‘बयालीस के ज्वार की लहरों में’ संस्मरण की विशेषताएँ / मूल संवेदना /उद्देश्य /संदेश / निहित राष्ट्रीय भावना

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ जी द्वारा रचित संस्मरण ‘बयालीस के ज्वार की लहरों में’ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का एक सजीव और मार्मिक चित्रण है। इस पाठ में लेखक ने बताया है कि कैसे 9 अगस्त 1942 को सभी बड़े नेताओं के जेल जाने के बाद भी भारत की जनता बिना किसी नेतृत्व के अपने आप उठ खड़ी हुई थी। यह पाठ ब्रिटिश शासन की क्रूरता और उसके सामने निहत्थे लेकिन अदम्य साहसी भारतीय युवाओं, विशेषकर छात्रों के महान बलिदान की गौरव गाथा प्रस्तुत करता है।

‘बयालीस के ज्वार की लहरों’ की विशेषताएँ

(1) बिना किसी नेता के अपने आप शुरू हुआ आंदोलन

9 अगस्त 1942 की सुबह तक कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को पकड़कर जेलों में डाल दिया गया था। अंग्रेजों को लगा था कि अब जनता को बगावत सिखाने वाला कोई नहीं बचा है। लेकिन इसके बावजूद, जनता बिना किसी नेता या मार्गदर्शन के अपने आप उठ खड़ी हुई। नेताओं की इस सामूहिक गिरफ्तारी ने जनता के मन में सुलग रही आग को भड़का दिया और उसे एक भयंकर ज्वाला में बदल दिया। इस प्रकार यह एक ऐसा अनोखा जन-आंदोलन था जिसे किसी बाहरी सीख या नेतृत्व की कोई आवश्यकता नहीं रह गई थी, बल्कि लोग खुद ही अपने रास्ते पर निकल पड़े थे।

(2) करो या मरो का जोश और निडरता

यह एक ऐसा निर्णायक और आर-पार का संघर्ष था जहाँ दोनों ही पक्ष अपनी जान की बाज़ी लगाकर लड़ रहे थे। भारतवासियों की देशभक्ति का केवल एक ही नारा था कि अंग्रेजों को यह देश छोड़कर जाना ही होगा। इस आंदोलन में भाग लेने वालों के भीतर मृत्यु का कोई भय नहीं था। छोटे-छोटे विद्यार्थी भी पूरी निश्चिंतता के साथ अपनी जान कुर्बान करने और शहादत देने को तैयार थे। यह एक ऐसी लड़ाई थी जिसमें किसी एक पक्ष को पूरी तरह से मिटना ही था, इसलिए देशवासी अपना सब कुछ दाँव पर लगाने को पूरे जोश के साथ तैयार थे।

(3) अंग्रेजी शासन के ठिकानों पर सीधा हमला

जनता के भीतर धधकती हुई देशभक्ति की आग ने अंग्रेजी सत्ता के हर प्रतीक और ठिकाने को अपना निशाना बनाया। देखते ही देखते शासन की शक्ति के मुख्य केंद्र माने जाने वाले पुलिस-थाने, डाकघर और रेलवे स्टेशन आग की लपटों में जलकर खाक हो गए। इन विनाशकारी घटनाओं के कारण मुख्य प्रशासनिक केंद्रों का संपर्क देहातों और गाँवों से पूरी तरह कट गया। इस जबर्दस्त जन-उभार ने अंग्रेजी शासन के हाथ-पाँव फुला दिए और उन्हें गहरे सन्नाटे में ला दिया। स्थिति यह हो गई थी कि पूरा देश ही एक बड़ी युद्ध-भूमि में बदल गया था।

(4) गाँवों तक फैली क्रांति और छात्रों की बहादुरी

इस क्रांति की आग केवल बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि छोटे-छोटे देहातों और गाँवों की गलियों में भी देशभक्ति के गीत और नारे गूँजने लगे। बिहार की राजधानी पटना जैसे शहरों में सुबह-सुबह चिड़ियों के जागने से पहले ही छात्र सड़कों पर उतर आते थे और गलियाँ उनकी प्रभात फेरियों से गूँज उठती थीं। पुलिस की लाठियां खाने और हड्डियां टूटने के बाद भी लोगों का जोश कम नहीं होता था। चौदह वर्ष तक के भोले-भाले किशोर भी पूरी निडरता के साथ अंग्रेजी फौज के सामने अपना सीना तान कर खड़े हो गए, जिनका साहस देखकर पहाड़ भी शरमा जाएं।

(5) अपने तिरंगे झंडे के लिए जान कुर्बान करने की ज़िद

आंदोलनकारी छात्रों के मन में अपने राष्ट्रध्वज तिरंगे के लिए इतना सम्मान था कि वे उसे सरकारी इमारतों (सेक्रेटेरिएट) पर फहराने के लिए अपनी जान देने को तैयार थे। यूनियन जैक की जगह अपना झंडा फहराने की ज़िद में ग्यारह छात्रों ने एक साथ खुशी-खुशी सीने पर गोलियाँ खाईं और ज़मीन पर गिर पड़े। एक छात्र तो गुंबद पर चढ़ गया और अपना तिरंगा झंडा फहराने के बाद सीने पर गोली खाकर ही नीचे गिरा। अस्पताल में अंतिम साँस लेते हुए उसे इस बात का बहुत ज्यादा गर्व था कि उसने कायरों की तरह पीठ पर नहीं, बल्कि एक वीर की तरह अपनी छाती पर गोली खाई है।

(6) अंग्रेजों का हद पार करने वाला जुल्म और क्रूरता

अंग्रेजों ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए इंसानियत की सारी हदें पार कर दीं और पुलिस तथा फौज को गाँवों में मनमानी करने की पूरी छूट दे दी। उन्होंने निहत्थे लोगों पर ‘दमदम’ बुलेट जैसी खतरनाक और प्रतिबंधित गोलियाँ चलाईं, जिनका उपयोग युद्ध के नियमों के अनुसार भी वर्जित था। लूटपाट करना, लोगों के घर फूँकना, गाँवों को जलाना और राम सिंह जैसे निर्दोष नागरिकों को लोहे के खूँटे पर बिठाकर मार डालना उनकी क्रूरता का सबसे भयानक रूप था। उन दिनों बिहार में गोरे सैनिकों के लिए इंसानों और कुत्तों में कोई खास फर्क नहीं रह गया था और वे बेखौफ होकर हत्याएं कर रहे थे।

(7) दिखने वाली हार में छिपी हुई असली और पक्की जीत

भले ही उस समय के क्रूर दमन और अत्याचारों को देखकर ऐसा लग रहा था कि अंग्रेज जीत गए हैं और भारतवासी हार गए हैं। लेकिन हकीकत यह थी कि उस भयानक दमनकारी समय में भी भारतीय हार कर भी जीत गए थे, और अंग्रेज अपनी क्रूरता से जीत कर भी हार चुके थे। इसी महान संघर्ष और शहादत ने अंततः वह मज़बूत ज़मीन तैयार की जिसके कारण ठीक पाँच वर्ष बाद 15 अगस्त 1947 को यूनियन जैक हमेशा के लिए खिसक गया और अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा। बयालीस के इस अभूतपूर्व और चमत्कारिक जागरण ने दुनिया के सामने हमेशा के लिए एक नया इतिहास रच दिया।

निष्कर्ष : संक्षेप में कहें तो 1942 का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ केवल एक राजनीतिक विद्रोह नहीं था, बल्कि यह भारत की सोई हुई आत्मा का वह प्रचंड जागरण था जिसने अंग्रेजी साम्राज्य की जड़ें हमेशा के लिए हिला दीं। भले ही अंग्रेजों ने क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए इस ज्वार को दबाने की कोशिश की और ऊपर से देखने पर हम हारे हुए लगे, लेकिन इस आंदोलन में दी गई अनगिनत शहादतों ने ही 1947 की आज़ादी की नींव पक्की की। यह संस्मरण हमें सिखाता है कि निहत्थे लोगों का अदम्य साहस और देशभक्ति, दुनिया की किसी भी बड़ी फौजी ताकत से हारकर भी जीत जाती है।

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