श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 4)

(1)

तपस्वी! क्यों इतने हो क्लांत?
वेदना का यह कैसा वेग?

आह! तुम कितने अधिक हताश
बताओ यह कैसा उद्वेग!

प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन और वार्तालाप का वर्णन किया गया है |

व्याख्या : वह बाला मनु को संबोधित कर कहती है कि हे तपस्वी! तुम क्यों इतने दु:खी और निराश जान पड़ते हो तथा तुम्हें इतनी अधिक व्यथा क्यों हो रही है। उसे मुनु को इतना अधिक निराश देखकर आश्चर्य होता है और वह उनसे पूछती है कि तुम्हारी इस अशांति का कारण क्या है?

(2)

हृदय में क्या है नहीं अधीर,
लालसा जीवन की निश्शेष?

कर रहा वंचित कहीं न त्याग
तुम्हें, मन में धर सुंदर वेश!

व्याख्या : वह आगंतुक रमणी मनु से कह रही है कि क्या अब तुम्हारे हृदय में और अधिक दिन जीवित रहने की चाह तथा जीवन के प्रति कुछ भी मोह नहीं रहा जो तुम इस प्रकार निराश से बैठे हो? कहीं ऐसा तो नहीं है कि तुम्हारे हृदय की विराग भावना ही सुंदर आकर्षक रूप धारण कर तुम्हें धोखा दे रही है अर्थात् तुम्हें जीवन से एकाएक विरक्त बना रही है और कहीं तुम अनुराग के अभाव में विवश होकर त्याग की ओर तो उन्मुख नहीं हो गए।

उस रमणी का कहना है कि यदि वास्तव में यही कारण है तो फिर तुम्हें पर्याप्त सावधानी रखनी चाहिए और इन अनुमानित प्रवादों ( अपुष्ट कथन ) को भुलाकर जीवन से पुन: अनुराग करना चाहिए अन्यथा हो सकता है कि तुम हमेशा के लिए जीवन के वास्तविक सुखों से वंचित हो जाओ।

(3)

दु:ख के डर से तुम अज्ञात
जटिलताओं का कर अनुमान,

काम से झिझक रहे हो आज,
भविष्यत् से बन कर अनजान।

व्याख्या : वह आगंतुक रमणी मनु को संबोधित कर कहती है कि कहीं तुम पहले से ही अज्ञात उलझनों का अनुमान कर उनसे उत्पन्न होने वाले दु:खों की कल्पना मात्र से ही तो घबरा कर कर्मक्षेत्र से विमुख नहीं हो गए। इसका अभिप्राय यह है कि बहुत मनुष्य स्वंय ही अज्ञात कल्पनाओं के भय से डर कर जीवन से प्रगति करना छोड़कर पलायन की प्रवृत्ति धारण करते हैं और कभी भी प्रगति नहीं कर पाते। वस्तुत: भय तो मन की अनुभूति ही है और अज्ञात भय की कल्पना से ही कभी-कभी बहुत से लोग साहस खो बैठते हैं | अत: वह बाला मनु को यह प्रेरणा देना चाहती है कि वे व्यर्थ ही न घबराएँ और जीवन से प्रेम करना सीखें। इसलिए वह कहती है कि कहीं इस भय से कि जीवन दु:खमय न हो, वे अज्ञात उलझनों की कल्पना कर कर्मक्षेत्र से पीछे तो नहीं हट रहे हैं। उनका कहना है कि वे यह क्यों भूल जाते हैं कि कल्पनाओं में वास्तविकता नहीं रहती और हम जो भी अनुमान करते हैं वह कभी भी पूर्ण सत्य नहीं होता अत: यह भी संभव है कि आज जिस भविष्य की कल्पना से हम भयभीत हो रहे हों वह उससे सर्वथा भिन्न हो और हम केवल आशंकाओं से ही भयभीत हो रहे हों।

(4)

कर रही लीलामय आनंद,
महा चिति सजग हुई सी व्यक्त,

विश्व का उन्मीलन अभिराम
इसी में सब होते अनुरक्त।

व्याख्या : वह बाला कह रही है कि यह सृष्टि जो कि अत्यंत सुंदर एवं आकर्षक प्रतीत होती है और जिसमें सभी अनुरक्त हैं, वास्तव में चेतन ब्रह्म अर्थात् परमात्मा की लीला का ही व्यक्त रूप है। अतएव जब ईश्वर स्वंय ही कर्म में लीन है तब उसके द्वारा निर्मित मानव का कर्म से विमुख होना अनुचित ही है। यहाँ यह स्मरणीय है कि सृष्टि निर्माण के संबंध में यह मत प्रचलित है कि जब परमात्मा एकाकीपन के भार से ऊब गया तब उसकी इच्छा एक से अनेक हो जाने की हुई और इसी अभिलाषा से उसने अपनी माया शक्ति से इस संसार को रच दिया। इसलिए यह अनुमान किया जा सकता है कि परमात्मा की आनंदपूर्ण लीला से ही सृष्टि निर्माण होने के कारण यह संसार अत्यधिक सुंदर और आकर्षक प्रतीत होता है। यही कारण है कि आगंतुक रमणी भी मनु को यह प्रेरणा देती है कि मानव मात्र को कर्म में रत रहने पर ही सच्चा सुख मिल सकता है।

(5)

काम मंगल से मंडित श्रेय
स्वर्ग, इच्छा का है परिणाम;

तिरस्कृत कर उसको तुम भूल
बनाते हो असफल भवधाम।

व्याख्या : वह बाला मनु से कह रही है कि जब हम इस सृष्टि की उत्पत्ति पर विचार करते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उसकी उत्पत्ति काम अर्थात् इच्छा से हुई है और यह उसका ही परिणाम है। इस प्रकार कवि ने श्रद्धा द्वारा सृष्टि के निर्माण को ही सर्वोपरि सिद्ध किया है और वास्तव में जब मनुष्य को किसी वस्तु की आकांक्षा होती है तभी वह कर्म में प्रवृत्त होता है। वास्तव में इस सृष्टि से भाँति-भाँति की कामनाएँ उत्पन्न होकर जगत कर्मक्षेत्र में प्रवृत्त करती हैं अन्यथा सृष्टि का विकास असंभव था। यह तो निर्विवाद रूप से स्वीकार किया जा सकता है कि शुभ कर्म करने से कल्याण होता है अत: काम का तिरस्कार करना युक्ति संगत नहीं है। इस प्रकार श्रद्धा मनु से कहती है कि तुम वैराग्य धारण कर काम अर्थात् इच्छा का तिरस्कार कर बड़ी भारी भूल कर रहे हो और इससे तुम्हारा सांसारिक जीवन असफल ही सिद्ध होता है।

(6)

दु:ख की पिछली रजनी बीच
विकसता सुख का नवल प्रभात;

एक परदा यह झीना नील
छिपाए है जिसमें सुख गात।

व्याख्या : वह रमणी अर्थात् श्रद्धा मनु से कह रही है कि जिस प्रकार रात्रि के समाप्त होते ही सुखद सवेरा आ जाता है उसी प्रकार दु:ख के पश्चात् सुख का आगमन स्वाभाविक ही है और जैसे कि उषा का सुंदर तन अंधकार के भीगे आवरण में ढका रहता है उसी तरह दु:ख-सुख दोनों एक दूसरे से संबंधित हैं और जीवन में दु:ख स्थायी नहीं है बल्कि उसकी भी एक अवधि है। अतएव दु:ख-सुख दोनों ही जीवन में क्रमानुसार आते-जाते रहते हैं और प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह धैर्य धारण करे तथा कभी भी दु:ख में अपना साहस न खो बैठे। इस प्रकार मनुष्य को यह विश्वास रखना चाहिए कि जिस प्रकार सघन अंधकार मिटते ही सुखद प्रभात की शुभ्र आभा दृष्टिगोचर होती है उसी प्रकार दु:ख रूपी परदा हटते ही सुख का नवीन संसार झलक उठता है।

(7)

जिसे तुम समझे हो अभिशाप,
जगत की ज्वालाओं का मूल;

ईश का वह रहस्य वरदान,
कभी मत इसको जाओ भूल।

व्याख्या : वह बाला अर्थात् श्रद्धा मनु से कह रही है कि तुम जिस दु:ख को अपने लिए अमंगल समझते हो और जिसे तुम संसार की सभी आपत्तियों का मूल समझ बैठे हो वह वास्तव में ईश्वर द्वारा ही प्रदत्त है अर्थात् ईश्वर ही हमें दु:ख-सुख दोनों प्रदान करता है। इस प्रकार यह सृष्टि तो ईश्वर को एक रहस्यपूर्ण देन ही है और यहाँ दु:ख में ही सुख समाया है | अतः मनुष्य को कभी भी दु:ख में अपना साहस न खोना चाहिए बल्कि साहसपूर्वक कठिनाइयों का सामना करना चाहिए।

(8)

विषमता की पीड़ा से व्यस्त
हो रहा स्पंदित विश्व महान;

यही दु:ख सुख विकास का सत्य
यही भूमा का मधुमय दान।

व्याख्या : वह आगंतुक रमणी अर्थात् श्रद्धा मनु को समझाते हुए कहती है कि यह विशाल विश्व वैषम्य से पीड़ित होने के कारण ही स्पंदनशील है अर्थात् यदि इस जगत में इतनी अधिक विषमता न होती तो फिर उसमें सुख का सर्वत्र अभाव ही हो जाता। कहने का अभिप्राय यह है कि विषमता ही इस जगत का जीवन है और उसी के कराण सुख एवं सहानुभूति की भावना इस जगत में दीख पड़ती है। वास्तव में स्वयं पीड़ा सहने पर ही मनुष्य को दूसरे का दु:ख समझ में आ पाता है और यह विशाल जगत आपदाओं से उत्पन्न होने वाली पीड़ा को सहन कर ही सहृदय बन सका है। इस प्रकार दु:ख ही मानव मात्र के सुख एवं उसकी उन्नति का कारण है और इसे भूमा अर्थात् परमात्मा का सुंदर दान समझकर ग्रहण करना चाहिए क्योंकि यही मानव जीवन को कोमल, उदार और विशाल बनाकर जीवन में मधुरता ला देता है तथा इसी से जीवन में क्रियाशीलता की भावना भी उत्पन्न होती है जिससे कि मनुष्य प्रगति करने में सफल हो पाता है।

(9)

नित्य समरसता का अधिकार,
उमड़ता कारण जलधि समान;

व्यथा से नीली लहरों बीच
बिखरते सुखमणि गण द्युतिमान!

व्याख्या : वह आगंतुक रमणी अर्थात् श्रद्धा मनु से कहती है कि यदि मानव-जीवन में वैषम्यता अर्थात् उतार चढ़ाव न हो तो मनुष्य स्वाभाविक ही इस एकरसता से ऊब उठेगा। इस प्रकार जीवन में उतार-चढ़ाव आवश्यक है क्योंकि एकरसता कभी भी प्रिय नहीं होती। श्रद्धा का कहना है कि ईश्वर भी प्राणियों को एक रस नहीं रहने देता और जो हमेशा सुख प्राप्त करने में लगा रहा है उसके जीवन में एक दिन वह भी आता है जब उसके मानस में भीषण हलचल-सी मच जाती है तथा जिस प्रकार समुद्र की लहरों से हलचल मचते ही उसकी सतह में छिपी मणियाँ ऊपर आकर नीली लहरों में बिखरी जान पड़ती है उसी प्रकार सुख भी पीड़ा से छिन्न-भिन्न हो जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि व्यक्ति को समरसता की प्राप्ति न होने के कारण ही सुख और दु:ख से पूर्ण विषमता के थपेड़े सहन करने पड़ते हैं।

(10)

लगे कहने मनु सहित विषाद:-
“मधुर मारुत से ये उच्छ्वास

अधिक उत्साह तरंग अबाध
उठाते मानस में सविलास।

व्याख्या : उस आगंतुक रमणी अर्थात् श्रद्धा के उद्गारों को सुनकर मनु ने व्यथापूर्ण वाणी ने उनसे कहा कि जिस प्रकार वायु के मधुर झकोरे मानसरोवर में एक प्रकार की हलचल-सी उत्पन्न कर देते हैं उसी प्रकार तुम्हारी इन बातों को सुनकर मेरे हृदय में उत्साह एवं आनंद के अनेक भाव उठ रहे हैं |

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