(1)
फैली खेतों में दूर तलक
मखमल की कोमल हरियाली,
लिपटीं जिससे रवि की किरणें
चाँदी की सी उजली जाली!
तिनकों के हरे हरे तन पर
हिल हरित रुधिर है रहा झलक,
श्यामल भू तल पर झुका हुआ
नभ का चिर निर्मल नील फलक!
उपरोक्त पंक्तियों में कवि सुमित्रानंदन पंत जी ने गाँव के प्राकृतिक सौंदर्य का बड़ा ही सुंदर चित्रण किया है। गाँव में दूर-दूर तक हरे – हरे खेतों में चारों तरफ मलमल के समान कोमल हरियाली फैली हुई है। उस कोमल घास पर सुबह-सुबह जब ओस की बूँदों पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे खेतों की हरियाली के ऊपर चाँदी की कोई साफ व् स्वच्छ जाली बिछी हुई है।
हरे-हरे तिनकों के हरे-हरे शरीर जब हवा से हिलते हैं, तब उनके हरे रंग का रक्त मानो झलक पड़ता है। कहने का तात्पर्य यह है कि तिनकों पर ठहरी हुई ओस की बूँदे, पारदर्शी होने के कारण हरे रंग की दिख देती हैं, और जब तिनके हिलते हैं तो ऐसा लगता है कि उन तिनकों पर हरे रंग की ओस की बूँदे उनका रक्त है जो हवा चलने पर तिनकों से गिर रहा है।
साँवली मिट्टी वाली धरती पर नीला स्वच्छ आकाश सदा झुका रहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि खेतों की हरियाली और स्वच्छ आकाश को देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि आकाश झुककर खेतों की हरियाली के ऊपर अपने नीले रंग के आँचल को बिछा रहा है।
(2)
रोमांचित सी लगती वसुधा
आई जौ गेहूँ में बाली,
अरहर सनई की सोने की
किंकिणियाँ हैं शोभाशाली!
उड़ती भीनी तैलाक्त गंध
फूली सरसों पीली पीली,
लो, हरित धरा से झाँक रही
नीलम की कलि, तीसी नीली!
कवि कहता है कि धरती बहुत अधिक प्रसन्न लग रही है क्योंकि खेतों में जौ और गेहूँ की फ़सल में बीज आ गए हैं अर्थात् जौ और गेहूँ की फ़सल पक गई है। अरहर और सनई की पकी फ़सलों पर पीले रंग के फूल किसी सोने की करघनी जैसे लग रहे हैं, जिन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे धरती रूपी युवती ने कमर में करघनी पहनी हुई है, जिसके कारण उसकी सुंदरता और अधिक बढ़ रही है। सरसों के पीले फूलों के खिल जाने से हवा में तेल युक्त सुगंध बह रही है। हरे खेतों में कहीं-कहीं खिले अलसी के नीले फूल नीलम रूपी रत्न के समान चमक रहे हैं, जो हरी-भरी धरती की सुंदरता को बढ़ाने का काम कर रहे हैं। कहने का आशय यह है कि खेतों में गेहूँ, जौ की बालियाँ, अरहर और सनई की फलियाँ, सरसों के पीले फूल एवं अलसी की कलियाँ धरती का सौंदर्य बढ़ा रही हैं।
(3)
रंग रंग के फूलों में रिलमिल
हँस रही सखियाँ मटर खड़ी,
मखमली पेटियों सी लटकीं
छीमियाँ, छिपाए बीज लड़ी!
फिरती हैं रंग रंग की तितली
रंग रंग के फूलों पर सुंदर,
फूले फिरते हैं फूल स्वयं
उड़ उड़ वृंतों से वृंतों पर!
कवि कहता है कि विभिन्न रंगों के फूलों के बीच मटर की फसल जब हवा चलने पर हिलती है तो उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे सारी सखियाँ एक – दूसरे से मिलकर हँसी मज़ाक़ कर रही हो। कोमल संदूकों के समान मटर की फलियाँ लटकी हुई हैं जिनमें बीजों की लड़ियाँ छिपी हुई हैं। बसंत ऋतु आने पर हर जगह रंग – बिरंगे सुंदर फूलों पर रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराती हैं। अर्थात तितलियाँ एक फूल से दूसरे फूल तक उड़-उड़कर जाती हैं। हवा चलने पर लहलहाते फूलों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने के लिए फूल स्वयं उठ – उठ कर दूसरे फूलों के डंठलों से गले मिल रहे हों।
(4)
अब रजत स्वर्ण मंजरियों से
लद गई आम्र तरु की डाली,
झर रहे ढाक, पीपल के दल,
हो उठी कोकिला मतवाली!
महके कटहल, मुकुलित जामुन,
जंगल में झरबेरी झूली,
फूले आड़ू, नींबू, दाड़िम,
आलू, गोभी, बैंगन, मूली!
इन पंक्तियों में कवि बसंत-ऋतु का सुंदर वर्णन करते हुए कहता है कि बसंत ऋतु की शुरुआत में आम के पेड़ों की डालियाँ चाँदी और सोने के रंग की कलियों से लद चुकी हैं। पतझड़ के कारण पलाश और पीपल के पेड़ की पत्तियाँ झड़ रही हैं। इन सभी परिवर्तनों को देखकर कोयल भी मदमस्त होकर मधुर संगीत सुना रही है। कटहल पक गए हैं जिनके कारण उसकी महक पूरे वातावरण में फैल गई है और जामुन कुछ पक गए हैं और कुछ कच्चे हैं। जंगल में बेरों की झाड़ियाँ छोटे – छोटे बेरों से भर गई हैं और झूल रही हैं। इस मौसम में आड़ू, नींबू, अनार, आलू, गोभी, बैंगन, मूली आदि कई तरह के फल एवं सब्ज़ियाँ उग चुकी हैं।
(5)
पीले मीठे अमरूदों में
अब लाल लाल चित्तियाँ पड़ी,
पक गए सुनहले मधुर बेर,
अँवली से तरु की डाल जड़ी!
लहलह पालक, महमह धनिया,
लौकी औ’ सेम फलीं, फैलीं
मखमली टमाटर हुए लाल,
मिरचों की बड़ी हरी थैली!
कवि कहता है कि बसंत ऋतु आने के कारण पीले और मीठे अमरुद पक चुके हैं और उनपर लाल-लाल निशान या दाग भी दिखाई दे रहे हैं। अर्थात अमरुद पक कर मीठे हो चुके हैं। बेर भी पककर सुनहरे रंग के हो गए हैं। छोटे-छोटे आँवलों के कारण पेड़ की पूरी डाल ऐसी लदी हुई है, जैसे किसी गहने में मोती जड़े होते हैं। पालक की फसल पूरे खेत में लहलहा रही है और धनिये की सुगंध तो भी पूरे वातावरण में फैली हुई है। लौकी और सेम की बेलें भी खेतों में फैल गई हैं। मखमल की तरह कोमल टमाटर भी पककर लाल हो गए हैं। और हरी मिर्चों के गुच्छे किसी बड़ी हरी थैली की तरह लग रहे हैं।
(6)
बालू के साँपों से अंकित
गंगा की सतरंगी रेती
सुंदर लगती सरपत छाई
तट पर तरबूजों की खेती;
अँगुली की कंघी से बगुले
कलँगी सँवारते हैं कोई,
तिरते जल में सुरखाब, पुलिन पर
मगरौठी रहती सोई!
कवि के अनुसार, गंगा के किनारे की रेत पर लहरों के निशान इस प्रकार दिखाई दे रहे हैं जैसे बालू पर कई साँपों ने अपने निशान छोड़ दिए हों अर्थात कई साँप उस रेट पर से गए हों। उस रेत पर पड़ती सूर्य की किरणों के कारण वह रेत इंद्रधनुष के सात रंगों के समान सतरंगी नज़र आ रहा है। गंगा के तट पर बिछी घास और तरबूजों की खेती बहुत ही सुंदर दिखाई दे रही है। गंगा के तट पर बगुले अपने पंजों से कलँगी को ऐसे सँवार रहे हैं, मानो वे कंघी कर रहे हों। चक्रवाक अथवा चकवा पक्षी जल में तैर रहे हैं और मगरौठी पक्षी गीली रेत में आराम से सोए हुए हैं।
(7)
हँसमुख हरियाली हिम-आतप
सुख से अलसाए-से सोए,
भीगी अँधियाली में निशि की
तारक स्वप्नों में-से खोए-
मरकत डिब्बे सा खुला ग्राम-
जिस पर नीलम नभ आच्छादन-
निरुपम हिमांत में स्निग्ध शांत
निज शोभा से हरता जन मन!
कवि कहता है कि सर्दी की धूप में जब सूर्य की किरणें खेतों की हरियाली पर पड़ती हैं, तो वह इस तरह चमक उठती है, मानो वह बहुत खुश है और इसी ख़ुशी के कारण कवि को वह सुख से सोती हुए प्रतीत हो रही है। सर्दी की रातें ओस के कारण भीगी हुई प्रतीत होती हैं, और तारों को देखकर लगता है मानो वे किसी सपने में खोये हुए हैं। गाँव में हर तरफ़ हरियाली फैली हुई ऐसी लग रही है जैसे हरे रंग के रत्न ‘पन्नों’ से भरा कोई डिब्बा खुल गया हो जिस पर ‘नीलम’ रूपी नीले रंग के रत्न के समान नीले आकाश ने अपनी चादर ओढ़ा रखी हो। इस प्रकार शीत ऋतु के अंत में गाँव के वातावरण में ऐसी सुंदर व् सौम्य शांति फैली हुई है, जो अपनी सुंदरता से सभी का मन मोह रही है।
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