(1)
चिर-किशोर-वय,नित्यविलासी–सुरभित जिससे रहा दिगंत
आज तिरोहित हुआ कहाँ वह मधु से पूर्ण अनंत वसंत?
कुसुमित कुंजों में वे पुलकित प्रेमालिंगन हुए विलीन,
मौन हुई हैं मूर्च्छित तानें और न सुन पड़ती अब बीन।
प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘चिंता सर्ग’ से अवतरित है | प्रस्तुत काव्यांश में जलप्रलय के बाद मनु की मनोस्थिति का वर्णन है जहाँ मनु प्रलय के कारणों व ‘चिंता’ के स्वरूप पर विचार करता है |
व्याख्या : जीवन के वे मधुर दिन जब युवावस्था की ही अनुभूति रहती थी, नित्य भोग-विलास और वासना में मग्न रहने के अवसर उपलब्ध थे तथा जीवन में हमेशा वसंत ऋतु रहती थी, न जाने कहाँ चले गए?
फूलों से लदे हुए लतामंडपों में होने वाले आलिंगनों के दृश्य भी अब कहीं नहीं दीख पड़ते और सुंदर सुरीली स्वर लहरी भी कहीं नहीं सुन पड़ती तथा वीणा भी अब शांत है।
(2)
अब न कपोलों पर छाया-सी पड़ती मुख की सुरभित भाप,
भुज-मूलों में शिथिल वसन की व्यस्त न होती है अब माप।
कंकण क्वणित,रणित नूपुर थे, हिलते थे छाती पर हार,
मुखरित था कलरव, गीतों में स्वर लय का होता अभिसार।
व्याख्या : अब इस जल प्रलय के कारण देवताओं और देवबालाओं को न तो चुंबन सुरा ही प्राप्त हो पाती है और न वे प्रमालिंगन ही कर पाते हैं। जब देवता रूपवती नारियों के कपोलों का चुंबन लेते थे तब उन्हें उनके शरीर से निकलने वाली फूलों की-सी मधुर सुगंध का आनंद प्राप्त होता था। साथ ही वासना के आवेग में जब देवबालाएँ उनका आलिंगन करती थीं तब उनके वस्त्र अस्त-व्यस्त होकर बिखर जाते थे परंतु अब ये सभी दृश्य समाप्त हो चुके हैं।
मनु का कहना है कि देवबालाएँ जब देवताओं का आलिंगन करती थी तब उनके कंगन मधुर ध्वनि करते, घुँघरू बज उठते और उनके वक्षस्थल पर हार हिलने लगते तथा चारों और संगीत की मधुर ध्वनि गूँजने लगती जिसमें स्वर और लय परस्पर मिले रहते थे।
(3)
सौरभ से दिगंत पूरित था, अंतरिक्ष आलोक-अधीर,
सब में एक अचेतन गति थी, जिससे पिछड़ा रहे समीर।
वह अनंग-पीड़ा -अनुभव-सा अंग-भंगियों का नर्त्तन,
मधुकर के मरंद – उत्सव – सा मदिर भाव से आवर्त्तन।
व्याख्या : उन दिनों सभी दिशाएँ सुगंध से परिपूर्ण रहती थीं और आकाश में चारों और अपूर्व प्रकाश व्याप्त रहता था। साथ ही देवताओं में एक ऐसी गति विद्यमान थी जिसके समक्ष वायु का वेग भी तुच्छ जान पड़ता था। इस प्रकार वे प्रतिदिन अत्यंत तीव्र गति के साथ उत्कर्ष प्राप्त कर रहे थे और उनकी यह गति पवन से भी तेज़ थी।
विलासिनी देवबालाएँ जब अपने विविध अंगों को मोड़कर भाँति-भाँति के हाव-भाव प्रदर्शित करती थी तब यह स्पष्ट हो जाता था कि उन्हें काम पीड़ा की अनुभूति हो रही है और उनकी इन चेष्टाओं को देखकर देवता भँवरों के समान उनके यौवन रस का पान करने में रत हो जाते।
(4)
सुरा सुरभिमय बदन अरुण वे नयन भरे आलस अनुराग,
कल कपोल था जहाँ बिछलता कल्पवृक्ष का पीत पराग।
विकल वासना के प्रतिनिधि वे सब मुरझाये चले गये,
आह ! जले अपनी ज्वाला से फिर वे जल में गले, गये।
व्याख्या : देवबालाओं के मुख से हमेशा शराब की सुगंध निकला करती थी और रात में अधिक देर तक जागने के कारण आलस्य और अनुराग से पूर्ण उनके नेत्र हमेशा लाल रहते थे। उनकी आलस्यपूर्ण पलकों से वासना छलकती प्रतीत होती थी। यद्यपि देवबालाओं के कपोलों की पीली आभा के सामने कल्पवृक्ष के फूलों का पीला पराग भी रंगहीन जान पड़ता था।
अतृप्त वासना के प्रतीक देवताओं का आज नाश हो गया है। वे अपनी ही लगाई आग में जल गए।
(5)
अरी उपेक्षा-भरी अमरते! री अतृप्ति! निर्बाध विलास!
द्विधा-रहित अपलक नयनों की भूख-भरी दर्शन की प्यास!
बिछुड़े तेरे सब आलिंगन, पुलक-स्पर्श का पता नहीं,
मधुमय चुंबन कातरतायें, आज न मुख को सता रहीं।
व्याख्या : देवताओं ने यह समझकर कि वे अमर हैं अपने जीवन में सभी की उपेक्षा की और भोगविलास को ही जीवन का साध्य समझा परंतु उनकी तृष्णा शांत नहीं हुई। उन्हें किसी भी बात की चिंता न थी और काम-क्रीड़ा के अतिरिक्त उन्हें अन्य कोई कार्य भी न था। इस प्रकार वे हमेशा प्रेम की प्यास लिए वासना पूरित नेत्रों से देव बालाओं क दर्शनों की लिए उत्सुक रहते।
देवबालाओं का आलिंगन करते समय जो रोमांच उनके शरीर में हो जाता था वह अब समाप्त हो गया। देवबालाओं के अधरों का मधुर चुंबन लेने की छटपटाहट और कातरता अब देवताओं को नहीं सता रही।
(6)
रत्न-सौघ के वातायन-जिनमें आता मधु-मदिर समीर,
टकराती होगी अब उनमें तिमिंगिलों की भीड़ अधीर।
देवकामिनी के नयनों से जहाँ नील-नलिनों की सृष्टि–
होती थी, अब वहाँ हो रही प्रलयकारिणी भीषण वृष्टि।
व्याख्या : जिन रत्न-जटित भवनों के झरोखों में से सदा सुगंधित पवन बहा करता था, आज उन्हीं में से तिमिंगल नामक अनेक समुद्री मछलियाँ टकरा रही होंगी।
उन सुंदर देवबालाओं के नेत्र नीले कमल के समान थे। वे जिस ओर भी दृष्टि फेरती थी, उधर अब उन नील कमलों के स्थान पर भीषण प्रलयकारी वर्षा हो रही है।
(7)
वे अम्लान-कुसुम-सुरभित—मणि-रचित मनोहर मालाएँ,
बनीं श्रृंखला, जकड़ीं जिनमें विलासिनी सुर-बालाएँ।
देव-यजन के पशुयज्ञों की वह पूर्णाहुति की ज्वाला,
जलनिधि में बन जलती कैसी आज लहरियों की माला।
व्याख्या : खिले हुए सुगंधित फूलों और मणियों की जो मनोहर मालाएँ अभी तक देवबालाओं के शरीर पर शृंगार सज्जा का काम देती थी वे ही आज शृंखलाओं के समान प्रतीत हो रही हैं और ऐसा जान पड़ता है कि उन पुष्पमालाओं में वे वे जकड़ दी गई हो।
जिस प्रकार यज्ञ की समाप्ति पर पशुओं की आहुति से यज्ञ की ज्वाला भभक उठती थी, उसी प्रकार अब ये सागर की भीषण लहरें ही आग की लपटों के समान जान पड़ती है।
(8)
उनको देख कौन रोया यों अंतरिक्ष में बैठ अधीर!
व्यस्त बरसने लगा अश्रुमय यह प्रालेय हलाहल नीर!
हाहाकार हुआ क्रंदनमय कठिन कुलिश होते थे चूर,
हुए दिगंत बधिर, भीषण रव बार-बार होता था क्रूर।
व्याख्या : उनकी यह दशा देख कर अंतरिक्ष में यह कौन रोया कि आसमान से आँसू बरसने लगे |
मनु कह रहे हैं कि जलप्लावन होते ही चारों और भयंकर हाहाकार मच गया और बिजलियों के टकराने से इतनी अधिक भीषण आवाज़ें होने लगीं कि अब प्रतिक्षण केवल कोलाहल ही सुनाई पड़ता है और इसके कारण सभी दिशाएँ भी बहरी सी हो गई हैं।
(9)
दिग्दाहों से धूम उठे, या जलधर उठे क्षितिज-तट के!
सघन गगन में भीमप्रकंपन, झंझा के चलते झटके।
अंधकार में मलिन मित्र की धुँधली आभा लीन हुई,
वरुण व्यस्त थे, घनी कालिमा स्तर-स्तर जमती पीन हुई।
व्याख्या : मनु कह रहे हैं कि दिशाओं में आग लग जान के कारण चारों ओर धुआँ ही धुआँ दिखाई पड़ता और कभी-कभी तो यह प्रतीत होता कि मानो आकाश में बादल ही घिर आए हैं। साथ ही तेज़ आँधी के भयंकर झोंकों से सारा आकाश ही रह-रहकर डोलने लगता।
सूर्य का प्रकाश पहले तो धुँधला-सा दीख पड़ने लगा पर कुछ ही क्षण पश्चात सूर्य उस अंधकार में ही अदृश्य सा हो गया और अब चारों ओर अंधकार ही अंधकार छा गया। साथ ही जल देवता वरुण भी क्रुद्ध होकर भयंकर वर्षा करने लगे और चारों ओर धुँए से उत्पन्न कालिमा की एक मोटी तह सी जम गई।
(10)
पंचभूत का भैरव मिश्रण, शंपाओं के शकल-निपात,
उल्का लेकर अमर शक्तियाँ खोज रहीं ज्यों खोया प्रात। बार-बार उस भीषण रव से कँपती धरती देख विशेष,
माना नील व्योम उतरा हो आलिंगन के हेतु अशेष!
व्याख्या : जिन पंचभूतों (पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्नि) के मिश्रण से यह संपूर्ण सृष्टि बनी है, आज उन्हीं का मिश्रण भयंकर प्रलयकारी दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। बिजलियाँ टूट-टूटकर गिर रही थीं और विद्युत खंड ऐसे प्रतीत होते थे मानो वास्तविक अमर शक्तियाँ अंधकार में छिपे हुए प्रातः काल को मशाल लेकर ढूँढ रही है।
लगातार होने वाले भयंकर कोलाहल के कारण धरती अब भी काँप उठती थी और चारों ओर जो नीला अंधकार दृष्टिगोचर होता था, उसे देखकर यही जान पड़ता था मानो काँपती हुई धरती को देखकर उसे छाती से लगा धीरज बँधाने के लिए नीला आकाश ही नीचे उतर आया हो।
(11)
उधर गरजतीं सिंधु लहरियाँ कुटिल काल के जालों सी,
चली आ रहीं फेन उगलती फन फैलाये व्यालों-सी। धँसती धरा, धधकती ज्वाला, ज्वाला-मुखियों के निश्वास,
और संकुचित क्रमशः उसके अवयव का होता था ह्रास ।
व्याख्या : उधर मृत्यु पाश के समान दिखाई देने वाली सागर की भीषण लहरें गरजती हुई इस प्रकार आगे बढ़ती थी मानो कि अपने-अपने फन फैलाकर अनेक ज़हरीले सर्प बढ़े चले आ रहे हों। लहरों की उपमा सर्प से देते हुए यहाँ यह कल्पना की गई है कि लहरों से उठने वाला फेन ऐसा प्रतीत होता था मानो कि वह उन सर्पों के मुख से निकला हुआ ज़हर हो।
धीरे-धीरे धरती नीचे की ओर धँसने लगी और उनके अंतर की आग ऊपर प्रकट हुई जो ज्वालामुखी पर्वत से स्फुटित होने वाली आग की भीषण लपटों के समान जान पड़ती थी। इस प्रकार पृथ्वी का भाग क्रमशः संकुचित होने लगा।
(12)
सबल तरंगाघातों से उस क्रुद्ध सिंधु के, विचलित-सी—
व्यस्त महाकच्छप-सी धरणी ऊभ-चूभ थी विकलित-सी। बढ़ने लगा विलास-वेग-सा वह अतिभैरव जल संघात,
तरल-तिमिर से प्रलय-पवन का होता आलिंगन, प्रतिघात।
व्याख्या : समुद्र की शक्तिशाली तरंगों के भीषण थपेड़ों के कारण पृथ्वी अत्यधिक विचलित जान पड़ने लगी तथा ऐसा प्रतीत हुआ मानो कि दीर्घकाय कछुए के समान धरती लहरों के थपेड़ों से घबराकर ऊपर की ओर सरक आई हो।
जिस तरह देवताओं की वासना अत्यंत तीव्र गति से बढ़ती चली गई थी, उसी प्रकार अब जलप्रलय भी अत्यंत वेगपूर्वक बढ़ने लगा और चारों ओर भयंकर जलराशि एकत्र होने लगी। चारों ओर फैले हुए अंधकार की सघन परतों पर भयंकर पवन बार-बार आकर टकराता था और ऐसा प्रतीत होता था कि उन दोनों में भीषण घात-प्रतिघात चल रहा है।
(13)
वेला क्षण-क्षण निकट आ रही क्षितिज क्षीण, फिर लीन हुआ,
उदधि डुबाकर अखिल धरा को बस मर्य्यादा हीन हुआ!
करका क्रन्दन करती गिरती और कुचलना था सब का,
पंचभूत का यह तांडवमय नृत्य हो रहा था कब का।
व्याख्या : धीरे-धीरे सागर का किनारा क्षण-प्रतिक्षण समीप जाने लगा और सुदूर क्षितिज के पास की पृथ्वी के भी जलमग्न हो जाने के कारण अब जल और आकाश मिले हुए दीख पड़ने लगे। समुद्र की यह मर्यादा है कि वह अपने तट को नहीं डुबाता परंतु प्रलयकालीन सागर ने अपनी मर्यादा का परित्याग कर समस्त धरती को डुबो दिया और वह सीमाहीन हो गया।
चारों ओर से भयंकर आवाज़ें करते हुए शोले बरसने लगे और उनके नीचे सब कुछ दबने लगा तथा पंचभूतों का यह भीषण तांडव न जाने कब तक चलता रहा।
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