1. उदन्त मार्तण्ड — यह हिंदी का प्रथम समाचार पत्र है, जिसका प्रकाशन 30 मई 1826 को कलकत्ता से साप्ताहिक रूप में शुरू हुआ था। इसके संपादक पंडित जुगल किशोर शुक्ल (युगुल किशोर सुकुल) थे। ‘उदन्त मार्तण्ड’ का शाब्दिक अर्थ है ‘उगता हुआ सूर्य’। इसी ऐतिहासिक पत्र के शुरू होने की याद में हर वर्ष 30 मई को ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य हिंदी भाषी जनता को अपनी भाषा में सूचना देना था। ब्रिटिश सरकार से डाक शुल्क में कोई छूट न मिलने के कारण हुए भारी आर्थिक संकट की वजह से 4 दिसंबर 1827 को यह पत्र बंद हो गया।
2. कविवचन सुधा — इस पत्रिका का प्रकाशन आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने 15 अगस्त 1867 को काशी (वाराणसी) से किया था। इस पत्रिका ने हिंदी साहित्य में ‘भारतेन्दु युग’ की मज़बूत नींव रखी। शुरुआत में यह एक मासिक पत्रिका थी, जो लोकप्रिय होने पर साप्ताहिक बन गई। इसके माध्यम से भारतेन्दु जी ने स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग, स्त्री शिक्षा और समाज सुधार का जोरदार समर्थन किया। इसमें ब्रजभाषा के साथ-साथ खड़ी बोली गद्य का विकास भी देखने को मिलता है। ब्रिटिश सरकार की आलोचना करने के कारण इसे सरकारी कोपभाजन का शिकार होना पड़ा।
3. हिंदी प्रदीप — यह भारतेन्दु युग की एक प्रमुख पत्रिका थी, जिसका संपादन पंडित बालकृष्ण भट्ट ने किया था। इसका प्रकाशन सितंबर 1877 में प्रयाग (इलाहाबाद) से शुरू हुआ। घोर आर्थिक संकटों के बावजूद भट्ट जी ने इसे लगभग 33 वर्षों तक निरंतर निकाला। इसकी भाषा अत्यंत चुटीली, मुहावरेदार और व्यंग्यात्मक थी। यह उग्र राष्ट्रवादी चेतना की पत्रिका थी, जो अंग्रेजी हुकूमत पर कड़े प्रहार करती थी। राजद्रोहात्मक लेख छापने के कारण जब अंग्रेजी सरकार ने इस पर भारी जुर्माना लगाया, तो इसे मजबूरन बंद करना पड़ा। इसने हिंदी निबंध और आलोचना विधा को नई ऊँचाइयाँ दीं।
4. ब्राह्मण — ‘ब्राह्मण’ पत्रिका का प्रकाशन 15 मार्च 1883 को कानपुर से पंडित प्रताप नारायण मिश्र ने शुरू किया था। मिश्र जी ने इसी पत्रिका के माध्यम से “हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान” का प्रसिद्ध नारा दिया था। इसकी भाषा में ग्रामीण मुहावरों और बैसवाड़ी बोली का पुट था। इसका मुख्य उद्देश्य समाज में फैले अंधविश्वासों को दूर करना और जनचेतना जगाना था। जब पत्रिका पर आर्थिक संकट आया, तो उन्होंने चंदा माँगते हुए लिखा था- “आठ मास बीते जजमान, अब तो करो दक्षिणा दान”। 1894 में मिश्र जी के असामयिक निधन के बाद यह पत्रिका बंद हो गई।
5. सरस्वती — ‘सरस्वती’ हिंदी साहित्य और पत्रकारिता की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका मानी जाती है। इसका प्रकाशन जनवरी 1900 में ‘इंडियन प्रेस’, प्रयाग से शुरू हुआ। 1903 से 1920 तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी इसके यशस्वी संपादक रहे और इस काल को ‘द्विवेदी युग’ कहा गया। इस पत्रिका ने हिंदी भाषा का परिमार्जन कर उसे एक मानक (शुद्ध) स्वरूप प्रदान किया। इसने ब्रजभाषा की जगह ‘खड़ी बोली’ को साहित्य और काव्य की भाषा बनाया। इसमें साहित्य के साथ विज्ञान, इतिहास और कला पर भी लेख छपते थे। इसने मैथिलीशरण गुप्त जैसे नवोदित कवियों को गढ़ा।
6. कर्मवीर — ‘कर्मवीर’ एक प्रखर राष्ट्रवादी पत्रिका थी, जिसके यशस्वी संपादक ‘एक भारतीय आत्मा’ के नाम से प्रसिद्ध माखनलाल चतुर्वेदी थे। इसका साप्ताहिक प्रकाशन 1920 के आसपास जबलपुर और बाद में खंडवा से हुआ। इस पत्रिका का मुख्य स्वर देशप्रेम, त्याग और स्वतंत्रता के लिए बलिदान था। चतुर्वेदी जी ने अपनी विश्व प्रसिद्ध कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ इसी राष्ट्रवादी दौर में लिखी थी। इसने असहयोग आंदोलन और झंडा सत्याग्रह को वैचारिक ताकत दी। अपने विद्रोही और क्रांतिकारी तेवरों के कारण ब्रिटिश सरकार ने चतुर्वेदी जी को कई बार जेल भेजा।
7. हंस — ‘हंस’ पत्रिका की स्थापना कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने मार्च 1930 में बनारस (वाराणसी) से की थी। यह पत्रिका प्रगतिशील विचारधारा, साम्यवाद और दलित-शोषित वर्ग की मज़बूत आवाज़ बनी। प्रेमचंद ने इसे “साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल” कहा था। इसके मुखपृष्ठ पर न्याय और विवेक के प्रतीक दो हंसों का चित्र छपता था। प्रेमचंद के बाद इसका संपादन जैनेन्द्र कुमार और शिवदान सिंह चौहान ने किया। 1986 में राजेंद्र यादव ने दिल्ली से इसका पुनः प्रकाशन शुरू किया, जिसने स्त्री और दलित विमर्श को नई दिशा दी। वर्तमान में इसके संपादक संजय सहाय हैं।
8. मतवाला — ‘मतवाला’ एक हास्य-व्यंग्य प्रधान साप्ताहिक पत्रिका थी, जिसका प्रकाशन 1923 में कलकत्ता (कोलकाता) से महादेव प्रसाद सेठ ने शुरू किया था। महान छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ इसके संपादकीय मंडल के प्रमुख सदस्य थे और उन्होंने ही इसका नामकरण ‘मतवाला’ किया था। ‘चलती चक्की’ इसका बहुत ही लोकप्रिय व्यंग्य स्तंभ था। इसकी भाषा बेबाक, मुहावरेदार और साहसी थी। इसने निराला की स्वच्छंद चेतना को मंच दिया और छायावाद का खुलकर समर्थन किया। इसके तीखे राजनीतिक व्यंग्यों के कारण ब्रिटिश हुकूमत हमेशा इससे घबराती थी।
9. धर्मयुग — धर्मयुग’ हिंदी की सबसे श्रेष्ठ और लोकप्रिय साप्ताहिक पत्रिकाओं में से एक थी, जिसका प्रकाशन मुंबई से ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ समूह करता था। महान साहित्यकार डॉ. धर्मवीर भारती (1960-1987) इसके सबसे यशस्वी संपादक रहे। उनके समय में यह पत्रिका हिंदी भाषी मध्यवर्ग की सांस्कृतिक पहचान बन गई थी। इसके ‘होली’ और ‘दीवाली’ विशेषांक पूरे देश में बहुत प्रसिद्ध थे। भारती जी ने 1971 के युद्ध की सीधी रिपोर्टिंग इसी पत्रिका के लिए की थी। उस दौर में इसमें छपना किसी भी नए लेखक के लिए बहुत बड़ा सम्मान माना जाता था। 1997 में यह पत्रिका बंद हो गई।
10. दिनमान — ‘दिनमान’ हिंदी की पहली गंभीर समाचार साप्ताहिक पत्रिका थी। इसका प्रकाशन 1965 में नई दिल्ली से ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ समूह द्वारा शुरू किया गया। महान साहित्यकार ‘अज्ञेय’ इसके संस्थापक संपादक थे, जिसके बाद रघुवीर सहाय ने इसका बेहद सफल संपादन किया। यह पत्रिका केवल ख़बरें नहीं देती थी, बल्कि उनका गहरा राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषण भी करती थी। इसने जन-सरोकारों और ग्रामीण भारत की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का व्यंग्य स्तंभ ‘चर्चे और चरखे’ इसमें बहुत लोकप्रिय था। यह बेहतरीन पत्रिका 1990 के दशक की शुरुआत में बंद हो गई।