(17)
कितना श्रम हुआ व्यर्थ, आया जब मिलनसमय,
तुम खींच रहे हो हस्त जानकी से निर्दय!
रावण? रावण लम्पट, खल कल्म्ष गताचार,
जिसने हित कहते किया मुझे पादप्रहार,
बैठा उपवन में देगा दुख सीता को फिर,
कहता रण की जय-कथा पारिषद-दल से घिर,
सुनता वसन्त में उपवन में कल-कूजित पिक
मैं बना किन्तु लंकापति, धिक राघव, धिक्-धिक्?
व्याख्या : विभीषण श्री राम से कहते हैं — “हाय! जब फल प्राप्ति का समय आया, तब सोचो इस पलायन से कितना श्रम व्यर्थ चला जाएगा? अब तक तो हम लोग विजय-लाभ के लिए काफी खून-पसीना बहा चुके हैं। क्या यह सब व्यर्थ ही न चला जायेगा ? अभी तो जानकी से मिलने का समय आया था। हे निर्मम ! दुःख है कि तुम ऐसे समय ही जानकी के मिलने के प्रयास से विमुख होकर निष्क्रिय हुए जा रहे हो। निःसन्देह जानकी के प्रति यह तुम्हारा कठोरता का ही व्यवहार होगा। जहाँ तक रावण का सम्बन्ध है, वह तो धूर्त, दुष्ट, पापी और भ्रष्टाचारी है, जिसने कल्याण की बात कहते हुए मुझ पर चरण-प्रहार किया था। यदि आपने युद्ध से विरक्ति ले ली तो रावण को विजयश्री मिलेगी। वह अपनी वाटिका में बैठा हुआ सीता को और अधिक यातना देगा। सभासदों से घिरा हुआ अपने जय-यश का गान करेगा, विजय गाथाएँ सुनायेगा। जब बसन्त ऋतु का आगमन होगा तो वह कोयल के मधुर स्वरों का आनन्द लेगा। यदि आपने युद्ध त्याग दिया, तब मैं भी लंका का राजा बन चुका ? क्या आपने इसीलिए मुझे लंका का राजा बनाया था? हे राघव । युद्ध से पलायन करने के कारण आपको बार-बार धिक्कार है।”
(18)
सब सभा रही निस्तब्ध राम के स्तिमित नयन
छोड़ते हुए शीतल प्रकाश देखते विमन,
जैसे ओजस्वी शब्दों का जो था प्रभाव
उससे न इन्हें कुछ चाव, न कोई दुराव,
ज्यों हों वे शब्दमात्र मैत्री की समनुरक्ति,
पर जहाँ गहन भाव के ग्रहण की नहीं शक्ति।
व्याख्या : विभीषण के युद्ध प्रेरक ओजस्वी कथन को सुनकर सभी सभासद विस्मय से भर गये। राम के अधखुले नेत्र उदास भाव से शीतल प्रकाश का संचार करते रहे। वे उदास चित्त से ऐसे देख रहे थे, जैसे विभीषण के ओजस्वी शब्दों का जो प्रभाव था उसमें न तो उनको कोई उत्साह था और न किसी से कोई छिपाव था। जैसे इन शब्दों में केवल मैत्री-भाव की औपचारिकता ही थी और उनमें किसी गम्भीर या सारगर्भित भाव को ग्रहण करने की क्षमता नहीं है।
(19)
कुछ क्षण तक रहकर मौन सहज निज कोमल स्वर,
बोले रघुमणि-“मित्रवर, विजय होगी न समर,
यह नहीं रहा नर-वानर का राक्षस से रण,
उतरीं पा महाशक्ति रावण से आमन्त्रण,
अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति।” कहते छल छल
हो गये नयन, कुछ बूँद पुनः ढलके दृगजल |
व्याख्या : राम कुछ क्षणों तक मौन रहकर फिर अपने सहज कोमल स्वर में बोले- मित्रवर! युद्ध में विजय नहीं होगी। यह मनुष्य और वानरों का राक्षसों से युद्ध नहीं है। इस युद्ध में रावण के निमंत्रण पर स्वयं महाशक्ति युद्ध करने उतरी हैं। अतः यह युद्ध राक्षस नहीं लड़ रहे साक्षात महाशक्ति राक्षस पक्ष से लड़ रही हैं। शोक ! रावण अन्याय और अधर्म का प्रतीक है। जिस ओर अन्याय है उसी ओर महाशक्ति है। भाग्य की यह कैसी विडम्बना है। जबकि शक्ति न्याय-पक्ष में होनी चाहिए थी, अन्याय का पक्ष ग्रहण कर रही है। यह कहते-कहते राम के नेत्रों से छल-छल करके आँसू बहने लगे। अश्रु-जल की कुछ बूंदें पुनः ढुलक पड़ी । एक बार सीता का स्मरण करके आँसुओं की दो बूँदें टपकी थीं और अब पुनः महाशक्ति द्वारा अन्याय पक्ष-ग्रहण से राम के हृदय को ठेस लगी और दुबारा आँसू की कुछ बूँदें ढुलक पड़ीं।
(20)
रुक गया कण्ठ, चमका लक्ष्मण तेजः प्रचण्ड
धँस गया धरा में कपि गह युगपद, मसक दण्ड
स्थिर जाम्बवान, समझते हुए ज्यों सकल भाव,
व्याकुल सुग्रीव, हुआ उर में ज्यों विषम घाव,
निश्चित सा करते हुए विभीषण कार्यक्रम
मौन में रहा यों स्पन्दित वातावरण विषम।
व्याख्या : कहते-कहते राम का गला रुँध गया। राम की इस दशा को देखकर लक्ष्मण अपने प्रचण्ड तेज से चमक उठे। हनुमान राम के दोनों चरणों को पकड़कर लज्जा से जमीन में धँस गये। पुष्ट भुजाओं वाले जाम्बवान ज्यों के त्यों शान्त बैठे रह गये। उन्होंने अपने हृदय में ही राम के द्वारा व्यक्त भाव की अनुभूति की। सुग्रीव ऐसे व्याकुल हो गये, जैसे उनके हृदय में गम्भीर घाव हो गया हो। विभीषण भारी युद्ध का कुछ कार्यक्रम सा निश्चित करते हुए मालूम हुए। इस प्रकार सारा भयंकर वातावरण मौन में ही बदलता हुआ सा दिखाई दिया। राम के वचन की प्रतिक्रिया में कोई एक शब्द भी नहीं बोल पाया।
(21)
निज सहज रूप में संयत हो जानकी-प्राण
बोले-“आया न समझ में यह दैवी विधान।
रावण, अधर्मरत भी, अपना, मैं हुआ अपर,
यह रहा, शक्ति का खेल समर, शंकर, शंकर!
करता मैं योजित बार-बार शर-निकर निशित,
हो सकती जिनसे यह संसृति सम्पूर्ण विजित,
जो तेजः पुंज, सृष्टि की रक्षा का विचार,
हैं जिसमें निहित पतन घातक संस्कृति अपार।
व्याख्या : थोड़ी देर बाद राम ने अपने को नियन्त्रित करके कहा- “मेरी समझ में यह ईश्वरीय नियम नहीं आया कि महाशक्ति ने अधर्मी रावण को तो अपना बना लिया और मैं धर्म-रत होते हुए भी उनके लिए पराया अर्थात् गैर ही रहा। यह युद्ध महाशक्ति का खेल बन गया है। हे शंकर! अब रक्षा करो। मैंने बार-बार सान पर रखे हुए तेज बाणों का सन्धान किया। ऐसे प्रखर बाणों को चलाया जिनसे में युद्ध में समस्त विश्व को विजय कर सकता था। अकेली रावण सेना का तो फिर कहना ही क्या। ये बाण तेज का समूह हैं, इनमें लोक-रक्षा की भावना है अर्थात् इन बाणों से लोक की रक्षा की जाती है। ये वही बाण है, जिनमें लोक-संस्कृति को प्रगतिशील बनाने की क्षमता है और संसार को पतन से रोकने की शक्ति है। “
(22)
शत-शुद्धि-बोध, सूक्ष्मातिसूक्ष्म मन का विवेक,
जिनमें है क्षात्रधर्म का धृत पूर्णाभिषेक,
जो हुए प्रजापतियों से संयम से रक्षित,
वे शर हो गये आज रण में, श्रीहत खण्डित!
देखा हैं महाशक्ति रावण को लिये अंक,
लांछन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक,
हत मन्त्रपूत शर सम्वृत करतीं बार-बार,
निष्फल होते लक्ष्य पर क्षिप्र वार पर वार।
व्याख्या : राम कहते हैं — “इनमें ( बाणों में ) शत-प्रतिशत पवित्रता का ज्ञान है। मन का सूक्ष्म से सूक्ष्म ज्ञान इन बाणों में है। जो बाण क्षत्रिय धर्म का अभिषिक्त रूप धारण किये हुए थे, जिनको प्रजापतियों ने अपने संयम से सुरक्षित रखा था, आज वे ही बाण युद्ध में शोभाहीन, विफल और खण्ड-खण्ड हो गये। मैंने देखा कि युद्ध में महाशक्ति रावण को गोद में लेकर इस प्रकार रक्षा कर रही थी, जिस प्रकार आकाश में चन्द्रमा शंकाहीन होकर कलंक को अपने अंक में धारण करता है। उस महाशक्ति ने मेरे मंत्रों द्वारा पवित्र किये बाणों को बार-बार रोककर नष्ट कर दिया। लक्ष्य पर किये गये मेरे फुर्तीले प्रहार बार-बार विफल हो गये।
(23)
विचलित लख कपिदल क्रुद्ध, युद्ध को मैं ज्यों ज्यों,
झक-झक झलकती वह्नि वामा के दृग त्यों-त्यों,
पश्चात्, देखने लगीं मुझे बँध गये हस्त,
फिर खिंचा न धनु, मुक्त ज्यों बँधा मैं, हुआ त्रस्त!”
व्याख्या : राम कहते हैं — “ये प्रहार मैंने वानर-सेना को युद्ध में घबराई हुई देखकर किये थे। युद्ध में क्रुद्ध होकर मैंने वार पर वार किये थे, किन्तु इस महाशक्ति ने उन सबको विफल कर दिया। जैसे-जैसे मैं बाण प्रहार करता था, वैसे ही वैसे इस महाशक्ति के नेत्रों में झक-झक करके अग्नि प्रज्वलित होने लगती थी। इसके पश्चात् वह मेरी ओर देखने लगी तो मेरे हाथ ही बँध गये। इसके बाद मुझसे धनुष नहीं ताना गया। मैं मुक्त होकर भी बन्धनयुक्त हो गया और अन्त में इस विवशता में मैं शंका एवं चिन्ता से ग्रस्त हो गया।”
(24)
कह हुए भानुकुलभूषण वहाँ मौन क्षण भर,
बोले विश्वस्त कण्ठ से जाम्बवान-“रघुवर,
विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण,
हे पुरुषसिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण,
आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर,
तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर।
रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सकता त्रस्त
तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त |
व्याख्या : महाशक्ति द्वारा रावण के पक्ष ग्रहण पर क्षोभ व्यक्त करने के पश्चात् सूर्य वंश को सुषमा-मण्डित करने वाले राम एक क्षण को मौन हो गये। इसके पश्चात् जाम्बवान पूर्ण आश्वस्त होकर बोले – “रघुवर ! मुझे तो इस प्रकार युद्ध से घबरा जाने का कोई भी कारण दिखाई नहीं देता। हे पुरुषसिंह ! जो महाशक्ति रावण ने प्राप्त कर ली है, उसी महाशक्ति को तुम भी प्राप्त कर लो। रावण द्वारा की गई आराधना का प्रत्युत्तर दृढ आराधना से दो। अर्थात् रावण ने जिस आराधना द्वारा महाशक्ति की कृपा प्राप्त की है, आप उससे भी अधिक दृढ आराधना करके महाशक्ति को अपने पक्ष में कर लो। तुम अपनी शक्ति को संयमित करके राक्षसों की शक्ति पर विजय प्राप्त करो। जब रावण अधर्मी होकर भी महाशक्ति को सिद्ध करके आपको भयभीत कर सका है तो तुम तो धर्मात्मा हो, निस्सन्देह तुम महाशक्ति को सिद्ध करके उसे नष्ट करके ही रहोगे।
(25)
शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन।
छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो, रघुनन्दन!
तब तक लक्ष्मण हैं महावाहिनी के नायक,
मध्य भाग में अंगद, दक्षिण-श्वेत सहायक।
मैं, भल्ल सैन्य, हैं वाम पार्श्व में हनुमान,
नल, नील और छोटे कपिगण, उनके प्रधान।
सुग्रीव, विभीषण, अन्य यथुपति यथासमय
आयेंगे रक्षा हेतु जहाँ भी होगा भय।”
व्याख्या : जाम्बवान कहते हैं — “हे राम ! तुम महाशक्ति की अभिनव कल्पना करो और उसकी पूजा करो। हे रघुनन्दन ! जब तक महाशक्ति तुम्हें सिद्ध न हो जाये, तब तक के लिए तुम युद्ध-विरत हो जाओ। तब तक लक्ष्मण ही इस विशाल वानर-सेना का मध्य भाग में नेतृत्व करेंगे। सेना के दक्षिण भाग की कमान गौर वर्ण अंगद सम्भालेंगे। में भालू सेना की बागडोर संभालूँगा। सेना के बाई ओर वीर हनुमान हैं ही। नल , नील और छोटे-छोटे वानरों की टोलियाँ और उनके प्रमुख सुग्रीव, विभीषण आदि अन्य सेनानायक जहाँ भी संकट होगा, वहाँ यथा-समय रक्षार्थ पहुँचकर सहायता करते रहेंगे। आप निश्चिन्त होकर महाशक्ति की उपासना करें।”
(26)
खिल गयी सभा। “उत्तम निश्चय यह, भल्लनाथ!”
कह दिया वृद्ध को मान राम ने झुका माथ।
हो गये ध्यान में लीन पुनः करते विचार,
देखते सकल-तन पुलकित होता बार-बार।
कुछ समय अनन्तर इन्दीवर निन्दित लोचन
खुल गये, रहा निष्पलक भाव में मज्जित मन,
बोले आवेग रहित स्वर सें विश्वास स्थित
“मातः, दशभुजा, विश्वज्योति; मैं हूँ आश्रित;
व्याख्या : जाम्बवान के महाशक्ति-सिद्धि के प्रस्ताव से समस्त मन्त्रिपरिषद् के मुख हर्ष से चमक उठे। राम ने शीश झुकाकर “हे जाम्बवान। आपका विचार निश्चय ही श्रेष्ठ हैं” कहकर वृद्ध जाम्बवान को उचित सम्मान दिया। इसके पश्चात् विचार करते-करते राम ध्यान-मग्न हो गये। सब देख रहे थे कि राम का शरीर बार-बार पुलकित हो रहा था। कुछ समय पश्चात् राम के नील कमल के सौन्दर्य को भी लज्जित करने वाले नेत्र खुले, किन्तु एकटक देखते रहे। उनका मन महाशक्ति के ध्यान में ही डूबा रहा। पुनः राम विश्वस्त भाव से शान्त स्वर में बोले — “हे दस भुजाओं वाली, समस्त विश्व की ज्योति स्वरूपा माँ! मैं तुम्हारी शरण में हूँ |”
(27)
हो विद्ध शक्ति से है खल महिषासुर मर्दित;
जनरंजन-चरण-कमल-तल, धन्य सिंह गर्जित!
यह, यह मेरा प्रतीक मातः समझा इंगित,
मैं सिंह, इसी भाव से करूँगा अभिनन्दित।”
व्याख्या : राम कहते हैं — ” आपके भाले से बिंधा असुर महिषासुर चूर-चूर हो गया। आपके मनुष्यों को प्रसन्न करने वाले चरणों के नीचे गर्जन करता सिंह धन्य है। तुम्हारा यह चरण सेवी वाहन सिंह मेरा ही प्रतीक है, मैं इस संकेत को समझ चुका हूँ। मैं आपका आश्रित एवं सेवक सिंह हूँ । इसी भाव से मैं तुम्हारी उपासना करूंगा। “
(28)
कुछ समय स्तब्ध हो रहे राम छवि में निमग्न,
फिर खोले पलक कमल-ज्योतिर्दल ध्यान-लग्न;
हैं देख रहे मंत्री, सेनापति, वीरासन
बैठे उमड़ते हुए, राघव का स्मित आनन।
व्याख्या : इसके पश्चात राम माँ दुर्गा की शोभा देखने में निमग्न होकर कुछ समय के लिए अवाक ही रहे। इसके बाद अपने कमल की पंखुड़ियों जैसे पलकों को खोल दिया और उनका मन ज्योति-पुंज महाशक्ति के ध्यान में डूब गया था। सभी मंत्री और सेनापति मुस्कराते हुए राम के मुख पर उमड़ते हुए भावों का अनुमान कर रहे थे।
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