‘राम की शक्तिपूजा’ की केन्द्रीय संवेदना : शक्ति की मौलिक कल्पना या नारी-मुक्ति

‘राम की शक्तिपूजा’ की केन्द्रीय संवेदना का प्रसंग विवादास्पद है क्योंकि विभिन्न समीक्षकों ने इस संबंध में भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ की हैं। नन्दकिशोर नवल का दावा है कि इस कविता का केन्द्रीय भाव ‘सीता की मुक्ति’ और सीता के प्रतीक के माध्यम से ‘नारी मुक्ति’ है। निराला गार्हस्थिक प्रेम के कवि हैं। उनके सम्पूर्ण साहित्य में गार्हस्थिक प्रेम की प्रतिबद्धता के कई उदाहरण दिखते हैं, जैसे पंचवटी प्रसंग, तुलसीदास तथा सरोज-स्मृति के कुछ अंश। शक्तिपूजा की मूल संवेदना इसी कड़ी का अगला चरण है। वे सरोज स्मृति में पुत्री की मुक्ति करते हैं। राम की शक्ति पूजा में पत्नी की मुक्ति उनकी नारीमुक्ति-चेतना का सर्वोच्च चरण है।

‘राम की शक्तिपूजा’ कविता की मूल संवेदना ‘सीता की मुक्ति है’ या ‘शक्ति की मौलिक कल्पना’? किसी निर्णय पर पहुँचने से पूर्व इन दोनों पर विचार करना आवश्यक होगा |

सीता की मुक्ति

‘राम की शक्तिपूजा’ में सीता की मुक्ति केन्द्रीय भाव है | इसका प्रमाण यह है कि न सिर्फ कथानक के उद्देश्य के रूप में बल्कि कथानक के हर मोड़ पर सीता उपस्थित हैं। यूँ प्रतीत होता है कि राम के पास न होते हुए भी राम के शिविर की सभी घटनाओं का संचालन सीता ही कर रही हैं।

सीता की मुक्ति कथानक का उद्देश्य है। यह रचना के अंतिम हिस्से में पूर्णतः स्पष्ट होता है। शक्ति पूजा का अंतिम कमल माँ दुर्गा उठाकर ले गई हैं और रिक्त स्थान को देखकर राम आत्मधिक्कार की अवस्था में पहुँच गये हैं। वे कहते हैं-

“धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध,

धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध।

जानकी हाय ! उद्धार प्रिया का हो न सका ।।”

प्रश्न है कि यह आत्मधिक्कार किसलिए है? यह न तो विजय के लिए है, न साधना की सफलता के लिए बल्कि सिर्फ सीता की मुक्ति के लिए है। घोर विफलता तथा आत्मधिक्कार की अवस्था में व्यक्ति सबसे पहले उसी लक्ष्य की बात करता है जो सबसे महत्वपूर्ण होते हुए भी पूरा नहीं हो पाता।

आत्मधिक्कार के उद्गार के तुरंत बाद ‘जानकी । हाय उद्धार प्रिया का हो न सका’ कथन का राम के मुख से निकलना इस बार का प्रमाण है कि सीता की मुक्ति ही कविता का केन्द्रीय उद्देश्य है।

सीता न सिर्फ इस शक्तिपूजा व युद्ध का उद्देश्य है बल्कि कथा के हर मोड़ पर भी सक्रिय रूप से उपस्थित हैं। कविता की संरचना का सूक्ष्म विश्लेषण ऐसे कई बिन्दुओं की पहचान कराता है जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं :

(1) कविता की पहली अठारह पंक्तियों में राम की सेना में पराजय तथा हताशा की मानसिकता है। इनमें अंतिम दो पंक्तियों में संकेत है कि हनुमान एकमात्र योद्धा हैं जो अभी भी पूर्ण चेतना व क्षमता से युक्त हैं। 18वीं पंक्ति सीता पर केन्द्रित है जिसे पढ़कर स्पष्टतः प्रतीत होता है कि युद्ध का सम्पूर्ण वर्णन यही दिखाने के लिए हुआ है कि सीता मुक्ति की आशा कितनी धूमिल हो गई है —

“उद्गीरित-वह्नि-भीम-पर्वत कपि चतुः प्रहर / जानकी-भीरू-उर-आशाभर रावण-सम्वर।”

(2) युद्ध-प्रसंग के बाद राम की सेना की सानु-सभा ( सानु –पर्वत के ऊपर समतल भूमि ) का प्रसंग है। राम के मन में अंधकार एवं निराशा की ‘अमानिशा’ है, ‘दिशाओं’ अर्थात् सफलता के मार्गों का सारा ज्ञान खो चुका है, चिन्ता व तनाव समुद्र की भाँति लगातार गरज रहे हैं और भूधर के समान स्थिर राघवेन्द्र को संशय, विकलता, पराजय बोध और असमर्थता बोध ने बुरी तरह झकझोर दिया है। इस घोर निराशा में राम को आशा मिलती है तो अपने जीवन की सबसे सुन्दर स्मृति से; और यह स्मृति सीता की ही है —

“ऐसे क्षण अन्धकार घन में जैसे विद्युत / जागी पृथ्वी तनया कुमारिका छवि, अच्युत |”

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“नयनों का नयनों से गोपन प्रिय संभाषण / पलकों का नवपलकों पर प्रथमोत्थान पतन |”

(3) सीता मिलन की स्मृति इतनी स्फूर्तिदायक है कि घोर निराशा में डूबे राम कुछ क्षणों के लिए सम्पूर्ण निराशा को छोड़कर ‘विश्वविजयभावना’ से भर जाते हैं और ‘हर धनुर्भग’ को तैयार हो जाते हैं —

“सिहर तन, क्षण-भर भूला मन, लहरा समस्त, हर धनुर्भग को पुनर्वार ज्यों उठा हस्त, फूटी स्मिति सीता-ध्यान-लीन राम के अधर, फिर विश्व-विजय-भावना हृदय में आयी भर।”

(4) किन्तु स्मृतिजन्य आत्मविश्वास मनोवैज्ञानिक राहत भले ही पहुँचा दे , वस्तुगत स्थितियों का पलट नहीं सकता। यही कारण है कि आज के युद्ध की घटनाओं का स्मरण होते ही राम शंकाओं से घिर उठते हैं और शंकाग्रस्त होते ही उन्हें सीता की वे आँखें याद आती हैं जो इस उम्मीद में राम की प्रतीक्षा कर रही हैं कि वे उन्हें बचाने आएँगे-

“लख शंकाकुल हो गये अतुल-बल शेष-शयन, खिंच गये दृगों में सीता के राममय नयन;”

इसके बाद सानु-सभा में राम की पराजय भावना को देखते हुए विभीषण एक मित्रोचित प्रयास करते हैं ताकि राम का खोया आत्मविश्वास पुनः लौट सके। किसी के खोए हुए आत्मविश्वास के जगाने का तरीका यही होता है कि उसके मार्मिक स्थल पर चोट की जाये। विभीषण सीता की याद दिलाकर तथा सीता के संभावित कष्टों का चित्र खींचकर राम को प्रेरित कर रहे हैं —

“कितना श्रम हुआ व्यर्थ आया जब मिलन समय / तुम खींच रहे हो हस्त जानकी से निर्दय |”

(5) इसके बाद सीता की केन्द्रीयता कविता के अंतिम हिस्से में स्पष्ट होती है। राम आत्मधिक्कार के तुरंत बाद न सिर्फ सीता की मुक्ति न होने की हताशा व्यक्त करते हैं बल्कि इसी बिन्दु पर उनके उदात्त व्यक्तित्व का रूपान्तरण होता है। राम सात्विक व्यक्ति हैं और नैतिकता को अपने स्वार्थ से कहीं ऊपर रखते हैं। किन्तु अब उनका राम्पूर्ण नैतिक जीवन दाँव पर है। सीता की मुक्ति यदि न हो सकी तो सम्पूर्ण नैतिकता व सम्पूर्ण ओदात्य राम के लिए निरर्थक है। सीता का उद्धार न हो सकने की छटपटाहट इतनी तीव्र है कि राम का ‘एक और मन’ उठ खड़ा होता है जो न थकने को तैयार है, न झुकने को, न हारने को जो न दीनता को मानता है, न विनय को —

“जानकी हाय ! उद्धार प्रिया का हो न सका /वह एक और मन रहा राम का जो न थका / जो नहीं जानता दैन्य नहीं जानता विनय ।”

(6) यह आक्रामकता, यह दृढ़ता और यह विजयेच्छा किसी भी पराजयपूर्ण स्थिति को पलट सकती है। सीता के प्रति राम का प्रेम एवं प्रतिबद्धता का स्तर इतना ऊँचा है कि वे अपनी आँख निकाल कर देने को तैयार हैं। यह प्रेम का वही आदर्श है, जिसे कबीर ने ‘सीस उतारै हाथि करि, सो पैसे घर माँहि’ कहकर और जायसी ने ‘प्रेम पहार कठिन विधि गढ़ा, सो पैं चढ़े सीस सों चढ़ा’ ( प्रेम का पहाड़ ईश्वर द्वारा अत्यंत कठिन गाढ़ा है जिस पर सिर के बल चढ़कर अर्थात पूर्ण समर्पण से चढ़ा जा सकता है ) कहकर व्यक्त किया है।

स्पष्ट है कविता की संरचना में सीता केन्द्र में व हर मोड़ पर उपस्थित हैं। नारी-मुक्ति निराला का स्थायी भाव है। साहित्य परम्परा में पुत्र के प्रति वात्सल्य तो खूब दिखता है किन्तु सरोज स्मृति में पुत्री के प्रति वात्सल्य दिखाकर उन्होंने रूढ़िवादी पुरुष प्रधान समाज में पुत्री को मुक्त किया। शक्तिपूजा में सीता मुक्ति प्रकारान्तर से नारी मुक्ति है। तुलसी के राम सीता के लिए लड़ते हैं पर सीता से समतामूलक प्रेम नहीं कर पाते। दुःख की चरम स्थिति में वे कह बैठते हैं- ‘नारी हानि बिसेष छति नाहीं’। दूसरी ओर, निराला के राम जानकी को पत्नी के रूप में नहीं, प्रेयसी के रूप में देखते हैं- “जानकी हाय उद्धार ‘प्रिया’ का हो न सका।”

इसके बाद भी यह नहीं भूलना चाहिए कि शक्तिपूजा संश्लिष्ट संवेदना की कविता है जिसकी वस्तु-संरचना एक साथ कई पक्षों को उद्घाटित करती है। सीता की मुक्ति इस भाव समुच्चय का केन्द्रीय तत्त्व तो है, किन्तु एकमात्र नहीं है, क्योंकि यह कविता राष्ट्रीय आंदोलन, शक्ति की मौलिक कल्पना, पौराणिक राम के मानवीय रूपान्तरण, निराला के आत्म-संघर्ष तथा सत्-असत् संघर्ष जैसे बिन्दुओं को भी समानांतर रूप से धारण करती है।

शक्ति की मौलिक कल्पना

राम की शक्तिपूजा पौराणिक आख्यान के ढाँचे में रची गई अत्यंत भावपूर्ण कविता है जिसकी केन्द्रीय संवेदना की व्याख्या विभिन्न समीक्षकों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से की है। डॉ. निर्मला जैन ने अपने प्रसिद्ध लेख ‘शक्ति काव्य का प्रतिमान: राम की शक्तिपूजा’ में इस कविता का सारतत्व ‘शक्ति चेतना’ को माना है। प्रसिद्ध समीक्षक चन्द्रकान्त बांदिवडेकर ने भी इस कविता की समस्त संभावनाओं को टटोलते हुए अन्ततः शक्ति चेतना को ही सर्वाधिक प्रमुख संवेदना माना है |

राम की शक्तिपूजा में शक्ति तत्व की केन्द्रीयता इसके नामकरण से ही स्पष्ट है। कविता का नामकरण शक्तिपूजा पर ही केन्द्रित है; न कि नारी मुक्ति, निराला के आत्मसंघर्ष या सत्-असत् संघर्ष जैसे अन्य भावों पर। कविता का कथानक भी शक्ति की केन्द्रीयता दर्शाता है। कविता का आरंभ इस बिन्दु पर होता है कि नायक नैतिक होते हुए भी शक्तिहीन है जबकि खलनायक अनैतिक होते हुए भी शक्तिसम्पन्न है। सन् 1936 के भारत में शक्ति का अनैतिक पक्ष होना एक साथ कई संदर्भों पर चोट है, जैसे अंग्रेजी शासन, रूढ़िवादी साहित्यिक चिन्तन, सामन्तवादी-पुरुषवादी सामाजिक संरचना इत्यादि। कुछ चिंतक इस संवेदना को प्रगतिवादी क्रांति चेतना से जोड़ते हैं क्योंकि गांधी की अहिंसा का विफल होना तथा निराला का प्रगतिवादी मूल्यों से सहमत होना जैसे तथ्य इस व्याख्या की संभावना तलाशते हैं। बहरहाल, व्याख्या किसी भी संदर्भ में हो, शक्ति चेतना का तत्त्व इस कविता का सारतत्व है।

कविता में शक्ति तत्व की केन्द्रीयता कई बिन्दुओं में नजर आती है। कविता का आरंभ ‘रवि हुआ अस्त’ से हुआ है जो शक्ति के अभाव का प्रतीकात्मक संकेत है। पहली अठारह पंक्तियाँ राम की सेना के पराजय की ओर बढ़ने या शक्तिहीन होने का संकेत करती हैं। राम कोशिश कर-कर के थक चुके हैं किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिल रही। उनके विश्वविजयी बाण भंग हो रहे हैं, उनके अंग बिंधे हुए हैं और मुट्ठियों के भीतर से खून बह रहा है —

“अनिमेष-राम-विश्वजिद्दिव्य-शर-भङ्ङ्ग-भाव / विद्धांग-बद्ध-कोदण्ड-मुष्टि-खर-रुधिर-स्राव।”

शक्तिहीनता का संकट इतना अधिक है कि राम के मन में ‘अमानिशा’ जैसी निराशा फैली हुई है। विजय किस प्रकार प्राप्त होगी, ऐसी ‘दिशा का ज्ञान’ खो गया है, चिन्ता का सागर निर्बाध रूप से गरज रहा है किन्तु समाधान नहीं मिल पा रहा है। जो व्यक्ति करोड़ों शत्रुओं के समक्ष भी दुराक्रान्त रहा हो, स्थिरता जिसका सारतत्व हो, शत्रुओं का दमन करते हुए जिसने कभी थकान महसूस न की हो, वह शक्तिहीनता से इतना संशयग्रस्त, विकल, विचलित और पराजित हो गया है कि असामर्थ्य चेतना से उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व हिल गया है —

“जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपु-दम्य-श्रान्त / एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त |”

इसी क्षण ‘अंधकार घन में विद्युत’ के समान सीता की स्मृति राम के मन में आती है। ‘विदेह के उपवन का लतान्तराल मिलन’ और ‘नयनों का नयनों से गोपन प्रिय संभाषण’ याद आता है। इस सुखद स्मृति का परिणाम है कि राम का पराजयभाव तुरन्त समाप्त हो जाता है और ‘सीता ध्यानलीन राम’ के हृदय में ‘विश्वविजय भावना’ भर आती है |

किन्तु स्मृतिजन्य शक्तिचेतना वस्तुगत परिस्थितियों के समक्ष कमजोर सिद्ध होती है। समस्या केवल राम के मनोविज्ञान की नहीं है कि उन्हें उनकी शक्ति का अहसास कराकर युद्ध जीता जा सके। समस्या तो यह है कि रावण से आमन्त्रण पाकर शक्ति खुद युद्ध में उतर गयी है। वे रावण को गोद में लेकर बैठी हैं तथा राम के सम्पूर्ण अस्त्र उनके सामने निरर्थक हो गए हैं —

“फिर देखी भीमा मूर्ति आज रण देखी जो / आच्छादित किये हुए सम्मुख समग्र नभ को | ”

यहीं इस कविता की केन्द्रीय समस्या उभरती है। विभीषण के ओजपूर्ण व्याख्यान के बाद राम इस बात का खुलासा करते हैं कि शक्ति स्वयं रावण के पक्ष में है। कविता की संरचना का घुमाव बिंदु यही है —

“बोले रघुमणि – ‘मित्रवर, विजय होगी न समर |”

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“अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति !”

यहीं से कविता की दिशा बदलती है और कविता में उपस्थित नैराश्य व अंधकार टूटना शुरू होता है। सारी समस्या को समझकर जाम्बवान विश्वस्त भाव से राम को भी शक्ति धारण करने की सलाह देते हैं। उनका दावा है कि यदि अशुद्ध रावण उन्हें त्रस्त कर सका है तो शक्ति की उपलब्धि के बाद राम तो उसे ध्वस्त कर देंगे —

“रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सका त्रस्त / तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त |”

राम को यह सुझाव उचित लगता है। वे प्रकृति के माध्यम से शक्ति की मौलिक कल्पना करते हैं। इस कल्पना में पर्वत पार्वती का, सिंह समुद्र का, अहंकार का दमन महिषासुर मर्दन का और आकाश शंकर का प्रतीक है। यह कल्पना कृतिवास रामायण के समान भक्ति पर नहीं बल्कि हठयोग प्रक्रिया पर आधारित है। राम युद्ध से मन हटाकर शक्ति के दृढ़ आराधन का अनुष्ठान पूरा कर रहे हैं, उनका मन तेजी से चक्र पार करता जा रहा है —

“क्रम-क्रम से हुए पार राघव के पंच दिवस / चक्र से चक्र चढ़ता गया मन ऊर्ध्व निरलस।”

आठवें दिन राम का आराधन ‘ब्रह्म-हरि शंकर’ का स्तर पार कर चुका है और आज्ञा चक्र पर समाहित है। उन्हें सहस्रार चक्र तक पहुँचने के लिए सिर्फ एक इन्दीवर ( कमल ) अर्पित करना बाकी है किन्तु रात्रि के समय दुर्गा छिपकर आती हैं और यह पुष्प उठा ले जाती हैं। राम अन्तिम पुष्प अर्पित करना चाहते हैं किन्तु कुछ न पाकर घोर अवसाद व आत्मधिक्कार से भर जाते हैं। आत्मधिक्कार का मूलभाव यह है कि सम्पूर्ण जीवन नैतिक रूप से जीने के बावजूद यदि इतने महत्वपूर्ण संघर्ष में सफलता न मिले तो ऐसे जीवन को धिक्कार है —

“धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध / धिक् साधन, जिसके लिए सदा ही किया शोध।”

किन्तु कविता पुनः त्रासदी के मार्ग को छोड़ती है और तेजी से सुखांत की ओर बढ़ती है। राम सीता-मुक्ति के युद्ध में पराजित होने को तनिक भी तैयार नहीं है। उनका अपराजेय मन पुनः जागृत होता है और वे सीता की मुक्ति के लिए अपनी आँख तक चढ़ाने को तैयार हो जाते हैं —

“यह है उपाय’ कह उठे राग ज्यों मन्द्रित घन / कहती थीं माता मुझे सदा राजीवनयन |दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण / पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।”

जिस क्षण राम का आँख अर्पित करने का निश्चय दृढ़ हो जाता है, उसी क्षण देवी का त्वरित आगमन होता है और वे राम को विजय का आशीर्वाद देती हैं |

स्पष्ट है कि शक्तिचेतना इस कविता की कथ्य संरचना का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। किन्तु, यह नहीं भूलना चाहिए कि यह कविता अपनी अर्थ संरचना में बहुआयामी है। शक्ति चेतना इन सूत्रों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तो है, किन्तु एकमात्र नहीं।

राम की शक्तिपूजा की केन्द्रीय संवेदना

‘राम की शक्तिपूजा’ अपनी अर्थ-बहुलता के कारण अत्यंत चर्चित कविता है। इस कविता की केंद्रीय संवेदना के निर्धारण में समस्या है कि इसकी बहुत सी पंक्तियाँ बेहद महत्वपूर्ण अर्थ धारण करने की वजह से मूल संवेदना की वाहक प्रतीक होती हैं। यही कारण है कि विभिन्न समीक्षकों ने निराला के मूल-भाव की व्याख्या भिन्न-भिन्न पंक्तियों के आधार पर की है। किसी ने ‘शक्ति की करो मौलिक कल्पना’ को केंद्रीय संवेदना का वाहक बताया है, किसी ने ‘सीता की मुक्ति’ या ‘नारी मुक्ति’ को, तो किसी ने राम के भीतर निराला की खोज करते हुए ‘निराला के आत्मसंघर्ष’ को ही इसका केंद्रीय-भाव सिद्ध किया है। इस कविता में एक और छिपी हुई संभावना यह है कि ‘वह एक और मन रहा राम का जो न थका’ भी कविता का बीज-कथन लगता है।

इस कथन का महत्व कविता के कथानक के विश्लेषण से स्पष्ट होता है। यह वह कथन है जहाँ से कविता लंबी निराशा को चीरकर अदम्य उतसाह की ओर बढ़ती है, पराजित मनःस्थिति से निकलकर अपराजेयता-बोध की ओर अग्रसर होती है। कविता के आरंभ से ही दिखता है कि राम धर्म-अधर्म संघर्ष में धर्म के पक्षधर हैं और साधन की पवित्रता से समझौता न करते हुए अपने पवित्र साध्य को अर्जित करना चाहते हैं। उनके पास पंरपरा से प्रदत्त शक्ति है, हनुमान जैसे महाशक्तिशाली सहायक हैं, जाम्बवंत जैसे अनुभवी मार्गदर्शक हैं, विभीषण जैसे नीति-निर्माता हैं, लक्षमण व सुग्रीव जैसे वीर योद्धा हैं; किंतु इन सबकी उपस्थिति के बावजूद राम विफलता की ओर बढ़ रहे हैं। निराला ने दिखाया है कि विषम परिस्थितियाँ राम को भी किस प्रकार संशय, पराजय बोध, असामर्थ्य चेतना, विकलता, दिशाहीनता जैसी निषेधात्मक प्रवृत्तियों से भर देती है — “स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर-फिर संशय / रह-रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय |

कविता में यह निराशा लगातार बढ़ती गई है। राम अंत में भी यही चाहते हैं कि वे अपने नैतिक पक्ष, औदात्य, विनम्रता जैसे गुणों को बनाए रखते हुए कठोर साधनों के माध्यम से अपने पवित्र उद्देश्य की उपलब्धि करें, किंतु देवी दर्गा द्वारा पूजा के अंतिम पुष्प को उठा लेना और उनकी साधना का विफल होना उनके संपूर्ण नैतिक जीवन पर चोट है। इस बिंदु पर राम हृदय को चीर डालने वाला दुःख झेलते हैं जिसके सामने औदात्य जैसे गुण नहीं टिक सकते। इसी बिंदु पर राम का औदात्य भंग हुआ है और वे प्रचंड क्रोध, निराशा व आत्मधिक्कार के भाव से भर उठे हैं —

“धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध / धिक् साधन, जिसके लिए सदा ही किया शोध !”

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“जानकी! हाय, उद्धार प्रिया का हो न सका।”

‘जानकी का उद्धार न हो सका’ यह स्थिति राम को भीतर तक उद्वेलित करती है और किसी भी प्रकार स्वीकार्य नहीं है। यहीं राम के भीतर वह व्यक्तित्व उठ खड़ा होता है जो किसी प्रकार की विनम्रता और दीनता को स्वीकार नहीं करता; जो अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है और वे अपने ‘नयनकमल’ से अनुष्ठान पूरा करते हैं |

“वह एक और मन रहा राम का जो न थका / जो नहीं जानता दैन्य नहीं जानता विनय ।”

इसी पंक्ति के बाद कविता की गति पलटती है | वह ‘त्रासदी’ के रास्ते से हटकर ‘फलागम’ के मार्ग पर अग्रसर होती है। राम का यह मन अपनी आँख निकालकर अर्पित करने को दृढ़ है। इस आत्मोत्सर्ग के साहस के सामने अंततः देवी दुर्गा को झुकना पड़ता है और विजय का आशीर्वाद देना पड़ता है। इस अर्थ में यह पंक्ति न केवल इस कविता का ‘टर्निंग प्वाइंट’ है न सिर्फ राम की कथा का बल्कि निराला की अपनी जीवन-कथा का भी ‘टर्निंग प्वाइंट’ है।

वस्तुतः यह स्थिति सिर्फ राम की नहीं, स्वयं निराला की भी है। निराला राम की ही तरह ‘महाप्राण’ हैं, भयानक से भयानक संघर्षों में भी ‘दुराक्रांत’ रहे हैं, अपने साहित्यिक जीवन में निंरतर नए प्रयोग करते रहे हैं किंतु अपनी पुत्री सरोज की मृत्यु ने उन्हें तोड़ दिया। ‘सरोज-स्मृति’ के निराला उसी टूटन और पराजित मनःस्थिति के प्रतीक हैं जिसके ‘राम की शक्तिपूजा’ के राम हैं। यही कारण है कि निराला का दुःख राम के दुःख के अत्यंत नजदीक महसूस होता है। इस दृष्टि से ‘दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज जो नहीं कही’ जितनी निराला की पीड़ा है, उतनी ही ‘राम’ की भी। और आगे बढ़ें तो स्पष्ट नजर आता है कि ‘वह एक और मन रहा राम का जो न थका’ जितना राम का मन है, उतना ही निराला का भी है। यह पंक्ति सरोज स्मृति के पराजित निराला के पुनः अपने ‘महाप्राणतत्व’ को अर्जित करने का उद्घोष है।

उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर यह मानने में कोई समस्या नहीं है कि ‘वह एक और मन रहा राम का जो न थका’ ही वह पंक्ति है जिसने कथानक को सबसे व्यापक तौर पर प्रभावित किया है। कविता की अन्य संवेदनाएँ जैसे ‘शक्ति की मौलिक कल्पना’ या ‘नारी मुक्ति’ भी इस पंक्ति के महत्व से सुसंगत है। अतः इसे केंद्रीय संवेदना का वाहक मानना उचित ही प्रतीत होता है।

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