श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 3)

(1)

एक विस्मृति का स्तूप अचेत,
ज्योति का धुँधला-सा प्रतिबिंब;

और जड़ता की जीवन राशि
सफलता का संकलित विलंब।

प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन को शब्द दिये गये हैं |

व्याख्या : मनुष्य अपने जीवन को जड़ता से पूर्ण विस्मृतियों का स्तंभ भी कहते हैं और उन्हें वह ज्योति की धुँधली-सी छाया जैसा लगता है। इसका अर्थ यह है कि मनु अपने आपको कीर्तिमान देवजाति का क्षुद्र वंशज ही समझते हैं और वे रह-रह कर यही सोचते हैं कि सफलता प्राप्त करने में न जाने अभी कितना समय और लगे क्योंकि उन्हें चारों ओर विलंब ही बिलंब देखना पड़ रहा है।

(2)

“कौन हो तुम वसंत के दूत?
विरस पतझड़ में अति सुकुमार!

घन तिमिर में चपला की रेख,
तपन में शीतल मंद बयार।

व्याख्या : कवि कह रहा है कि आगंतुक को अपने दयनीय एवं अभावग्रस्त जीवन से परिचित कराने के पश्चात् मनु ने यह जानना चाहा कि आख़िर वह रमणी कौन है? मनु उस आगंतुक से कह रहे हैं कि उनके जीवन में वसंत के समान उल्लासमय वातावरण प्रस्तुत करने की आशा उत्पन्न करने वाले तुम कौन हो? इस प्रकार मनु आगंतुक से कहते हैं कि वे तो अपने जीवन को पतझड़ के समान मानते हैं और उस नारी को वसंत का दूत समझते हैं तथा यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि उन्हें उसकी बातें सुनकर यह आशा हो चली है कि उसके जीवन से शीघ्र ही सरसता और मधुरता का आगमन होगा।

(3)

नखत की आशा किरण समान,
हृदय की कोमल कवि की कांत—

कल्पना की लघु लहरी दिव्य
कर रही मानस हलचल शांत!

व्याख्या : मनु कहते हैं कि जैसे सघन अंधकार में विद्युत की क्षीण रेखा चमक उठती है वैसे ही आज उनके निराशारूपी अंधकारपूर्ण जीवन में वह आगंतुक आशा की सुनहली किरण के समान जान पड़ता है और उसे देखकर उन्हें वैसी ही शांति प्राप्त होती है जैसी ग्रीष्म ऋतु में शीतल मंद पवन के प्रवाहित होने से मानव मात्र को प्राप्त होती है। इतना ही नहीं मनु उस आगंतुक को अंधकार में नक्षत्र की किरण के समान मानते हैं अर्थात् उनकी दृष्टि में वह रमणी उनके नैराश्यपूर्ण हृदय में आशा की किरण के समान है। इसलिए उसका आगमन होते ही उनके मानस प्रदेश की समस्त हलचल शांत हो गई है और उन्हें वैसी ही अनिर्वचनीय आनंद प्राप्त हो रहा है जैसा कि किसी कोमल भावनाओं वाले कवि को दिव्य मनोहर कल्पना के उदय होने पर प्राप्त होता है।

(4)

लगा कहने आगंतुक व्यक्ति
मिटाता उत्कंठा सविशेष;

दे रहा हो कोकिल सानंद
सुमन को ज्यों मधुमय संदेश:-

व्याख्या : कवि का कहना है कि मनु के उद्गारों को सुनने के पश्चात् वह आगंतुक व्यक्ति, उनकी जिज्ञासा शांत करने के लिए अपनी मधुर वाणी से अपना परिचय उसी प्रकार देने लगा जिस प्रकार कोयल प्रसन्न होकर फूल को वसंतागमन की सूचना देती है। वस्तुत: इन पंक्तियों से फूल और मधुमय नामक दोनों ही शब्द श्लिष्ट हैं तथा सुमन का अर्थ फूल के साथ-साथ सुंदर मनवाला और मधुमय का अर्थ वसंतमय एवं मधुर दोनों ही माना जाना चाहिए। इस दूसरे अर्थ के आधार पर यह कहा जा सकता है कि उस आगंतुक ने सुंदर मन वाले मनु को भावी जीवन की मधुर आशा बँधाई।

(5)

भरा था मन में नव उत्साह
सीख लूँ ललित कला का ज्ञान

इधर रह गंधर्वों के देश
पिता की हूँ प्यारी संतान।

व्याख्या : वह आगंतुक रमणी अपना परिचय देते हुए कह रही है कि मैं अपने पिता को अत्यंत प्यारी संतान हूँ और मेरे मन से हमेशा से ललित कलाओं का ज्ञान प्राप्त करने की उत्कट अभिलाषा रही है। इस प्रकार मैं इधर गंधर्वों के देश में रहकर अपनी अभिलाषा पूर्ण कर ही हूँ।

(6)

घूमने का मेरा अभ्यास,
बढ़ा था मुक्त व्योम-तल नित्य;

कुतूहल खोज रहा था व्यस्त
हृदय सत्ता का सुंदर सत्य।

व्याख्या : उस आगंतुक रमणी का कहना है कि स्वच्छंद प्रकृति की होने के कारण मैं इस विस्तृत उन्मुक्त आकाश के नीचे दिन-प्रतिदिन इधर-उधर घूमती रहती थी और इस प्रकार मेरी यह आदत-सी पड़ गई कि चारों ओर घूमकर प्रकृति की सुंदर छवि देखी जाय। वह बाला कहती है कि इस प्रकार प्रकृति के विभिन्न दृश्यों की मनोहर सुषमा को देख, आश्चर्यकित हो मैं अपने हृदय से उठने वाले रहस्यों को सुलझाने की चेष्टा करती और हमेशा यह जानने को उत्सुक रहती कि आख़िर इन सुंदर वस्तुओं में विद्यमान सत्य क्या है?

(7)

दृष्टि जब जाती हिम-गिरि ओर
प्रश्न करता मन अधिक अधीर,

धरा की यह सिकुड़न भयभीत
आह कैसी है? क्या है पीर?

व्याख्या : वह आगंतुक रमणी कह रही है कि मेरा मन प्राकृतिक दृश्यों की सुषमा निहार कर रहस्य से पूर्ण हो जाता था और कुतूहल मिटाने के लिए भी वह स्वभाविक ही अधीर हो उठता था अतएव हिमालय पर्वत को देखकर ही कभी-कभी मैं यह सोचने लगती कि आख़िर धरती के हृदय में ऐसी कौन-सी पीड़ा है या उसे कौन-सा कष्ट है कि इसके कारण उसके मस्तक पर चिंता की सिकुड़न पड़ गई है। यहाँ यह स्मरणीय है कि जब कोई भी प्राणी किसी व्यथा से पीड़ित होता है और उसके मन में चिंताएँ-सी उठने लगती है उस समय स्वाभाविक ही उसके मस्तक पर सिकुड़न-सी आ जाती है। अत: इन पंक्तियों में वह बाला हिमालय को धरती के ललाट की सिकुड़न ही मानती है और उसका अनुमान है कि कदाचित् किसी आंतरिक व्यथा के कारण पृथ्वी के मस्तक पर सिकुड़न-सी पड़ गई है और यही सिकुड़न हिमालय के रूप में दीख पड़ती है।

(8)

मधुरिमा में अपनी ही मौन,
एक सोया संदेश महान,

सजग हो करता था संकेत;
चेतना मचल उठी अनजान।

व्याख्या : वह आगंतुक बाला कहती है कि हिमालय पर्वत के मौन सौंदर्य की ओर देखने पर कभी-कभी यह भी आभास होने लगता कि उसकी इस नीरव सुषमा में कोई न कोई महान और गुप्त संदेश अवश्य है। यह भाव सजग हो कुछ संकेत करता था जिससे उसके विषय में जानने की इच्छा बलवती हो उठी कि आख़िर वह संदेश क्या है।

(9)

बढ़ा मन और चले ये पैर,
शैल मालाओं का शृंगार;

आँख की भूख मिटी यह देख
आह कितना सुंदर संभार!

व्याख्या : उस रमणी का कहना हे कि ज्यों ही मेरे मन में हिमालय के मौन सौंदर्य में विद्यमान गुप्त संदेश को जानने की उत्सुक्ता जागृत हुई त्यों ही मेरे चरण भी आगे बढ़ चले। इस प्रकार रमणीय पर्वत शृंखलाओं में अनेक मनोहर दृश्यों को देख मेरे नेत्रों की प्यास बुझ गई और मैं इसी निष्कर्ष में पहुँची कि यह पर्वत ऊपर वैभवशाली है तथा उनकी साज-सज्जा भी मनोहरिणी है।

(10)

एक दिन सहसा सुंधु अपार
लगा टकराने नग तल क्षुब्ध;

अकेला यह जीवन निरुपाय
आज तक घूम रहा विश्रब्ध।

व्याख्या : उस बाला ने मनु से पुन: कहा कि एक दिन अचानक इसी हिमालय पर्वत के नीचे अपार सागर अपने पूरे वेग से उमड़ उठा और वह गरजता हुआ पर्वत की तलहटी से टकराने लगा। वस्तत: इन पंक्तियों में उस रमणी ने भीषण जल प्रलय की ओर संकेत किया है और उसका कहना है कि एक दिन हिमालय पर्वत के चारों ओर जल ही जल दीख पड़ने लगा तथा उसी समय से मैं निरुपाय-सी हो इधर-उधर अकेली आश्वस्त भाव से घूम रही हूँ।

(11)

यहाँ देखा कुछ बलि का अन्न,
भूत-हित-रत किसका यह दान!

इधर कोई है अभी सजीव
हुआ ऐसा मन में अनुमान।

व्याख्या : वह आगंतुक रमणी मनु से कह रही है कि अकेले घूमते-घूमते मैं इस ओर निकल आई और मैंने जब यहाँ पास में ही यज्ञ से बचा हुआ कुछ अन्न देखा तब मुझे यह अनुमान-सा होने लगा कि प्राणियों के हित साधन में तत्पर कोई न कोई प्राणी अवश्य जीवित है। इस प्रकार मुझे यह विश्वास हो गया कि जल प्रलय के पश्चात् मेरे समान कोई दूसरा प्राणी भी जीवित बच रहा है अन्यथा यह अन्न यहाँ न दिखाई देता।

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