हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा ‘नीड़ का निर्माण फिर’ का सारांश

हिंदी के महान कवि हरिवंशराय बच्चन जी की यह आत्मकथा सिर्फ उनके जीवन की कहानी नहीं है। यह इंसान के संघर्ष, गिरने, फिर से उठने और हर हाल में जीने की इच्छा की एक बहुत बड़ी और सच्ची कहानी है। उनकी आत्मकथा चार भागों में छपी थी। इनमें से दूसरा भाग है— ‘नीड़ का निर्माण फिर’ (1970 में प्रकाशित)।

​’नीड़’ का मतलब होता है घोंसला या घर। जैसे भयानक तूफान में एक पक्षी का घोंसला टूट कर बिखर जाता है, लेकिन तूफान रुकने के बाद वह पक्षी हार नहीं मानता और फिर से तिनके जोड़कर अपना नया घोंसला बनाता है। उसी तरह, यह किताब बच्चन जी के जीवन के पूरी तरह से बर्बाद होने के बाद, राख से उठकर फिर से खड़े होने की एक बहुत ही प्रेरणा देने वाली कहानी है।

कथा की पृष्ठभूमि: अंधकार, अवसाद और मृत्यु का साया

‘नीड़ का निर्माण फिर’ की कहानी वहीं से शुरू होती है जहाँ पहले भाग (‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’) का अंत हुआ था। बच्चन जी की पहली पत्नी श्यामा का टी.बी. की बीमारी के कारण बहुत छोटी उम्र में ही निधन हो गया था। श्यामा बच्चन जी की ज़िंदगी का बहुत बड़ा सहारा थीं। उनके जाने से बच्चन जी अंदर तक टूट गए थे। उन्हें ऐसा लगने लगा था जैसे उनके जीवन की सारी खुशियाँ और उम्मीदें खत्म हो गई हों।

​पत्नी की मौत के कुछ ही समय बाद उनके पिता जी भी चल बसे। घर में बहुत ज्यादा गरीबी आ गई और उनके सिर पर भारी कर्ज हो गया। यह वह समय था जब बच्चन जी बहुत ज्यादा उदास रहने लगे, अकेलेपन का शिकार हो गए और उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि ज़िंदगी में आगे क्या करें। ऐसे दुखी और खालीपन के समय में उन्होंने ‘निशा निमंत्रण’ और ‘एकांत संगीत’ जैसी मशहूर कविताएँ लिखीं, जिनमें उनके दिल का दर्द साफ दिखाई देता है।

जीवन का संघर्ष और भटकाव

इस किताब में बच्चन जी ने अपने इस भटकाव और दुख का बहुत ईमानदारी से वर्णन किया है। वे लिखते हैं कि किस तरह इलाहाबाद में रहते हुए उन्होंने खुद को शराब और उदासी में डुबो लिया था। वे अपनी ज़िंदगी से इतने निराश थे कि कई बार उनके मन में आत्महत्या (खुद को खत्म करने) के विचार भी आते थे।

​पैसों की तंगी से जूझते हुए बच्चन जी ट्यूशन पढ़ाकर और छोटे-मोटे काम करके किसी तरह अपनी विधवा माँ और भाई का पेट पाल रहे थे। इस बीच उनके जीवन में कई दोस्त और कुछ महिलाएँ भी आईं, जिन्होंने उनके इस अकेलेपन को दूर करने की कोशिश की, लेकिन श्यामा की जगह कोई नहीं ले पाया। बच्चन जी ने अपनी किताब में अपनी कमजोरियों और गलतियों को बिना किसी शर्म या परदे के पाठकों को बताया है, जो इस किताब की सबसे अच्छी बात है।

परिवर्तन का बिंदु: तेजी सूरी (तेजी बच्चन) से भेंट

दुख और अंधेरे के इस लंबे समय के बाद कहानी में एक नया और बहुत ही सुंदर मोड़ तब आता है, जब 31 दिसंबर 1941 को बरेली में उनकी मुलाकात तेजी सूरी (जो बाद में तेजी बच्चन बनीं) से होती है। बच्चन जी अपने एक दोस्त प्रकाश के घर बरेली गए हुए थे, जहाँ वे तेजी से मिले।

​तेजी जी बहुत ही खुशमिज़ाज, फुर्तीली और कला से प्यार करने वाली महिला थीं। वे बच्चन जी की कविताओं को बहुत पसंद करती थीं। पहली ही मुलाकात में दोनों के बीच एक गहरा और सच्चा रिश्ता बन गया। तेजी ने बच्चन जी की आँखों में छिपे उस गहरे दर्द और अकेलेपन को पहचान लिया जिसे दुनिया नहीं देख पा रही थी। तेजी के रूप में बच्चन जी को वह साथी मिल गई जो उनकी टूटी हुई ज़िंदगी को फिर से संवार सकती थी। तेजी के आते ही बच्चन जी के जीवन में मानो खुशियों का वसंत लौट आया।

सामाजिक रूढ़ियों का सामना और ‘नीड़’ का पुनर्निर्माण

उस समय का समाज (1940 का दशक) आज की तरह खुले विचारों वाला नहीं था। बच्चन जी उत्तर प्रदेश के एक साधारण परिवार से थे और उनकी पहली पत्नी का देहांत हो चुका था, जबकि तेजी एक अमीर पंजाबी परिवार से थीं। इन दोनों की शादी दो अलग-अलग जातियों और राज्यों के बीच थी, जिसे उस समय के समाज में बहुत बड़ी बगावत माना जाता था।

​लेकिन दोनों का प्यार इतना सच्चा और पक्का था कि उन्होंने समाज और रिश्तेदारों की परवाह नहीं की। 24 जनवरी 1942 को इलाहाबाद में दोनों ने बहुत ही सादे तरीके से शादी कर ली। तेजी के घर में कदम रखते ही बच्चन जी की ज़िंदगी पूरी तरह से बदल गई। जो घर श्यामा की मौत के बाद एकदम सूना और वीरान हो गया था, तेजी ने अपने प्यार और समझदारी से उसे फिर से एक स्वर्ग (नीड़) बना दिया। यहीं से असल में ‘नीड़ का निर्माण फिर’ यानी नए घर का बनना सच साबित होता है।

एक नया जीवन: आशा और सृजन का दौर

तेजी के आने के बाद बच्चन जी ने अपनी उदासी और निराशा को हमेशा के लिए छोड़ दिया। उनके अंदर जीने की एक नई इच्छा पैदा हुई। उनकी ज़िंदगी में फिर से एक अनुशासन और नियम आ गया। इसी खुशहाल शादीशुदा ज़िंदगी के दौरान उनके दो बेटों—अमिताभ (मशहूर एक्टर अमिताभ बच्चन) और अजिताभ का जन्म हुआ। बच्चों की हँसी-खुशी ने उनके इस नए ‘नीड़’ (घर) को और भी खुशहाल बना दिया।

​इसी समय में बच्चन जी का लिखने का तरीका भी बदल गया। उनकी कविताओं में जो पहले ज़हर और उदासी थी, वह अब उम्मीद, ज़िंदगी से प्यार और कुछ नया बनाने के गीतों में बदल गई। उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अपनी आगे की पढ़ाई (एम.ए.) पूरी की और वहीं पढ़ाना भी शुरू कर दिया। यह भाग हमें बताता है कि कैसे एक औरत का सच्चा प्यार एक टूटे हुए और भटके हुए इंसान को फिर से एक सफल इंसान बना सकता है।

आत्मकथा की भाषा-शैली और प्रामाणिकता

साहित्य के नज़रिए से ‘नीड़ का निर्माण फिर’ हिंदी की एक बहुत ही अनमोल किताब है। इसकी सबसे बड़ी खासियत बच्चन जी की ‘सच्चाई’ है। उन्होंने खुद को एक महान हीरो के रूप में नहीं दिखाया है, बल्कि अपनी कमियों, निराशाओं, पैसों की कमी और यहाँ तक कि अपने प्रेम-संबंधों को भी पूरी सच्चाई से लिखा है।

​इस आत्मकथा की भाषा कहानी की तरह होते हुए भी कविता जैसा मज़ा देती है। भाषा बहुत ही आसान, लगातार बहने वाली और भावनाओं से भरी है। शब्दों का चुनाव इतना सटीक है कि पढ़ने वाला खुद को बच्चन जी के उस समय में खड़ा हुआ महसूस करता है।

निष्कर्ष

अंत में यह कहा जा सकता है कि हरिवंशराय बच्चन जी की पुस्तक ‘नीड़ का निर्माण फिर’ सिर्फ एक कवि के शादी करने और घर बसाने की कहानी नहीं है। यह इंसान के अंदर की उस ताकत की कहानी है जो कभी हार नहीं मानती। यह किताब हमें यह संदेश देती है कि ज़िंदगी में चाहे कितना भी बड़ा तूफान क्यों न आ जाए, चाहे सब कुछ क्यों न उजड़ जाए, हमें हार नहीं माननी चाहिए। सब कुछ बर्बाद होने के बाद भी, फिर से कुछ नया बनाने का समय ज़रूर आता है।

​इस किताब का असली संदेश बच्चन जी की इन मशहूर लाइनों में है कि नाश या बर्बादी के दुख से, नया कुछ बनाने की आशा कभी खत्म नहीं होती। यह किताब हर उस इंसान के लिए एक बड़ी प्रेरणा है जो ज़िंदगी की मुश्किलों से थक कर हार मान चुका है, क्योंकि यह सिखाती है कि राख से फिर से एक नया घोंसला (नीड़) कैसे बनाया जाता है।

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