“साए में धूप” दुष्यंत कुमार की एक प्रसिद्ध ग़ज़ल है, जो उनके संग्रह “साए में धूप” (1975) का हिस्सा है। यह ग़ज़ल हिंदी साहित्य में अपनी गहन संवेदनशीलता और सामाजिक चेतना के लिए जानी जाती है। इसमें दुष्यंत ने 1960 और 1970 के दशक की सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल, अन्याय और आम आदमी की पीड़ा को व्यक्त किया है। ग़ज़ल का मूल भाव निराशा और आशा के बीच संतुलन, व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह और मानवीय संघर्ष की प्रेरणा है। उनकी सरल, प्रतीकात्मक और लयबद्ध भाषा पाठक को गहराई से प्रभावित करती है। यह रचना आज भी प्रासंगिक है।
कहाँ तो तय था चिराग हरेक घर के लिए,
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए। (1)
यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है,
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए। (2)
व्याख्या — शायर कहता है कि चुनावों के समय यह घोषणा की जाती है कि प्रत्येक घर में रोशनी का प्रबंध होगा। परंतु चुनावों के बाद घर तो क्या पूरे शहर के लिए एक दीपक भी उपलब्ध नहीं हो पाता। कहने का अभिप्राय यह है कि नेता सामान्य व्यक्ति की प्रत्येक आवश्यकता को पूरा करने की घोषणा करते हैं और बाद में व्यक्ति तो क्या पूरे शहर की छोटी-से-छोटी जरूरत भी पूरी नहीं हो पाती है।
शायर कहता है कि पेड़ों की छाया में भी धूप लगने लगी है, इसलिए बची हुई उम्र को बिताने के लिए कोई और आश्रय स्थल खोजा जाए। अर्थात् जो व्यक्ति या संस्थाएँ आज तक हमें सहारा देती आई हैं, अब परिस्थितियाँ बदलने के कारण वे दुख व पीड़ा पहुंचाने लगे हैं। इसलिए शेष बची हुई उम्र बिताने के लिए कहीं और जाकर आश्रय अपनाया जाए।
न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे,
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए। (3)
खुदा नहीं, न सही, आदमी का ख्वाब सही,
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए। (4)
व्याख्या — शायर कहता है कि यदि पूरे शरीर को ढंकने के लिए कमीज नहीं है तो लोग अपने पैरों को मोड़कर पेट को ढंक लेते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जीवन में अभावों का सामना करने वाले लोग इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि वे उन अभावों से समझौता कर लेते हैं और सीमित साधनों के बल पर ही जीवनयापन कर लेते हैं। इस प्रकार के लोग ऐसी जीवन-यात्रा के लिए सर्वथा उपयुक्त हैं।
शायर कहता है कि यदि भगवान नहीं है तो न सही ; यह केवल मनुष्य का हसीन ख्वाब अर्थात सुंदर स्वप्न ही सही | कम से कम उसकी आँखों में अपने दु:खों का निवारण करने के लिए खुदा के रूप में कोई सुंदर दृश्य तो है। अर्थात इस संसार में भगवान नहीं तो कोई बात नहीं, आम आदमी के लिए सपना तो है। कहने का तात्पर्य है कि ईश्वर मानव की कल्पना तो है ही। इस कल्पना के जरिये उसे आकर्षक दृश्य देखने के लिए मिल जाते हैं। इस तरह उनका जीवन कट जाता है।
वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिंघल नहीं सकता,
मैं बेकरार हूँ आवाज में असर के लिए। (5)
तेरा निज़ाम है सिल दे जुबान शायर की,
ये एहतियात जरूरी है इस बहर के लिए। (6)
जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले,
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए। (7)
व्याख्या — पहले शेर में कवि आम व्यक्ति के विश्वास की बात बताता है। आम व्यक्ति को विश्वास है कि भ्रष्ट व्यक्तियों, पूँजीपति वर्ग अर्थात् शोषक वर्ग के दिल पत्थर के होते हैं उनमें संवेदना नहीं होती। किसी का दु:ख उन्हें भावुक नहीं बना सकती है लेकिन कवि एक ऐसी आवाज के लिए व्याकुल है जिसमें इतना दर्द भरा हो कि पत्थर हृदय पिघल जाये । कहने का अभिप्राय यह है कि आम आदमियों के स्वर में क्रांति की चिंगारी हो। उनकी आवाज बुलंद हो तथा आम आदमी संगठित होकर विरोध करें तो भ्रष्ट व्यक्ति समाप्त हो सकते हैं।
दूसरे शेर में, कवि शायरों और शासक के संबंधों के बारे में बताता है। शायर सत्ता के खिलाफ लोगों को जागरूक करता है। इससे सत्ता को क्रांति का भय रहता है। वे स्वयं को बचाने के लिए शायरों की जबान अर्थात् कविताओं पर प्रतिबंध लगा सकते हैं। जैसे गजल के छन्द के लिए बंधन की सावधानी जरूरी है, उसी तरह शासकों को भी अपनी सत्ता कायम रखने के लिए विरोध को दबाना जरूरी है। कवि आगे कहता है कि तुम्हारा शासन है. तुम चाहो तो कवि की आवाज बंद सकते हो। क्योंकि जो रचनाएँ उसके द्वारा कही जा रही हैं वे तुम्हारे विरुद्ध सिद्ध होती हैं। ऐसी रचनाओं को समाज में फैलने से रोकने के लिए यही सावधानी अपनानी होगी कि कवि को समाप्त कर दिया जाए।
तीसरे शेर में, शायर कहता है कि हम अपने उपवन के सुंदर फूलदार गुलमोहर के वृक्ष के नीचे अपना जीवन बिताएँ और दूसरों के फूलदार गुलमोहर की रक्षा के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दें। कहने का अभिप्राय यह है कि हम अपने जीवन में उपलब्ध होने वाली सुख-सुविधाओं में जीवन-निर्वाह करें और दूसरों की मुख-सुविधाओं की रक्षा करने की भावना भी रखें। परोपकर के लिए हमें अपना जीवन तक न्योछावर कर देना चाहिए। दूसरे शब्दों में मनुष्य जब तक जिएँ, वह मानवीय मूल्यों को मानते हुए शाति से जिएँ। दूसरों के लिए भी इन्हीं मूल्यों की रक्षा करते हुए बाहर की गलियों में भरें।
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