श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 2 )

(1)

घिर रहे थे घुँघराले बाल
अंस अवलंबित मुख के पास;

नील घन-शावक से सुकुमार
सुधा भरने को विधु के पास।

प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन को शब्द दिये गये हैं |

व्याख्या : कवि का कहना है कि उस नवयुवती के मुखड़े पर घुँघराले बाल इस प्रकार बिखरे हुए थे कि मानो काले बादलों के सुकुमार शिशु ही चंद्रमा के समीप पीयूष पान करने के लिए पहुँच गए हों। कवि यहाँ घुँघराले बालों की उपमा बादलों के छोटे-छोटे सुकुमार बच्चों से दे रहा है तथा मुख को चंद्रमा मानता है। इस प्रकार उसकी दृष्टि में जिस तरह काले-काले बादल चंद्रमा के समीप एकत्र हो जाते हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि मानो वे उसका सुधा रस पान करना चाहते हो उसी प्रकार उस बाला के कंधे तक लटकने वाले घुँघराले केशों को देखकर यही आभास होता था कि मानो वे भी उसके चंद्रमा सदृश्य मुख का पीयूष पान करने के लिए एकत्र हुए हों।

(2)

और उस मुख पर वह मुस्क्यान!
रक्त किसलय पर ले विश्राम

अरुण की एक किरण अम्लान
अधिक अलसाई हो अभिराम।

व्याख्या : कवि कह रहा है कि उस नवयौवना के मुख पर मंद-मंद हँसी को देख यही अनुमान होता था कि संभवत: प्रभातकालीन बालारूण अर्थात् बाल रवि की कोई आभायुक्त किरण ही किसी लाल कोपल पर विश्राम करती हुई वहीं टिक गई है और इस दशा में यह अत्यंत सुंदर जान पड़ती है।

(3)

नित्य यौवन छवि से ही दीप्त
विश्व की करुण कामना मूर्ति;

स्पर्श के आकर्षण से पूर्ण
प्रकट करती ज्यों जड़ से स्फूर्ति।

व्याख्या : कवि उस आगंतुक रमणी का रूपवर्णन करते हुए कह रहा है कि उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि मानो संपूर्ण सृष्टि की करुण भावना ने ही एकत्र होकर शरीर धारण कर लिया हो अर्थात् वह बाला अनंत करुणामयी ही जान पड़ती थी। साथ ही उसका यह यौवन शाश्वत ही है अर्थात् हमेशा बना रहने वाला है और उसकी देह द्युति जिस तरह आज आभायुक्त है उसी तरह हमेशा ऐसी बनी रहेगी तथा उसके शरीर की शोभा कभी भी कम न होगी। कवि के कहने का अभिप्राय यह है कि वह बाला न केवल अपूर्व सुंदरी है अपितु करुणामयी भी है और उसके इस लौकिक सौंदर्य को देखते ही मन इस प्रकार उसकी ओर आकृष्ट हो उठता है कि स्वाभाविक ही उसे स्पर्श करने की आकांक्षा होने लगती है। इतना ही नहीं वह इतनी सुंदर थी कि जड़ पदार्थों में भी स्फूर्ति जागृत करने की अर्थात् चेतना उत्पन्न करने की शक्ति रखती थी।

(4)

उषा की पहिली लेखा कांत,
माधुरी से भींगी भर मोद;

मद भरी जैसे उठे सलज्ज
भोर की तारक द्युति की गोद।

व्याख्या : कवि का कहना है कि जिस प्रकार प्रभातकालीन तारे की अपूर्व शोभा युक्त अंक-शय्या से मधुरिमा में ओत-प्रोत उल्लास पूर्ण अपूर्व मादकता भरी और लज्जायुक्त उषा की पहली सुनहली किरण उठती है उसी प्रकार उस बाला के सुंदर मुख पर हल्की-सी मुस्कराहट छा रही थी। कवि ने यहाँ प्रियतम की गोद में रात्रि भर सोने के पश्चात् प्रभातकाल में उठने वाली किसी नारी की कल्पना की है और उसका कहना है कि उस नारी के मुख पर जो हर्ष, मादकता एवं लज्जा दीख पड़ती है वही उस बाला के मुख पर भी दिखाई देती थी।

(5)

कुसुम कानन-अंचल में मंद
पवन प्रेरित सौरभ साकार,

रचित परमाणु पराग शरीर
खड़ा हो ले मधु का आधार।

व्याख्या : कवि कह रहा है कि वह सुकुमार नारी इतनी सुंदर जान पड़ती थी कि मानो फूलों की वाटिका में मंद पवन के झकोरो से प्ररित हो मकरंद का आधार लिए हुए पराग के कणों का समूह ही साक्षात् देह धारण कर शोभायमान प्रतीत हो रहा हो |

(6)

और पड़ती हो उस पर शुभ्र
नवल मधु-राका मन की साध;

हँसी का मद विह्वल प्रतिबिंब
मधुरिमा खेला सदृश अबाध।

व्याख्या : और उन कणों पर मन को रुचिकर प्रतीत होने वाली सुंदर स्वच्छ नव बसंत की पूर्ण चाँदनी रात का प्रकाश पड़ रहा हो। इतना ही नहीं उस बाला के सुंदर मुखड़े पर रम्य क्रीड़ायुक्त अर्थात् मधुरता से ओत-प्रोत मंद-मंद उठने वाली मुस्कराहट की स्वाभाविक झलक भी दीख पड़ती थी।

(7)

कहा मनु ने, “नभ धरणी बीच
बना जीवन रहस्य निरुपाय;

एक उल्का-सा जलता भ्रांत,
शून्य में फिरता हूँ असहाय।

व्याख्या : कवि कह रहा है कि उस आगंतुक अर्थात् श्रद्धा की बातें सुनकर मनु ने उससे कहा कि इस आकाश और पृथ्वी के मध्य उनका जीवन एक रहस्य बनकर रह गया है अर्थात् वे इस प्रकार अनगिनती उलझनों से घिरे हैं कि उन्हें यही नहीं समझ में आता कि इन उलझनों को कैसे सुलझाया जाए। मनु का कहना है कि जिस प्रकार अंतरिक्ष से टूटा हुआ तारा जलते-जलते शून्य में असहाय-सा हो इधर-उधर भटकता फिरता है उसी प्रकार उन्हें भी अब व्यथा रूपी जलन को लेकर इस निर्जन प्रदेश में बिना किसी सहारे के इधर-उधर भटकना पड़ रहा है।

(8)

शैल निर्झर न बना हतभाग्य
गल नहीं सका जो कि हिम-खंड,

दौड़कर मिला न जलनिधि अंक
आह वैसा ही हूँ पाषंड।

व्याख्या : मनु कह रहे हैं कि उनका जीवन तो अब एक प्रकार से पाखंड ( निर्जीव पत्थर समान ) मात्र ही रह गया है अर्थात् उसमें किसी भी प्रकार की वास्तविकता या गति के चिन्ह नहीं रहे तथा उन्हें यह जीवन बिल्कुल व्यर्थ बिताना पड़ रहा है। इस प्रकार मनु का यही कहना है कि जिस प्रकार पर्वत के अस्तित्व की सार्थकता झरनों के रूप में प्रवाहित होने में ही है अन्यथा वह तो जड़ ही कहा जाता है उसी प्रकार मेरा जीवन भी उसी पर्वत खंड के समान ही है कारण कि उससे अभी तक किसी भी प्रकार का स्त्रोत निर्झरित नहीं हो सका। इतना ही नहीं मनु अपने जीवन को उस हिमखंड जैसा मानते हैं जो कि सरिता बनकर सागर में नहीं मिल सका।

(9)

पहेली-सा जीवन है व्यस्त
उसे सुलझाने का अभिमान,

बताता है विस्मृति का मार्ग
चल रहा हूँ बन कर अनजान।

व्याख्या : मनु उस आगंतुक अर्थात् श्रद्धा से कह रहे हैं कि मेरा जीवन तो पहेली के समान उलझा हुआ है और मैं उसे भरसक प्रयत्न करके भी सुलझा नहीं पाता और यह भी समझ में नहीं आता कि आख़िर उसका क्या कारण है? मनु का कहना है कि इस प्रकार मैं बिना सोचे समझे अनजान-सा बनकर अपना जीवन व्यतीत कर रहा हूँ।

(10)

भूलता ही जाता दिन-रात
सजल अभिलाषा कलित अतीत;

बढ़ रहा तिमिर गर्भ में नित्य,
दीन जीवन का यह संगीत।

व्याख्या : मनु कहते हैं कि मैं दिन-रात अपने कोमल अभिलाषाओं से पूर्ण विगत युग को भुलाने का प्रयत्न कर रहा हूँ क्योंकि मुझे अब वैसा उल्लास और आनंद शायद ही मिल सके। मनु का कहना है कि मैं तो यही चाहता हूँ कि जिस प्रकार घोर अंधकारपूर्ण गुफा में संगीत की मधुर स्वर लहरी दूर तक गूँजकर नही रह जाती है उसी प्रकार अब उनके व्यथापूर्ण जीवन की सभी सुखद कल्पनाएँ शनै:- शनै: निराशा रूपी अंधकार में मिटती-सी जा रही हैं।

(11)

क्या कहूँ, क्या कहूँ मैं उद्भ्रांत?
विवर में नील गगन के आज,

वायु की झटकी एक तरंग,
शून्यता का उजड़ा-सा राज।

व्याख्या : मनु कह रहे हैं कि चारों ओर निरुद्देश्य भटकने के कारण मैं यह भी नहीं कह पाता कि आख़िर में स्वयं क्या हूँ क्योंकि मुझे अपने जीवन में सार्थकता के कुछ भी अंश नहीं दीख पड़ते। मनु का कहना है कि मुझे तो यही जान पड़ता है कि मानो मैं नीले आकाश के रिक्त स्थानों से भटकी हुई वायु की एक तरंग के समान हूँ और मेरा जीवन उस उजड़े हुए राज्य की भाँति है जिसमें शून्यता-सी व्याप्त है।

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