नौबतखाने में इबादत ( यतीन्द्र मिश्र )/ Naubatkhane Mein Ibadat ( Yatindra Mishra )

( यहाँ NCERT की कक्षा 10वीं की हिंदी की पाठ्य पुस्तक 'क्षतिज भाग 2' में संकलित 'नौबतखाने में इबादत ( यतीन्द्र मिश्र )' अध्याय का सार तथा अभ्यास के प्रश्नों को दिया गया है | )

पाठ का सार

यतीन्द्र मिश्र द्वारा रचित ‘नौबतखाने में इबादत’ प्रसिद्ध शहनाई वादक भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के जीवन और उनकी संगीत साधना पर आधारित एक अत्यंत प्रेरणादायक व्यक्ति-चित्र है। यह पाठ न केवल उनके संगीत के सफर को दर्शाता है, बल्कि उनकी सादगी, धार्मिक सद्भाव और कला के प्रति अटूट समर्पण को भी उजागर करता है।

अमीरूद्दीन (बिस्मिल्ला खाँ) का जन्म बिहार के डुमरांव में हुआ था, लेकिन उनका पालन-पोषण और संगीत की शिक्षा उनके ननिहाल काशी (वाराणसी) में हुई। उनके पूर्वज दरबारी संगीतकार थे, इसलिए संगीत उन्हें विरासत में मिला था। उनके मामा सादिक हुसैन और अलीबख्श खाँ प्रसिद्ध शहनाई वादक थे, जिन्हें देखकर बालक अमीरूद्दीन के मन में इस वाद्य के प्रति गहरा आकर्षण पैदा हुआ। उनकी संगीत यात्रा की शुरुआत रसूलन बाई और बतूलन बाई के गायन को सुनने से हुई, जिसके प्रभाव ने उनके भीतर संगीत के बीज बोए।

बिस्मिल्ला खाँ का जीवन गंगा-जमुनी तहजीब का एक जीवंत उदाहरण था। वे एक सच्चे मुसलमान थे, जो पांचों वक्त की नमाज पढ़ते थे और मुहर्रम के दौरान शोक मनाते थे। साथ ही, वे बाबा विश्वनाथ और माँ सरस्वती के अनन्य भक्त भी थे। वे अक्सर बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी पर बैठकर शहनाई का रियाज करते थे। उनके लिए संगीत और धर्म अलग-अलग नहीं थे; वे शहनाई के माध्यम से ईश्वर की इबादत करते थे। उनकी मान्यता थी कि संगीत ही वह माध्यम है जो मनुष्य को परमात्मा से जोड़ता है।

उनकी सादगी का आलम यह था कि भारत रत्न जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्राप्त करने के बाद भी वे एक साधारण फटी हुई तहमत (लुंगी) पहनने में संकोच नहीं करते थे। जब उनकी शिष्या ने उन्हें इस पर टोका, तो उन्होंने बड़ी सहजता से कहा कि “मालिक से फटा हुआ सुर न मांगे, लुंगी तो क्या है, आज फटी है तो कल नई सिल जाएगी।” यह प्रसंग उनके अहंकार शून्य व्यक्तित्व और कला के प्रति उनकी ईमानदारी को दर्शाता है। वे जीवन भर खुदा से केवल एक ‘सच्चा सुर’ मांगते रहे।

काशी के प्रति उनका प्रेम अटूट था। वे काशी को संस्कृति की पाठशाला मानते थे। पाठ में बिस्मिल्ला खाँ के माध्यम से काशी की बदलती संस्कृति पर भी दुख व्यक्त किया गया है—कैसे वहाँ की कचौड़ी, जलेबी और आपसी भाईचारे की मिठास कम हो रही है। उनके लिए काशी और शहनाई स्वर्ग से बढ़कर थे।

अंततः, ‘नौबतखाने में इबादत’ हमें यह सिखाता है कि कला की कोई जाति या धर्म नहीं होता। बिस्मिल्ला खाँ 80 वर्षों तक लगातार सुरों की साधना करते रहे, लेकिन अंत तक वे खुद को एक जिज्ञासु छात्र ही मानते रहे। यह पाठ उनकी विनम्रता, अटूट भक्ति और भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रति उनके महान योगदान का एक भावपूर्ण दस्तावेज है।

अभ्यास के प्रश्न

प्रश्न 1 – शहनाई की दुनिया में डुमराँव को क्यों याद किया जाता है ?

उत्तर –शहनाई की दुनिया में डुमराँव को याद किए जाने के मुख्य रूप से दो कारण हैं – पहला, शहनाई बजाने के लिए जिस रीड का प्रयोग होता है, वह नरकट नामक घास से बनती है। यह घास अंदर से खोखली और गाँठदार होती है। ऐसी उत्तम गुणवत्ता की नरकट डुमराँव में सोन नदी के किनारे पाई जाती है। इस रीड के बिना शहनाई बजाना संभव नहीं है।
दूसरा कारण यह है कि महान शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की जन्मभूमि डुमराँव ही है। इसी कारण डुमराँव को शहनाई की दुनिया में विशेष स्थान प्राप्त है।

प्रश्न 2 – बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगल ध्वनि का नायक क्यों कहा गया है ?

उत्तर – बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगल ध्वनि का नायक इसलिए कहा जाता है क्योंकि शहनाई को शुभ और मंगल अवसरों पर बजाया जाता है। इसका वादन विवाह, उत्सव और अन्य शुभ कार्यों में किया जाता है।
बिस्मिल्ला खाँ लगभग अस्सी वर्ष की आयु तक शहनाई बजाते रहे। वे भारत के श्रेष्ठ शहनाई वादकों में गिने जाते हैं। उन्होंने शहनाई को देश ही नहीं, विदेशों में भी लोकप्रिय बनाया। इसी कारण उन्हें शहनाई की मंगल ध्वनि का नायक कहा गया है।

प्रश्न 3 – सुषिर–वाद्यों से क्या अभिप्राय है ? शहनाई को ‘सुषिर वाद्यों में शाह’ की उपाधि क्यों दी गई होगी ?

उत्तर – संगीत शास्त्र के अनुसार जिन वाद्यों को फूँक मारकर बजाया जाता है, उन्हें सुषिर वाद्य कहा जाता है। शहनाई, बाँसुरी और श्रृंगी आदि सुषिर वाद्य हैं।
अरब देशों में फूँककर बजाए जाने वाले वाद्य, जिनमें नरकट या रीड लगी होती है, उन्हें ‘नय’ कहा जाता है। शहनाई को वहाँ ‘शाहेनय’ कहा गया है, जिसका अर्थ है – सुषिर वाद्यों में राजा।
शहनाई की ध्वनि बहुत मधुर और कर्णप्रिय होती है, इसलिए उसे ‘सुषिर वाद्यों में शाह’ की उपाधि दी गई है।

प्रश्न 4 – आशय स्पष्ट कीजिए –

(क) ‘फटा सुर न बख्शे। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।’

उत्तर – बिस्मिल्ला खाँ का मानना था कि पहचान कपड़ों से नहीं, बल्कि कला से होती है। वे खुदा से हमेशा अच्छे और शुद्ध सुर माँगते थे। उनका कहना था कि यदि सुर बिगड़ जाए तो उसे ठीक करना संभव नहीं होता, लेकिन फटा कपड़ा कभी-न-कभी सिल ही जाता है। इसलिए वे सुरों को सबसे बड़ा धन मानते थे।

(ख) ‘मेरे मालिक सुर बख्श दे। सुर में वह ताकत पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ।’

उत्तर – बिस्मिल्ला खाँ महान कलाकार होने के बावजूद अत्यंत विनम्र थे। वे ईश्वर से ऐसे सुर माँगते थे, जिन्हें सुनकर श्रोताओं के मन में सच्चा भाव जाग जाए और उनकी आँखों से आनंद के आँसू बहने लगें। वे चाहते थे कि उनकी कला सीधे दिल को छू ले।

प्रश्न 5 – काशी में हो रहे कौन-से परिवर्तन बिस्मिल्ला खाँ को व्यथित करते थे ?

उत्तर – समय के साथ काशी में आए कई परिवर्तन बिस्मिल्ला खाँ को दुखी करते थे, जैसे –

▪️पक्का महाल से मलाई बरफ बेचने वाले अब दिखाई नहीं देते।

▪️कुलसुम की कचौड़ियाँ और जलेबियाँ अब नहीं मिलतीं।

▪️ संगीत और साहित्य के प्रति लोगों का सम्मान कम हो गया है।

▪️गायकों में संगतकारों के प्रति पहले जैसा आदर नहीं रहा।

▪️हिंदू-मुस्लिम आपसी सौहार्द में कमी आ गई है।

प्रश्न 6 – पाठ में आए किन प्रसंगों के आधार पर आप कह सकते हैं कि –

(क) बिस्मिल्ला खाँ मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे।

उत्तर – बिस्मिल्ला खाँ मुस्लिम धर्म के सच्चे अनुयायी थे। वे नियमित नमाज़ पढ़ते थे और खुदा से अच्छे सुर की प्रार्थना करते थे। वे हज़रत इमाम हुसैन की शहादत पर शोक मनाते और नौहा बजाते थे।
इसके साथ-साथ वे काशी में रहते हुए गंगामैया, बालाजी और बाबा विश्वनाथ में भी गहरी आस्था रखते थे। वे हनुमान जयंती के अवसर पर होने वाले संगीत कार्यक्रमों में भी भाग लेते थे। इन प्रसंगों से स्पष्ट है कि वे मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे।

(ख) वे वास्तविक अर्थों में एक सच्चे इंसान थे।

उत्तर – बिस्मिल्ला खाँ के मन में किसी भी धर्म के प्रति भेदभाव नहीं था। वे हिंदू-मुस्लिम एकता के सच्चे उदाहरण थे। वे जिस श्रद्धा से खुदा और इमाम हुसैन को मानते थे, उसी श्रद्धा से गंगामैया और बाबा विश्वनाथ को भी मानते थे। वे गंगा-जमुनी तहज़ीब में विश्वास रखते थे। इसलिए उन्हें सच्चा इंसान कहा जा सकता है।

प्रश्न 7 – बिस्मिल्ला खाँ के जीवन से जुड़ी उन घटनाओं और व्यक्तियों का उल्लेख करें जिन्होंने उनकी संगीत साधना को समृद्ध किया।

उत्तर – ▪️बिस्मिल्ला खाँ की संगीत साधना को समृद्ध करने वाली प्रमुख घटनाएँ और व्यक्ति निम्नलिखित हैं –

▪️बचपन में वे अपने नाना को शहनाई बजाते देखते थे। नाना के निधन के बाद वे उसी शहनाई को ढूँढ़ा करते थे।

▪️अपने मामू के अच्छे सुर सुनकर वे खुशी में पत्थर फेंककर दाद दिया करते थे।

▪️रसूलनबाई और बतूलनबाई के गायन से वे बहुत प्रभावित हुए और संगीत सीखने के लिए प्रेरित हुए।

▪️कुलसुम हलवाइन की कचौड़ियाँ तलने की आवाज़ में भी उन्हें संगीत का रस महसूस होता था।

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