रीढ़ की हड्डी (जगदीशचंद्र माथुर )

( यहाँ NCERT की कक्षा 9वीं की हिंदी की पाठ्य पुस्तक 'कृतिका भाग 1' में संकलित 'रीढ़ की हड्डी (जगदीशचंद्र माथुर )' अध्याय के अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं | )

प्रश्न 1– रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद बात-बात पर “एक हमारा ज़माना था…” कहकर अपने समय की तुलना वर्तमान समय से करते हैं। इस प्रकार की तुलना करना कहाँ तक तर्कसंगत है?

उत्तर- रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद का बार-बार “एक हमारा ज़माना था…” कहकर अपने समय की वर्तमान समय से तुलना करना एक सामान्य वृद्ध मानसिकता को बताता है, जिसमें अतीत को आदर्श और वर्तमान को दोषपूर्ण माना जाता है। यह प्रवृत्ति तर्कसंगत तो कही जा सकती है जब इसका आधार अनुभव और मूल्यों की गहराई पर हो, परन्तु जब यह केवल आधुनिक परिवर्तनों को स्वीकार न कर पाने के कारण हो, तो यह पिछड़ेपन और रूढ़िवादिता को दर्शाता है। समाज निरंतर बदलता है, और हर पीढ़ी की अपनी चुनौतियाँ व दृष्टिकोण होते हैं। अतीत की अच्छाइयों को याद करना उचित है, पर वर्तमान की वास्तविकताओं को नकारना तर्कसंगत नहीं।

प्रश्न 2– रामस्वरूप का अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलवाना और विवाह के लिए छिपाना, यह विरोधाभास उनकी किस विवशता को उजागर करता है?

उत्तर- रामस्वरूप द्वारा अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलवाना और फिर उसी शिक्षा को विवाह के समय छिपाना एक गहरा सामाजिक विरोधाभास है, जो उसकी विवशता को उजागर करता है। यह विरोधाभास उस पितृसत्तात्मक समाज की मानसिकता का परिणाम है जहाँ बेटी की शिक्षा को तभी तक स्वीकारा जाता है जब तक वह विवाह में बाधा न बने। रामस्वरूप आधुनिकता की ओर बढ़ना तो चाहता है, पर समाज की पारंपरिक सोच और ‘कुंवारी कन्या अधिक पढ़-लिख जाए तो विवाह में अड़चन आती है’ जैसी धारणाएँ उसे विवश कर देती हैं। यह उसके भीतर चल रहे संघर्ष को दर्शाता है—एक ओर वह अपनी बेटी को आत्मनिर्भर बनाना चाहता है, दूसरी ओर समाज की आलोचना और विवाह न हो पाने के डर से झूठ बोलने को मजबूर होता है।

प्रश्न 3– अपनी बेटी का रिश्ता तय करने के लिए रामस्वरूप उमा से जिस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा कर रहे हैं, वह उचित क्यों नहीं है?

उत्तर- रामस्वरूप अपनी बेटी उमा से यह अपेक्षा करता है कि वह रिश्ता तय करते समय अधिक बोल-चाल न करे, शर्मीली बने, अधिक पढ़ी-लिखी न लगे, और केवल ‘हाँ’ या ‘ना’ में उत्तर दे। यह अपेक्षा पूरी तरह से अनुचित है, क्योंकि यह एक स्त्री की पहचान, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान को नकारने के समान है।

    यह अपेक्षा न केवल उमा के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाती है, बल्कि समाज में स्त्रियों के अधिकारों और समानता की दिशा में चल रही प्रगति के विरुद्ध भी है। रामस्वरूप का दृष्टिकोण, भले ही सामाजिक दबावों से प्रेरित हो, उमा जैसे आधुनिक सोच रखने वाले युवाओं के व्यक्तित्व को बाधित करता है।

    प्रश्न 4– गोपाल प्रसाद विवाह को ‘बिजनेस’ मानते हैं और रामस्वरूप अपनी बेटी की उच्च शिक्षा छिपाते हैं। क्या आप मानते हैं कि दोनों ही समान रूप से अपराधी हैं? अपने विचार लिखें।

    उत्तर- हाँ, यह कहा जा सकता है कि गोपाल प्रसाद और रामस्वरूप दोनों ही अपने-अपने स्तर पर सामाजिक मूल्यों और नैतिकता के प्रति अपराधी हैं, जबकि उनके अपराध के स्वरूप अलग हैं।

      गोपाल प्रसाद विवाह को ‘बिजनेस’ मानते हैं, जहाँ लेन-देन, प्रतिष्ठा और लाभ की बातें प्रमुख हैं। उनके लिए विवाह एक सौदेबाज़ी है, जिसमें दहेज, पारिवारिक रुतबा और स्त्री की भूमिका केवल एक वस्तु के रूप में देखी जाती है।

      दूसरी ओर, रामस्वरूप अपनी बेटी की उच्च शिक्षा को छिपाकर एक प्रकार का आत्म-धोखा करते हैं। वे जानते हैं कि उमा की शिक्षा उसकी सबसे बड़ी ताक़त है, फिर भी वे उसे दबा देते हैं ताकि वह सही विवाह योग्य लड़की लगे। यह उनकी उस विवशता को दर्शाता है जो समाज की अपेक्षाओं और परंपराओं से बँधी हुई है। वे अपने ही मूल्यों और पुत्री के अधिकारों के साथ समझौता करते हैं।

      इसलिए, जहाँ गोपाल प्रसाद का अपराध जानबूझकर और स्वार्थपूर्ण है, वहीं रामस्वरूप का अपराध विवशता से जन्मा है, लेकिन दोनों ही समाज में स्त्रियों के प्रति न्याय और समानता के मूल्यों को ठेस पहुँचाते हैं।

      प्रश्न 5– “…आपके लाड़ले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नही…” उमा इस कथन के माध्यम से शंकर की किन कमियों की ओर संकेत करना चाहती हैं ?

      उत्तर- उमा का यह तीखा और व्यंग्यपूर्ण कथन — “…आपके लाड़ले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नही…” — शंकर के चरित्र की उन कमज़ोरियों की ओर संकेत करता है जो उसे एक निर्बल, आत्महीन और निर्णयहीन व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करती हैं।

        यह कथन मूलतः शंकर की नैतिक दुर्बलता, स्वाभिमान की कमी, और अपने माता-पिता के अनुचित निर्णयों के प्रति आत्म-स्वतंत्रता के अभाव की ओर इशारा करता है।

        इसका संकेत यह भी है कि शंकर सिर्फ अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करने वाला एक ‘हँसमुख, लेकिन रीढ़विहीन’ युवक है, जो अपने जीवन के निर्णयों में स्वयं को व्यक्त नहीं करता।

        प्रश्न 6– शंकर जैसे लड़के या उमा जैसी लड़की-समाज को कैसे व्यक्तित्व की ज़रूरत है? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

        उत्तर- समाज को आज शंकर जैसे नहीं, बल्कि उमा जैसी व्यक्तित्व की ज़रूरत है। इसका प्रमुख कारण यह है कि उमा एक स्वाभिमानी, आत्मनिर्भर और स्पष्ट सोच वाली युवती है, जो अपने अधिकारों और आत्मसम्मान से समझौता नहीं करती, जबकि शंकर निर्णयहीन, दब्बू और सामाजिक दबावों में घुटा हुआ युवक है।

          आज के समय में समाज को ऐसे ही साहसी, विवेकशील और आत्मनिर्भर व्यक्तित्वों की आवश्यकता है, जो न केवल अपने अधिकारों के लिए जागरूक हों, बल्कि सामाजिक बदलाव के लिए भी प्रेरणा बनें। उमा जैसे चरित्र ही नए समाज की नींव रख सकते हैं।

          प्रश्न 7– ‘रीढ़ की हड्डी’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

          उत्तर- ‘रीढ़ की हड्डी’ नाटक का शीर्षक बहुत ही सही और अर्थपूर्ण है। रीढ़ की हड्डी शरीर को सीधा खड़ा रखती है, वैसे ही इंसान का आत्म-सम्मान, हिम्मत और सच्चाई उसकी अंदरूनी रीढ़ की हड्डी होती है।

            नाटक में रामस्वरूप, गोपाल प्रसाद और शंकर जैसे लोग समाज के डर और दिखावे के आगे झुक जाते हैं। ये लोग सही बात के लिए खड़े नहीं हो पाते – इसलिए ये ‘रीढ़हीन’ कहे जा सकते हैं।

            लेकिन उमा एक ऐसी लड़की है जो सही बात के लिए डटकर खड़ी रहती है, किसी से नहीं डरती, और अपने आत्म-सम्मान से समझौता नहीं करती।

            इसलिए नाटक का यह शीर्षक दिखाता है कि समाज में ऐसे लोगों की ज़रूरत है जिनके अंदर हिम्मत, सच्चाई और आत्म-सम्मान हो। इन्ही सभी बातों से स्पष्ट होता है कि ‘रीढ़ की हड्डी’ शीर्षक उपयुक्त है।

            प्रश्न 8– कथावस्तु के आधार पर आप किसे एकांकी का मुख्य पात्र मानते हैं और क्यों?

            उत्तर- इस एकांकी का मुख्य पात्र हम उमा को मान सकते हैं। इसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं-

              ▪️पूरी कहानी में उमा ही एकमात्र पात्र है जो सच और गलत में फर्क समझती है और सही के लिए आवाज़ उठाती है।
              ▪️वह अपने पिता रामस्वरूप को उनकी गलती का एहसास कराती है।
              ▪️वह गोपाल प्रसाद और शंकर जैसे लोगों की दोहरी सोच और स्वार्थ का विरोध करती है।
              ▪️वह दिखाती है कि लड़की होना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान के साथ जीना ही असली ताकत है।
              इस प्रकार उमा की सोच, व्यवहार और साहस इस नाटक का मुख्य संदेश हैं, और इसी कारण वह इस एकांकी की मुख्य पात्र है।

              प्रश्न 9– एकांकी के आधार पर रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए।

              उत्तर- रामस्वरूप की चारित्रिक विशेषताएँ:

                परंपरावादी सोच– रामस्वरूप अपने पुराने जमाने की बातें करते रहते हैं और बदलाव को जल्दी स्वीकार नहीं करते।
                विवश पिता- वह अपनी बेटी को पढ़ाना तो चाहता है, पर समाज और रिश्तेदारों के डर से उसकी पढ़ाई छिपाता है।
                डरपोक स्वभाव– समाज की सोच के आगे झुक जाते हैं और अपनी बात पर अडिग नहीं रह पाते।
                संकोची– अपने दिल की बात खुलकर नहीं कह पाते और दूसरों के दबाव में आ जाते हैं।

                गोपाल प्रसाद की चारित्रिक विशेषताएँ:

                  लालची और स्वार्थी– वह शादी को एक व्यापार की तरह देखते हैं और लड़की के गुणों की जगह दहेज को ज्यादा अहमियत देते हैं।
                  दिखावटी– अपने बेटे शंकर को बहुत बड़ा समझते हैं, जबकि उसमें आत्मनिर्भरता की कमी है।
                  संकीर्ण सोच- लड़कियों की शिक्षा और उनके आत्म-सम्मान को महत्व नहीं देते।
                  अहंकारी– दूसरों की बात सुनने की बजाय अपनी सोच को ही सही मानते हैं।
                  इन दोनों पात्रों के व्यवहार से हमें यह समझ में आता है कि समाज में बदलाव तभी आएगा जब ऐसी सोच को पीछे छोड़ा जाएगा।

                  प्रश्न 10– इस एकांकी का क्या उद्देश्य है? लिखिए।

                  उत्तर- इस एकांकी का उद्देश्य समाज में फैली पुरानी सोच और दहेज प्रथा जैसी बुराइयों पर सवाल उठाना है। यह नाटक दिखाता है कि कैसे कुछ लोग लड़की की शिक्षा और योग्यता को नज़रअंदाज़ करके सिर्फ दहेज को महत्व देते हैं। साथ ही, यह भी दिखाया गया है कि समाज में नारी की आत्म-निर्भरता और आत्म-सम्मान की कितनी जरूरत है।

                    एकांकी यह संदेश देती है कि आज के समाज को उमा जैसे हिम्मती और सच बोलने वाले व्यक्तित्व की ज़रूरत है, जो गलत बातों का विरोध कर सके और सही के लिए आवाज़ उठा सके। इसका मकसद लोगों को सोचने और बदलने के लिए प्रेरित करना है।

                    प्रश्न 11– समाज में महिलाओं को उचित गरिमा दिलाने हेतु आप कौन-कौन से प्रयास कर सकते हैं?

                    उत्तर- समाज में महिलाओं को उचित सम्मान और गरिमा दिलाने के लिए हम कई छोटे-छोटे लेकिन ज़रूरी प्रयास कर सकते हैं:

                      शिक्षा का प्रचार– लड़कियों को अच्छी शिक्षा दिलाना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना चाहिए।
                      सम्मानजनक व्यवहार– घर, स्कूल, दफ़्तर, हर जगह महिलाओं से सम्मानपूर्वक बात करनी चाहिए।
                      समान अवसर प्रदान करना – नौकरी, खेल, राजनीति, हर क्षेत्र में महिलाओं को बराबरी का मौका मिलना चाहिए।
                      गलत बात का विरोध करना– जब भी किसी महिला के साथ भेदभाव या अन्याय हो, तो चुप न रहकर उसका विरोध करना चाहिए।
                      घर से बदलाव शुरू करना– अपने घर में लड़के और लड़की के साथ एक जैसा व्यवहार करना चाहिए।
                      महिलाओं की सफलता को सराहना– जब कोई महिला अच्छा काम करे, तो उसकी सराहना करके उसका हौसला बढ़ाना चाहिए।
                      इन प्रयासों से समाज में महिलाओं को उनका सही स्थान और सम्मान मिल सकता है।

                      यह भी पढ़ें :

                      ▪️हिंदी ( कक्षा 9) — क्षितिज भाग 1 और कृतिका भाग 1

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