राम की शक्ति-पूजा : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ( भाग 2)

(11)

युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल,
देखा कपि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल;
ये नहीं चरण राम के, बने श्यामा के शुभ,-
सोहते मध्य में हीरक युग या दो कौस्तुभ;
टूटा वह तार ध्यान का, स्थिर मन हुआ विकल,
सन्दिग्ध भाव की उठी दृष्टि, देखा अविकल
बैठे वे वहीं कमल-लोचन, पर सजल नयन,
व्याकुल-व्याकुल कुछ चिर-प्रफुल्ल मुख, निश्चेतन।

प्रसंग — प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की बहुचर्चित कविता ‘राम की शक्ति-पूजा’ से अवतरित हैं | इन पंक्तियों में राम-रावण युद्ध की विभीषिका, रावण की भयावहता और राम की हताशा और उससे उबरने की मनःस्थिति को दर्शाया गया है |

व्याख्या — राम के दिव्य चरणों पर उनके दो अश्रु-बिन्दु टपक पड़े। हनुमान ने गिरते हुए उन दो अश्रु-बिन्दुओं को इस प्रकार देखा, जैसे आकाश के दो तारे हों । हनुमान को लगा कि ये दोनों चरण राम के नहीं हैं, स्वयं महाशक्ति कालिका के ही मंगलमय चरण हैं, जिन पर गिरकर राम के दो अश्रु-बिन्दु ऐसे चमक रहे हैं, जैसे दो हीरे हों या दो कौस्तुभ मणियाँ हों।

हनुमान की वह ध्यानावस्थित दशा भंग हो गयी और उनका शान्त चित्त अशान्त हो उठा। उनका हृदय शंकाकुल हो गया। शंका भरी दृष्टि से जब उन्होंने राम की ओर देखा तो कमल-लोचन राम वहीं पर शान्त मुद्रा में आसीन थे। उनके नेत्रों में अश्रु डब-डबा रहे थे तथा वे कुछ व्याकुल से थे। उनका सदैव प्रसन्न रहने वाला मुख चेतना-शून्य तथा उदास-सा लग रहा था।

(12)

“ये अश्रु राम के” आते ही मन में विचार,
उद्वेल हो उठा शक्ति – खेल – सागर अपार,
हो श्वसित पवन – उनचास, पिता पक्ष से तुमुल
एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प को उड़ा अतुल,
शत घूर्णावर्त, तरंग – भंग, उठते पहाड़,
जल राशि – राशि जल पर चढ़ता खाता पछाड़,
तोड़ता बन्ध-प्रतिसन्ध धरा हो स्फीत वक्ष
दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष,
शत-वायु-वेग-बल, डूबा अतल में देश – भाव,
जलराशि विपुल मथ मिला अनिल में महाराव |

व्याख्या — ये राम के आँसू हैं- इस विचार के आते ही शक्ति का खेल खेलने में अपार सागर के समान शक्तिशाली हनुमान उत्तेजित हो उठे अर्थात् हनुमान के रूप में शक्ति का समुद्र ही उद्वेलित हो उठा। हनुमान को उत्तेजित देखकर उनके पिता मरुत के पक्ष में भयंकर उनचास पवन वेग से चलने लगे अर्थात् हनुमान को उत्तेजित देखकर प्रलयकालीन दृश्य उपस्थित हो गया। इन प्रखर उनचास पवनों ने सागर के वक्ष पर छायी भाप को आकाश में उड़ा दिया जिससे सैकड़ों चक्कर लगाती हुई समुद्र में विशाल लहरें उठने लगीं। समुद्र में वायु-वेग से जल के पहाड़ से उठने लगे। सहसा सागर में ज्वार आ गया और वह उफनने लगा। एक जल-राशि पर दूसरी जल-राशि पछाड़ खाने लगी। सागर का विस्तार इतना बढ़ गया कि उसने पृथ्वी की सारी सीमाएँ तोड़ डालीं, अर्थात् समग्र धरा जलमग्न हो गई। समुद्र दिग्विजय हेतु हर क्षण शक्ति से आगे ही बढ़ता चला जा रहा था। सैकड़ों पवनों के वेग की शक्ति से स्थल का भाव गहरे पाताल में खो गया अर्थात् उफनते समुद्र में डूबी पृथ्वी कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। इस प्रलयंकर बेला का प्रखर स्वर सागर की जल-राशि को मथता हुआ वायु में मिल गया।

(13)

वज्रांग तेजघन बना पवन को, महाकाश
पहुँचा, एकादश रूद्र क्षुब्ध कर अट्टहास।
रावण – महिमा श्यामा विभावरी, अन्धकार,
यह रूद्र राम – पूजन – प्रताप तेजः प्रसार;
उस ओर शक्ति शिव की जो दशस्कन्ध-पूजित,
इस ओर रूद्र-वन्दन जो रघुनन्दन – कूजित,
करने को ग्रस्त समस्त व्योम कपि बढ़ा अटल,
लख महानाश शिव अचल, हुए क्षण-भर चंचल |

व्याख्या — इस प्रलयकालीन दृश्य के उपस्थित हो जाने पर परमवीर हनुमान अपन वज्र जैसे अंगों के वर्चस्व से पवन वेग को और प्रखर एवं भयंकर बनाते हुए, एकादश रुद्र के समान क्रुद्ध होकर अट्टहास अर्थात् भयंकर गर्जन करते हुए महाकाश में जा पहुँचे उन्होंने महाकाश में पहुँचकर देखा कि एक ओर तो रावण की महिमा के रूप में रात्रि के घनान्धकार जैसी काले वर्ण की महाशक्ति महाकालिका विद्यमान थी और दूसरी ओर राम द्वारा की गई शिव-पूजा के प्रताप के तेज स्वरूप स्वयं हनुमान थे। इस ओर रावण द्वारा पूजित शिव-शक्ति थी और उस ओर राम द्वारा प्रशंसित शिव का वंदन था, जिसके बल पर दृढ़ निश्चय वाले हनुमान समस्त महाकाश को निगलने के लिए आगे बढ़ रहे थे। स्थिर शिव इस महाविनाश को देखकर क्षण भर के लिए विचलित हो गये।

(14)

श्यामा के पद तल भार धरण हर मन्द्रस्वर
बोले- “सम्बरो, देवि, निज तेज, नहीं वानर
यह, -नहीं हुआ श्रृंगार-युग्म-गत, महावीर,
अर्चना राम की मूर्तिमान अक्षय – शरीर,
चिर – ब्रह्मचर्य – रत, ये एकादश रूद्र धन्य,
मर्यादा – पुरूषोत्तम के सर्वोत्तम, अनन्य,
लीलासहचर, दिव्यभावधर, इन पर प्रहार
करने पर होगी देवि, तुम्हारी विषम हार;
विद्या का ले आश्रय इस मन को दो प्रबोध,
झुक जायेगा कपि, निश्चय होगा दूर रोध।”

व्याख्या — महाशक्ति महाकाली के पद भार को धारण करने वाले शिव ने घन जैसे गंभीर स्वर में कहा — देवी! अपने तेज पर नियन्त्रण करो। यह केवल एक वानर नहीं है। यह कभी भी काम वासना से किसी नारी के प्रेम-पाश में नहीं बँधा है। यह वानर राम की मूर्तिमान अर्चना है। इसका शरीर अमिट है, यह आजन्म ब्रह्मचारी है। यह एकादश रुद्र का अवतार हनुमान धन्य है। यह मर्यादा पुरुषोत्तम राम का सर्वश्रेष्ठ अनन्य लीला सहचर है। इन्हीं के सहयोग से राम अपनी लीलाएँ सम्पन्न करते हैं। ये पवित्र भावों के धारणकर्ता हैं। देवि ! सावधान इस पर प्रहार करने से तुम्हारी अपमानजनक पराजय होगी। इनको तो तुम अपनी विद्या का आश्रय लेकर समझाओ। ऐसा करने से यह वानर स्वयं ही अपने निश्चय से डिग कर तुम्हारे सामने विनम्र होकर झुक जायेगा और तुम्हारा संकट दूर हो जायेगा।

(15)

कह हुए मौन शिव, पतन तनय में भर विस्मय
सहसा नभ से अंजनारूप का हुआ उदय।
बोली माता “तुमने रवि को जब लिया निगल
तब नहीं बोध था तुम्हें, रहे बालक केवल,
यह वही भाव कर रहा तुम्हें व्याकुल रह रह।
यह लज्जा की है बात कि माँ रहती सह सह।
यह महाकाश, है जहाँ वास शिव का निर्मल,
पूजते जिन्हें श्रीराम उसे ग्रसने को चल
क्या नहीं कर रहे तुम अनर्थ? सोचो मन में,
क्या दी आज्ञा ऐसी कुछ श्री रधुनन्दन ने?
तुम सेवक हो, छोड़कर धर्म कर रहे कार्य,
क्या असम्भाव्य हो यह राघव के लिये धार्य?”
कपि हुए नम्र, क्षण में माता छवि हुई लीन,
उतरे धीरे धीरे गह प्रभुपद हुए दीन।

व्याख्या — महाशक्ति को कर्त्तव्य कर्म की ओर इंगित करके शिव तो मौन हो गये। उसी समय हनुमान को आश्चर्य चकित करते हुए आकाश में उनकी माता अंजना के दर्शन हुए। हनुमान उस महाकाश में सहसा अपनी माता अंजना के उदय से आश्चर्य में पड़ गये कि वे यहाँ कैसे आ गईं? माता अंजना के रूप में महाशक्ति ने कहा-पुत्र। अपनी बाल्यावस्था में जब तुमने सूर्य को निगल लिया था, उस समय तुमको ज्ञान नहीं था कि ऐसा करने से लोक का कितना अनिष्ट हो जाएगा। उस समय तुम निरे बालक थे. किन्तु अब तो तुम प्रौढ़ हो गये हो। फिर भी तुम्हें वही शैशव का भाव रह-रहकर अधीर कर रहा है और तुम वैसे ही उत्पात करते रहते हो। यह बड़ी लज्जा की बात है कि तुम्हारे ऐसे अनर्थों से तुम्हारी माता को अपमान सहन करना पड़ रहा है। बेटे, यह महाकाश है. जहाँ शिव निवास कर रहे हैं। ये वे ही शिव हैं, जिनकी तुम्हारे आराध्य देव राम पूजा करते हैं। एक तुम हो कि उसी महाकाश शिव की निवासस्थली को निगलने चले हो। क्या महाकाश को निगल कर तुम कोई बड़ा पाप नहीं कर रहे हो अर्थात् अवश्य ही घोर अनिष्ट कर रहे हो। तुम स्वयं ही अपने मन में सोच लो कि क्या रघुनन्दन ने तुम्हें ऐसा अनर्थ करने की आज्ञा दी है? तुम राम-भक्त हो। भला बताओ कि तुम्हारा धर्म-विरुद्ध ऐसा अनुचित कार्य क्या राम स्वीकार कर सकेंगे? अर्थात् नहीं। माता अंजनी का यह उपदेश सुनकर हनुमान सहसा नम्र हो गये और क्षण भर में माता की छवि तिरोहित हो गई। हनुमान धीरे-धीरे महाकाश से उतर आये | उन्हीने दीन होकर राम के चरण ग्रहण कर लिए |

(16)

राम का विषण्णानन देखते हुए कुछ क्षण,
“हे सखा” विभीषण बोले “आज प्रसन्न वदन
वह नहीं देखकर जिसे समग्र वीर वानर
भल्लुक विगत-श्रम हो पाते जीवन निर्जर,
रघुवीर, तीर सब वही तूण में हैं रक्षित,
है वही वक्ष, रणकुशल हस्त, बल वही अमित,
हैं वही सुमित्रानन्दन मेघनादजित् रण,
हैं वही भल्लपति, वानरेन्द्र सुग्रीव प्रमन,
ताराकुमार भी वही महाबल श्वेत धीर,
अप्रतिभट वही एक अर्बुद सम महावीर
हैं वही दक्ष सेनानायक है वही समर,
फिर कैसे असमय हुआ उदय यह भाव प्रहर।
रघुकुलगौरव लघु हुए जा रहे तुम इस क्षण,
तुम फेर रहे हो पीठ, हो रहा हो जब जय रण।

व्याख्या — कुछ क्षणों तक विभीषण राम का मुख देखते रहे और फिर राम से बोल— “हे सखा! आज आपका मुख्य वैसा प्रसन्न नहीं है जिसे देखकर वानर और भालू युद्ध में हुई थकावट को खो देते थे और पुनः प्रसन्नता के निर्झर में स्नान करने फुर्ती से आ जाते थे। हे रघुवीर ! आपके वही बाण आज भी आपके तरकस में सुरक्षित हैं। ऐसी बात नहीं कि आपके बाणों में परिवर्तन हो गया है। इन्हें बाणों से तो आप खर-दूषण आदि राक्षसों का वध कर चुके हैं। सब वे ही बाण हैं, आपका वही युद्ध को सहन करने वाला चौड़ा वक्षस्थल है और आपकी भुजाओं में भी पहले जैसी ही अपार शक्ति है। युद्ध में मेघनाद पर विजय पाने वाले सुमित्रा-पुत्र लक्ष्मण भी वही हैं। भालुओं की सेना के राजा जाम्बवान भी वही हैं। प्रसन्न मन वानरराज सुग्रीव भी वही हैं। महाबलशाली, गौरवर्ण और धैर्यशाली तारा-पुत्र अंगद भी वही हैं। एक अरब योद्धाओं के समान अद्वितीय वीर हनुमान भी वही हैं।”

यह भी पढ़ें :

राम की शक्ति-पूजा : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ( भाग 1)

राम की शक्ति पूजा : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ( भाग 3)

राम की शक्ति पूजा : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ( भाग 4)

‘राम की शक्तिपूजा’ में नाटकीयता के तत्त्व

‘राम की शक्तिपूजा’ की केन्द्रीय संवेदना : शक्ति की मौलिक कल्पना या नारी-मुक्ति

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 1 )

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 2 )

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 3)

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 4)

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 5)

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 6)

error: Content is proteced protected !!