देवनागरी लिपि का मानकीकरण

देवनागरी लिपि भारत की प्रमुख लिपियों में से एक है, जिसका उपयोग हिंदी, संस्कृत, मराठी, नेपाली आदि भाषाओं के लेखन के लिए होता है। यह लिपि प्राचीन ब्राह्मी लिपि की उत्तरी-शैली से विकसित हुई है | यह लगभग 8वीं–10वीं शताब्दी के आसपास आधुनिक रूप ले चुकी थी।

समय के साथ, क्षेत्र, समय और प्रयोजन के अनुसार दफ्तरों, प्रिंटिंग प्रेसों, शिक्षा संस्थानों आदि में देवनागरी का कई रूपों में उपयोग होने लगा — जिससे अक्षर-रूप, वर्तनी, मात्रा-चिह्न आदि में असमानताएँ उत्पन्न हो गईं। इस प्रकार, लिपि के मानकीकरण (standardization) की आवश्यकता महसूस हुई ताकि लेखन, मुद्रण, शिक्षा, प्रशासन, अनुवाद तथा आधुनिक डिजिटल माध्यमों में एकरूपता बनी रहे।

मानकीकरण का अर्थ और आवश्यकता

मानकीकरण (standardization) का तात्पर्य है — किसी लिपि या भाषा के लेखन में नियम, स्वरूप व वर्तनी तय करना ताकि सभी लोग एक समान रूप में लिख सकें।

देवनागरी मानकीकरण की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से हुई —

▪️विभिन्न क्षेत्रों या मुद्रण घरों में अक्षर-रूपों (glyphs), मात्रा-चिह्न, संयुक्ताक्षर आदि में विविधता थी।

▪️ इससे वर्तनी अस्थिर हो जाती थी — एक ही शब्द कई रूपों में लिखे जा सकते थे ।

▪️शिक्षा, पाठ्यपुस्तकें, सरकारी पत्र, अनुवाद, समाचारपत्र आदि में असमानता होती थी।

▪️कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक मुद्रण, डिजिटल संचार आदि में एक मानक रूप की आवश्यकता थी।

देवनागरी मानकीकरण के प्रमुख प्रयास एवं संस्थाएँ

Central Hindi Directorate (केंद्रीय हिंदी निदेशालय)

इस संस्था ने “” नामक पुस्तक प्रकाशित की, जो देवनागरी वर्णमाला, उसके मानक स्वरूप, वर्तनी नियम, संयुक्ताक्षर आदि का विस्तृत विश्लेषण है।

सरकार द्वारा मानक देवनागरी वर्णमाला (standard Hindi alphabet) तथा हिंदी वर्तनी मानक तय किए गए जिसे शिक्षण, मुद्रण तथा प्रशासन में उपयोग हेतु स्वीकार किया गया।

कंप्यूटरीकरण / डिजिटल मानकीकरण: ISCII और Unicode मानक

1980–90 के दशक में, जैसा कि डिजिटल लेखन और कंप्यूटर युग आया जिससे देवनागरी को कम्प्यूटर्स आदि पर लिखने-देखने हेतु मानक कोडिंग की आवश्यकता हुई। इसके लिए 1988 में ISCII मानक तैयार किया गया। इसने देवनागरी समेत कई भारतीय लिपियों के लिए कोड पॉइंट निर्धारित किए।

बाद में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर Unicode का विकास हुआ, जिसमें देवनागरी को शामिल किया गया। Unicode ने ISCII-1988 की पद्धति से ही कोडिंग तय की। इसके कारण किसी भी कंप्यूटर, मोबाइल या डिजिटल डिवाइस पर देवनागरी अक्षर एक ही कोड व फॉर्मेट में दिखने लगे।

इस डिजिटल मानकीकरण ने देवनागरी को आधुनिक ज़माने के लिए उपयुक्त बनाया और हिंदी व अन्य देवनागरी-लिपिबद्ध भाषाओं का इंटरनेट, ई-पुस्तक, डिजिटल मीडिया आदि में प्रसार सुगम किया।

वर्तनी मानक और साहित्यिक–शिक्षण स्तर पर एकरूपता

“देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण” नामक दस्तावेज़ / पुस्‍तक में वर्तनी, मात्रा-चिन्ह, संयुक्त-वर्ण आदि के मानक नियम तय किए गए। इसे शिक्षा, मुद्रण व प्रशासन में लागू किया गया।

इस मानक वर्तनी से राज्य और क्षेत्र के भेद से उत्पन्न असमानताओं को हटाकर एक समेकित और सार्वभौमिक रूप स्थापित हुआ।

मानकीकरण के प्रमुख बिंदु / मानक स्वरूप

  1. वर्णमाला व वर्ण-क्रम
    — देवनागरी की मानक वर्णमाला तय की गई, जिसमें स्वर और व्यंजन क्रमबद्ध हैं। उदाहरणार्थ, व्यंजन के 33 अक्षर, व कुछ स्वीकार्य संयुक्ताक्षर (जैसे क्ष, त्र, ज्ञ, श्र आदि) निर्धारित किए गए।
  2. वर्तनी व मात्रा-चिह्न
    — मात्रा, अनुस्वार, अनुनासिक, विसर्ग आदि के लिए नियम निर्धारित किए गए ताकि एक ही ध्वनि के लिए एक ही चिह्न रहे। इस प्रकार शब्दों की वर्तनी में स्थिरता आई।
  3. डिजिटल कोडिंग व फ़ॉन्ट-रूप (Unicode / ISCII)
    — कंप्यूटर, मोबाइल, डिजिटल मीडिया आदि में देवनागरी का प्रयोग संभव हुआ। सभी उपकरणों पर अक्षर एकरूप दिखने लगे।
  4. प्रकाशन, शिक्षा और प्रशासन में एकरूपता
    — पाठ्यपुस्तकों, सरकारी दस्तावेज़ों, समाचार पत्र, अनुवाद, शोध आदि में वही मानक रूप अपनाया जाता है। इससे पढ़ने, समझने व लिखने में आसानी होती है।

मानकीकरण के लाभ

▪️भाषाई एकरूपता: देवनागरी लिपि अब पूरे भारत (और कुछ अन्य देशों) में एक समान रूप में स्वीकार्य हो गई है।

▪️शिक्षण एवं वाचन-लेखन आसान: मानक वर्तनी, मानक वर्णमाला, स्थिर मात्रा-चिह्न आदि के कारण विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक आदि के लिए लिखना और पढ़ना सरल हुआ।

▪️डिजिटल युग के अनुकूल: Unicode आदि के कारण देवनागरी आधारित लिखित भाषा अब इंटरनेट, कंप्यूटर, मोबाइल आदि पर सुचारू रूप से उपयोग हो सकती है।

▪️सांस्कृतिक एवं प्रशासनिक उपयोग: राजभाषा, शिक्षा, अनुवाद, साहित्य आदि में एक मानक लिपि होने से भाषा-संचार अधिक प्रभावी हुआ।

मानकीकरण के उदाहरण

▪️अगर मानकीकरण न हुआ होता, तो एक ही शब्द कई रूपों में लिखे जा सकते थे — जैसे “शक्ति / सक्ति / शक्‍ति”, “बुद्ध / बुध / बुद्ध्” आदि। लेकिन मानक वर्तनी से इनकी लिखावट स्थिर हो गई।

▪️डिजिटल माध्यमों पर हिन्दी वेबसाइट, ई-पुस्तक, समाचार आदि पहले अलग-अलग फॉन्ट और कोडिंग की समस्या होती थी; अब Unicode व InScript keyboard layout के कारण हर जगह समान अक्षर दिखते हैं।

▪️शिक्षा-पुस्तक, प्रतियोगी परीक्षा नोट्स, सरकारी फार्म आदि में एक समान लिपि — जिससे विद्यार्थियों के लिए अध्ययन सुगम हुआ।

निष्कर्ष — देवनागरी लिपि का मानकीकरण वास्तव में आवश्यक और सफल रही। इसके परिणामस्वरूप भाषा, शिक्षा, प्रशासन, मुद्रण, अनुवाद तथा डिजिटल संचार में लेखन-पठन की एकरूपता, स्पष्टता और सहजता आई है।

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