‘सुनीता’ उपन्यास के आधार पर श्रीकांत और हरिप्रसन्न के चरित्रों की तुलना

जैनेंद्र कुमार के उपन्यास ‘सुनीता’ में श्रीकांत और हरिप्रसन्न केवल दो पात्र नहीं हैं, बल्कि वे दो भिन्न मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं, दो जीवन-दर्शनों और दो परस्पर विरोधी व्यक्तित्वों के प्रतीक हैं। एक ओर श्रीकांत है—जो शांत, समृद्ध, गृहस्थ और उदार है; दूसरी ओर हरिप्रसन्न है—जो उग्र, क्रांतिकारी, संन्यासी (तथाकथित) और घोर कुंठित है। उपन्यास का पूरा ढांचा इन्हीं दो पुरुषों के मानसिक द्वंद्व पर खड़ा है, जिसके केंद्र में सुनीता है।

​इन दोनों चरित्रों की विस्तृत तुलनात्मक विवेचना निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत की जा सकती है:

​1. जीवन-दृष्टि: ‘गृहस्थ का संतोष’ बनाम ‘क्रांतिकारी की बेचैनी’

​श्रीकांत और हरिप्रसन्न की तुलना का सबसे पहला आधार उनकी जीवन शैली और विचारधारा है। श्रीकांत एक सफल वकील है, धनवान है और एक व्यवस्थित गृहस्थ जीवन जी रहा है। वह समाज के उस ‘बुर्जुआ’ (Bourgeois) वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जो जीवन को सहजता और सुख से भोगना चाहता है। उसकी दृष्टि में जीवन कोई समस्या नहीं, बल्कि एक व्यवस्था है। वह परिवर्तन चाहता है, लेकिन शांतिपूर्ण तरीके से। उसका राष्ट्रप्रेम बौद्धिक है, भावनात्मक नहीं। वह जेल जाने या फांसी चढ़ने की बातें नहीं करता, बल्कि वह अपने घर के ड्राइंग रूम में बैठकर दर्शन बघारता है। श्रीकांत के चरित्र में एक प्रकार की ‘तटस्थता’ (Detachment) है, जो कई बार कृत्रिम लगती है।

​इसके ठीक विपरीत, हरिप्रसन्न एक भगोड़ा क्रांतिकारी है। उसके पास न घर है, न पैसा, और न ही मानसिक शांति। वह समाज की स्थापित व्यवस्था को उखाड़ फेंकना चाहता है। हरिप्रसन्न के लिए जीवन ‘भोग’ नहीं, बल्कि ‘त्याग’ और ‘संघर्ष’ है। वह श्रीकांत की सुख-सुविधाओं को देखकर ईर्ष्या भी करता है और उनसे घृणा का नाटक भी। जहाँ श्रीकांत ‘यथार्थ’ (Reality) में जीता है, वहीं हरिप्रसन्न ‘आदर्श’ (Idealism) और ‘कल्पना’ के लोक में विचरण करता है। श्रीकांत स्थिरता का प्रतीक है, जबकि हरिप्रसन्न गति और विनाश का।

​उपन्यास में साफ़ दिखता है कि श्रीकांत अपनी ‘सुरक्षा’ के किले में इतना कैद है कि उसे जीवन में रोमांच के लिए हरिप्रसन्न जैसे ‘खतरे’ की जरूरत महसूस होती है। वहीं, हरिप्रसन्न अपनी ‘असुरक्षा’ से इतना डरा हुआ है कि उसे श्रीकांत के घर की शरण चाहिए। दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हुए भी एक-दूसरे के विरोधी हैं। श्रीकांत का जीवन ‘जल’ की तरह शांत है, तो हरिप्रसन्न का जीवन ‘अग्नि’ की तरह दाहक। यह विरोधाभास उनके हर संवाद में झलकता है।

​2. स्त्री के प्रति दृष्टिकोण: ‘बौद्धिक मैत्री’ बनाम ‘दमित वासना’

​श्रीकांत और हरिप्रसन्न के चरित्र का सबसे बड़ा अंतर ‘स्त्री’ (विशेषकर सुनीता) को देखने की उनकी दृष्टि में है। श्रीकांत सुनीता को अपनी संपत्ति नहीं मानता (कम से कम सचेत मन से)। वह उसे एक ‘मित्र’ और ‘समान’ व्यक्तित्व के रूप में देखता है। वह चाहता है कि सुनीता घर की चारदीवारी से बाहर निकले, दुनिया को जाने। श्रीकांत का यह व्यवहार 1930 के दशक में अत्यंत आधुनिक था। उसे अपनी पत्नी पर इतना विश्वास है कि वह उसे अपने पुरुष मित्र के साथ अकेले छोड़ने में भी संकोच नहीं करता। हालांकि, मनोवैज्ञानिक यह तर्क दे सकते हैं कि श्रीकांत का यह व्यवहार पूर्णतः निस्वार्थ नहीं है; शायद वह अपनी पत्नी को ‘प्रदर्शित’ कर या उसे ‘मुक्त’ करके अपने आधुनिक होने के अहंकार को तुष्ट कर रहा है। फिर भी, उसकी दृष्टि में स्त्री के लिए एक सम्मान और सहजता है।

​दूसरी ओर, हरिप्रसन्न का दृष्टिकोण अत्यंत जटिल और विकृत है। वह स्त्री को सामान्य मनुष्य नहीं मानता। उसके लिए स्त्री या तो ‘देवी/माँ’ है या फिर ‘भोग्या’। वह सुनीता को ‘माँ’ कहकर संबोधित करता है, जो कि फ्रायड के मनोविज्ञान के अनुसार उसकी ‘रक्षात्मक युक्ति’ (Defense Mechanism) है। वह सुनीता के यौन आकर्षण से डरता है, इसलिए उसे माँ बना देता है ताकि वासना का अपराधबोध न रहे। लेकिन अवचेतन में वह सुनीता के प्रति घोर आसक्त है।

​जहाँ श्रीकांत सुनीता के साथ सहज है, वहीं हरिप्रसन्न उसके सामने असहज, आक्रामक और तनावग्रस्त रहता है। हरिप्रसन्न को लगता है कि स्त्री पुरुष की साधना में बाधक है, फिर भी वह उसी बाधा से लिपटना चाहता है। श्रीकांत स्त्री को ‘समझने’ का दावा करता है, जबकि हरिप्रसन्न स्त्री को एक ‘रहस्य’ मानकर उसे भेदना चाहता है। श्रीकांत का प्रेम ‘विश्वास’ पर आधारित है, जबकि हरिप्रसन्न का तथाकथित प्रेम ‘अधिकार’ और ‘छीना-झपटी’ की भावना से ग्रसित है। हरिप्रसन्न सुनीता को श्रीकांत से अलग कर उसे अपनी दुनिया का हिस्सा बनाना चाहता है, जो उसकी ईर्ष्या को दर्शाता है।

​3. मनोवैज्ञानिक ग्रंथि: ‘ईगो’ (Ego) और ‘इड’ (Id) का टकराव

​मनोविश्लेषण के परिप्रेक्ष्य में, श्रीकांत और हरिप्रसन्न मानव मन के दो अलग-अलग हिस्सों का प्रतिनिधित्व करते हैं। श्रीकांत ‘ईगो’ (Ego) है—संतुलित, तर्कशील और सामाजिक नियमों के साथ तालमेल बिठाने वाला। वह अपनी भावनाओं को बुद्धि से नियंत्रित करता है। उसे ईर्ष्या भी होती होगी, तो वह उसे अपने सिद्धांतों के नीचे दबा देता है। वह एक ‘सभ्य’ पुरुष है, जिसने अपनी पाश्विक वृत्तियों का उदात्तीकरण (Sublimation) कर लिया है। वह जानता है कि समाज में कैसे व्यवहार करना है। उसका हर कदम नपा-तुला होता है।

​इसके विपरीत, हरिप्रसन्न ‘इड’ (Id) का प्रतीक है—आवेगपूर्ण, अतार्किक और दमित इच्छाओं का पुतला। ‘इड’ वह हिस्सा है जो सामाजिक नैतिकता की परवाह नहीं करता और अपनी इच्छाओं की तत्काल पूर्ति चाहता है। हरिप्रसन्न के भीतर का क्रोध, उसकी यौन कुंठाएँ और उसका हिंसक क्रांतिकारी विचार—सब उसके अनियंत्रित ‘इड’ के लक्षण हैं। वह अपने मन की गहराइयों में चल रहे तूफ़ान को ‘देशभक्ति’ और ‘क्रांति’ के नाम पर जायज ठहराता है।

​श्रीकांत का मनोविज्ञान ‘पकड़कर छोड़ने’ का है, जबकि हरिप्रसन्न का मनोविज्ञान ‘छीनने’ का है। श्रीकांत स्वयं को मिटाना नहीं चाहता, वह बना रहना चाहता है। हरिप्रसन्न ‘आत्म-विनाश’ (Self-destruction) की ओर अग्रसर है। उपन्यास में इन दोनों का टकराव दरअसल ‘व्यवस्था’ और ‘अराजकता’ का, ‘चेतन’ और ‘अवचेतन’ का टकराव है। श्रीकांत हरिप्रसन्न को सुधारना चाहता है (ईगो द्वारा इड को नियंत्रित करना), जबकि हरिप्रसन्न श्रीकांत को तोड़ना चाहता है (इड द्वारा ईगो को ध्वस्त करना)।

​4. प्रयोगधर्मिता और नैतिकता: उदारवाद बनाम कट्टरवाद

​उपन्यास में दोनों पात्र नैतिकता के अपने-अपने मापदंड गढ़ते हैं। श्रीकांत एक ‘प्रयोगधर्मी’ (Experimentalist) है। वह सुनीता और हरिप्रसन्न को पास लाकर एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग करता है। वह देखना चाहता है कि क्या स्त्री-पुरुष का संबंध बिना किसी वासना के, केवल मैत्री के स्तर पर संभव है? श्रीकांत की नैतिकता लचीली है। वह पाप-पुण्य की पुरानी परिभाषाओं को नहीं मानता। उसका मानना है कि अगर मन साफ़ है, तो कोई भी कार्य पाप नहीं है। इसलिए वह पत्नी को पर-पुरुष के साथ जाने की अनुमति देता है। यह उसका ‘बौद्धिक उदारवाद’ है।

​हरिप्रसन्न, इसके उलट, एक ‘कट्टर नैतिकवादी’ (Rigid Moralist) होने का ढोंग करता है, जबकि भीतर से वह अनैतिकता की ओर झुक रहा है। वह बार-बार सुनीता को सतीत्व, धर्म और परंपरा की दुहाई देता है, उसे ताने मारता है, लेकिन अंत में वही उसे निर्वस्त्र होने के लिए कहता है। यह हरिप्रसन्न का ‘पाखंड’ (Hypocrisy) नहीं, बल्कि उसकी ‘मनोवैज्ञानिक द्वंद्विता’ है। वह जिन नियमों को दूसरों पर थोपना चाहता है, स्वयं उनका पालन करने में असमर्थ है।

​श्रीकांत नैतिकता को ‘स्वतंत्रता’ में ढूंढता है, जबकि हरिप्रसन्न नैतिकता को ‘बंधन’ और ‘निषेध’ (Taboo) में ढूंढता है। श्रीकांत के लिए नैतिकता सहज है, हरिप्रसन्न के लिए वह एक बोझ है। हरिप्रसन्न बार-बार श्रीकांत की जीवनशैली को अनैतिक और विलासी कहता है, लेकिन असल में वह उसी विलास को भोगना चाहता है। श्रीकांत का चरित्र दिखाता है कि सच्ची नैतिकता विश्वास में है, जबकि हरिप्रसन्न का चरित्र दिखाता है कि दमित नैतिकता अंततः विकृति (Perversion) में बदल जाती है।

​5. चरमोत्कर्ष में भूमिका: द्रष्टा और भोक्ता

​उपन्यास के अंत में, जब सुनीता हरिप्रसन्न के साथ एकांत में होती है, तब दोनों पुरुष पात्रों की असलियत खुलकर सामने आती है। श्रीकांत इस दृश्य में शारीरिक रूप से अनुपस्थित है, लेकिन मानसिक रूप से वह इस पूरी घटना का सूत्रधार है। वह ‘द्रष्टा’ (Observer) की भूमिका में है। उसने जानबूझकर यह परिस्थिति उत्पन्न की। उसका यह ‘निष्क्रिय’ रहना उसकी सबसे बड़ी क्रिया है। वह जानता था कि हरिप्रसन्न को इस अग्नि-परीक्षा से गुजरना होगा। श्रीकांत का धैर्य और उसका जुआ (Gamble) अंततः जीतता है। सुनीता सुरक्षित लौट आती है, और हरिप्रसन्न परास्त हो जाता है।

​हरिप्रसन्न इस नाटक का ‘भोक्ता’ (Participant) और ‘पीड़ित’ है। वह अपनी कुंठाओं के चरम बिंदु पर पहुँचकर सुनीता को नग्न देखना चाहता है। यह उसकी हार है। वह सोचता था कि वह सुनीता (प्रकृति/स्त्री) पर विजय प्राप्त कर लेगा, लेकिन सुनीता की नग्नता के तेज के सामने वह भस्म हो जाता है। हरिप्रसन्न का चरित्र यहाँ पूरी तरह ‘विखंडित’ (Disintegrate) हो जाता है। वह जिस सत्य को खोजना चाहता था, उसका सामना करने का साहस उसमें नहीं था।

​तुलनात्मक रूप से देखें तो, श्रीकांत जीतता है क्योंकि वह वास्तविकता को स्वीकार करता है और अपनी पत्नी पर भरोसा करता है। हरिप्रसन्न हारता है क्योंकि वह अपनी कल्पनाओं में जी रहा था और वास्तविकता (नग्न सत्य) उसके लिए असहनीय हो गई। श्रीकांत ‘लौटने’ (Return) का प्रतीक है—सुनीता उसके पास लौट आती है। हरिप्रसन्न ‘पलायन’ (Escape) का प्रतीक है—वह अंततः चला जाता है, खाली हाथ और अपमानित होकर।

​​निष्कर्षतः — ‘सुनीता’ उपन्यास में श्रीकांत और हरिप्रसन्न हिंदी उपन्यास जगत के दो अत्यंत सशक्त और विरोधी ध्रुव हैं। श्रीकांत वह ‘तट’ है जो नदी को दिशा देता है, जबकि हरिप्रसन्न वह ‘बाढ़’ है जो तटबंधों को तोड़ने के लिए व्याकुल है। जैनेंद्र ने श्रीकांत के माध्यम से यह दिखाया है कि सच्चा पौरुष आक्रामकता में नहीं, बल्कि विश्वास और धैर्य में है। वहीं, हरिप्रसन्न के माध्यम से उन्होंने यह मनोवैज्ञानिक सत्य उद्घाटित किया है कि क्रांति और त्याग के बड़े-बड़े आदर्शों के पीछे अक्सर एक कुंठित और डरा हुआ आदमी छिपा होता है।

​श्रीकांत का चरित्र ‘स्थायित्व’ (Stability) और ‘सभ्यता’ का प्रतीक है, जबकि हरिप्रसन्न का चरित्र ‘अस्थिरता’ और ‘दमित इच्छाओं’ का दस्तावेज है। अंततः, श्रीकांत का शांत और विश्वासी प्रेम, हरिप्रसन्न के उग्र और कुंठित आकर्षण पर भारी पड़ता है। इन दोनों की तुलना से ही जैनेंद्र कुमार ने मानव मन की उन अंधेरी गुफाओं को रोशन किया है, जहाँ ‘देवता’ और ‘दानव’ साथ-साथ निवास करते हैं।

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