लिपि केवल अक्षरों का समूह नहीं बल्कि भाषा की अस्मिता, बोली-संस्कृति और संप्रेषण का माध्यम है। हिन्दी भाषा के लिए प्रयुक्त देवनागरी लिपि निस्संदेह वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित लिपियों में गिनी जाती है, परन्तु इसके प्रयोग में व्यावहारिक दृष्टि से अनेक कमियाँ देखने को मिलती हैं।
देवनागरी लिपि की प्रमुख कमियाँ
पुस्तक के आधार पर निम्न-कमियाँ विशेष रूप से सामने आई हैं:
- संयुक्ताक्षरों और जटिल अक्षर-रूपों की समस्या
पुस्तक में बताया गया है कि हिन्दी में प्रयुक्त देवनागरी वर्णमाला में कुछ “संयुक्त व्यंजन” एवं “विशिष्ट व्यंजन” हैं, जैसे क्ष, त्र, ज्ञ, श्र,ड़,ढ़,ळ आदि । इन अक्षरों का स्वरूप तथा लेखन-रूप शिक्षार्थियों को कठिनाई देता है।
उदाहरण के लिए: “ज्ञ” लिखना व पढ़ना सरल नहीं होता—“ग्य” की तरह बोलने की प्रवृत्ति से लेखन में त्रुटि हो जाती है।
इसके कारण लिपि का पढ़ने-लिखने में सहज प्रवाह बाधित होता है।
- मात्राओं एवं चिह्नों की असमान स्थिति
देवनागरी में स्वरचिह्न, मात्राएँ, हलन्त (्) आदि अक्षर के ऊपर, नीचे, सामने या पीछे लगती हैं। पुस्तक में उल्लेख है कि “मात्राओं की स्थिति सीखने वालों के लिए भ्रम-उत्पादक बनी हुई है।” उदाहरण के लिए: कि और की, कु और कू में मात्राओं का स्थान मात्र बदल जाता है, पर लिखने-पढ़ने में उलझन होती है।
- अनुस्वार (ं) व अनुनासिक (ँ) का भ्रम
पुस्तक में स्पष्ट किया गया है कि हिन्दी में ‘ं’ और ‘ँ’ दो भिन्न चिह्न हैं, पर लेखन में अक्सर दोनों को एक-समान इस्तेमाल किया जाता है। इससे उच्चारण, अर्थ व लिखने-पढ़ने की शुद्धता प्रभावित होती है। उदाहरण स्वरूप: साँप vs संप में अत्यधिक फर्क है, पर अक्सर गलत लिखा-पढ़ा जाता है।
- विसर्ग (ः) व अन्य विशेष चिह्नों का अप्रचलन या गलत प्रयोग
पुस्तक में यह भी कहा गया है कि हिन्दी में पारंपरिक रूप से प्रयुक्त संस्कृतनिष्ठ चिह्न जैसे विसर्ग (ः) और कुछ ध्वनियों हेतु नुक्ता ( ़ ) आदि का प्रयोग अनियमित या मिश्रित रूप से हो रहा है। इससे लिपि-मानकता कम होती है और लेखन-रूप में अस्थिरता आती है।
- भाषाई विविधता व लिपि-प्रयुक्ति में असंगति
केंद्रीय हिंदी निदेशालय की पुस्तिका में यह संकेत है कि देवनागरी लिपि न सिर्फ हिन्दी, बल्कि संस्कृत, मराठी, कोंकणी, डोगरी, बोडो आदि भाषाओं में भी उपयोग हो रही है। विभिन्न भाषाओं में लिपि-रूपों व ध्वनियों में भिन्न-भिन्नता के कारण, पढ़ने-लिखने वालों को भ्रम होता है और हिंदी लेखन-मानक अस्थिर बन जाता है।
- तकनीकी व डिजिटल टाइपिंग की चुनौतियाँ
पुस्तक में उल्लेख है कि सूचना-प्रौद्योगिकी (आईटी) के युग में देवनागरी लिपि का कंप्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट आदि माध्यमों में प्रयोग करते समय विभिन्न फॉण्ट्स, इनपुट मेथड, यूनिकोड इत्यादि कारणों से त्रुटियाँ सामने आई हैं। जैसे कि अक्षर जुड़ जाना, शिरोरेखा टूट जाना, मात्राएँ गलत लगना आदि।
- शिरोरेखा एवं अक्षर-संपर्क की समस्या
पुस्तक में यह भी बताया गया है कि शिरोरेखा (चोटी-रेखा जो अक्षरों को ऊपर से जोड़ती है) के कारण गति-लेखन या हाथ-लेखन में अक्षर सही-सही नहीं लगते। इसके कारण अनेक शब्दों में अस्पष्टता आती है।
कमियाँ दूर करने के उपाय
उपरोक्त कमियों को दूर करने के कुछ उपाय निम्नलिखित हैं :
- मानक वर्णमाला व चिह्नों का पालन
पुस्तक में इस बात पर बल दिया गया है कि प्रत्येक कार्यालय, शैक्षणिक संस्थान और प्रकाशन मीडियम को “मानक हिन्दी वर्णमाला तथा अंक” का पालन करना चाहिए। इससे अक्षर-रूप एकरूप होंगे और शुद्धता बढ़ेगी। उदाहरण के लिए, हिन्दी में ऋ, लृ आदि व्यंजन/स्वरों का प्रयोग नहीं माना गया है क्योंकि यह आम लेखन-प्रयोग में नहीं है।
- संयुक्ताक्षर-औरविशिष्टचिह्नों का नियमित अभ्यास
संयुक्ताक्षरों (क्ष, त्र, ज्ञ, श्र) तथा विशिष्ट चिह्नों (ड़, ढ़, ळ) को लिखने-पढ़ने के अभ्यास को पाठ-पुस्तक का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। शैक्षणिक संस्थानों को शिक्षार्थियों को सही रूप दिखाना तथा उन्हें नियमित लेखन-अभ्यास करना चाहिए।
- मात्राएँ, हलन्त व चिह्नों की स्पष्ट शिक्षा
मात्राओं (ि, ी, ु, ू, े, ै, ो, ौ) और हलन्त (्) तथा अनुस्वार/अनुनासिक/विसर्ग जैसे चिह्नों की शिक्षा व्यवहार-आधारित होनी चाहिए। जैसे-शिक्षार्थी सुनें, लिखें, मात्राओं को पहचानें, स्थान देखें। पुस्तक में इस बात पर जोर है कि प्रारम्भिक स्तर से ही लिपि-रूप को व्यवस्थित तरीके से सिखाना चाहिए।
- लिपि-प्रयुक्ति की एकरूपता (मानकीकरण)
हिन्दी-माध्यम, सरकारी दस्तावेज, समाचार-पत्तिकाएँ आदि में मानक रूप को अपनाना चाहिए। पुस्तक में कहा गया है कि 1966 में “मानक देवनागरी वर्णमाला” प्रकाशित की गयी थी, उसके बाद 1967 में “हिंदी वर्तनी का मानकीकरण” हुआ और 1983 में “देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण” नामक पुस्तिका आई। समय-समय पर इन्हें अद्यतन भी किया गया है।
- शिक्षण-साधनों तथा शिक्षक-प्रशिक्षण को सुदृढ़ करना
शिक्षकों को देवनागरी लिपि के मानक रूप व अभ्यस्त लेखन-रूप में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। विद्यार्थियों को सिर्फ अक्षर-याद न कराए जाएँ, बल्कि उन्हें लेखन-अभ्यास, त्रुटि-चिन्हांकन, मित्र-समीक्षा आदि के माध्यम से सिखाया जाए।
- डिजिटल-माध्यमों में उपयुक्त टूल व फॉण्ट का प्रयोग
इंटरनेट, मोबाइल, कम्प्यूटर में हिंदी इनपुट के लिए उपलब्ध टूल्स, यूनिकोड-फॉण्ट्स, मानक-कीबोर्ड लेआउट आदि का उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए। पुस्तक में कहा गया है कि विभिन्न फॉण्ट्स व इनपुट मेथड्स के कारण पहले कठिनाई थी, जिसे यूनिकोड द्वारा काफी हद तक हल किया गया है।
- लिखित-प्रकाशन में समीक्षा व प्रूफरीडिंग की पद्धति अपनाना
प्रकाशित किसी भी ग्रंथ, समाचार-लेख, वेबसाइट आदि में देवनागरी लिपि व वर्तनी का मानक रूप अपनाया जाना चाहिए। इसके लिए भाषा-विशेषज्ञ, संपादक एवं प्रूफरीडर की भूमिका महत्वपूर्ण है।
- बहुभाषिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखना
मेरी पुस्तक में यह भी सुझाव है कि देवनागरी लिपि को केवल हिन्दी तक सीमित न रखा जाए, बल्कि अन्य भाषाओं में भी इसके प्रयोग में आने वाली ध्वनियों व प्रतीकों को समाहित कर एक सम्यक् रूप दिया जाना चाहिए—उदाहरण के लिए मराठी, कोंकणी, बोडो इत्यादि।
निष्कर्ष
आज के सूचना-प्रौद्योगिकी युग में, भाषा-लिपि का मानकीकरण और उसका सुव्यवस्थित प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। देवनागरी लिपि अपनी वैज्ञानिकता, ध्वन्यात्मकता एवं सरलता के कारण अपार संभावनाएं लिए हुई है। फिर भी, उपरोक्त चर्चा से यह स्पष्ट है कि व्यवहार में इस लिपि के प्रयोग में अनेक कमियाँ हैं—जिन्हें पहचानना तथा दूर करना आवश्यक है।
देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण पुस्तक में न सिर्फ इन कमियों का विश्लेषण है, बल्कि उनके दूर करने के लिए ठोस उपाये भी दिए गए हैं। एम.ए. हिंदी-स्तर के विद्यार्थी, शिक्षक तथा शोधकर्ता इन पर विचार करके अपने लेखन-व्यवहार में सुधार ला सकते हैं।
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