‘राम की शक्ति-पूजा’ में नाटकीयता के तत्त्व

‘राम की शक्ति-पूजा’ केवल निराला ही नहीं प्रत्युत आधुनिक हिंदी कविता की प्रमुख रचना है | इस कविता में अंतर्निहित नाटकीय तत्त्व इसे विशिष्टता प्रदान करते हैं |

नाटकीयता का यह तत्त्व साहित्य की अन्य विधाओं में भी मिलता है क्योंकि नाटकीयता शामिल होते ही रचना की प्रभावक्षमता बहुगुणित हो जाती है। निराला व मुक्तिबोध कविता में नाटकीय तत्वों का प्रयोग करने की दृष्टि से महानतम कवि हैं। निराला की जिस कविता में यह तत्त्व सघनतम रूप में दिखाई देता है, वह ‘राम की शक्तिपूजा’ ही है।

कविता में नाटकीय तत्वों का समावेश मुख्यतः दो स्तरों पर होता है — कथा की संरचना के स्तर पर तथा नाट्य युक्तियों के स्तर पर। संरचना के स्तर पर नाटकीयता का अर्थ है कि कविता का कथानक विरोधी तत्वों की टकराहट के माध्यम से विकसित हो, जिसे पाश्चात्य साहित्य-शास्त्र में ‘द्वन्द्व’ या ‘संघर्ष’ कहा गया है। कथानक की गति जितनी अधिक वक्र होगी, कविता उतनी ही नाटकीय होगी। नाट्य युक्तियों के स्तर पर नाटकीयता का अर्थ है कि जिस प्रकार नाटक में प्रकाश-योजना, दृश्य-योजना, ध्वनि-योजना, वेशभूषा तथा संवाद-शैली इत्यादि का प्रयोग किया जाता है, वैसे ही कविता में भी किया जाए। ‘राम की शक्तिपूजा’ दोनों ही स्तरों पर चरम नाटकीयता से सम्पन्न कविता है।

कथानक के स्तर पर नाटकीयता

(1) प्रकाश व अंधेरे का द्वन्द्व — इस कविता की मूल संरचना द्वन्द्वात्मक है और इसी द्वन्द्व के कारण कविता की भाव-योजना में नाटकीयता अन्तर्निहित है। यह द्वन्द्व मुख्यतः दो प्रकार से दिखता है। मूर्त स्तर पर द्वन्द्व अंधेरे व प्रकाश में है। कविता की शुरुआत ‘रवि हुआ अस्त’ से हुई है और यह अंधेरा घना होते-होते ‘अमानिशा’ के स्तर तक पहुँचता है। पूरी कविता में प्रकाश का उल्लेख सिर्फ दो बार हुआ है। पहली बार अमानिशा से टकराता हुआ प्रकाश ‘केवल जलती मशाल’ का है; दूसरी बार प्रकाश तब आया है जब राम साधना के लिए तत्पर होते हैं- ‘निशि हुई विगत, नभ के ललाट पर प्रथम किरण फूटी’। इस प्रकार, रचना में एक ओर गहरा अंधकार है तो दूसरी ओर क्षीण प्रकाश। इनके द्वन्द्व से अद्भुत नाटकीयता पैदा हुई है। ध्यातव्य है कि दिन के प्रकाश की कविताएँ तो बहुत से कवियों ने लिखी हैं, किन्तु कविता में रात के अंधेरे से टकराने की क्षमता निराला व मुक्तिबोध जैसे जुझारू कवियों में ही संभव है।

(2) भावों के स्तर पर नाटकीयता — कविता में भावों के स्तर पर भी अद्भुत नाटकीयता है। पुरी कविता परस्पर विरोधी भावों के क्रमिक उत्थान-पतन पर भी आधारित है। सबसे पहले राम पराजित मनःस्थिति में हैं — ‘स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर-फिर संशय’। इसके तुरंत बाद ‘इसी क्षण जैसे अंधकार घन में विद्युत’ की भाँति सीता की जनक-वाटिका की स्मृति जागती है और राम के मन में ‘फिर विश्व विजय भावना हृदय में आई भर’ की स्थिति उत्पन्न होती है।

इसके तुरंत बाद भयानक मूर्ति याद आती है उनका मनोबल भंग हो जाता है और उनके मन में निराशा छा जाती है और उनकी आँखों से अश्रु बहने लगते हैं —

“भावित नयनों से सजल गिरे दो मुक्ता-दल |”

फिर हनुमान का ऊर्ध्वगमन प्रचंड आशा जगाता है किंतु पार्वती के अंजना रूप के समक्ष वे भी दीन हो जाते हैं। विभीषण के ओजपूर्ण उद्बोधन से कविता के तेवर आक्रामक होते हैं, किंतु राम का जवाब कि ‘मित्रवर, विजय होगी न समर’ तथा ‘अन्याय जिधर है उधर शक्ति’ व्यक्त होने के साथ ही कविता निराशा में डूब जाती है।

जाम्बवन्त का सुझाव कि ‘आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर’ कविता में फिर जान फूंक देता है और पूजा के अंतिम पुष्प के समर्पण तक यही आशा और ओज निरंतर बना रहता है, किन्तु तभी जब रात्रि के दूसरे प्रहर दुर्गा छिपकर पुष्प उठा ले जाती है तो कविता नाटकीय रूप से फिर निराशा में डूब जाती है |

यहाँ लगता है कि कविता अपने त्रासद अंत पर पहुँच गई है और उसी की अभिव्यक्ति है — “धिक् जीवन को जी पाता ही आया विरोध / धिक साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध |”

किन्तु यहीं फिर आशा जागती है जब राम के मन में कभी न हारने का भाव अचानक जाग उठता है –“वह एक और मन रहा राम का जो न थका / जो नहीं जानता दैन्य नहीं जानता विनय |”

राम को अचानक स्मृति आती है कि मेरी आँखों को माता राजीवनयन कहती थी और वे कहते हैं कि उनकी आँखों के रूप में दो पुष्प अभी भी शेष हैं — “दो नीलकमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण / पूरा करता हूँ मातः देकर एक नयन |”

वे अत्यंत उत्साह के साथ एक आँख चढ़ाने को तत्पर हो जाते हैं और उसी क्षण देवी दुर्गा त्वरित रूप से प्रकट हो जाती है और राम को विजय का आशीर्वाद देते हुए उसके वदन में लीन हो जाती है |

स्पष्ट है कि कविता की पूर्ण संरचना भावों के द्वन्द्व पर ही टिकी है। परस्पर विरोधी भावों के तीव्र उत्थान व पतन ने कविता पढ़ने की प्रक्रिया को नाटक देखने के समान रोचक बना दिया है।

भावों के स्तर पर एक और द्वन्द्व भी है। यह द्वन्द्व भावों तथा उनकी अभिव्यक्ति में है। इसमें एक ओर रावण तथा हनुमान हैं, जो भावों की अभिव्यक्ति चरम स्तर पर करते हैं। रावण भी अट्टहास करता है और हनुमान भी। इसके विपरीत, राम तीव्र भावनाओं की अत्यंत संयमित अभिव्यक्ति करते हैं। उनका औदात्य इसी नाटकीयता में छिपा है जो तीव्र भावनाओं व कठोर संयम के आंतरिक द्वन्द्व से निर्मित हुई है। जिस क्षण उनके मन में पूरा विश्व जीत लेने का उद्दाम आत्मविश्वास है, तब भी उनके होठों पर सिर्फ हल्की सी मुस्कुराहट है- “फूटी स्मिति सीता ध्यान लीन राम के अधर, फिर विश्व विजय भावना हृदय में आई भर।”

दूसरी ओर, जब जीवन की सारी नैतिकता व सारा संघर्ष पराजय के बिन्दु पर खत्म होता है और जिस स्थिति में कोई भी साधारण मनुष्य पूर्णतः टूट सकता है. वहाँ भी राम की अभिव्यक्ति निःशब्द रुदन की है। यह स्थिति कविता में तीन बार आई है किन्तु तीनों ही बार राम की अभिव्यक्ति अत्यंत संयमित है- “भावित नयनों से सजल गिरे दो मुक्ताजल।”

(3) कथानक के विकास के चरण या अवस्थाएँ — शक्तिपूजा के कथानक में नाटक के विकास के चरण भी दृष्टिगत होते हैं। भारतीय व पाश्चात्य दोनों दृष्टियों से इसके कथानक की आंशिक व्याख्या हो सकती है। द्वन्द्र की अधिकता के कारण इसमें भारतीय कार्यावस्थाओं का उपलबध होना कठिन है किन्तु राम की दृढ़ आराधना को ‘प्रयत्न’ कार्यावस्था, ‘रह गया एक इंदीवर’ को ‘प्राप्त्याशा’ ( प्राप्ति की आशा ) तथा ‘होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन’ को ‘नियताप्ति’ ( फल निश्चित ) कार्यावस्था माना जा सकता है। किन्तु कथा की गति अत्यंत वक्र है इसलिए पाश्चात्य नाटक के चरण भी सीमित रूप से दिख जाते हैं। पश्चिमी चरणों में ‘आरंभ’ व ‘विकास’ नहीं दिखते क्योंकि आरंभ में संघर्ष की स्थिति एकतरफा सी है। जब राम आराधना के अंतिम चरण पर हैं और दुर्गा पुष्प उठाने आई हैं, वह बिन्दु ‘चरम बिन्दु’ (Climax) है क्योंकि इसके बाद किसी न किसी पक्ष की विजय होनी तय है। दुर्गा के पुष्प उठाने के तुरंत बाद आत्मधिक्कार की स्थिति के साथ ही कविता ‘निगति’ ( फल असम्भव ) की ओर बढ़ती है और लगता है कि ट्रैजिक अंत निकट है; किन्तु तभी राम का न थकने वाला मन जागता है और कथानक ‘पतन’ (त्रासद अंत) के रास्ते को छोड़कर ‘नियताप्ति’ ( निश्चित फल प्राप्ति ) की ओर बढ़ जाता है।

नाट्य युक्तियों के स्तर पर नाटकीयता

(1) आकस्मिकता — यह नाटकीयता की सबसे प्रमुख युक्ति है। यदि कथानक में संघर्ष को चरम बिंदु तक ले जाना हो तो यह जरूरी होता है कि कुछ घटनाएँ अचानक घटित हों। आकस्मिकता कम हो तो नाटकीय तनाव कम हो जाता है, जबकि आकस्मिकता आवश्यकता से अधिक हो तो नाटक यथार्थ से पलायन कर बैठता है। इस कविता में बार-बार इस युक्ति का प्रयोग हुआ है। उदाहरण के लिए, जब राम घोर निराशा में डूबे हैं, अचानक तभी सीता उनकी स्मृति में आती हैं (‘ऐसे क्षण अंधकार घन में जैसे विद्युत, जागी पृथ्वी तनया कुमारिका छवि’)। इसी प्रकार जब वे विश्व विजय भावना से भरे हैं, तभी अचानक भीमा की मूर्ति याद आती है । इसी प्रकार, हनुमान जैसे ही शक्ति को निगलने वाले हैं, तभी अचानक अंजना रूप का उदय होता है । जब पूजा का अंतिम पुष्प रह जाता है, तभी देवी आती हैं और उसे ले जाती हैं। (‘द्विप्रहर रात्रि का साकार हुईं दुर्गा छिप कर, हँस उठा ले गईं पूजा का प्रिय इंदीवर’।) जब राम आत्मधिक्कार से भरते हैं, तभी अचानक उनका एक और मन जागता है जो कभी हारता नहीं, कभी थकता नहीं (वह एक और मन रहा राम का जो न थका) और उन्हें अपनी माँ के कथन की स्मृति आती है कि उनकी माँ उन्हें राजीवनयन कहती थी |

अंत में, जैसे ही राम द्वारा आँख निकालने का निश्चय दृढ़ होता है, तभी अचानक देवी त्वरित रूप से प्रकट होकर उन्हें विजय का आशीर्वाद देती है और कविता सुखद अंत पाती है |

(2) दृश्य योजना — नाटक में दृश्य योजना का अत्यधिक महत्व होता है। ‘राम की शक्तिपूजा’ नाटक के कथानक की तरह कुछ निश्चित दृश्यों में बंटी है। पहला दृश्य युद्ध का है, दूसरा लौटती हुई सेनाओं का, तीसरा सानु-सभा का, चौथा हनुमान के ऊर्ध्वगमन का का तथा पाँचवाँ राम की साधना का। इन पाँच दृश्य-खंडों में पूरी कविता का नाट्य रूपांतरण किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त कई ऐसे कथन प्रयुक्त हुए हैं जिनमें किसी दृश्य के संकेत हैं। यूँ लगता है कि रचनाकार यह संकेत पाठक को ही कर रहा है, जैसे-देखो बन्धुवर, सामने स्थित जो यह भूधर’ तथा ‘और देखो ऊपर/अम्बर में हुए दिगम्बर अर्चित शशि शेखर’ इत्यादि ।

(3) चरित्रों का नाटकीय वर्णन — चरित्र वर्णन भी किसी कविता में नाटकीयता उत्पन्न करता है। निराला ने विभिन्न चरित्रों की बाह्य चेष्टाओं का स्पष्ट उल्लेख कई बार किया है, जैसे — ‘हो निर्निमेष देखते राम का जित-सरोज-मुख श्याम-देश’, ‘देखते सकल, तन पुलकित होता बार-बार’। इसी प्रकार जब राम-विभीषण के लम्बे कथन के बाद रो पड़े हैं तो अगली छः पंक्तियों में लक्ष्मण, हनुमान, जाम्बवान, सुग्रीव व विभीषण की मानसिक व बाह्य प्रतिक्रियाएँ बताई गई हैं, जो बेहद नाटकीय बन पड़ी हैं।

(4) संवाद योजना — नाटक में ‘संवाद योजना’ का अत्यधिक महत्व होता है। यदि नाटक एकालाप, विवरण या भाषण शैली पर आधारित हो तो नाटकीय तत्त्व शिथिल हो जाता है। दूसरी ओर वार्तालाप व संवाद शैली से नाटकीयता का तत्त्व तो सघन होता ही है, कथानक व दर्शक में सीधा संबंध भी बना रहता है। ‘राम की शक्तिपूजा’ में कई संवाद हैं, जैसे- राम का संवाद, विभीषण का संवाद, अंजना का संवाद, जाम्बवान का संवाद व अंत में दुर्गा का राम के प्रति संवाद।

(5) प्रकाश व्यवस्था — यह भी नाटक में महत्वपूर्ण होती है। नाटक में आवश्यक होता है कि जिस घटना या चरित्र पर ध्यान दिया जाए, प्रकाश उसी पर केन्द्रित रहे। चूँकि यह कविता है, नाटक नहीं, इसलिए ऐसे संकेत व्यक्त रूप में नहीं दिए गए हैं, किन्तु कविता के बिम्बग्रहण की प्रक्रिया में प्रकाश योजना महसूस होती है। यह अँधेरे का नाटक है, इसलिए प्रकाश बेहद अद्वितीय ढंग से प्रयुक्त हुआ है। मुख्यतः यह राम पर केन्द्रित है, किन्तु बीच-बीच में हनुमान, लक्ष्मण, जाम्बवान र्व अन्य पात्रों र्व स्थितियों पर स्थानान्तरित होता रहता है।

(6) पूर्वदीप्ति — नाटक में ‘पूर्वदीप्ति’ ( फ्लेश बैक ) का प्रयोग भी अत्यंत उपयोगी माना जाता है। अतीत या कल्पना के चित्रों की प्रस्तुति सीधे तौर पर करना संभव नहीं होता। यदि अभिनेता बोलकर अपनी स्मृति के तथ्य बताए तो नाटकीय तनाव का क्षरण हो जाता है। पूर्वदीप्ति शैली अतीत को प्रत्यक्ष बनाने की शैली है जो ऐसे प्रसंगों में बेहद कारगर सिद्ध होती है। ‘राम को शक्तिपूजा’ में राम को सीता की स्मृति आने के समय तथा ताड़का-सुबाहु का वध करने की स्मृति के समय इसी युक्ति का प्रयोग हुआ है — “देखते हुए निष्पलक याद आया उपवन विदेह का प्रथम स्नेह का, लतांतराल मिलन।”

(7) अनुभाव योजना — प्रस्तुत कविता में आहार्य अनुभावों ( वे बाहरी लक्षण/साज-सज्जा जिनसे पात्र की भावनाएँ या नाटकीय स्थिति प्रकट हो ) की योजना भी दिखाई पड़ती है। निराशाग्रस्त राम की खुलकर बिखरी हुई जटाएँ | इसी प्रकार साधना के लिए तत्पर राम के संबंध में कही गई पंक्ति — ‘है नहीं शरासन आज हस्त तूणीर स्कंध’ और कविता के अंत में दुर्गा का अपने पारम्परिक वेश में उपस्थित होना भी आहार्य अनुभाव का उदाहरण है।

(8) ध्वनि एवं वेशभूषा — ‘राम की शक्तिपूजा’ में ध्वनि संकेत, वेशभूषा संकेत इत्यादि पर भी ध्यान दिया गया है। युद्ध में जब हनुमान हुंकार भरते हैं तो उसे ‘क्रुद्ध कपि विषम हुह’ कहकर बताया गया है। राक्षसों के युद्ध से लौटते समय तेज शोर के कारण ‘बिंध महोल्लास से बार-बार आकाश विकल’ हो गया है तो राम की सेना एकदम मौन है। फिर राम की चिंता व निराशा को समुद्र के गर्जन से मूर्त बनाया गया है- ‘अप्रतिहत गरज रहा पीछे अंबुधि विशाल।’ हनुमान का ऊर्ध्वगमन भी भयानक कोलाहल से भरा हुआ है। इसी प्रकार, राम की साधना के उच्च स्तर पर अम्बर के काँपने का संकेत है- ‘जप के स्वर लगा काँपने थर-थर अम्बर।’

स्पष्ट है कि ‘राम की शक्तिपूजा’ कविता में नाटकीता के अनेक तत्त्व मिलते हैं । कविता के ढाँचे में नाटक की उपस्थिति कविता में अद्भुत आकर्षण उत्पन्न करती है । जब कविता नाटकीयता से युक्त हो जाती है, तो वह पाठक के ऐन्द्रिक बोध का विषय बनती है और उसका प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। आधुनिक हिन्दी कविता में इस कविता की नाटकीयता की तुलना सिर्फ मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ से हो सकती है। वस्तुतः ‘राम की शक्तिपूजा’ कविता का आधुनिक काल की सफलतम कविताओं में शामिल होने का एक प्रमुख कारण उसमें विद्यमान नाटकीयता है |

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