भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास हिंदी पत्रकारिता के इतिहास से अलग नहीं किया जा सकता। जिस दौर में देश गुलामी की पीड़ा झेल रहा था, उसी दौर में हिंदी पत्रकारिता ने जनता की जागृति, राष्ट्रीय चेतना, समाज-सुधार और स्वतंत्रता की भावना को जन-जन तक पहुँचाने का सार्थक और साहसी कार्य किया। स्वतंत्रता पूर्व की हिंदी पत्रकारिता केवल समाचारों का प्रसारण नहीं थी, बल्कि वह राष्ट्र के लिए संघर्ष की संग्राम-भूमि भी थी, जिसने जनता में आत्मसम्मान और स्वाधीनता के लिए लड़ने की प्रेरणा उत्पन्न की। आज़ादी के पहले, हिंदी पत्रकारिता ने विदेशी शासन के दमन, अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाई तथा किसानों, मजदूरों, स्त्रियों, दलितों और आम नागरिकों की पीड़ा को सामने रखा।
‘उदन्त मार्तण्ड’ से लेकर ‘प्रताप’, ‘सरस्वती’, ‘हंस’, ‘अभ्युदय’, ‘मर्यादा’, ‘आज’, ‘राष्ट्रीय भाषा’, ‘हरिजन’, ‘यंग इंडिया’, ‘नवजीवन’ जैसे अनेक पत्र-पत्रिकाएँ राष्ट्रीय आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन के महत्वपूर्ण स्तंभ बने। इन पत्रों ने जनता को सत्य से परिचित कराया, क्रांतिकारी विचार फैलाए और ब्रिटिश सरकार की नीतियों की मुखर आलोचना की। ऐसे कठिन समय में पत्रकारिता करना जोखिमपूर्ण था—पत्र बंद किए गए, संपादकों को जेल हुई, दमन हुआ, परंतु इन पत्रों के लेखकों की कलम देश के लिए युद्धभूमि में तलवार की तरह चलती रही। यही स्वतंत्रता पूर्व की हिंदी पत्रकारिता का ऐतिहासिक महत्व है।
स्वतंत्रता पूर्व की हिंदी पत्रकारिता
- हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत
भारत में हिंदी पत्रकारिता का आरंभ 30 मई 1826 को कोलकाता से प्रकाशित ‘उदन्त मार्तण्ड’ से हुआ, जिसके संपादक पं. जुगल किशोर शुक्ल थे। यह पत्र जनता की भाषा में पत्रकारिता की पहली आवाज़ था। यद्यपि आर्थिक संघर्षों के कारण यह एक वर्ष बाद बंद हो गया, लेकिन इसने हिंदी पत्रकारिता की दिशा और उद्देश्य को स्पष्ट कर दिया—जनता की बात जनता की भाषा में।
इसके बाद ‘बनारस अखबार’, ‘सुदर्शन’, ‘सुधाकर’, ‘हिंदुस्तान’ जैसे पत्र निकले, जिन्होंने हिंदी भाषा और समाज को एक पहचान दी।
- भारतेन्दु युग की पत्रकारिता : साहित्य और राष्ट्र की चेतना
भारतेन्दु हरिश्चंद्र (1850–1885) को हिंदी पत्रकारिता और आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक माना जाता है। उन्होंने ‘कविवचनसुधा’, ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’, ‘बालबोधिनी’ और ‘प्रेमप्रकाश’ जैसे पत्रों का संपादन किया।
इन पत्रों के माध्यम से भारतेन्दु ने सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रश्नों को उठाया—दरिद्र जनता की दशा, विदेशी व्यापार नीति, करों का भार, भाषाई दमन आदि।
उनकी प्रसिद्ध पंक्ति—
“भारत दुर्दशा न देखी जाए”
पत्रकारिता की राष्ट्रीयता और संवेदना का प्रतीक है।
भारतेन्दु की पत्रकारिता ने हिंदी भाषा को आधुनिक, वैज्ञानिक, तर्कपूर्ण और राष्ट्रवादी रूप दिया। वे पत्रकारिता को राष्ट्रीय स्वतंत्रता के संघर्ष का साधन मानते थे।
- बालमुकुंद गुप्त और राजनीतिक पत्रकारिता
‘हिंदुस्तान’ (1883) के संपादक बालमुकुंद गुप्त ने ब्रिटिश शासन के अत्याचारों की तीखी आलोचना की। उनकी लेखनी तेज, स्पष्ट और तथ्यपरक थी।
उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्रीय आंदोलन की ओर जनमानस को प्रेरित किया।
गुप्त की आलोचना से घबराकर अंग्रेज सरकार ने कई बार दबाव बनाया, पर उन्होंने कलम नहीं रोकी।
उनकी भाषा में संघर्ष की ज्वाला थी, जो जनता के दिलों में विद्रोह जगाती थी।
- ‘सरस्वती’ और द्विवेदी युग का पत्रकारिता-चेतना विस्तार
‘सरस्वती’ (1900) हिंदी की सबसे प्रभावशाली पत्रिका मानी जाती है। इसके संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी थे।
‘सरस्वती’ में साहित्य, सामाजिक-सुधार, स्त्री-शिक्षा, स्वदेशी, विज्ञान, इतिहास और राजनीति के विषयों पर गंभीर लेख प्रकाशित होते थे।
द्विवेदी ने पत्रकारिता को विचारों और शोध का मंच बनाया।
उनकी प्रेरणा से प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, रामचंद्र शुक्ल जैसे साहित्यकार प्रसिद्ध हुए।
यह काल हिंदी पत्रकारिता का चेतना और विवेक का काल कहाया।
- गणेश शंकर विद्यार्थी और क्रांतिकारी पत्रकारिता
‘प्रताप’ (1919) गणेश शंकर विद्यार्थी के संपादन में क्रांतिकारी राष्ट्रीय पत्र था।
विद्यार्थी की पत्रकारिता निर्भीक और जनता की आवाज़ थी।
उन्होंने भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाह खान आदि क्रांतिकारियों को जनता के समक्ष सम्मानित रूप दिया।
‘प्रताप’ ने काकोरी कांड, जलियावाला बाग़, किसान आंदोलनों और मजदूर संघर्षों को शक्तिशाली लेखन द्वारा प्रकाशित किया।
विद्यार्थी स्वयं 1931 में सांप्रदायिक दंगे में लोगों को बचाते हुए शहीद हो गए।
उनकी शहादत साहित्यिक और क्रांतिकारी पत्रकारिता की महानतम मिसाल है।
- प्रेमचंद और समाज सुधार की पत्रकारिता
प्रेमचंद ने ‘ज़माना’, ‘हंस’ (1930), ‘जागरण’ आदि पत्रों में संपादन और लेखन किया।
उनकी पत्रकारिता किसानों, मजदूरों, दलितों, स्त्रियों और आम लोगों की पीड़ा की अभिव्यक्ति थी।
प्रेमचंद वस्तुनिष्ठ और यथार्थवादी पत्रकार थे।
उन्होंने साम्प्रदायिकता, जातिवाद, गरीबी, शोषण और अन्याय पर प्रहार किया।
‘हंस’ राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक सुधार का सशक्त मंच बना।
- गांधीजी और हिंद स्वराज की पत्रकारिता
महात्मा गांधी ने पत्रकारिता को नैतिकता, सत्य और सामाजिक सेवा का सर्वोच्च माध्यम माना।
उन्होंने ‘यंग इंडिया’, ‘नवजीवन’ और ‘हरिजन’ जैसी पत्रिकाएँ निकालीं।
इन पत्रों में उन्होंने सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन, छुआछूत–उन्मूलन, ग्राम-उन्नति और नैतिक राजनीति पर लेख लिखे।
गांधीजी ने कहा—
“पत्रकारिता जनता की सेवा का माध्यम है, न कि व्यापार।”
उनकी पत्रकारिता अहिंसा और सत्य की प्रेरणा बनकर जन-जन तक पहुँची।
(8) स्वतंत्रता आंदोलन में अन्य महत्वपूर्ण पत्र और पत्रिकाएँ
| पत्र /पत्रिका | संपादक / संबंधित व्यक्ति | प्रकाशन स्थान |
| उदन्त मार्तण्ड | पंडित जुगल किशोर | कलकत्ता |
| कविवचन सुधा | भारतेंदु हरिश्चंद्र | बनारस ( वाराणसी) |
| हरिश्चंद्र चंद्रिका | भारतेंदु हरिश्चंद्र | बनारस ( वाराणसी) |
| बाला बोधिनी | भारतेंदु हरिश्चंद्र | बनारस ( वाराणसी) |
| सरस्वती | महावीर प्रसाद द्विवेदी | काशी ( वाराणसी ), बाद में इलाहाबाद से |
| प्रताप | गणेश शंकर विद्यार्थी | कानपुर |
| कर्मवीर | माखनलाल चतुर्वेदी | जबलपुर, बाद में खंडवा |
| हंस | मुंशी प्रेमचंद | बनारस ( वाराणसी) |
स्वतंत्रता-पूर्व की पत्रकारिता की विशेषताएँ
- राष्ट्रीय चेतना का निर्माण
स्वतंत्रता-पूर्व की पत्रकारिता का सबसे बड़ा योगदान जनता में राष्ट्रीय चेतना का निर्माण था। उस समय जब अंग्रेजी सरकार भारतीयों को जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रों में बाँटकर कमजोर बनाना चाहती थी, तब हिंदी पत्रकारिता ने लोगों को एक राष्ट्र के रूप में सोचने की प्रेरणा दी। ‘भारतमित्र’, ‘मराठा’, ‘हिंदुस्तान’, ‘सरस्वती’ और ‘कायस्थ पत्रिका’ जैसे पत्रों ने राष्ट्रभक्ति की भावना जगाई। इन पत्रों के लेख लोगों में अपने देश, संस्कृति और गौरव की भावना भरते थे। पत्रकारिता ने स्वाधीनता को जनता की सामूहिक आवश्यकता बनाया और देशभक्ति के बीज जन-जन में रोपे। - ब्रिटिश अत्याचारों का विरोध
हिंदी पत्रकारिता ने ब्रिटिश अत्याचारों और शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई। जब अंग्रेजी सरकार अन्यायपूर्ण कानूनों, करों और दमनकारी नीतियों से जनता को दबा रही थी, तब ‘अभ्युदय’, ‘प्रताप’, ‘यंग इंडिया’, ‘इंडियन ओपिनियन’, ‘हिंदी केसरी’ आदि पत्रों ने इन अत्याचारों को बेनकाब किया। बाल गंगाधर तिलक को ‘केसरी’ में लिखने के कारण कारावास भुगतना पड़ा और गणेश शंकर विद्यार्थी को ‘प्रताप’ में क्रांतिकारी समाचार छापने हेतु अनेक बार दंडित किया गया। इस पत्रकारिता ने जनता को अन्याय के विरोध के लिए प्रेरित किया, उनकी आवाज बनकर अंग्रेजों के झूठ को उजागर किया। - जनता को संगठित करना
स्वतंत्रता-पूर्व की पत्रकारिता ने जनता को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘प्रताप’, ‘अकबर’, ‘प्रभा’, ‘भारत जी’, ‘स्वराज’ जैसे अखबारों ने जनता को एक लक्ष्य के लिए तैयार किया—स्वाधीनता। अखबारों में छपने वाले लेख, भाषण, आंदोलन की जानकारी और प्रेरक विचारों ने जनता को आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया। जलियाँवाला बाग हत्याकांड, नमक सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन और Quit India जैसे आंदोलनों में पत्रकारों ने सेतु का कार्य किया। उन्होंने गाँव-गाँव तक स्वतंत्रता आंदोलन का संदेश पहुँचाकर क्रांति का वातावरण बनाया और संगठित राष्ट्रीय शक्ति का निर्माण किया। - समाज सुधार के मुद्दे
संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं था—समाज को अंधविश्वास, अशिक्षा, जातिवाद और कुरीतियों से मुक्त करना भी जरूरी था। इसलिए हिंदी पत्रकारिता ने समाज-सुधार को भी महत्वपूर्ण विषय बनाया। ‘समाज सुधारक’, ‘हरिजन’, ‘कायस्थ समाचार’, ‘सुधारक’, ‘सरस्वती’ और ‘चांद’ पत्रिकाओं ने विधवा-विवाह, स्त्री–शिक्षा, दहेज-प्रथा, बाल-विवाह और छुआछूत के विरोध में लेख प्रकाशित किए। महात्मा गांधी, राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे लेखकों ने इन पत्रों के माध्यम से समाज में परिवर्तन की चेतना जगाई। पत्रकारिता ने सामाजिक जागरण को स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जोड़ा। - भाषा और राष्ट्रभक्ति का समन्वय
स्वतंत्रता से पहले हिंदी पत्रकारिता केवल समाचार देने का माध्यम नहीं थी, बल्कि भाषा और राष्ट्रीय भावना को मजबूत करने का साधन भी थी। हिंदी भाषा को राष्ट्र की साझा भाषा बनाने की दिशा में इन पत्रों का बड़ा योगदान रहा। ‘हिंदूस्तान’, ‘सरस्वती’, ‘प्रचार’, ‘भारतमित्र’ और ‘कवि’ जैसे पत्रों ने हिंदी को सरल, स्पष्ट और जनसाधारण की भाषा बनाने पर बल दिया। हिंदी भाषा को राष्ट्र की आत्मा बताते हुए पत्रकारों ने इसे स्वतंत्रता संघर्ष का माध्यम बनाया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि भाषा केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता की मजबूत धुरी भी है। - क्रांतिकारी विचारों को समर्थन
स्वतंत्रता-पूर्व की पत्रकारिता में क्रांतिकारी विचारों का भी महत्वपूर्ण स्थान था। ‘प्रताप’, ‘बंदे मातरम्’, ‘युगांतर’, ‘संदेश’, ‘भारत माता’, ‘स्वराज्य’ आदि पत्र क्रांतिकारी गतिविधियों और स्वतंत्रता सेनानियों के प्रयासों को जनता तक पहुँचाते थे। इन पत्रों ने वीर सावरकर, भगत सिंह, अशफाक उल्लाह खाँ, चन्द्रशेखर आज़ाद और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे योद्धाओं के विचार और बलिदान की खबरें छापीं। इन लेखों ने युवाओं में संघर्ष, त्याग और बलिदान का जोश भरा। ब्रिटिश शासन ने इन्हें प्रतिबंधित किया, परन्तु उनका प्रभाव गहरा और अमिट रहा। - जोखिम और बलिदान की भावना
साम्राज्यवादी शासन में पत्रकारिता करना अत्यन्त जोखिमपूर्ण था। अंग्रेज सरकार किसी भी स्वतंत्र विचार को विद्रोह मानती थी और पत्रकारों को जेल, देश निकाला या आर्थिक दंड देती थी। फिर भी पत्रकार पीछे नहीं हटे। गणेश शंकर विद्यार्थी, लोकमान्य तिलक, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसे पत्रकारों ने अपने जीवन और धन की परवाह किए बिना लेखन जारी रखा। ‘प्रताप’ और ‘केसरी’ जैसे अखबार बार-बार बंद और जब्त किए गए, लेकिन पत्रकारों के संकल्प को कमजोर नहीं कर सके। बलिदान और साहस की यह भावना पत्रकारिता को स्वतंत्रता संघर्ष का अग्रदूत बनाती है।
निष्कर्ष — स्वतंत्रता पूर्व की हिंदी पत्रकारिता भारत के स्वतंत्रता संग्राम का महान अध्याय है। इस काल की पत्रकारिता ने जनता को जागृत किया, राष्ट्र को सोई हुई चेतना से जगाया और गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ने की प्रेरणा दी। ‘उदन्त मार्तण्ड’ से प्रारंभ होकर ‘प्रताप’, ‘सरस्वती’, ‘हंस’, ‘अभ्युदय’, ‘मर्यादा’, ‘आज’, ‘हरिजन’ जैसी पत्रिकाएँ स्वतंत्रता संघर्ष की शक्ति बनीं।
इनकी लेखनी तलवार से भी अधिक धारदार थी, जिसने अंग्रेजी शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों को उजागर किया और जनता के दिलों में स्वतंत्रता का ज्वार पैदा किया।
इस काल की पत्रकारिता में सत्य, नैतिकता, देशभक्ति, भाषाई गौरव, मानवीय सरोकार और बलिदान की अद्भुत मिसालें हैं।
आज जब पत्रकारिता बाज़ारवाद और तकनीकी परिवर्तन के दबाव में खड़ी है, तब स्वतंत्रता पूर्व की पत्रकारिता हमें याद दिलाती है कि पत्रकारिता केवल सूचना का व्यापार नहीं, बल्कि समाज सेवा और सत्य की रक्षा का पवित्र कार्य है।
अतः स्वतंत्रता पूर्व की हिंदी पत्रकारिता भारत के इतिहास और लोकतंत्र की धरोहर है और सदैव प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।
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