे अपितु ऐसा प्रतीत होता था मानो शीत से ठिठुर जाने के कारण वे पत्थर के समान अड़कर रह गए हों।
उस व्यक्ति के शरीर का प्रत्येक अवयव सृदृढ़ था और मुख की कांति भी अपूर्व ओजमयी थी तथा वह स्वस्थ रक्त के संचार से परिपूर्ण नसों के कारण अत्यंत आकर्षक भी प्रतीत होता था।

(4)

चिंता-कातर बदन हो रहा पौरुष जिसमें ओत-प्रोत,
उधर उपेक्षामय यौवन का बहता भीतर मधुमय स्रोत ।
बँधी महावट से नौका थी सूखे में अब पड़ी रही,
उतर चला था वह जल-प्लावन, और निकलने लगी मही।
निकल रही थी मर्म वेदना करुणा विकल कहानी-सी,
वहां अकेली प्रकृति सुन रही, हंसती-सी पहचानी-सी।

व्याख्या : उसके शरीर से अनुपम पौरुष झलक रहा था; पर साथ ही वह चिंता के कारण कुछ-कुछ व्याकुल भी जान पडता था। इसी प्रकार उस व्यक्ति की हृदय-स्थली में यौवनकालीन अनेक मधुर स्मृतियाँ भी विद्यमान थीं। प्रलय के शोक के सामने उसकी प्रेम भावनाएँ उपेक्षित जान पड़ती थी।
जिस नाव का सहारे मनु ने जल प्रलय में अपने प्राणों की रक्षा की थी, वह नाव सूखी ज़मीन पर एक विशाल बरगद के वृक्ष से बँधी हुई थी। क्षण-प्रतिक्षण जल की बाढ़ भी कम होती जा रही थी और पृथ्वी भी दिखाई पड़ने लगी थी। उस व्यक्ति का हृदय वेदनापूर्ण था और अब वह अपनी करुण कहानी का वर्णन कर रहा था। उसकी इस दर्द भरी कहानी को श्रवण करने वाली और उसकी व्यथाओं की अनुभूति करने वाली मात्र प्रकृति ही उस कहानी को मुस्कराती हुई सुन रही थी और ऐसा प्रतीत होता था कि मानो वह पहले से ही उसकी कहानी से परिचित है।

(5)

‘ओ चिंता की पहली रेखा, अरी विश्व-वन की व्याली,
ज्वालामुखी स्फोट के भीषण प्रथम कंप-सी मतवाली!
है अभाव की चपल बालिके, री ललाट की खललेखा!
हरी-भरी-सी दौड़-धूप,ओ जलमाया की चल-रेखा !

व्याख्या : मनु चिंता को संबोधित कर कहता है कि आज पहली बार उसके हृदय में चिंता प्रवेश कर सकी है। जिस प्रकार संसार रूपी उपवन में विचरण करने वाले प्राणियों को सर्पिणी पग-पग कर सशंकित कर देती है उसी प्रकार जिस मनुष्य का हृदय चिंताग्रस्त हो जाता है वह कुछ भी नहीं कर पाता। जिस प्रकार ज्वालामुखी पर्वत का प्रथम विस्फोट ही भीषण प्रभावकारी होता है तथा वह अपने समीपवर्ती सभी पर्दाथों को प्रभावित कर उन्हें नष्ट कर देता है उसी प्रकार चिंता का आगमन होते ही मन के अन्य समस्त क्रिया-व्यापार नष्ट हो जाते हैं।

चिंता अभाव की चंचल बालिका है क्योंकि वह अभाव से ही उत्पन्न होती है। चिंता मनुष्य के ललाट की वह रेखा है, जो उसकी नियति निर्धारित करती है। ज्यों ही मनुष्य के हृदय में चिंता उत्पन्न होती है, वह अस्थिर हो जाता है। वह उससे मुक्ति पाने के लिए प्रयत्न करने लगता है। जिस तरह जल में अनेकानेक लहरें उठती रहती हैं उसी प्रकार चिंता भी इस माया-जगत में उठने वाली एक हलचल के समान है।

(6)

इस ग्रहकक्षा की हलचल—री तरल गरल की लघु-लहरी,
जरा अमर-जीवन की, और न कुछ सुनने वाली, बहरी!
अरी व्याधि की सूत्र-धारिणी—अरी आधि, मधुमय अभिशाप!
हृदय-गगन में धूमकेतु-सी, पुण्य-सृष्टि में सुन्दर पाप।

व्याख्या : चिंता समस्त संसार में हलचल उत्पन्न करने वाली है जिस प्रकार विष की हल्की लहर मनुष्य के शरीर में व्याप्त होते ही उसे व्याकुल अवश्य कर देती है पर उसके जीवन का पूर्ण रूप से अंत नहीं कर देती, उसी प्रकार चिंता भी मनुष्य को केवल व्यथा ही पहुँचा पाती है। वह अपने जीवन को अमर समझने वाले देवताओं को भी वृद्ध बना देती है। चिंता इतनी स्वच्छंद और निष्ठुर है कि जब वह किसी मानव मन में प्रविष्ट होती है तब उसका रुदन नहीं सुन सकती और बहरी बनकर स्वच्छंदता के साथ उस पर अपना अधिकार स्थापित कर लेती है।

चिंता मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार की व्यथाओं को उत्पन्न करने वाली है। चिंता के कारण मन हमेशा व्याकुल रहता है, वह शाप तो है ही, पर इसे एक मधुर अभिशाप ही समझना चाहिए क्योंकि यदि जीवन में चिंता न हो तो मनुष्य सुख प्राप्ति के लिए प्रयत्न ही नहीं करेगा और जीवन की मधुरता से वंचित रह जाएगा। चिंता का उदय ठीक उसी प्रकार विध्वंस का द्योतक है जिस प्रकार आकाश में पुच्छल नक्षत्र के उदय होने पर सृष्टि में बाह्य विनाश की आशंका होने लगती है। अपने अच्छे-बुरे गुणों के कारण ही चिंता इस पुण्य भूमि में सुंदर पाप की तरह है |

(7)

मनन करावेगी तू कितना? उस निश्चिंत जाति का जीव—
अमर मरेगा क्या? तू कितनी गहरी डाल रही है नींव।
आह! घिरेगी हृदय-लहलहे-खेतों पर करका-घन-सी,
छिपी रहेगी अंतरतम में सब के तू निगूढ़ घन-सी।

व्याख्या : हे चिंता! यद्यपि तू आज इतना अधिक सोच विचार करवाकर मुझे व्यथित कर रही है, पर मुझे इसकी तनिक भी परवाह नहीं है क्योंकि अमर जीवात्मा को नष्ट करने की शक्ति किसी में नहीं है। चिंता के कारण मुझे चाहे कितना दुख क्यों न हो परंतु इससे मेरे जीवन का अंत किसी भी प्रकार नहीं हो सकता।
जिस प्रकार ओलों से परिपूर्ण बादल हरी-भरी खेती को नष्ट कर देने की आशंका पैदा करते हैं, उसी प्रकार हृदय में चिंता के उदय होते ही मानव मन आशंकित हो उठता है। जिस प्रकार पृथ्वी मे छुपे हुए धन का पता उसी व्यक्ति को रहता है जो कि उसे वहाँ छिपाता है, चिंता भी मनुष्य के अंत करण में छिपी रहती है और उसका पता वही जान पाता है जो चिंताक्रांत होता है।

(8)

बुद्धि, मनीषा, मति, आशा, चिन्ता तेरे हैं कितने नाम।
अरी पाप है, तू, जा, चल जा, यहाँ नहीं कुछ तेरा काम।
विस्मृति आ, अवसाद घेर ले, नीरवते! बस चुप कर दे,
चेतनता चल जा, जड़ता से आज शून्य मेरा भर दे।

व्याख्या : चिंता के न जाने कितने नाम हैं! चिंतन द्वारा ही मनुष्य सत-असत् का निर्णय कर पाता है, इसीलिए वह बुद्धि कहलाती है; वह हृदय में ज्ञान उत्पन्न करती है अतः उसे मनीषा भी कहा जाता है। चिंता ही मति भी कहलाती है क्योंकि मनुष्य उसी की सहायता से किसी विवाद ग्रस्त विषय के संबंध में अपनी कोई निश्चित धारणा बना सकता है और मनुष्य की शोकावस्था में चिंता ही आशा के रूप में सांत्वना प्रदान करती है। चिंता के इतने रूप होते हुए भी वह जिस रूप में मनु के हृदय में उदय हुई है, वह अत्यंत अशुभ है इसलिए मनु चिंता को संबोधित करते हुए कहता है कि उसका यहाँ पर कुछ भी काम नहीं है।

चिंतातुर मनु की चाहत है कि विस्मृति उसे घेर ले ताकि अतीत की स्मृति उसे पीड़ा न दे सके। मनु अपने शरीर में शिथिलता चाहता है ताकि उनमें तनिक भी सोचने-विचारने का उत्साह न रहे। इसी प्रकार मनु अपने हृदय में उठने वाली समस्त हलचलों को शांत करना चाहते हैं और अपनी समस्त चेतना को विलुप्त होती हुई भी देखना चाहते हैं जिससे कि उन्हें किसी प्रकार की शारीरिक या मानसिक व्यथा की अनुभूति न हो सके।

(9)

“चिन्ता करता हूँ मैं जितनी उस अतीत की, उस सुख की,
उतनी ही अनंत में बनती जाती रेखाएँ दुःख की।
आह सर्ग के अग्रदूत! तुम असफल हुए, विलीन हुए,
भक्षक या रक्षक जो समझो, केवल अपने मीन हुए।

व्याख्या : चिंता की अवसन्न स्थिति से मनु का ध्यान देवताओं के विलासी जीवन की ओर गया। अब मनु कहते हैं कि विगत दिनों की उन मनोहर स्मृतियों के संबंध में वे जितना ही अधिक सोचते हैं, उतना ही अधिक दुःख उन्हें होता है।
मनु कह रहे हैं कि जिन देवताओं का जन्म इस धरती पर सबसे पहले हुआ था और जिन्हें इस सृष्टि का अग्रदूत कहा जाता था, उन्हीं का आज अस्तित्व ही समाप्त हो गया और वे इस अपार जलराशि में विलीन हो गए। जिस प्रकार मछलियाँ अपनी जाति का विकास करती हैं, उसी प्रकार जिन देवताओं ने अपनी जाति का उत्थान किया था उन्होंने अब आठों पहर विलास में ही लीन रहकर स्वयं ही अपने आपको नष्ट कर डाला।

(10)

अरी आँधियो! ओ बिजली की दिवा-रात्रि तेरा नर्त्तन,
उसी वासना की उपासना, वह तेरा प्रत्यावर्त्तन।
मणि-दीपों के अंधकारमय अरे निराशा पूर्ण भविष्य।
देव-दंभ के महामेघ में सब कुछ ही बन गया हविष्य।

व्याख्या : मनु कह रहे हैं कि जल प्रलय के पूर्व दिन-रात आँधियों और बिजलियों का भयंकर नृत्य होता रहा परंतु देवतागण भोग-विलास में ही लीन रहे। जब वे सचेत न हुए तब प्रकृति ने अपना भीषणतम रूप धारण कर उन्हें सर्वथा नष्ट कर दिया।
जिस देव जाति को अपनी तक इस बात का अहंकार था कि उसका विनाश कोई भी नहीं कर सकता वही अब इस जल प्रलय के कारण नष्ट हो गई। जिस प्रकार घोर अंधकार में रखा हुआ मणि का एक दीपक केवल अपने आसपास ही थोड़ा सा प्रकाश कर पाता है और अपने चारों और व्याप्त तिमिर-राशि को सर्वथा नष्ट कर देने की शक्ति उसमें नहीं रहती उसी प्रकार आज वह स्वयं भी अपने भविष्य के विषय में कुछ भी सोचने-विचारने में असमर्थ है।

(11)

अरे अमरता के चमकीले पुतलो! तेरे वे जयनाद—
काँप रहे हैं आज प्रतिध्वनि बनकर मानो दीन विषाद।
प्रकृति रही दुर्जय, पराजित हम सब थे भूले मद में,
भोले थे, हाँ तिरते केवल सब विलासिता के नद में।

व्याख्या : आज तक जिन देवताओं का जयघोष चारों ओर गूँजा करता था, अब देव जाति का पतन हो जाने पर वे ही जय-ध्वनियाँ दीनता और दुःखपूर्ण स्वरों में प्रतिध्वनित हो रही है।
मनु कह रहे हैं कि अंत में प्रकृति की ही विजय हुई और घमंड में फूले देवताओं को पराजय स्वीकार करनी पड़ी। देवता यह भूल गए थे कि विलासिता की अधिकता से उनका नाश हो जाएगा। अज्ञानतावश वे हमेशा भोग-विलास की नदी में ही डूबे रहे।

(12)

वे सब डूबे, डूबा उनका विभव, बन गया पारावार-
उमड़ रहा था देव-सुखों पर जलधि का नाद अपार | वह उन्मत्त विलास हुआ क्या! स्वप्न रहा या छलना थी!
देवसृष्टि की सुख-विभावरी ताराओं की कलना थी।

व्याख्या : मनु का कहना है कि न केवल वे सभी देवगण जो कि हमेशा भोग-विलास में ही लीन रहते थे, सब डूब गए। जल-प्लावन के कारण जो उमड़ता हुआ समुद्र ऐसा प्रतीत होता है मानो देवताओं का वैभव ही पानी बनकर इस अगाध सागर के रूप में चारों ओर फैला हुआ है और वह उनके समस्त सुखों को अपने में लीन कर दुःख को ध्वनित कर रहा है।
आख़िर देवताओं का वह निर्बाध, उच्छृंखल भोग विलास आज कहाँ चला गया? क्या यह सब केवल स्वप्न मात्र या भ्रम ही था? मनु का कहना है कि देवताओं के संसार की वह सुख-रात्रि ताराओं से परिपूर्ण थी और जिस प्रकार तारागणों की कोई गिनती ही नहीं ही पाती उसी प्रकार देवताओं के भोग-विलास की भी कोई सीमा न थी।

(13)

चलते थे सुरभित अंचल से जीवन के मधुमय निश्वास,
कोलाहल में मुखरित होता देव जाति का सुख-विश्वास।
सुख, केवल सुख का वह संग्रह, केंद्रीभूत हुआ इतना,
छायापथ में नव तुषार का सघन मिलन होता जितना।

व्याख्या : स्त्रियों के सुगंधित आँचलों की छाया से देवगण मादक साँसे लिया करते थे और विलास एवं वैभव के वातावरण में सुख तथा स्वच्छंदता के साथ अपना जीवन व्यतीत करना ही उनका लक्ष्य था।
वास्तव में देवताओं के जीवन का एकमात्र लक्ष्य सुखोपभोग ही था और उन्होंने विविध सुखों को अपने पास उसी प्रकार एकत्र कर लिया था जिस प्रकार नवीन बर्फ़ कणों की भाँति चमकने वाले अनेकानेक तारे आकाश गंगा में गुँथे हुए जान पड़ते है।

(14)

सब कुछ थे स्वायत्त, विश्व के—बल, वैभव, आनंद अपार,
उद्वेलित लहरों-सा होता उस समृद्धि का सुख-संचार।
कीर्ति, दीप्ति, शोभा थी नचती अरुण-किरण-सी चारों ओर,
सप्तसिंधु के तरल कणों में, द्रुम-दल में, आनंद-विभोर।

व्याख्या : मनु कह रहे हैं कि संसार के समस्त बल-वैभव के स्वामी देवता थे इसी कारण उनका जीवन अपूर्व सुखमय और समृद्धिशाली हो गया था। जिस प्रकार आज समुद्र की लहरें उमड़-घुमड़ कर अपनी सत्ता एवं व्यापकता का परिचय दे रही है उसी प्रकार देवता भी अपनी समृद्धि का परिचय देते थे।

मनु का कहना है कि देवताओं का यश, तेज़ और शोभा प्रातः कालीन सूर्य की किरणों के समान चारों ओर व्याप्त थी। इतना ही नहीं देवता सप्त सिंधु के तरल कणों और वृक्षों के झुंड में आनंद मग्न होकर घूमा करते थे।

(15)

शक्ति रही हाँ शक्ति-प्रकृति थी पद-तल में विनम्र विश्रांत,
कंपती धरणी उन चरणों से होकर प्रतिदिन ही आक्रांत।
स्वयं देव थे हम सब, तो फिर क्यों न विशृंखल होती सृष्टि?
अरे अचानक हुई इसी से कड़ी आपदाओं की वृष्टि।

व्याख्या : मनु का कहना है कि देवताओं में अपूर्व शक्ति विद्यमान थी और प्रकृति भी पराजित होकर नम्रता के साथ उनके चरणों से झुक गई थी तथा धरती उनके चरणों से पद दलित होकर प्रतिदिन काँपती रहती थी। मनु कह रहे हैं कि देवताओं ने यह समझ लिया कि अब वे स्वयं ही अपने कर्मों के नियामक है तथा जो कुछ चाहें करने को स्वतंत्र हैं तब स्वाभाविक ही उनकी संयमहीनता के कारण संसार की व्यवस्था ही छिन्न-भिन्न होने लगी और उन्हें अनेक विपत्तियाँ झेलनी पड़ीं।

(16)

गया, सभी कुछ गया, मधुर तम सुर-बालाओं का शृंगार,
उषा ज्योत्स्ना-सा यौवन-स्मित मधुप-सदृश निश्चिंत विहार।
भरी वासना-सरिता का वह कैसा था मदमत्त प्रवाह,
प्रलय-जलधि में संगम जिसका देख हृदय था उठा कराह।”

व्याख्या : मनु का कहना है कि देवताओं का समस्त ऐश्वर्य और आनंद विहार नष्ट हो गया तथा देवबालाओं का शृंगार और उषा-सा उनका यौवन, चाँदनी सी उनकी मुस्कानें तथा मतवाले भँवरे के समान उनका निश्चिंत भोग विलास आदि नष्ट हो गया।

देवताओं के जीवन में उमड़ती हुई वासना रूपी नदी तीव्र वेग के साथ प्रवाहित हुई और अंत में यह नदी विनाश के समुद्र में ही विलीन हो गई। उनके इस अंत से अब मनु का हृदय कराह उठता है।



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