चिंता सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 3 )

(1)

एक नाव थी, और न उसमें डाँड़े लगते, या पतवार,
तरल तरंगों में उठ-गिरकर बहती पगली बारंबार।
लगते प्रबल थपेड़े, धुँधले तट का था कुछ पता नहीं,
कातरता से भरी निराशा देख नियति पथ बनी वहीं।

प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘चिंता सर्ग’ से अवतरित है | प्रस्तुत काव्यांश में जलप्रलय के बाद मनु की मनोस्थिति का वर्णन है जहाँ मनु प्रलय के कारणों व ‘चिंता’ के स्वरूप पर विचार करता है |

व्याख्या : मनु अपने जीवित बच जाने की कथा सुनाते हुए कह रहे हैं कि जल प्लावन में सारे ऐश्वर्य समाप्त हो गए और मनु को एक ऐसी नौका मिली जिसमें बाढ़ के समय डाँट और पतवार भी नहीं लगा सकते थे, वह नौका पगली की भाँति इधर-उधर चक्कर काटती हुई आगे की ओर बढ़ रही थी।
उस नाव पर रह-रहकर बार-बार लहरें भीषण आघात करती थीं और समुद्र के धूमिल तट का कहीं पता भी न चलता था। मनु का कहना है कि मेरे हृदय में घोर निराशा सी व्याप्त होने लगी और मुख से व्याकुलता भी झलकने लगी परंतु यह सोचकर कि अब तो मैं भाग्य के ही अधीन हूँ, शांत बैठा रहा और विश्व की वह नियामिका शक्ति ही पथ-प्रदर्शिका बनी।

(2)

लहरें व्योम चूमती उठतीं, चपलायें असंख्य नचतीं,
गरल जलद की खड़ी झड़ी में बूँदे निज संसृति रचतीं।
चपलायें उस जलधि-विश्व में स्वयं चमत्कृत होती थीं,
ज्यों विराट बाड़व-ज्वालायें खंड-खंड हो रोती थीं।

व्याख्या : समुद्र में ऊँची-ऊँची लहरें उठ रही थीं, मानो वे आकाश का चुंबन कर रही हो। हज़ारों बिजलियाँ आकाश में नृत्य कर रही थीं। प्रलयकारी बादल भी उमड़-उमड़ कर बरस रहे थे। इस भीषण वर्षा को देखकर यही प्रतीत होता था कि यह संसार मानव प्राणियों का निवास स्थल न रहकर बूँदों का निवास लोक बन गया है।
विशाल फैले हुए सागर के जल में आकाश से चमकने वाली बिजलियों का प्रतिबिंब ऐसा जान पड़ता था मानो समुद्र के अंतस की अग्नि विभिन्न अशों में विजाभित होकर रो रही हो।

(3)

जलनिधि के तलवासी जलचर विकल निकलते उतराते,
हुआ विलोड़ित गृह,तब प्राणी कौन! कहाँ! कब! सुख पाते?
घनीभूत हो उठे पवन, फिर श्वासों की गति होती रुद्ध,
और चेतना थी बिलखाती, दृष्टि विफल होती थी क्रुद्ध।

व्याख्या : जल प्रलय में जल-जंतु व्याकुल होकर ऊपर की ओर उतरने लगे।जब जल के भीतर रहने वाले ही व्याकुल हो गए, तब भला दूसरा कौन एक क्षण को भी सुख पा सकता था!
जो पवन अभी तक अत्यंत वेग के साथ प्रवाहित हो रहा था, वह भी अब जल प्रलय के कारण रुकने लगा और साँस लेना भी मुश्किल हो गया। इतना ही नहीं शरीर की समस्त चेतना भी शिथिल पड़ने लगी और इतना अधिक अंधकार हो गया कि नेत्र भी कुछ नहीं देख पाते थे।

(4)

उस विराट् आलोड़न में ग्रह, तारा बुद-बुद से लगते,
प्रखर प्रलय-पावस में जगमग, ज्योतिरिंगणों-से जगते। प्रहर दिवस कितने बीते, अब इसको कौन बता सकता,
इनके सूचक उपकरणों का चिह्न न कोई पा सकता।

व्याख्या : घोर हलचल के कारण, विशाल समुद्र के ऊपर चमकने वाले नक्षत्र और तारे कभी तो पानी के बुलबुलों के समान जान पड़ते और कभी ऐसा प्रतीत होता जैसे इधर-उधर जुगनू चमक रहे हों।
प्रलयकारी दशा को कितने पहर और कितने दिवस बीत गए, इसे कोई नहीं बता सकता था क्योंकि घोर अंधकार और वर्षा के कारण दिन और रात्रि के सूचक उपकरण सूर्य एवं चंद्र आदि का कुछ भी पता न था।

(5)

काला शासन-चक्र मृत्यु का कब तक चला, न स्मरण रहा,
महामत्स्य का एक चपेटा दीन पोत का मरण रहा।
किंतु, उसी ने ला टकराया इस उत्तरगिरि के शिर से,
देव-सृष्टि का ध्वंस अचानक श्वास लगा लेने फिर से।

व्याख्या : मृत्यु का वह क्रूरतापूर्ण साम्राज्य न जाने कब तक छाया रहा, ठीक-ठाक नहीं कहा जा सकता परंतु इसी बीच अचानक ही एक दीर्घकाय मछली का आघात उस नाव पर लगा जिस पर मैं सवार था।
यद्यपि बड़ी मछली के चपेटे में मेरी नाव को बिना किसी संदेह के अवश्य टूट जाना चाहिए था परंतु ऐसा नहीं हुआ और नौका बच गई। इतना अवश्य है कि वह आघात के कारण हिमालय की ऊँची चोटी पर पहुँच गई और देवताओं का संपूर्ण वश नष्ट होते-होते बच गया।

(6)

आज अमरता का जीवित हूंँ मैं वह भीषण जर्जर दंभ,
आह सर्ग के प्रथम अंक का अधम-पात्र मय सा विष्कंभ ! ओ जीवन की मरु-मरीचिका, कायरता के अलस विषाद!
अरे पुरातन अमृत ! अगतिमय मोहमुग्ध जर्जर अवसाद !

व्याख्या : मैं उन्हीं देवताओं का एकमात्र वंशज बच रहा हूँ जो किसी समय अमरता के अभिमान में फूले नहीं समाते थे। मनु कह रहे हैं कि जिस प्रकार नाटक के प्रथम अंक का कोई पात्र विगत घटनाओं को दुहराता है उसी प्रकार अब वे भी देवताओं के विनाश की करुणापूर्ण कहानी सुनाने के लिए बच रहे हैं।
न केवल जीवन के समस्त सुख बल्कि स्वयं जीवन ही मृगतृष्णा है और जीवन एक भुलावा तथा छल मात्र ही जान पड़ता है। जिस प्रकार मरुभूमि में सूर्य रश्मियों की चमक से मृग को जल का भ्रम हो जाता है और वह उसी की आशा में दूर दौड़ता चला जाता है उसी प्रकार मनुष्य जीवन में भी सुख कहीं नहीं हैं और जिसे हम सुख समझते हैं वह केवल भ्रम मात्र है। वस्तुतः मनु को अब अपने आप पर ग्लानि हो रही है और वे स्वयं को कायर आलसी ओर शोकग्रस्त समझते हैं।

(7)

मौन ! नाश ! विध्वंस ! अंधेरा ! शून्य बना जो प्रकट अभाव,
वही सत्य है, अरी अमरते! तुझको यहाँ कहाँ अब ठाँव।
मृत्यु, अरी चिर-निद्रे ! तेरा अंक हिमानी-सा शीतल,
तू अनंत में लहर बनाती काल-जलधि की-सी हलचल।

व्याख्या : मनु को चारों ओर व्याप्त नीरवता, नाश, विध्वंस, अंधकार तथा सभी कुछ नष्ट हो जाने के कारण स्पष्ट दिखाई देने वाला यह अभाव आदि सब कुछ सत्य ही जान पड़ता है। मनु का अब यही कहना है कि आज तक देवगण जो अमरत्व का दावा करते थे वह मिथ्या ही था, क्योंकि यदि वह सत्य होता तो फिर इस प्रलय में वे नष्ट क्यों हो जाते। इसलिए वे कहते हैं कि अरी अमरते, अब तेरे लिए यहाँ कोई स्थान नहीं है।

मृत्यु ने जाने कितने प्राणियों को हमेशा के लिए इस जीवन से छुटकारा दिला देती है और उसकी गोद बर्फ़ के समान शीतल है। जिस प्रकार सागर में हलचल होने पर लहरें उठने लगती हैं उसी प्रकार मृत्यु भी इस संसार रूपी समुद्र में भयंकर हलचल उत्पन्न करती है और असंख्य प्राणियों का प्राण ले लेती है।

(8)

महानृत्य का विषम सम अरी अखिल स्पंदनों की तू माप,
तेरी ही विभूति बनती है सृष्टि सदा होकर अभिशाप।
अंधकार के अट्टहास-सी मुखरित सतत चिरंतन सत्य,
छिपी सृष्टि के कण-कण में तू यह सुंदर रहस्य है नित्य।

व्याख्या : मनु ने यहाँ मृत्यु को एक ऐसी नर्तकी कहा है जो कि महानृत्य में लीन है और जब-जब वह ‘सम’ ताल पर धरती को अपने चरणों से दबाती है तब जहाँ कहीं भी उसके चरणों का दबाव पड़ता है वहीं की वस्तु नष्ट हो जाती है।
जिस प्रकार घोर अंधकार में यदि कोई व्यक्ति जोर से हँसे तो उसका वह हँसना तो सुनाई देता है परंतु हम उस हँसने वाले को नहीं देख सकते उसी प्रकार मृत्यु का आकार तो दिखाई नहीं देता लेकिन उसके विनाशकारी कर्म स्पष्ट रूप में दीख पड़ते हैं। इस प्रकार मृत्यु एक चिरंतन सत्य है और वह हमेशा विद्यमान रहती है तथा सृष्टि के प्रत्येक कण में निहित है।

(9)

जीवन तेरा क्षुद्र अंश है व्यक्त नील घन-माला में,
सौदामिनी-संधि-सा सुंदर क्षण भर रहा उजाला में। पवन पी रहा था शब्दों को निर्जनता की उखड़ी साँस,
टकराती थी, दीन प्रतिध्वनि बनी हिम-शिलाओं के पास।

व्याख्या : जीवन तो वास्तव में मृत्यु का एक छोटा-सा अंश है जिस प्रकार नीले आकाश में बादलों के मथ्य बिजली क्षण भर के लिए चमक कर फिर उसी में लुप्त हो जाती है, उसी प्रकार मानव जीवन भी उस सुंदर प्रकाश के समान कुछ समय तक ही प्रकाशयुक्त रह पाता है और बाद में वह मृत्यु में ही विलीन हो जाता है।
मनु के मुख से निकले हुए उपर्युक्त शब्द वायु मंडल में गूँज रहे थे परंतु उन्हें सुनने वाला कोई भी न था। यह अवश्य है कि उनकी ध्वनि से चारों ओर सूनापन दूर हो गया था क्योंकि ये शब्द जब हिम शिलाओं से टकराते थे तब एक करुणा प्रतिध्वनि सी हो वहाँ गूँज उठती थी।

(10)

धू-धू करता नाच रहा था अनस्तित्व का तांडव नृत्य,
आकर्षण-विहीन विद्युत्कण बने भारवाही थे भृत्य।
मृत्यु सदृश शीतल निराश ही आलिंगन पाती थी दृष्टि,
परमव्योम से भौतिक कण-सी घने कुहासों की थी वृष्टि।

व्याख्या : अब सब कुछ नष्ट हो चुका था परंतु विनाश का तांडव नृत्य अभी भी हो रहा था। साथ ही विद्युत के परमाणुओं में भी आकर्षण शक्ति नहीं थी और वे शून्य में इधर से उधर उसी प्रकार चक्कर काट रहे थे जिस प्रकार बोझा ढोने वाला नौकर बोझा लादे हुए इधर-उधर फिरता है।
मृत्यु के कारण उत्पन्न होने वाली निराशा ही चारों ओर दीख पड़ती थी और जिस प्रकार आकाश से छोटे-छोटे कण बरसते हैं उसी प्रकार चारों ओर कुहरा घना कुहासा बरस रहा था।

(11)

वाष्प बना उड़ता जाता था या वह भीषण जल-संघात,
सौरचक्र में आवर्त्तन था प्रलय निशा का होता प्रात!

व्याख्या : मनु कह रहे हैं कि आकाश से गिरने वाली कुहरो की परतों को देखकर कभी-कभी यह संदेह भी होने लगता था कि कहीं यह भीषण जल-राशि ही तो भाप बनकर नहीं उड़ी जा रही है और इसीलिए चारों ओर कुहरा दृष्टिगोचर हो रहा था। इधर अब मगंल, चंद्र, सूर्य और ग्रह-उपग्रह भी अपनी पूर्व गति के अनुसार आकाश में चक्कर लगाने लगे थे और प्रलय रूपी रात्रि के अंत तथा प्रभात की सुंदर बेला के उदय की आशा हो चली थी।

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