राम की शक्ति-पूजा : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ( भाग 1)

(1)

रवि हुआ अस्त; ज्योति के पत्र पर लिखा अमर
रह गया राम-रावण का अपराजेय समर
आज का तीक्ष्ण शर-विधृत-क्षिप्रकर, वेग-प्रखर,
शतशेलसम्वरणशील, नील नभगर्ज्जित-स्वर,
प्रतिपल – परिवर्तित – व्यूह – भेद कौशल समूह
राक्षस – विरुद्ध प्रत्यूह,-क्रुद्ध – कपि विषम हूह |

प्रसंग — प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की बहुचर्चित कविता ‘राम की शक्ति-पूजा’ से अवतरित हैं | इन पंक्तियों में राम-रावण युद्ध की विभीषिका, रावण की भयावहता और राम की हताशा और उससे उबरने की मनःस्थिति को दर्शाया गया है |

व्याख्या — युद्ध करते-करते सूर्य अस्त होने से दिवस का अन्त हो गया और आलोक के पत्र रूपी दिवस के हृदय पर राम-रावण के अनिर्णीत युद्ध की अमर गाथा लिखी होने के कारण अधूरी रह गई। अर्थात् दिन भर राम-रावण की सेना में भीषण युद्ध हुआ, किन्तु किसी भी पक्ष की जय-पराजय का निर्णय नहीं हो पाया। आज का युद्ध एक निर्णायक युद्ध था, किन्तु यह युद्ध अजेय बनकर ही अमर हो गया। राम और रावण की सेना के वीर योद्धाओं ने तीक्ष्ण बाणों को धारण कर फुर्तीले हाथों से परस्पर प्रहार किया। तीव्र वेग से सौ-सौ भालों को एक साथ चलाया, जिसे पक्ष-विपक्ष के वीर सैनिकों ने विफल कर दिया। युद्धोन्माद के तुमुल-नाद एवं वीरों को हुंकार से नीला आकाश निनादित होकर गूंज उठा। दोनों सेनाओं ने क्षण-प्रतिक्षण अपनी-अपनी सामरिक व्यूह रचनाओं में परिवर्तन किया, किन्तु उन व्यूहों को भंग करने का भी कौशल देखते ही वनता था। सारी व्यूह रचनाएँ रण-कौशल से भंग कर दी गईं। कोई भी व्यूह-रचना सफल न हो सकी। उस दिन का वह युद्ध-कौशल अद्भुत एवं विस्मयजनक था, राक्षसी सेना के आक्रमण के विरुद्ध राम की सेना ने प्रत्याक्रमण किया। क्रोधित वानर सेना ने हू-हू की आवाज की।

(2)


विच्छुरित वह्नि – राजीवनयन – हतलक्ष्य – बाण,
लोहितलोचन – रावण मदमोचन – महीयान,
राघव-लाघव – रावण – वारण – गत – युग्म – प्रहर,
उद्धत – लंकापति मर्दित – कपि – दल-बल – विस्तर,
अनिमेष – राम-विश्वजिद्दिव्य – शर – भंग – भाव,
विद्धांग-बद्ध – कोदण्ड – मुष्टि – खर – रुधिर – स्राव |

व्याख्या — रावण और राम के युद्ध में सभी जगह आग ही आग फैल गई। कमल के समान नयनों वाले राम के बाण भी लक्ष्य पर चोट नहीं कर पाये। उनका निशाना भी चूक गया। युद्धोन्माद से लाल नेत्रों वाले रावण के युद्ध-दर्प को नष्ट करने के लिए राम का श्रेष्ठ युद्ध-कौशल और रावण द्वारा उसका विफल कर देना, यही क्रम दोपहर तक चलता रहा। अन्त में प्रचण्ड रावण ने विशाल वानर सेना की शक्ति को कुचल ही डाला। राम ने समस्त विश्व को भी विजय करने में सक्षम अपने दिव्य बाणों को विफल होते हुए देखा तो उनकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं। शत्रु-पक्ष के बार्णो से राम के अंग-प्रत्यंग घायल हो गए। वे धनुष पर मुट्ठी कसे खड़े थे। उनके घायल अंगों से रक्त तीव्र गति से बह रहा था।

(3)


रावण – प्रहार – दुर्वार – विकल वानर – दल – बल,
मुर्छित – सुग्रीवांगद – भीषण – गवाक्ष – गय – नल,
वारित – सौमित्र – भल्लपति – अगणित – मल्ल – रोध,
गर्ज्जित – प्रलयाब्धि – क्षुब्ध हनुमत् – केवल प्रबोध,
उद्गीरित – वह्नि – भीम – पर्वत – कपि चतुःप्रहर,
जानकी – भीरू – उर – आशा भर – रावण सम्बर।

व्याख्या –– रावण के दुर्निवार प्रहारों से वानर सेना व्याकुल हो गई। सुग्रीव, अंगद, गवाक्ष, नल आदि वीर सेनानी रावण के भयंकर प्रहारों से घायल होकर चेतना-शून्य हो गये। लक्ष्मण, जाम्बवन्त आदि असंख्य योद्धाओं ने राक्षस-सेना को रोका, किन्तु उनका प्रयत्न शत्रु पक्ष ने विफल कर दिया। राम-दल में केवल एक हनुमान ही चेतना वाले थे। वे क्रुद्ध होकर प्रलयकालीन भयंकर समुद्र की भाँति गरज रहे थे। क्रोध में तमतमाया उनका मुख ऐसा मालूम हो रहा था, जैसे भयंकर एवं विशाल ज्वालामुखी पर्वत से अग्नि की लपटें निकल रही हों। इस प्रकार परम पराक्रमी हनुमान चार प्रहर तक रावण की भयंकर सेना से युद्ध करते रहे। अकेले वीर हनुमान ने ही इस प्रकार चार पहर रावण से युद्ध करके सीता के लिए चिन्तित राम के हृदय में आशा का संचार किया अथवा युद्ध की गतिविधियों से हताश जानकी के हृदय में मुक्ति की आशा जगाई।

(4)

लौटे युग – दल – राक्षस – पदतल पृथ्वी टलमल,
बिंध महोल्लास से बार – बार आकाश विकल।
वानर वाहिनी खिन्न, लख निज – पति – चरणचिह्न
चल रही शिविर की ओर स्थविरदल ज्यों विभिन्न। प्रशमित हैं वातावरण, नमित – मुख सान्ध्य कमल लक्ष्मण चिन्तापल पीछे वानर वीर – सकल ;

व्याख्या —व्याख्या-सन्ध्या के समय युद्ध-विराम के पश्चात् वानर सेना तथा राक्षस-सेना दोनों ही विश्राम करने को लौट पड़ीं। राक्षस-सेना के पद-भार से पृथ्वी प्रकम्पित हो रही थी। राक्षसों के हर्षोल्लास भरे निनाद से आहत आकाश बार-बार व्याकुल हो उठा। आज के भीषण युद्ध से उदास वानर सेना अपने स्वामी राम के पद चिह्नों को देखती हुई अपने युद्ध शिविर (छावनी) की ओर ऐसे बढ़ रही थी, जैसे अनेक वृद्धों या बौद्ध भिक्षुओं के समूह चल रहे हों। वातावरण शान्त था। लक्ष्मण सन्ध्या के झुके हुए कमल के समान नीचा मुख किये चिन्तित चले जा रहे थे और उनके पीछे-पीछे समस्त वानर-वीर अपने शिविर की ओर बढ़ रहे थे।

(5)


रघुनायक आगे अवनी पर नवनीत-चरण,
श्लथ धनु-गुण है, कटिबन्ध स्रस्त तूणीर-धरण,
दृढ़ जटा – मुकुट हो विपर्यस्त प्रतिलट से खुल
फैला पृष्ठ पर, बाहुओं पर, वक्ष पर, विपुल
उतरा ज्यों दुर्गम पर्वत पर नैशान्धकार
चमकतीं दूर ताराएं ज्यों हों कहीं पार।

व्याख्या –– सबसे आगे अपने मक्खन जैसे कोमल चरणों को पृथ्वी पर रखते हुए राम चल रहे थे। उनके धनुष की डोरी ढीली थी और कमर बन्ध, जिससे बाणों का तरकस बँधा था खिसका हुआ था। दृढ़ता से बाँधा गया जटाओं का मुकुट भी अब अस्त-व्यस्त हो चुका था। उसकी प्रत्येक लट बिखर गई थी। समस्त जटाएँ खुलकर उनकी पीठ पर, भुजाओं पर, विशाल वक्षस्थल (छाती) पर बिखर रही थी। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो किसी दुर्गम पर्वत पर रात्रि का अन्धकार उतर आया हो। यहाँ रात्रि के अन्धकार से तात्पर्य राम की काली-काली जटाओं के फैल जाने से है। राम की ऑंखें इन जटाओं के बीच से ऐसे चमक रहे थी जैसे रात्रि के अंधकार को चीरकर दूर से तारे चमक रहे हों |

(6)

आये सब शिविर,सानु पर पर्वत के, मन्थर
सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान आदिक वानर
सेनापति दल – विशेष के, अंगद, हनुमान
नल नील गवाक्ष, प्रात के रण का समाधान करने के लिए, फेर वानर दल आश्रय स्थल। बैठे रघु-कुल-मणि श्वेत शिला पर, निर्मल जल
ले आये कर – पद क्षालनार्थ पटु हनुमान
अन्य वीर सर के गये तीर सन्ध्या – विधान
वन्दना ईश की करने को, लौटे सत्वर,
सब घेर राम को बैठे आज्ञा को तत्पर,
पीछे लक्ष्मण, सामने विभीषण, भल्लधीर,
सुग्रीव, प्रान्त पर पाद-पद्म के महावीर,
यूथपति अन्य जो, यथास्थान हो निर्निमेष
देखते राम का जित-सरोज-मुख-श्याम-देश।

व्याख्या — समस्त राम-सेना पर्वत शिखर पर स्थित युद्ध-शिविर में आ गई। सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान आदि वानर-दल के सेनापति, अंगद, हनुमान, नल, नील, गवाक्ष आदि कल प्रातःकाल आरम्भ होने वाले युद्ध के विषय में विचार-विमर्श हेतु, अपने-अपने दल को विश्राम शिविरों में पहुँचा कर धीरे-धीरे लौट आये। रघुकुल मणि राम पर्वत की श्वेत शिला पर बैठ गये। चतुर हनुमान शीघ्र ही उनके हाथ और पैर धोने के लिए स्वच्छ जल ले आये। अन्य वीर सेनापति तालाब के तट पर सन्ध्या वन्दन आदि द्वारा ईश्वर-वन्दना के लिए चले गये और अपना नित्यकर्म करके शीघ्र ही लौट आये। आज्ञा-पालन को तैयार सभी सैनिक राम को घेरकर बैठ गये। राम के पीछे लक्ष्मण, सामने विभीषण, पार्श्व में सुग्रीव और चरणों के समीप सेवक हनुमान बैठ गये। इनके अतिरिक्त अन्य सेनापति भी यथा-स्थान बैठकर पलक झपकाये बिना राम के नील कमल की कान्ति को जीतने वाले श्याम मुख की शोभा देखने लगे |

(7)

है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार,
खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार,
अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल,
भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल।
स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर – फिर संशय
रह – रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय,
जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपु-दम्य-श्रान्त,
एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त,
कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार – बार,
असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार-हार।

व्याख्या — अमावस की रात थी और आकाश घना अन्धकार उगल रहा था। इस घने अन्धकार में दिशा-ज्ञान भी खो गया था अर्थात् घने अन्धकार के कारण यह भी पता नहीं चल रहा था कि कौन सी दिशा किस ओर है। चलने वाली हवा भी आज वातावरण के अनुरूप ही शान्त थी। विशाल सागर पीछे लगातार गर्जन कर रहा था। इस प्रकार मौन में पर्वत जैसे समाधिस्थ हो गया हो। प्रकाश का एक मात्र साधन एक मशाल जल रही थी। आज राम अन्तर्द्वन्द्व से पीड़ित हैं। स्वभाव से ही शान्त रहने वाले राघवेन्द्र अर्थात राम को संशय बार-बार चंचल कर जाता है। उनकी यह मानसिक चंचलता उनके सहज स्वभाव के विपरीत है। उनके मन में बार-बार रावण-विजय का भय जाग उठता है और उन्हें प्रकम्पित कर जाता है। उन्हें आशंका है कि यदि रावण जैसे अत्याचारी एवं असत् के प्रतीक की विजय हो गई तो समस्त संसार के जीवन की क्या दशा होगी। रावण की जय तो असत् की जय होगी। इससे समाज के जीवन का क्या होगा। राम की चिन्ता यहाँ हित की चिन्ता है। राम चिन्तित हैं कि जो हृदय कभी भी शत्रु से पराजित और थकित नहीं हुआ और जिस अकेले का दस-दस हजार, एक लाख शत्रु भी दमन नहीं कर सके, अर्थात् जो हृदय अगणित शत्रुओं से भी पराजित नहीं हुआ, वही हृदय कल शत्रु से युद्ध करने से व्याकुल हो रहा है। वह युद्ध के लिए तैयार हो-होकर न जाने क्यों आज बार-बार अपनी पराजय ही स्वीकार कर रहा है |

(8)

ऐसे क्षण अन्धकार घन में जैसे विद्युत
जागी पृथ्वी तनया कुमारिका छवि अच्युत
देखते हुए निष्पलक, याद आया उपवन
विदेह का, -प्रथम स्नेह का लतान्तराल मिलन
नयनों का-नयनों से गोपन-प्रिय सम्भाषण,-
पलकों का नव पलकों पर प्रथमोत्थान-पतन,-
काँपते हुए किसलय,-झरते पराग-समुदय,-
गाते खग-नव-जीवन-परिचय-तरू मलय-वलय,-
ज्योतिःप्रपात स्वर्गीय,-ज्ञात छवि प्रथम स्वीय,-
जानकी-नयन-कमनीय प्रथम कम्पन तुरीय।

व्याख्या — निराशा एवं विषाद के इन अँधेरे क्षणों में सहसा जनक-नन्दिनी कुमारी सीता की छवि राम के मानस पटल पर ऐसे जग उठी जैसे बादल में बिजली कौंध गई हो। राम अपलक नेत्रों से उस छवि को देख रहे थे। उन्हें राजा जनक का उपवन, वह पुष्प वाटिका याद आ गई, जहाँ उन्हें सीता के प्रथम दर्शन हुए थे। इस पुष्प वाटिका में ही पहली बार लताओं के झुरमुट में उनका प्रिया सीता से स्नेहपूर्ण मिलन हुआ था। यहाँ पर ही राम के नयनों ने पहली बार सीता के स्नेहिल नयनों से प्रेम पूर्ण भाषा में मधुर वार्तालाप किया था। राम के पलक प्रथम बार सीता के पलकों पर उठे और झुके थे अथवा प्रथम बार सीता के पलक राम को देखकर लज्जा से झुके थे अर्थात सीता के पलकों ने प्रथम बार प्रेम की अनुभूति की थी। उस प्रेम के मधुर वातावरण में वृक्षों तथा लताओं की नई-नई कोंपलें हिल रही थीं। पराग कणों के समूह अधिक प्रसन्नता प्रकट करते हुए झर रहे थे। पक्षी अपने कलरव में नवजीवन परिचय के गीत गा रहे थे। चारों ओर सुगंधि बिखराते हुए चन्दन वृक्षों का समूह घेरे खड़ा था। प्रातः कालीन सूर्य का स्वर्गीय प्रकाश झरने के समान झर रहा था। राम को प्रथम बार अप्रतिम सौन्दर्य की अनुभूति हुई थी। उनके और सीता के सुन्दर नयन आज प्रथम बार ही मिले थे। इससे उत्पन्न कम्पन ने मन को समाधि की तुरीयावस्था में पहुँचा दिया था, जिसमें योगी को पूर्ण आत्म-विस्मृति हो जाती है अर्थात् सीता के सुन्दर नेत्रों से अपने नेत्र मिलते ही राम अपनी सुध-बुध खो बैठे थे।

(9)

सिहरा तन, क्षण-भर भूला मन, लहरा समस्त,
हर धनुर्भंग को पुनर्वार ज्यों उठा हस्त,
फूटी स्मिति सीता ध्यान-लीन राम के अधर,
फिर विश्व-विजय-भावना हृदय में आयी भर,
वे आये याद दिव्य शर अगणित मन्त्रपूत,-
फड़का पर नभ को उड़े सकल ज्यों देवदूत,
देखते राम, जल रहे शलभ ज्यों रजनीचर,
ताड़का, सुबाहु, बिराध, शिरस्त्रय, दूषण, खर; फिर देखी भीमा मूर्ति आज रण देखी जो
आच्छादित किये हुए सम्मुख समग्र नभ को,
ज्योतिर्मय अस्त्र सकल बुझ बुझ कर हुए क्षीण,
पा महानिलय उस तन में क्षण में हुए लीन;
लख शंकाकुल हो गये अतुल बल शेष शयन,
खिंच गये दृगों में सीता के राममय नयन;
फिर सुना हँस रहा अट्टहास रावण खलखल,
भावित नयनों से सजल गिरे दो मुक्ता-दल।

व्याख्या — सीता का मधुर स्मरण होते ही राम के गतिहीन शरीर में स्पन्दन हुआ। क्षण भर के लिए वे आत्मविभोर होकर विषादमय दशा से मुक्त हो गये। उनके मन में एक लहर उठी अर्थात् उनका मन नवीन उत्साह से भर उठा। ऐसा प्रतीत हुआ, मानो कि शिव का धनुष तोड़ने के लिए राम का हाथ पुनः उठ गया हो। सीता के ध्यान में लीन राम के होठों पर हास फूट पड़ा और उनका हृदय विश्व-विजय की भावना से भर गया, अर्थात् सीता-स्मरण से उत्पन्न शक्ति एवं उत्साह से उनमें विश्व-विजय का पराक्रम भर गया। इस भावना से ऊर्जस्वित राम को मन्त्र द्वारा पवित्र, अपने असंख्य दिव्य बाणों का स्मरण हो आया। ये सभी बाण अपने पंखों को फड़का-फड़का कर आकाश में देवदूतों के समान उड़ गये। राम देख रहे थे कि अग्नि वर्षा करने वाले उन बाणों की ज्वाला में ताड़का, सुबाहु, विराध, त्रिशिरा, खर और दूषण आदि राक्षस समूह निस्सहाय होकर भस्म हुए जा रहे हैं।

इसके पश्चात् राम के मानस पटल पर वह भयंकर मूर्ति अंकित हो गई जिसे युद्ध में देख चुके थे। यह शक्ति-रूपी भयंकर मूर्ति सारे आकाश को ढके हुए थी। राम के समस्त आग्नेयास्त्र इस मूर्ति में ही प्रवेश करके बुझ गये थे, अर्थात् विफल हो गये थे और रावण के शरीर पर आँच तक नहीं आ पायी थी। उस अन्धकार में अत्यन्त विशाल स्थान पाकर वे एक क्षण में ही उस विशाल मूर्ति के शरीर में समा गये थे। शेषशायी विष्णु जिनमें अपार शक्ति थी, उस भयंकर पूर्ति का स्मरण करके शंका-ग्रस्त हो गये। उनका विजय का स्वप्न भंग हो गया और वे पुनः संशय से भर उठे। उनके नेत्रों में सीता के राममय नेत्र अंकित हो गये, अर्थात् वे सीता के उद्धार के लिए चिन्तित हो गये। वे सोचने लगे कि इस सीता को रावण से किस प्रकार मुक्त करावा जा सकेगा, जिसके नेत्रों में हर क्षण उनका रूप अंकित है। इसी क्षण राघवेन्द्र ने खल-खल की ध्वनि करते रावण का युद्धोन्मत्त अट्टहास सुना और राम के भावुक नेत्रों से जैसे मोती के समान दो अश्रु-बिन्दु टपक पड़े।

(10)

बैठे मारुति देखते राम-चरणारविन्द-
युग ‘अस्ति-नास्ति’ के एक रूप, गुण-गण-अनिन्द्य;
साधना-मध्य भी साम्य-वाम-कर दक्षिणपद,
दक्षिण-कर-तल पर वाम चरण, कपिवर गद् गद्
पा सत्य सच्चिदानन्द रूप, विश्राम – धाम,
जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम – नाम।

व्याख्या — चरणों के समीप बैठे राम भक्त हनुमान राम के ही चरण-कमलों के दर्शन कर रहे थे। वे राम के दोनों चरण ईश्वर के अस्तित्व और अनस्तित्व दोनों के समन्वित रूप ही थे और समस्त गुणों के रूप थे। हनुमान की साधना में समरसता थी। उनका बायाँ हाथ राम के दायें चरण पर रखा था और दायें हाथ की हथेली पर बायाँ चरण टिका था। हनुमान भगवान के सत्, चित् और आनन्दमय रूप को सामने पाकर हर्ष से पुलकित हो उठे। भगवान का यह दिव्य रूप मुक्ति धाम था, अर्थात् इस दिव्य रूप के दर्शन से मुक्ति मिलना निश्चित था। उस समय हर्ष-मुखर हनुमान भक्ति-भाव से भरकर अजपा जाप कर रहे थे और द्वैत भाव से राम-राम रट रहे थे। यद्यपि सोहम अर्थात् ‘वही मैं हूँ’ के अनुसार आत्मा-परमात्मा में भिन्नता नहीं है, दोनों एक ही हैं, फिर भी द्वैतमूला भक्ति के सन्दर्भ में हनुमान राम को सेव्य और अपने को सेवक समझकर अपने आराध्य राम के नाम की रट लगा रहे थे।

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