अन्विताभिधानवाद का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएँ व व्याख्या

भारतीय व्‍याकरण और मीमांसा दर्शन में शब्द-अर्थ-सम्बंध और वाक्यार्थ की प्राप्ति एक अत्यंत गहन और महत्वपूर्ण विषय है। यह विचार कि मनुष्य किसी वाक्य का अर्थ कैसे समझता है, भारतीय भाषाशास्त्र का केन्द्रीय प्रश्न रहा है। इसी संदर्भ में मीमांसा दर्शन के दो प्रसिद्ध आचार्यों—कुमारिल भट्ट और प्रभाकर—ने दो भिन्न सिद्धांत प्रस्तुत किए। कुमारिल का सिद्धांत अभिहितान्वयवाद कहलाया, जबकि प्रभाकर ने उससे भिन्न मत का प्रतिपादन करते हुए अन्विताभिधानवाद को प्रस्तुत किया।

अन्विताभिधानवाद का मूल प्रयोजन यह बताना है कि वाक्य का अर्थ एक-एक शब्द के अर्थों को जोड़कर नहीं बनता, बल्कि शब्द अपने-आप में वाक्य में पहले से निहित सम्बन्ध (अन्वय) सहित अर्थ देता है। इस विचार के कारण प्रभाकर भारतीय भाषाशास्त्र में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं।

अन्विताभिधानवाद का अर्थ

अन्विताभिधानवाद शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—

अन्वित = जो किसी संबंध के साथ संयुक्त हो

अभिधान = शब्द का अर्थ व्यक्त करना

अर्थात्, अन्विताभिधानवाद वह सिद्धांत है जिसके अनुसार शब्द अपने अर्थ को संबंध सहित प्रकट करते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जब हम कोई वाक्य सुनते हैं, तब हम शब्दों के बिना-संबंध अर्थ को नहीं लेते, बल्कि वाक्य में निहित सम्बन्ध या वाक्य-भाव के साथ ही अर्थ को समझते हैं।

उदाहरण के लिए— “राम घर जाता है।”
अलग-अलग शब्दों का अर्थ— राम, घर, जाता, है —पहले से ही व्यक्तिगत अर्थ में नहीं आता, बल्कि यह सब मिलकर एक साथ हमें यह समझाते हैं कि “राम घर की ओर जाने की क्रिया कर रहा है।” अर्थात्, वाक्य का अर्थ एक चयनित समग्र भाग के रूप में समझ में आता है।

अन्विताभिधानवाद की परिभाषा

प्रभाकर के अनुसार— “वाक्य में प्रयुक्त शब्द अपने-अपने अर्थों को अलग-अलग रूप में नहीं बताते, बल्कि वे अर्थ को अन्वय सहित प्रकट करते हैं और वाक्यार्थ की प्राप्ति तत्काल होती है।”

दूसरे शब्दों में — “वाक्यार्थ शब्दों के योग से नहीं, बल्कि वाक्य में निहित सम्बन्ध के ज्ञान से प्राप्त होता है।”

अन्विताभिधानवाद की विशेषताएँ

(1) शब्द अर्थ को अन्वय सहित प्रकट करते हैं

प्रभाकर मत के अनुसार शब्द कभी भी अकेले अर्थ नहीं देते, बल्कि वे अपने अर्थ को वाक्य के संबंध सहित बताते हैं। शब्द जब वाक्य में प्रयोग होते हैं, तभी उनमें अर्थ की पूर्णता आती है। जैसे ‘जा’ शब्द का अर्थ क्रिया है, लेकिन यह किसके विषय में है, कहाँ जा रहा है, किस दिशा में—ये सभी बातें तभी स्पष्ट होती हैं जब वह वाक्य में प्रयुक्त हो। इसका अर्थ यह है कि भाषा का संचालन वाक्य के आधार पर होता है, अलग-अलग शब्दों से नहीं।

(2) वाक्य अर्थ का तत्काल ज्ञान

अन्विताभिधानवाद मानता है कि वाक्य सुनते ही उसका अर्थ तात्कालिक रूप से ज्ञात हो जाता है। वाक्य का अर्थ बनाने के लिए मन को पहले शब्दार्थ, फिर उनका संयोजन, फिर वाक्यार्थ बनाने जैसी प्रक्रियाओं की आवश्यकता नहीं होती। अर्थ-ग्रहण सहज और स्वाभाविक है। सामान्य बोलचाल में भी वाक्य सुनकर लोग तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं, इससे स्पष्ट है कि वाक्यार्थ का बोध प्रत्यक्ष और त्वरित होता है।

(3) वाक्य को प्राथमिक इकाई माना गया है

अन्विताभिधानवाद में ‘वाक्य’ को भाषा की मूल इकाई माना गया है, ‘शब्द’ को नहीं। शब्द केवल तभी अर्थपूर्ण होते हैं जब वे वाक्य में आते हैं। शब्दों को अकेले देखने पर उनकी अर्थ-सम्पूर्णता संभव नहीं। प्रभाकर का मानना है कि सामान्य मनुष्य भाषा को वाक्यों के रूप में ही ग्रहण करता है, इसलिए भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से वाक्य को प्राथमिक वास्तविकता स्वीकार करना उचित है।

(4) अर्थ-ग्रहण में स्मृति-ज्ञान की आवश्यकता नहीं

कुमारिल का मत है कि पहले शब्दार्थ को जानने के लिए स्मृति की सहायता ली जाती है, फिर उन अर्थों का संबंध स्थापित कर वाक्यार्थ प्राप्त होता है। परन्तु प्रभाकर मानते हैं कि अर्थ-ज्ञान में स्मृति या मानसिक क्रिया की कोई मध्यवर्ती भूमिका नहीं। वाक्यार्थ सीधे-सीधे प्राप्त होता है, जैसे कोई वस्तु आँखों से देखकर तुरंत दिखाई देती है। इससे भाषा-व्यवहार सरल और सहज रूप में समझाया जा सकता है।

(5) व्यावहारिक भाषा अनुभव पर आधारित सिद्धांत

प्रभाकर का सिद्धांत साधारण भाषा-प्रयोग का समर्थन करता है। जब कोई कहता है—“जल्दी आओ”, तो श्रोता तुरंत समझ जाता है कि उसे शीघ्र आना है। वह पहले ‘जल्दी’ और ‘आओ’ के अर्थ अलग-अलग नहीं समझता, फिर उन्हें जोड़ता नहीं। इसलिए अन्विताभिधानवाद मानव अनुभव और व्यावहारिक भाषा व्यवहार पर आधारित अत्यंत सुगढ़ सिद्धांत माना गया है।

अन्विताभिधानवाद की उदाहरण सहित विस्तृत व्याख्या

अन्विताभिधानवाद को समझने के लिए सबसे सामान्य उदाहरण लिया जा सकता है—
“गोपाल पानी पीता है।”
यदि इसे शब्द-शब्द विभाजित कर समझें—

गोपाल – एक व्यक्ति

पानी – द्रव्य

पीता – क्रिया

परंतु केवल इन तीनों अलग-अलग जानकारियों से यह बात स्पष्ट नहीं होती कि गोपाल पानी के साथ क्या कर रहा है। लेकिन जब पूरा वाक्य सुनते हैं, तो अर्थ सीधे मिलता है—
“गोपाल पानी पीने की क्रिया कर रहा है।”
यह अर्थ उसी समय मिलता है जब हम वाक्य सुनते हैं।
यानी वाक्य के अर्थ ग्रहण के लिए शब्दार्थ का पहले ज्ञान, फिर उनके संयोग की प्रक्रिया आवश्यक नहीं।

दूसरा उदाहरण—
“बच्चा रो रहा है।”
शब्दों के अलग अर्थों से हमें ‘बच्चा’ और ‘रोने’ की क्रिया अलग-अलग तो ज्ञात हो सकती है, परन्तु यह जान पाना कि बच्चा अभी रोने की स्थिति में है—केवल वाक्य सुनने से ही संभव है।

व्यावहारिक व्याख्या देखें—
जब शिक्षक कहते हैं—“कॉपी निकालो”, तो छात्र तुरंत कॉपी निकाल लेते हैं। वे पहले इस क्रिया का व्याकरणिक विश्लेषण नहीं करते। इसका अर्थ है कि वाक्यार्थ का ज्ञान प्रत्यक्ष और तत्क्षण होता है।

प्रभाकर के अनुसार वाक्यार्थ संयोग, व्यवस्था और अन्वय का संयुक्त और स्वाभाविक परिणाम है, जो मनुष्य की बुद्धि में सहज रूप से विद्यमान रहता है। शब्द‐अर्थ-संबंध के पूर्व निर्धारण की आवश्यकता नहीं क्योंकि यह संबंध स्वयं वाक्य-रचना में निहित होता है।

निष्कर्ष

अन्विताभिधानवाद भारतीय भाषा-विचार परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसने यह प्रतिपादित किया कि भाषा का आधार शब्द नहीं बल्कि वाक्य है। शब्द अपनी पूर्णता तभी पाते हैं जब वे वाक्य में प्रयुक्त होते हैं और अर्थ को अन्वय अर्थात् संबंध सहित प्रकट करते हैं। प्रभाकर का यह मत भाषा के सामान्य और व्यावहारिक व्यवहार के सर्वाधिक निकट है। यही कारण है कि आधुनिक भाषाशास्त्र में भी इसे मानव-मस्तिष्क की प्राकृतिक भाषा-क्षमता का वैज्ञानिक और तर्कसंगत सिद्धांत माना जाता है। वास्तव में, अन्विताभिधानवाद वाक्यार्थ-बोध की सहजता और प्राकृतिकता का समर्थक सिद्धांत है, और भारतीय काव्य-मीमांसा के इतिहास में इसका विशिष्ट स्थान है।

यह भी देखें :

▪️भारतीय काव्यशास्त्र एवं हिंदी आलोचना( एम ए तृतीय सेमेस्टर ) पेपर -1 ( KUK )

Leave a Comment

error: Content is proteced protected !!